June 30, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 202 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ दोवाँ अध्याय देवपूजा के योग्य और अयोग्य पुष्प पुष्पाध्यायकथनं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! भगवान् श्रीहरि पुष्प, गन्ध, धूप, दीप और नैवेद्य के समर्पण से ही प्रसन्न हो जाते हैं। मैं तुम्हारे सम्मुख देवताओं के योग्य एवं अयोग्य पुष्पों का वर्णन करता हूँ। पूजन में मालती- पुष्प उत्तम है। तमाल-पुष्प भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। मल्लिका (मोतिया) समस्त पापों का नाश करती है तथा यूथिका (जूही) विष्णुलोक प्रदान करने वाली है। अतिमुक्तक (मोगरा) और लोध्रपुष्प विष्णुलोक की प्राप्ति कराने वाले हैं। करवीर – कुसुमों से पूजन करने वाला वैकुण्ठ को प्राप्त होता है तथा जपा- पुष्पों से मनुष्य पुण्य उपलब्ध करता है। पावन्ती, कुब्जक और तगर- पुष्पों से पूजन करने वाला विष्णुलोक का अधिकारी होता है। कर्णिकार (कनेर) – द्वारा पूजन करने से वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है एवं कुरुण्ट (पीली कटसरैया)- के पुष्पों से किया हुआ पूजन पापों का नाश करनेवाला होता है। कमल, कुन्द एवं केतकी के पुष्पों से परमगति की प्राप्ति होती है। बाणपुष्प, बर्बर पुष्प और कृष्ण तुलसी के पत्तों से पूजन करनेवाला श्रीहरि के लोक में जाता है। अशोक, तिलक तथा आरूष (अड़से)- के फूलों का पूजन में उपयोग करने से मनुष्य मोक्ष का भागी होता है। बिल्वपत्रों एवं शमीपत्रों से परमगति सुलभ होती है। तमालदल तथा भृङ्गराज- कुसुमों से पूजन करनेवाला विष्णुलोक में निवास करता है। कृष्ण तुलसी, शुक्ल तुलसी, कल्हार, उत्पल, पद्म एवं कोकनद — ये पुष्प पुण्यप्रद माने गये हैं ॥ १-७ ॥’ भगवान् श्रीहरि सौ कमलों की माला समर्पण करने से परम प्रसन्न होते हैं। नीप, अर्जुन, कदम्ब, सुगन्धित बकुल (मौलसिरी), किंशुक (पलाश), मुनि (अगस्त्यपुष्प), गोकर्ण, नागकर्ण (रक्त एरण्ड), संध्यापुष्पी (चमेली), बिल्वातक, रञ्जनी एवं केतकी तथा कूष्माण्ड, ग्रामकर्कटी, कुश, कास, सरपत, विभीतक, मरुआ तथा अन्य सुगन्धित पत्रों द्वारा भक्तिपूर्वक पूजन करने से भगवान् श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। इनसे पूजन करनेवाले के पाप नाश होकर उसको भोग मोक्ष की प्राप्ति होती है। लक्ष स्वर्णभार से पुष्प उत्तम है, पुष्पमाला उससे भी करोड़गुनी श्रेष्ठ हैं, अपने तथा दूसरों के उद्यान के पुष्पों की अपेक्षा वन्य पुष्पों का तिगुना फल माना गया है ॥ ८- १११/२ ॥ झड़कर गिरे, अधिकाङ्ग एवं मसले हुए पुष्पों से श्रीहरि का पूजन न करे। इसी प्रकार कचनार, धत्तूर, गिरिकर्णिका (सफेद किणही ), कुटज, शाल्मलि (सेमर) एवं शिरीष (सिरस ) वृक्ष के पुष्पों से भी श्रीविष्णु की अर्चना न करे। इससे पूजा करनेवाले का नरक आदि में पतन होता है। विष्णु भगवान् का सुगन्धित रक्तकमल तथा नीलकमल कुसुमों से पूजन होता है। भगवान् शिव का आक, मदार, धत्तूर- पुष्पों से पूजन किया जाता है; किंतु कुटज, कर्कटी एवं केतकी (केवड़े) के फूल शिव के ऊपर नहीं चढ़ाने चाहिये। कूष्माण्ड एवं निम्ब के पुष्प तथा अन्य गन्धहीन पुष्प ‘पैशाच’ माने गये हैं ॥ १२-१५ ॥ अहिंसा, इन्द्रियसंयम, क्षमा, ज्ञान, दया एवं स्वाध्याय आदि आठ भावपुष्पों से देवताओं का यजन करके मनुष्य भोग मोक्ष का भागी होता है। इनमें अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रिय-निग्रह द्वितीय पुष्प है, सम्पूर्ण भूत प्राणियों पर दया तृतीय पुष्प है, क्षमा चौथा विशिष्ट पुष्प है। इसी प्रकार क्रमशः शम, तप एवं ध्यान पाँचवें, छठे और सातवें पुष्प हैं। सत्य आठवाँ पुष्प है। इनसे पूजित होने पर भगवान् केशव प्रसन्न हो जाते हैं। इन आठ भावपुष्पों से पूजा करने पर ही भगवान् केशव संतुष्ट होते हैं। नरश्रेष्ठ! अन्य पुष्प तो पूजा के बाह्य उपकरण हैं, श्रीविष्णु तो भक्ति एवं दया से समन्वित भाव- पुष्पों द्वारा पूजित होने पर परितुष्ट होते हैं ॥ १६-१९ ॥ जल वारुण पुष्प है; घृत, दुग्ध, दधि सौम्य पुष्प हैं; अन्नादि प्राजापत्य पुष्प हैं, धूप-दीप आग्नेय पुष्प हैं, फल- पुष्पादि पञ्चम वानस्पत्य पुष्प हैं, कुशमूल आदि पार्थिव पुष्प हैं; गन्ध- चन्दन वायव्य कुसुम हैं, श्रद्धादि भाव वैष्णव प्रसून हैं। ये आठ पुष्पिकाएँ हैं, जो सब कुछ देनेवाली हैं। आसन (योगपीठ), मूर्ति निर्माण, पञ्चाङ्गन्यास तथा अष्टपुष्पिकाएँ — ये विष्णुरूप हैं। भगवान् श्रीहरि पूर्वोक्त अष्टपुष्पिका द्वारा पूजन करने से प्रसन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त भगवान् श्रीविष्णु का ‘वासुदेव’ आदि नामों से एवं श्रीशिव का ‘ईशान’ आदि नाम-पुष्पों से भी पूजन किया जाता है ॥ २०-२३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘पुष्पाध्याय’ नामक दो सौ दोनों अध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe