July 16, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 302 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ दोवाँ अध्याय नाना प्रकार के मन्त्र और औषधों का वर्णन नाना मन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — ‘ऐं कुलजे ऐं सरस्वति स्वाहा’ — यह ग्यारह अक्षरों का मन्त्र मुख्य ‘सरस्वती विद्या’ है। जो क्षारलवण से रहित आहार ग्रहण करते हुए मन्त्रों की अक्षर संख्या के अनुसार उतने लाख मन्त्र का जप करता है, वह बुद्धिमान् होता है। अत्रि (द्), अग्नि (र), वामनेत्र (ई) तथा बिन्दु (‘) ‘द्रीं’ — यह मन्त्र महान् विद्रावणकारी (शत्रु को मार भगाने वाला) है। वज्र और कमल धारण करने वाले पीत वर्ण वाले इन्द्र का आवाहन करके उनकी पूजा करे और घी तथा तिल की एक लाख आहुतियाँ दे। फिर तिलमिश्रित जल से इन्द्र देवता का अभिषेक करे। ऐसा करने से राजा आदि अपने छीने गये राज्य आदि तथा राजपुत्र आदि (मनोवाञ्छित वस्तुओं) को पा सकते हैं। हृल्लेखा (ह्रीं) — यह ‘शक्तिदेवा’ नाम से प्रसिद्ध है। इसका उद्धार यों है — घोष (ह), अग्नि (र), दण्डी (ई), दण्ड (‘) ‘ह्रीं’। शिवा और शिव का पूजन करके शक्तिमन्त्र (ह्रीं) का जप करे। अष्टमी से लेकर चतुर्दशी तक आराधना में संलग्न रहे। हाथों में चक्र, पाश, अङ्कुश एवं अभय की मुद्रा धारण करने वाली वरदायिनी देवी की आराधना करके होम आदि करने पर उपासक को सौभाग्य एवं कवित्व शक्ति की प्राप्ति होती है तथा वह पुत्रवान् होता है ॥ १-५ ॥ ‘ ‘ॐ ह्रीं ॐ नमः कामाय सर्वजनहिताय सर्वजनमोहनाय प्रज्वलिताय सर्वजनहृदयं ममाऽऽत्मगतं कुरु कुरु ॐ ॥’ — इसके जप आदि करने से यह मन्त्र सम्पूर्ण जगत् को अपने वश में कर सकता है ॥ ६-७ ॥ ‘ॐ ह्रीं चामुण्डे अमुकं दह दह पच पच मम वशमानयानय स्वाहा ॐ।’ यह चामुण्डा का वशीकरणमन्त्र कहा गया है। स्त्री को चाहिये कि वशीकरण के प्रयोगकाल में त्रिफला के ठंडे पानी से अपनी योनि को धोये। अश्वगन्धा, यवक्षार, हल्दी और कपूर आदि से भी स्त्री अपनी योनि का प्रक्षालन कर सकती है। पिप्पली के आठ तन्दुल, कालीमिर्च के बीस दाने और भटकटैया के रस का योनि में लेप करने से उस स्त्री का पति आमरण उसके वश में रहता है। कटीरमूल, त्रिकटु (सोंठ, मिर्च और पीपल) — का लेप भी उसी तरह लाभदायक होता है। हिम, कैथ का रस, मागधीपिप्पली, मुलहठी और मधु — इनके लेप का प्रयोग दम्पति के लिये कल्याणकारी होता है। शक्कर मिला हुआ कदम्ब रस और मधु — इसका योनि में लेप करने से भी वशीकरण होता है। सहदेई, महालक्ष्मी, पुत्रजीवी, कृताञ्जलि (लज्जावती) — इन सबका चूर्ण बनाकर सिर पर डाला जाय तो इहलोक के लिये उत्तम वशीकरण का साधन है। त्रिफला और चन्दन का क्वाथ एक प्रस्थ अलग हो और दो कुडव अलग हो, भँगरैया तथा नागकेसर का रस हो, उतनी ही हल्दी, क्षम्बुक, मधु, घी में पकायी हुई हल्दी और सूखी हल्दी — इन सबका लेप करे तथा बिदारीकंद और जटामांसी के चूर्ण में चीनी मिलाकर उसको खूब मथ दे। फिर दूध के साथ प्रतिदिन पीये। ऐसा करने वाला पुरुष सैकड़ों स्त्रियों के साथ सहवास की शक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ८-१६ ॥ गुप्ता, उड़द, तिल, चावल — इन सबका चूर्ण बनाकर दूध और मिश्री मिलाये। पीपल, बाँस और कुश की जड़, ‘वैष्णवी’ और ‘श्री’ नामक ओषधियों की जड़ तथा दूर्वा और अश्वगन्धा का मूल — इन सबको पुत्र की इच्छा रखने वाली नारी दूध के साथ पीये। कौन्ती, लक्ष्मी, शिवा और धात्री (आँवले का बीज), लोध्र और वट के अङ्कुर को स्त्री ऋतुकाल में घी और दूध के साथ पीये। इससे उसको पुत्र की प्राप्ति होती है। पुत्रार्थिनी नारी ‘श्री’ नामक ओषधि की जड़ और वट के अङ्कुर को दूध के साथ पीये। श्री, वटाङ्कर और देवी — इनके रस का नस्य ले और पीये भी। ‘श्री’ और ‘कमल’ की जड़ को, अश्वत्थ और उत्तर के मूल को दूध के साथ पीये। कपास के फल और पल्लव को दूध में पीसकर तरल बनाकर पीये। अपामार्ग के नूतन पुष्पाग्र को भैंस के दूध के साथ पीये। उपर्युक्त साढ़े पाँच श्लोकों में पुत्रप्राप्ति के चार योग बताये गये हैं ॥ १७-२११/२ ॥ यदि स्त्री का गर्भ गलित हो जाता हो तो उसे शक्कर, कमल के फूल, कमलगट्टा, लोध, चन्दन और सारिवालता — इनको चावल के पानी में पीसकर दे या लाजा, यष्टि (मुलहठी), सिता (मिश्री), द्राक्षा, मधु और घी — इन सबका अवलेह बनाकर वह स्त्री चाटे ॥ २२-२३ ॥ आटरूप (अड़ूसा), कलाङ्गली, काकमाची, शिफा (जटामांसी) — इन सबको नाभि के नीचे पीसकर छाप दे तो स्त्री सुखपूर्वक प्रसव कर सकती है ॥ २४ ॥ लाल और सफेद जवाकुसुम, लाल चीता और हींगपत्री पीये। केसर, भटकटैया की जड़,गोपी, षष्ठी (साठी का तृण) और उत्पल — इनको बकरी के दूध में पीसकर तैल मिलाकर खाय तो सिर में बाल उगते हैं। अगर सिर के बाल झड़ रहे हों तो यह उनको रोकने का उपाय है ॥ २५-२६ ॥ आँवला और भँगरैया का एक सेर तैल, एक आढक दूध, षष्ठी और अञ्जन का एक पल तैल — ये सब सिर के बाल, नेत्र और सिर के लिये हितकारक होते हैं ॥ २७ ॥ हल्दी, राजवृक्ष की छाल, चिञ्चा (इमली का बीज), नमक, लोध और पीली खारी — ये गौओं के पेट फूलने की बीमारी को तत्काल रोक देते हैं ॥ २८ ॥ ‘ॐ नमो भगवते त्र्यम्बकायोपशमयोपशमय चुलु चुलु मिलि मिलि भिदि भिदि गोमानिनि चक्रिणि हूं फट्। अस्मिन् ग्रामे गोकुलस्य रक्षां कुरु शान्तिं कुरु कुरु कुरु ठ ठ ठ’ ॥ २९-३० ॥ यह गोसमुदाय की रक्षा का मन्त्र है। अस्मिन् ग्रामे गोकुलस्य रक्षां कुरु शान्तिं कुरु घण्टाकर्णो महासेनो वीरः प्रोक्तो महाबलः ॥ मारीनिर्नाशनकरः स मां पातु जगत्पतिः । ‘घण्टाकर्ण महासेन वीर बड़े बलवान् कहे गये हैं। वे जगदीश्वर महामारी का नाश करने वाले हैं, अतः मेरी रक्षा करें।’ ये दोनों श्लोक और मन्त्र गोरक्षक हैं, इनको लिखकर घर पर टाँग देना चाहिये ॥ ३१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘नाना प्रकार के मन्त्र और औषधों का कथन’ नामक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०२ ॥ Content is available only for registered users. 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