अग्निपुराण – अध्याय 285
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
दो सौ पचासीवाँ अध्याय
मृतसंजीवनकारक सिद्ध योगों का कथन
मृतसञ्जीवनीकरसिद्धयोगः

धन्वन्तरि कहते हैं — सुश्रुत । अब मैं आत्रेय के द्वारा वर्णित मृतसंजीवनकारक दिव्य सिद्ध योगों को कहता हूँ, जो सम्पूर्ण व्याधियों का विनाश करने वाले हैं ॥ १ ॥

आत्रेय ने कहा — वातज्वर में बिल्वादि पञ्चमूल- बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटल एवं अरणी का काढ़ा दे और पाचन के लिये पिप्पलीमूल गिलोय और सोंठ इनका क्वाथ दे। आँवला, अभया (बड़ी हर्रै), पीपल एवं चित्रक — यह आमलक्यादि क्वाथ सब प्रकार के ज्वरों का नाश करने वाला है। बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा, गम्भारी, पाटल, शालपर्णी, गोखरू, पृष्टपर्णी, बृहती (बड़ी कटेर) और कण्टकारिका (छोटी कटेर) — ये दशमूल कहे गये हैं। इनका क्वाथ तथा कुश के मूल का क्वाथ ज्वर, अपाचन, पार्श्वशूल और कास (खाँसी) का नाश करने वाला है। गिलोय, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चिरायता और सोंठ — यह ‘पञ्चभद्र क्वाथ’ वात और पित्तज्वर में देना चाहिये ॥ २-५ ॥’

निशोथ, विशाला (इन्द्रवारुणी), कुटकी, त्रिफला और अमलतास — इनका क्वाथ यवक्षार मिलाकर पिलावे। यह विरेचक और सम्पूर्ण ज्वरों को शान्त करने वाला है। देवदारु, खरेटी, अडूसा, त्रिफला और व्योष (सोंठ, काली मिर्च, पीपल), पद्मकाष्ठ, वायविडङ्ग और मिश्री — इन सबका समान भाग चूर्ण पाँच प्रकार के कास-रोगों का मर्दन करता है। रोगी मनुष्य हृदयरोग, ग्रहणी, पार्श्वरोग, हिक्का, श्वास और कासरोग के विनाश के लिये दशमूल, कचूर, रास्ना, पीपल, बिल्व, पोकरमूल, काकड़ासिंगी, भुई आँवला, भार्गी, गिलोय और पान — इनसे विधिवत् सिद्ध किया हुआ क्वाथ या यवागू आयुर्वेद में एक विशेष प्रकार का भोजन है जो जौ या चावल के मांड से बनाया जाता है। इसे सड़ाकर कुछ खट्टा किया जाता है, जिससे यह एक प्रकार की कांजी बन जाती है। यवागू को पाचन के लिए अच्छा माना जाता है और यह वात दोष को शांत करने में भी मदद करता है।का पान करे। मुलहठी (चूर्ण) के साथ मधु, शर्करा के साथ पीपल, गुड़ के साथ नागर (सौंठ) और तीनों लवण (सेंधानमक, विड्नमक और कालानमक) — ये हिक्का (हिचकी) का नाश करने वाले हैं। कारवी अजाजी (कालाजीरा, सफेदजीरा), काली मिर्च, मुनक्का, वृक्षाम्ल (इमली), अनारदाना, कालानमक और गुड़ — इन सबके समानभाग से तैयार चूर्ण का शहद के साथ निर्मित ‘कारव्यादि बटी’ सब प्रकार के अरुचि रोगों का नाश करती है। अदरख के रस के साथ मधु मिलाकर रोगी को पिलाये। इससे अरुचि, श्वास, कास, प्रतिश्याय (जुकाम) और कफविकारों का नाश होता है ॥ ६-१२ ॥

वट-वटाङ्कर, काकड़ासिंगी, शिलाजीत, लोध, अनारदाना और मुलहठी — इनका चूर्ण बनाकर उस चूर्ण के समान मात्रा में मिश्री मिला मधु के साथ अवलेह (चटनी) का निर्माण करे। इस ‘वटशुङ्गादि’ के अवलेह को चावल के पानी के साथ लिया जाय तो उससे प्यास और छर्दि (वमन)- का प्रशमन होता है। गिलोय, अडूसा, लोध और पीपल — इनका चूर्ण शहद के साथ कफयुक्त रक्त, प्यास, खाँसी एवं ज्वर को नष्ट करने वाला है। इसी प्रकार समभाग मधु से मिश्रित अडूसे का रस और ताम्रभस्म कास को नष्ट करता है। शिरीषपुष्प के स्वरस में भावित सफेद मिर्च का चूर्ण कास में (तथा सर्पविष में) हितकर है। मसूर सभी प्रकार की वेदना को नष्ट करने वाला है तथा चौंराई का साग पित्तदोष को दूर करनेवाला है। मेउड़, शारिवा, सेरुकी एवं अङ्कोल — ये विषनाशक औषध हैं। सोंठ, गिलोय, छोटी कटेरी, पोकरमूल, पीपलामूल और पीपल — इनका क्वाथ मूर्छा और मदात्यय रोग में लेना चाहिये। हींग, कालानमक एवं व्योष (सोंठ, मिर्च, पीपल) — ये सब दो-दो पल लेकर चार सेर घृत और घृत से चौगुने गोमूत्र में सिद्ध करने पर उन्माद का नाश करते हैं। शङ्खपुष्पी, वच और मीठा कूट से सिद्ध ब्राह्मी रस को मिलाकर इन सबकी गुटिका बना ले तो वह पुराने उन्माद और अपस्मार रोग का नाश करती है और उत्तम मेधावर्धक औषध है। हर्रै के साथ पञ्चगव्य या घृत का प्रयोग कुष्ठनाशक है। परवल की पत्ती, त्रिफला, नीम की छाल, गिलोय, पृश्चिपर्णी, अडूसे के पते तथा करञ्ज — इनसे सिद्ध किया घृत कुष्ठरोग का मर्दन करता है। इसे ‘वज्रक’ कहते हैं। नीम की छाल, परवल, कण्टकारि-पञ्चाङ्ग, गिलोय और अडूसा — सबको दस-दस पल लेकर भलीभाँति कूट ले। फिर सोलह सेर जल में क्वाथ बनाकर उसमें सेरभर घृत और (बीस तोले) त्रिफला चूर्ण का कल्क बनाकर डाल दे और चतुर्थांश शेष रहने तक पकाये। यह ‘पञ्चतिक्त घृत’ कुष्ठनाशक है। यह अस्सी प्रकार के वातरोग, चालीस प्रकार के पित्तरोग और बीस प्रकार के कफरोग, खाँसी, पीनस (बिगड़ी जुकाम), बवासीर और व्रणरोगों का नाश करता है। जैसे सूर्य अन्धकार को नष्ट कर डालता है, उसी प्रकार यह योगराज निःसंदेह अन्य रोगों का भी विनाश कर देता है ॥ १३-२४१/२

उपदंश की शान्ति के लिये त्रिफला के क्वाथ या भृङ्गराज के रस से व्रणों का प्रक्षालन करे (धोये)। परवल को पत्ती के चूर्ण के साथ अनार की छाल का चूर्ण अथवा गजपीपर या त्रिफला का चूर्ण पाउडर के रूप में ही उस पर छोड़े। त्रिफला, लोहचूर्ण, मुलहठी, आर्कव (कुकुरमाँगरा), नील कमल, कालीमिर्च और सैन्धव-नमकसहित पकाये हुए तैल के मर्दन से वमन की शान्ति होती है। दुग्ध, मार्कव-रस, मुलहठी और नील कमल — इनको दो सेर लेकर तबतक पकाये, जबतक एक पाव तैल शेष रह जाय। इस तैल का नस्य (वृद्धावस्था के चिह्न) पलित (बाल पकने) का नाशक है। नीम की छाल, परवल की पत्ती, त्रिफला, गिलोय, खैर की छाल, अडूसा अथवा चिरायता, पाठर, त्रिफला और लाल चन्दन — ये दोनों योग ज्वर को नष्ट करते हैं तथा कुष्ठ, फोड़ा-फुन्सी, चकते आदि को भी मिटा देते हैं। परवल की पत्ती, गिलोय, चिरायता, अडूसा, मजीठ एवं पित्तपापड़ा — इनके क्वाथ में खदिर मिलाकर लिया जाय तो वह ज्वर तथा विस्फोटक रोगों को शान्त करता है ॥ २५-३१ ॥

दशमूल, गिलोय, हर्रै, दारुहल्दी, गदहपूर्णा, सहजना एवं सोंठ — ज्वर, विद्रधि तथा शोथ रोगों में हितकर है। महुवा और नीम की पत्ती का लेप व्रणशोधक होता है। त्रिफला (आँवला, हर्रा, बहेरा), खैर (कत्था), दारुहल्दी, बरगद की छाल, बरियार, कुशा, नीम के पत्ते तथा मूली के पत्ते — इनका क्वाथ शरीर के बाह्य-शोधन के लिये हितकर है। करन, नीम तथा मेठड़ का रस घाव के कृमियों को नष्ट करता है। धाय का फूल, सफेद चन्दन, खरेटी, मजीठ, मुलहठी, कमल, देवदारु तथा मेदा का घृतसहित लेप व्रणरोपण (घाव को भरने वाला) है। गुग्गुल, त्रिफला, पीपल, सोंठ, मिर्च, पीपर — इनका समान भाग ले और इन सबके समान घृत मिलाकर प्रयोग करे। इस प्रयोग से मनुष्य नाड़ीव्रण, दुष्टव्रण, शूल और भगन्दर आदि रोगों को दूर करे। गोमूत्र में भिगोकर शुद्ध की हुई हरीतकी (छोटी हर्रै) को (रेडी के) तेल में भूनकर सेंधा नमक के साथ प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे। ऐसी हरीतकी कफ और वात से होने वाले रोगों को नष्ट करती है। सोंठ, मिर्च, पीपल और त्रिफला का क्वाथ यवक्षार और लवण मिलाकर पीये। कफप्रधान और वातप्रधान प्रकृति वाले मनुष्यों के लिये यह विरेचन है और कफवृद्धि को दूर करता है। पीपल, पीपलामूल, वच, चित्रक, सोंठ — इनका क्वाथ अथवा किसी प्रकार का पेय बनाकर पीये। यह आमवात का नाशक है। रास्ना, गिलोय, रेंड़ की छाल, देवदारु और सोंठ — इनका क्वाथ सर्वाङ्ग-वात तथा संधि, अस्थि और मज्जागत आमवात में पीना चाहिये। अथवा सोंठ के जल के साथ दशमूल-क्वाथ पीना चाहिये। सोंठ एवं गोखरू का क्वाथ प्रतिदिन प्रातः प्रातः सेवन किया जाय तो वह आमवात के सहित कटिशूल और पाण्डुरोग का नाश करता है। शाखा एवं पत्रसहित प्रसारिणी (छुईमुई) का तैल भी उक्त रोग में लाभकर है। गिलोय का स्वरस, कल्क, चूर्ण या क्वाथ दीर्घकाल तक सेवन करके रोगी वातरत रोग से छुटकारा पा जाता है। वर्धमान पिप्पली या गुड़ के साथ हर्रै का सेवन करना चाहिये। (यह भी वात-रक्तनाशक है। पटोलपत्र, त्रिफला, राई, कुटकी और गिलोय — इनका पाक तैयार करके उसके सेवन से दाहयुक्त वात-रक्तरोग शीघ्र नष्ट होता है। गुग्गुल को ठंढे गरमजल से और त्रिफला को समशीतोष्ण जल से, अथवा खरेटी, पुनर्नवा, एरण्डमूल, दोनों कटेरी, गोखरू का क्वाथ हींग तथा लवण के साथ लेने पर वह वातजनित पीड़ा को शीघ्र ही दूर कर देता है। एक तोला पीपलामूल, सैन्धव, सौवर्चल, विड्, सामुद्र एवं औद्भिद पाँचों नमक, पिप्पली, चित्ता, सोंठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, शीतला, दन्ती, स्वर्णक्षीरी (सत्यनाशी) और काकड़ासिंगी — इनकी बेर के समान गुटिका बनाये और काँजी के साथ उसका सेवन करे। शोथ तथा उससे हुए पाक में भी इसका सेवन करे। उदरवृद्धि में भी निशोथ का प्रयोग विहित है। दारुहल्दी, पुनर्नवा तथा सोंठ — इनसे सिद्ध किया हुआ दुग्ध शोथनाशक है तथा मदार, गदहपूर्ना एवं चिरायता के क्वाथ से सेक (करने पर) शोथ का हरण होता है ॥ ३२-५१ ॥

जो मनुष्य त्रिकटुयुक्त घृत को तिगुने पलाशभस्म युक्त जल में सिद्ध करके पीता है, उसका अर्शरोग निस्संदेह नष्ट हो जाता है। फूल प्रियङ्गु, कमल, सँभालू, वायविडङ्ग, चित्रक, सैन्धवलवण, रास्ना, दुग्ध, देवदारु और वच से सिद्ध चौगुना कटुद्रव्ययुक्त तैल मर्दन करने से (या जल के साथ ही पीसकर लेप करने से) गलगण्ड और गण्डमाल रोगों का नाश हो जाता है ॥ ५२-५४ ॥

कचूर, नागकेसर, कुमुद का पकाया हुआ क्वाथ तथा क्षीरविदारी, पीपल और अडूसा का कल्क दूध के साथ पकाकर लेने से क्षयरोग में लाभ होता है ॥ ५५ ॥

वचा, विड्लवण, अभया (बड़ी हर्रै), सोंठ, हींग, कूठ, चित्रक और अजवाइन — इनके क्रमशः दो, तीन, छः, चार, एक, सात, पाँच और चार भाग ग्रहण करके चूर्ण बनावे। वह चूर्ण गुल्मरोग, उदररोग, शूल और कासरोग को दूर करता है। पाठा, दन्तीमूल, त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल), त्रिफला और चित्ता — इनका चूर्ण गोमूत्र के साथ पीसकर गुटिका बना ले। यह गुटिका गुल्म और प्लीहा आदि का नाश करने वाली है। अडूसा, नीम और परवल के पत्तों के चूर्ण का त्रिफला के साथ सेवन करने पर वात-पित्त रोगों का शमन होता है। वायविडङ्ग का चूर्ण शहद के साथ लिया जाय तो वह कृमिनाशक है। विडङ्ग, सेंधानमक, यवक्षार एवं गोमूत्र के साथ ली गयी हर्रै भी (कृमिष्न है)। शल्लकी (शालविशेष), बेर, जामुन, प्रियाल, आप्न और अर्जुन — इन वृक्षों की छाल का चूर्ण मधु में मिलाकर दूध के साथ लेने से रक्तातिसार दूर होता है। कच्चे बेल का सूखा गूदा, आम की छाल, धाय का फूल, पाठा, सोंठ और मोचरस (कदली स्वरस) — इन सबका समान भाग लेकर चूर्ण बना ले और गुड़मिश्रित तक्र के साथ पीये। इससे दुस्साध्य अतिसार का भी अवरोध हो जाता है। चाँगेरी, बेर, दही का पानी, सोंठ और यवक्षार — इनका घृतसहित क्काथ पीने से गुदभ्रंश रोग दूर होता है। वायबिडंग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठा तथा इन्द्रयव — इनके क्वाथ में मिर्च का चूर्ण मिलाकर पीने से शोथयुक्त अतिसार का नाश होता है ॥ ५६-६३ ॥

शर्करा, सैन्धव और सोंठ के साथ अथवा पीपल, मधु एवं गुड़ के सहित प्रतिदिन दो हर्रै का भक्षण करे तो इससे मनुष्य सौ वर्ष (अधिक काल) तक सुखपूर्वक जीवित रह सकता है। पिप्पलीयुक्त त्रिफला भी मधु और घृत के साथ प्रयोग में लायी जाने पर वैसा ही फल देती है। आँवले के स्वरस से भावित आँवले के चूर्ण को मधु, घृत तथा शर्करा के साथ चाटकर दुग्धपान करे। इससे मनुष्य स्त्रियों का (प्रिय) प्रभु बन सकता है। उड़द, पीपल, अगहनी का चावल, जौ और गेहूँ — इन सबका चूर्ण समान मात्रा में लेकर घृत में उसकी पूरी बना ले। उसका भोजन करके शर्करायुक्त मधुर दुग्धपान करे। निस्संदेह इस प्रयोग से मनुष्य गौरैया पक्षी के समान दस बार स्त्री-सम्भोग करने में समर्थ हो सकता है। मजीठ, धाय के फूल, लोध, नीलकमल — इनको दूध के साथ देना चाहिये। यह स्त्रियों के प्रदररोग को दूर करता है। पोली कटसरैया, मुलहठी और श्वेतचन्दन — ये भी प्रदररोगनाशक हैं। श्वेतकमल और नीलकमल की जड़ तथा मुलहठी, शर्करा और तिल — इनका चूर्ण गर्भपात की आशङ्का होने पर गर्भ को स्थिर करने में उत्तम योग है। देवदारु, अभ्रक, कूट, खस और सोंठ — इनको काँजी में पीसकर तैल मिलाकर लेप करने से शिरोरोग का नाश करता है। सैन्धव-लवण को तैल में सिद्ध करके छान ले। जब तैल थोड़ा गरम रह जाय तो उसको कान में डालने से कर्णशूल का शमन होता है। लहसुन, अदरख, सहजन और केला — इनमें से प्रत्येक का रस (कर्णशूलहारी है।) बरियार, शतावरी, रास्ना, गिलोय, कटसरैया और त्रिफला इनसे सिद्ध घृत का या इनके सहित घृत का पान तिमिररोग का नाश करने में परम उत्तम माना गया है। त्रिफला, त्रिकटु एवं सैन्धवलवण — इनसे सिद्ध किये हुए घृत का पान मनुष्य को करना चाहिये। यह चक्षुष्य (आँखों के लिये हितकर), हृद्य (हृदय के लिये हितकर), विरेचक, दीपन और कफरोगनाशक है। गाय के गोबर के रस के साथ नीलकमल के पराग की गुटिका का अञ्जन दिनाँधी और रतौंधी के रोगियों के लिये हितकर है। मुलहठी, बच, पिप्पली-बीज, कुरैया की छाल का कल्क और नीम का क्वाथ घोट देने से वह वमनकारक होता है। खूब चिकना तथा रेड़ी-जैसे तैल से स्निग्ध किया गया या पकाया हुआ यव का पानी विरेचक होता है। किंतु इसका अनुचित प्रयोग मन्दाग्नि, उदर में भारीपन और अरुचि को उत्पन्न करता है। हर्रै, सैन्धवलवण और पीपल — इनके समान भाग का चूर्ण गर्म जल के साथ ले। यह नाराच संज्ञक चूर्ण सर्वरोगनाशक तथा विरेचक है ॥ ६४-७८ ॥

महर्षि आत्रेय ने मुनिजनों के लिये जिन सिद्ध योगों का वर्णन किया था, समस्त योगों में श्रेष्ठ उन सर्वरोगनाशक योगों का ज्ञान सुश्रुत ने प्राप्त किया ॥ ७९ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘मृतसंजीवनीकारक सिद्ध योगों का कथन’ नामक दो सौ पचासोंवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८५ ॥

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