July 10, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 264 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौंसठवाँ अध्याय देवपूजा तथा वैश्वदेव-बलि आदि का वर्णन देवपूजावैश्व देव बलिः पुष्कर कहते हैं — परशु राम ! अब मैं देवपूजा आदि कर्म का वर्णन करूँगा, जो उत्पातों को शान्त करने वाला है। मनुष्य स्नान करके ‘आपो हि ष्ठा०’ (यजु० ३६ । १४-१६) आदि तीन मन्त्रों से भगवान् श्रीविष्णु को अर्घ्य समर्पित करे। फिर ‘हिरण्यवर्णा०’ (ऋ० प० ११ । ११ । १-३) आदि तीन मन्त्रों से पाद्य समर्पित करे। ‘शं नो आपः०’ इस मन्त्र से आचमन एवं ‘इदमापः०’ (यजु० ६ । १७) मन्त्र से अभिषेक अर्पण करे। ‘रथे०, अक्षेषु० एवं चतस्रः‘ (यजु०) इन तीन मन्त्रों से भगवान् के श्रीअङ्गों में चन्दन का अनुलेपन करे। फिर ‘युवा सुवासाः०’ (ऋक्० ३ । ८ । ४) मन्त्र से वस्त्र और ‘पुष्पवती’ (अथर्व० ८ । ७ । २७) इत्यादि मन्त्र से पुष्प एवं ‘धूरसि०’ (यजु० १ । ८) आदि मन्त्र से धूप समर्पित करे। ‘तेजोऽसि शुक्रमसि०’ (यजु० १ । ३१) इस मन्त्र से दीप तथा ‘दधिक्राव्णो’ (यजु० २३ । ३२) मन्त्र से मधुपर्क निवेदन करे। नरश्रेष्ठ। तदनन्तर ‘हिरण्यगर्भः०’ आदि आठ ऋचाओं का पाठ करके अन्न एवं सुगन्धित पेय पदार्थ का नैवेद्य समर्पित करे। इसके अतिरिक्त भगवान् को चामर, व्यजन, पादुका, छत्र, यान एवं आसन आदि जो कुछ भी समर्पित करना हो, वह सावित्र मन्त्र से अर्पण करे। फिर ‘पुरुषसूक्त‘ का जप करे और उसी से आहुति दे। भगवद्विग्रह के अभाव में वेदिका पर स्थित जलपूर्ण कलश में, अथवा नदी के तट पर, अथवा कमल के पुष्प में भगवान् विष्णु का पूजन करने से उत्पातों की शान्ति होती है ॥ १-७ ॥’ (काम्य बलिवैश्वदेव-प्रयोग) भूमिस्थ वेदी का मार्जन एवं प्रोक्षण करके उसके चारों ओर कुश को बिछावे। फिर उस पर अग्नि को प्रदीप्त करके उसमें होम 1 करें। महाभाग परशुराम ! मन और इन्द्रियों को संयम में रखते हुए सब प्रकार की रसोई में से अग्राशन भोजन का वह अंश जो देवता के लिये पहले निकाल दिया जाता है । यह अग्राशन पशुओं और सन्यासियों को दिया जाता है ।निकालकर गृहस्थ द्विज क्रमशः वासुदेव आदि के लिये आहुतियाँ दे। मन्त्र वाक्य इस प्रकार हैं — ‘प्रभवे अव्ययाय देवाय वासुदेवाय नमः स्वाहा । अग्नये नमः स्वाहा । सोमाय नमः स्वाहा । मित्राय नमः स्वाहा । वरुणाय नमः स्वाहा । इन्द्राय नमः स्वाहा । इन्द्राग्नीभ्यां नमः स्वाहा । विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः स्वाहा । प्रजापतये नमः स्वाहा । अनुमत्यै नमः स्वाहा । धन्वन्तरये नमः स्वाहा । वास्तोष्पतये नमः स्वाहा । देव्यै 2 नमः स्वाहा । एवं अग्नये स्विष्टकृते नमः स्वाहा।’ इन देवताओं को उनका चतुर्थ्यन्त नाम लेकर एक-एक ग्रास अन्न की आहुति दे। तत्पश्चात् निम्नाङ्कित रीति से बलि समर्पित करे ॥ ८-१२ ॥ धर्मज्ञ ! पहले अग्नि दिशा से आरम्भ करके तक्षा, उपतक्षा, अश्वा, ऊर्जा, निरुन्धी, धूम्रिणीका, अस्वपन्ती तथा मेघपत्नी — इनको बलि अर्पित करे। भृगुनन्दन। ये ही समस्त बलिभागिनी देवियों के नाम हैं। क्रमशः आग्नेय आदि दिशाओं से आरम्भ करके इन्हें बलि दे। (बलि-समर्पण के वाक्य इस प्रकार हैं — तक्षायै नमः आग्नेय्याम्, उपतक्षायै नमः याम्ये, अश्वाभ्यो नमः नैऋत्ये, ऊर्णाभ्यो नमः वारुण्याम्, निरुन्ध्यै नमः वायव्ये, धूम्रिणीकायै नमः उदीच्याम्, अस्वपन्त्यै नमः ऐशान्याम्, मेघपत्न्यै नमः प्राच्याम्।) भार्गव । तदनन्तर नन्दिनी आदि शक्तियों को बलि अर्पित करे । यथा — नन्दिन्यै नमः, सुभगायै नमः (अथवा सौभाग्यायै नमः), सुमङ्गल्यै नमः, भद्रकाल्यै 3 नमः। इन चारों के लिये पूर्वादि चारों दिशाओं में बलि देकर किसी खम्भे या खूँटे पर लक्ष्मी 4 आदि के लिये बलि दे। यथा — श्रियै नमः, हिरण्यकेश्यै नमः तथा वनस्पतये नमः। द्वार पर दक्षिण भाग में ‘धर्ममयाय नमः’, वामभाग में ‘अधर्ममयाय नमः’, घर के भीतर ‘ध्रुवाय नमः’, घर के बाहर ‘मृत्यवे नमः’ तथा जलाशय में ‘वरुणाय नमः’ इस मन्त्र से बलि अर्पित करे। फिर घर के बाहर ‘भूतेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से भूतबलि दे। घर के भीतर ‘धनदाय नमः’ कहकर कुबेर को बलि दे। इसके बाद मनुष्य घर से पूर्वदिशा में ‘इन्द्राय नमः, इन्द्रपुरुषेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से इन्द्र और इन्द्र के पार्षदपुरुषों को बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् दक्षिण में ‘यमाय नमः, यमपुरुषेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से, ‘वरुणाय नमः, वरुणपुरुषेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से पश्चिम में, ‘सोमाय नमः, सोमपुरुषेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से उत्तर में और ‘ब्रह्मणे वास्तोष्यतये नमः, ब्रह्मपुरुषेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से गृह के मध्यभाग में बलि दे। ‘विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से घर के आकाश में ऊपर की ओर बलि अर्पित करे। ‘स्थण्डिलाय नमः’ इस मन्त्र से पृथ्वी पर बलि दे। तत्पश्चात् ‘दिवाचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से दिन में बलि दे तथा ‘रात्रिचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः’ इस मन्त्र से रात्रि में बलि अर्पित करे। घर के बाहर जो बलि दी जाती है, उसे प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल देते रहना चाहिये। यदि दिन में श्राद्ध सम्बन्धी पिण्डदान किया जाय तो उस दिन सायंकाल में बलि नहीं देनी चाहिये ॥ १३-२२ ॥ पितृ-श्राद्ध में दक्षिणाग्र कुशोंपर पहले पिता को, फिर पितामह को और उसके बाद प्रपितामह को पिण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार पहले माता को, फिर पितामही को, फिर प्रपितामही को पिण्ड अथवा जल दे। इस प्रकार ‘पितृयाग’ करना चाहिये ॥ २३१/२ ॥ बने हुए पाक में से बलिवैश्वदेव करने के बाद पाँच बलियाँ दी जाती हैं। उनमें सर्वप्रथम ‘गो- बलि’ है; किंतु यहाँ पहले ‘काकबलि ‘ का विधान किया गया है — काकबलि इन्द्रवारुणवायव्या याम्या वा नैर्ऋताश्च ये । ते काकाः प्रतिगृह्णन्तु इमं पिण्डं मयोद्धृतम् ॥ 5 ‘जो इन्द्र, वरुण, वायु, यम एवं निर्ऋति देवता की दिशा में रहते हैं, वे काक मेरे द्वारा प्रदत्त यह पिण्ड ग्रहण करें।’ इस मन्त्र से काकबलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्र से कुत्तों के लिये अन्न का ग्रास दे ॥ २४-२५ ॥ कुक्कुर-बलि विवस्वतः कुले जातौ द्वौ श्यामशबलौ 6 शुनौ । ताभ्यां पिण्डं प्रदास्यामि रक्षां पथि मां सदा ॥ ‘श्याम और शबल (काले और चितकबरे) रंग वाले दो श्वान विवस्वान् के कुल में उत्पन्न हुए हैं। मैं उन दोनों के लिये पिण्ड प्रदान करता हूँ। वे लोक-परलोक के मार्ग में सदा मेरी रक्षा करें’ ॥ २६ ॥ गो-ग्रास सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पापनाशनाः 7 । प्रतिगृह्णन्तु में ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः ॥ ‘त्रैलोक्यजननी, सुरभिपुत्री गौएँ सबका हित करने वाली, पवित्र एवं पापों का विनाश करने वाली हैं। वे मेरे द्वारा दिये हुए ग्रास को ग्रहण करें।’ इस मन्त्र से गो-ग्रास देकर स्वस्त्ययन “कल्याण, शुभ या मंगल की कामना करना”करे। फिर याचकों को भिक्षा दिलावे। तदनन्तर दीन प्राणियों एवं अतिथियों का अन्न से सत्कार करके गृहस्थ स्वयं भोजन करे ॥ २७-२८ ॥ (अनाहिताग्नि पुरुष निम्नलिखित मन्त्रों से जल में अन्न की आहुतियाँ दे —) ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा। ॐ देवकृतस्यैन सोऽवयजनमसि स्वाहा। ॐ पितृकृतस्यैनसोऽवय जनमसि स्वाहा। ॐ आत्मकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। ॐ मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। ॐ एनस एनसोऽवयजनमसि स्वाहा। यच्चाहमेनो विद्वांश्चकार यच्चाविद्वांस्तस्य सर्वस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा। अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। ॐ प्रजापतये स्वाहा। यह मैंने तुमसे विष्णु पूजन एवं बलिवैश्व देव का वर्णन किया ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘देवपूजा और वैश्वदेव बलि का वर्णन’ नामक दो सौ चौसठयाँ अध्धाय पूरा हुआ ॥ २६४ ॥ 1. यहाँ मूल में संक्षेप से अग्निस्थापन की विधि दी गयी है। इसे विशदरूप में इस प्रकार समझे — पहले भूमिस्थ वेदी पर कुशों से सम्मार्जन करके उन कुशों को ईशान दिशा में फेंक दे; इसके बाद उस वेदी पर शुद्ध जल छिड़के। तदनन्तर स्रुवा के मूलभाग से उस वेदी पर तीन उत्तरोत्तर रेखाएँ अङ्कित करे। इन रेखाओं की लंबाई प्रादेशमात्र हो । उल्लेखन-क्रम से रेखाओं के ऊपर से थोड़ी-थोड़ी मिट्टी अनामिका एवं अङ्गुष्ठ द्वारा उठाकर बायें हाथ पर रखे और उन सबको एक साथ फेंक दे। तत्पश्चात् गोबर और जल से उस वेदी को लीपे और उसके ऊपर कांस्यपात्र में अग्नि मँगाकर स्थापित करे । उस अग्नि के ऊपर कुछ काष्ठ की समिधाएँ रखकर अग्नि को प्रज्वलित करे । वेदी के चारों ओर कुश बिछा दे । फिर प्रज्वलित अग्नि में होम करे । 2. मनुस्मृति के अनुसार यह आहुति ‘ द्यावा-पृथिवी’ के लिये दी जाती है । यथा — ‘ द्यावापृथिवीभ्यां नमः स्वाहा । ‘ 3. मनुस्मृति के अनुसार भद्रकाली को बलि वास्तुपुरुष के चरण की दिशा — दक्षिण-पश्चिम में देनी चाहिये । 4. लक्ष्मी को वास्तुपुरुष के शिरोभाग उत्तर – पूर्व में बलि दी जाती है । 5. उत्तरार्ध के स्थान में यह पाठान्तर उपलब्ध होता है — वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम् । 6. कहीं कहीं — द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ । ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ ॥ – ऐसा पाठ मिलता है। 7. पाठान्तर — ‘पुण्यराशयः । ‘ Content is available only for registered users. 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