July 18, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 330 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तीसवाँ अध्याय ‘गायत्री’ से लेकर ‘जगती’ तक छन्दों के भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्र का वर्णन छन्दःसारः अग्निदेव कहते हैं — इस प्रकरण की पूर्ति होने तक ‘पादः’ पद का अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री आदि छन्दों में किसी पाद की अक्षर-संख्या पूरी न हो, वहाँ ‘इय्’, ‘उव्’ आदि के द्वारा उसकी पूर्ति की जाती है। (जैसे ‘तत्सवितुर्वरेण्यम्’ में आठ अक्षर की पूर्ति के लिये ‘वरेण्यम्’ के स्थान में ‘वरेणियम्’ समझ लिया जाता है। ‘स्वः पते’ के स्थानमें ‘सुवःपते’ माना जाता है।) गायत्री छन्द का एक पाद आठ अक्षरों का होता है। अर्थात् जहाँ ‘गायत्री के पाद’ का कथन हो, वहाँ आठ अक्षर ग्रहण करने चाहिये। [यही बात अन्य छन्दों के पादों के सम्बन्ध में भी है।] ‘जगती’ छन्द का पाद बारह अक्षरों का होता है। विराट् के पाद दस अक्षरों के बताये गये हैं। ‘त्रिष्टुप्’ छन्द का चरण ग्यारह अक्षरों का है। जिस छन्द का जैसा पाद बताया गया है, उसी के अनुसार कोई छन्द एक पाद का, कोई दो पाद का, कोई तीन का और कोई चार पाद का माना गया है। [जैसे आठ अक्षर के तीन पादों का ‘गायत्री’ छन्द और चार पादों का ‘अनुष्टुप्’ होता है।] ‘आदि छन्द’ अर्थात् ‘गायत्री’ कहीं छः अक्षर के पादों से चार पादों की होती है। [जैसे ऋग्वेद में —‘इन्द्रः शचीपतिर्बलेन वीलितः। दुश्च्यवनो वृषा लमत्सु सामहिः ॥’] ‘कहीं-कहीं गायत्री सात अक्षर के पादों से तीन पाद की होती है। [जैसे ऋग्वेद में —‘युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम्। भूयाम वाजदाम्नाम् ॥’ (१।१७।४)] वह सात अक्षरों वाली गायत्री ‘पाद-निचृत’ संज्ञा धारण करती है। यदि गायत्री का प्रथम पाद आठ अक्षरों का, द्वितीय पाद सात अक्षरों का तथा तृतीय पाद छः अक्षरों का हो तो वह ‘प्रतिष्ठा गायत्री’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक् च सूर्य दृशे ॥’ (१।२२।२१)] इसके विपरीत यदि गायत्री का प्रथम पाद छः, द्वितीय पाद सात और तृतीय पाद आठ अक्षरों का हो तो उसे ‘वर्धमाना’ 1 गायत्री कहते हैं। यदि तीन पादों वाली गायत्री का प्रथम पाद छः, द्वितीय पाद आठ और तीसरा पाद सात अक्षरों का हो तो उसका नाम ‘अतिपाद 2 निचृत्’ होता है। यदि दो चरण नौ-नौ अक्षरों के हों और तीसरा चरण छः अक्षरों का हो तो वह ‘नागी’ नाम की गायत्री होती है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘अग्ने तमद्याश्चं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम् । ऋध्यामां ओहैः ॥ (४।१०।१)] यदि प्रथम चरण छः अक्षरों का और द्वितीय तृतीय नौ-नौ अक्षरों के हों तो ‘वाराही गायत्री’ नामक छन्द होता है। [जैसे सामवेद में — ‘अग्ने मृड महाँ अस्यय आदेवयुं जनम्। इयेथ बर्हिरासदम् ॥’ (२३)] अब तीसरे अर्थात् ‘विराट्’ नामक भेद को बतलाते हैं। जहाँ दो ही चरणों का छन्द हो, वहाँ यदि प्रथम चरण बारह और द्वितीय चरण आठ अक्षर का हो तो वह ‘द्विपाद् विराद्’ नामक गायत्री छन्द है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो। राजा देवः समुद्रियः ॥’ (९।१०७।१६)] ग्यारह अक्षरों के तीन चरण होने पर ‘त्रिपाद् विराट्’ नामक गायत्री होती है। [उदाहरण ऋग्वेद में — दुहीयन् मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै। इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै ॥’ (१।१२०।९) ॥ १-४ ॥ जब दो चरण आठ-आठ अक्षरों के और एक चरण बारह अक्षरों का हो तो वेद में उसे ‘उष्णिक्’ नाम दिया गया है। प्रथम और तृतीय चरण आठ अक्षरों के हों और बीच का द्वितीय चरण बारह अक्षरों का हो तो वह तीन पादों का ‘ककुप् उष्णिक्’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः । यं त्रायध्वेऽस्यासते 3 ॥’ (५/५३।१५)] जब प्रथम चरण बारह अक्षरों का और द्वितीय तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरों के हों तो ‘पुर उष्णिक् नामक तीन पादों वाला छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘ अफ्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः ॥’ (१।२३।१९)] जब प्रथम और द्वितीय चरण आठ-आठ अक्षरों के हों और तृतीय चरण बारह अक्षरों का हो तो ‘परोष्णिक्’ छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः 4 ॥’ (१।७९।४)] सात-सात अक्षरों के चार चरण होने पर भी ‘उष्णिक’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘नदं व ओदतीनां नदं यो युवतीनाम्। पतिं वो अध्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ॥’ (८।६९।२) ] आठ-आठ अक्षर के चार चरणों का ‘अनुष्टुप्’ नामक छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेद में — ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं सर्वतः स्पृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥’ (३१।१)] अनुष्टुप् छन्द कहीं-कहीं तीन चरणों का भी होता है। ‘त्रिपाद अनुष्टुप्’ दो तरह के होते हैं। एक तो वह है, जिसके प्रथम चरण में आठ तथा द्वितीय और तृतीय चरणों में बारह बारह अक्षर होते हैं। दूसरा वह है, जिसका मध्यम अथवा अन्तिम पाद आठ अक्षर का हो तथा शेष दो चरण बारह-बारह अक्षर के हों। आठ अक्षर के मध्यम पादवाले ‘त्रिपाद् अनुष्टुप्’ का उदाहरण [जैसे ऋग्वेद में — ‘पर्युपु प्र धन्व वाजसातय, परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे ॥’ (९।११०।१)] तथा आठ अक्षर के अन्तिम चरण वाले ‘त्रिपाद् अनुष्टुप्’ का उदाहरण [ऋग्वेद में — ‘मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो मा कुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः। स्तनाभुजो अशिश्वीः ॥’ (१।१२०।८)] यदि एक चरण ‘जगती’ का (अर्थात् बारह अक्षर का) हो और शेष तीन चरण गायत्री के (अर्थात् आठ-आठ अक्षर के) हों तो यह चार चरणों का ‘बृहती छन्द’ होता है। इसमें भी जब पहले का स्थान तीसरा चरण ले ले अर्थात् वही जगती का पाद हो और शेष तीन चरण गायत्री के हों तो उसे ‘पथ्या बृहती’ कहते हैं। [जैसे सामवेद में — ‘मा चिदन्यद् विशंसत सखायो मा रिषण्यत। इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत ॥’ (२४२)] जब पहले वाला ‘जगती ‘का चरण द्वितीय पाद हो जाय और शेष तीन गायत्री के चरण हों तो ‘न्यङ्गुसारिणी बृहती’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः। वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वाजीसहस्रसातमः ॥’ (१।१७५।१)] आचार्य क्रोष्टुकि के मत में यह (न्यकुसारिणी) ‘स्कन्ध’ या ‘ग्रीवा’ नामक छन्द है।5 यास्काचार्य ने इसे ही ‘उरोबृहती’ नाम दिया है। जब अन्तिम (चतुर्थ) चरण ‘जगती’ का हो और आरम्भ के तीन चरण गायत्री के हों तो ‘उपरिष्टाद् बृहती’ 6 नामक छन्द होता है। वही ‘जगती ‘ का चरण जब पहले हो और शेष तीन चरण गायत्री छन्द के हों तो उसे ‘पुरस्ताद् बृहती’ छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेद में — ‘महो यस्पतिः शस्वसो असाम्या महो नृम्णस्य ततुजिः। मर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम् ॥’7 (१०।२२।३)] वेद में कहीं- कहीं नौ-नौ अक्षरों के चार चरण दिखायी देते हैं। वे भी ‘बृहती’ छन्द के ही अन्तर्गत हैं। [उदाहरण के लिये ऋग्वेद में — ‘तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम। देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् 8 ॥ (१।१८७।११)] जहाँ पहले दस अक्षर के दो चरण हों, फिर आठ अक्षरों के दो चरण हों, उसे भी ‘बृहती’ छन्द कहते हैं। [जैसे सामवेद में — ‘अग्ने विवस्वदुषसञ्चित्रं राधो अमर्त्य। आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः 9 ॥ (४०)] केवल ‘जगती’ छन्द के तीन चरण हों तो उसे ‘महाबृहती’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेद में — ‘अजीजनो अमृत मर्त्येष्वाँ, ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः। सदासरो वाजमच्छासनिष्यदत्’ 10 (९।११०।४)] ताण्डी नामक आचार्य के मत में यही ‘सतो बृहती’ नामक छन्द है ॥ ५-१०१/२ ॥ जहाँ दो पाद बारह-बारह अक्षरों के और दो आठ-आठ अक्षरों के हों, वहाँ ‘पङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। यदि विषम पाद अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह बारह अक्षरों के हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरों के तो उसे ‘सतः पङ्क्ति’ नामक छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेद में — ‘यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहनः। चं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः ॥’ (१।३६।१०)] यदि वे ही चरण विपरीत अवस्था में हों, अर्थात् प्रथम-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरों के और द्वितीय चतुर्थ बारह बारह अक्षरों के तो भी वह छन्द ‘सतः पङ्क्ति’ ही कहलाता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘य ऋष्ये श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः। तं विश्वे मानुषा युगे, इन्द्रं हवन्ते तविषं यतासुचः ॥’ (८।४६।१२)] जब पहले के दोनों चरण बारह बारह अक्षरों के हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरों के, तो उसे ‘प्रस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [ग्यारहवें श्लोक में बताये हुए ‘पङ्क्ति’ छन्द के लक्षण से ही यह गतार्थ हो जाता है, तथापि विशेष संज्ञा देने के लिये यहाँ पुनः उपादान किया गया है। मन्त्र-ब्राह्मण में इसका उदाहरण इस प्रकार है — ‘काम वेदते मदो नामासि समानया अमुं सुरा ते अभवत्। परमत्र जन्मा अग्ने तपसा निर्मितोऽसि 11 ॥’] जब अन्तिम दो चरण बारह बारह अक्षरों के हों और आरम्भ के दोनों आठ-आठ अक्षरों के तो ‘आस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — भद्रं नो अपि वातय, मनो दक्षमुत क्रतुम्। अधा ते सख्य अन्धसो वि वो मदे रणन् गावो न यवसे विवक्षसे ॥’ (१०।२५।१)] यदि बारह अक्षरों वाले दो चरण बीच में हों और प्रथम एवं चतुर्थ चरण आठ-आठ अक्षरों के हों तो उसे ‘विस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [जैसे वेद में — ‘अग्ने तव श्रवो वयो, महि भ्राजन्ते अर्धयो विभावसो। बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुये कवे ॥’ (१०।१४०।१)] यदि बारह अक्षरों वाले दो चरण बारह हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरण के रूप में हों और बीच के द्वितीय तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरों के हों तो वह ‘संस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘पितुभृतो न तन्तुमित् सुदानवः प्रतिद्ध्मो यजामसि। उपा अप स्वसुस्तमः संवर्तयति वर्तनि सुजातता ॥’ (१०।१७२।३)] पाँच-पाँच अक्षरों के चार पाद होने पर ‘अक्षरपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘प्र शुकैतु 12 देवी मनीषा। अस्मत् सुतष्टो रथो न वाजी ॥’ (७।३४।१)] पाँच अक्षरों के दो ही चरण होने पर ‘अल्पशः पङ्क्ति’ नामक छन्द कहलाता है। जहाँ पाँच-पाँच अक्षरों के पाँच पाद हों, वहाँ ‘पदपङ्क्ति’ नामक छन्द जानना चाहिये। [जैसे ऋऋवेद में — ‘घृतं न पूर्त तनूररेपाः शुचि हिरण्यं तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः 13 ॥ (४।१०।६)] जब पहला चरण चार अक्षरों का, दूसरा छः अक्षरों का तथा शेष तीन पाद पाँच पाँच अक्षरों के हों तो भी ‘पद-पङ्क्ति’ छन्द ही होता है। आठ-आठ अक्षरों के पाँच पादों का ‘पथ्यापङ्क्ति’ नामक छन्द कहा गया है। [जैसे ऋग्वेद में — ‘अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ट्या यती योजान्विन्द्र ते हरी ॥’ (१।८२।२)] आठ-आठ अक्षरों के छः चरण होने पर ‘जगतीपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे मन्त्र ब्राह्मण में — ‘येन स्त्रियमकृणुतं येनापामृषतं सुराम्; येनाक्षामभ्यषिञ्चतम्। येनेमां पृथ्वीं महीं यद्वां तदश्विना यशस्तेन मामभिषिञ्चतम् ॥’ ] ॥ ११-१४ ॥ ‘त्रिष्टुप्’ अर्थात् ग्यारह अक्षरों का एक पाद हो और आठ-आठ अक्षरों के चार पाद हों तो पाँच पादों का ‘त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती’ नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब एक चरण ‘जगती’ का अर्थात् बारह अक्षरों का हो और चार चरण ‘गायत्री’ के (आठ-आठ अक्षरों के) हों तो उस छन्द का नाम ‘जगतीज्योतिष्मती’ होता है। यदि पहला ही चरण ग्यारह अक्षरों का हो और शेष चार चरण आठ-आठ अक्षरों के हों तो ‘पुरस्ताज्योति’ 14 नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है और यदि पहला ही चरण बारह अक्षरों का तथा शेष चार चरण आठ-आठ के हों तो ‘पुरस्ताज्योति’ नामक जगती छन्द 15 होता है। जब मध्यम चरण ग्यारह अक्षरों और आगे-पीछे के दो-दो चरण आठ-आठ के हों तो ‘मध्ये ज्योति” 16 नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है; इसी प्रकार जब मध्यम चरण बारह का तथा आदि-अन्त के दो-दो चरण आठ-आठ के हों तो ‘मध्ये ज्योति”17 नामक जगती छन्द होता है। जब आरम्भ के चार चरण आठ-आठ अक्षरों के हों तथा अन्तिम चरण ग्यारह अक्षरों का हो तो उसे ‘उपरिष्टाज्योति” 18 नामक त्रिष्टुप् छन्द कहते हैं। इसी प्रकार जब आदि के चार चरण पूर्ववत् आठ-आठ के हों और अन्तिम पाद बारह अक्षरों का हो तो उसका नाम ‘उपरिष्टाज्योति जगती छन्द 19 होता है ॥ १५१/२ ॥ गायत्री आदि सभी छन्दों के एक पाद में यदि पाँच अक्षर हों तथा अन्य पादों में पहले के अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उस छन्द का नाम ‘शङ्कुमती’ होता है। [जैसे प्रथम पाद पाँच अक्षर का और तीन चरण छः-छः अक्षरों का होने पर उसे ‘शङ्कुमती गायत्री’ कह सकते हैं।] जब एक चरण छः अक्षरों का हो और अन्य चरणों में पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम ‘ककुदमती’ होगा। जहाँ तीन पाद वाले छन्द के पहले और दूसरे चरण में अधिक अक्षर हों और बीच वाले में बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्द का नाम ‘पिपीलिकमध्या’ होगा। [जैसे त्रिपदा गायत्री के आदि और अन्त चरण आठ-आठ अक्षर के हों तथा बीच वाला चरण तीन, चार या पाँच अक्षर का हो तो उसे ‘पिपीलिकमध्या’ कहेंगे। इसके विपरीत जब आदि और अन्त वाले पादों के अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरों का हो तो उस ‘त्रिपाद् गायत्री’ आदि छन्द को ‘यवमध्या’ कहते हैं। यदि ‘गायत्री’ या ‘उष्णिक्’ आदि छन्दों में केवल एक अक्षर की कमी हो, उसकी ‘निचृत’ यह विशेष संज्ञा होती है। एक अक्षर की अधिकता होने पर वह छन्द ‘भूरिक्’ नाम धारण करता है। इस प्रकार दो अक्षरों की कमी रहने पर ‘विराट्’ और दो अक्षर अधिक होने पर ‘स्वराट्’ संज्ञा होती है। संदिग्ध अवस्था में आदि पाद के अनुसार छन्द का निर्णय करना चाहिये। [जैसे कोई मन्त्र छब्बीस अक्षर का है, उसमें गायत्री से दो अक्षर अधिक हैं और उष्णिक से दो अक्षर कम – ऐसी दशा में वह ‘स्वराड् गायत्री’ छन्द है या ‘विराड् उष्णिक्’?- ऐसे संदेहयुक्त स्थलों में यदि मन्त्र का पहला चरण ‘गायत्री’ से मिलता हो तो उसे ‘स्वराड् गायत्री’ कहेंगे और यदि प्रथम पाद ‘उष्णिक्’ से मिलता हो तो उसे ‘विराड् उष्णिक्’ कह सकते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये। इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदि के द्वारा संदिग्धस्थल में छन्द का निर्णय हो सकता है। गायत्री आदि छन्दों के देवता क्रमशः इस प्रकार हैं — अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव। उक्त छन्दों के स्वर हैं — ‘षड्ज’ आदि। उनके नाम क्रमशः ये हैं — षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। क्षेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित (लाल) तथा गौर — ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दों के वर्ण हैं। ‘कृति’ नामवाले छन्दों का वर्ण गोरोचन के समान है और अतिच्छन्दों का वर्ण श्यामल है। अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वसिष्ठ — ये क्रमशः उक्त सात छन्दों के गोत्र बताये गये हैं ॥ १६-२३ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘छन्दस्स्सार का कथन’ नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३० ॥ 1. उदाहरण ऋग्वेद में — त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने ॥ (६।१६।१) 2. ऋग्वेदे यथा — प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्नि रथं न वेद्यम् ॥ (८।८४।१) 3. इस मन्त्र में ‘मर्त्य’ के स्थान में व्यूह की रीति से ‘मर्तिय’ मानने तथा ‘अस्यासते ‘ के स्थान में ‘अस्य आसते’ इस प्रकार दीर्घ-व्यूह करने से पाद की पूर्ति होती है। 4. पाँचवें श्लोक में ‘उष्णिक्’ छन्द का जो लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है। यहाँ ‘परोष्णिक्’ यह विशेष संज्ञा बताने के लिये पुनः उल्लेख किया गया है। 5. पिङ्गलसूत्र में ‘स्कन्धोग्रीवी’ नाम आया है। 6. इसका उदाहरण सामवेद में इस प्रकार है — ‘ अग्ने जरितर्विश्पतिस्तपानो देव रक्षसः । अप्रोषिवान् गृहपते महाँ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः ॥’ (३९) 7. आठवें श्लोक के उत्तरार्ध में जो ‘बृहती छन्द ‘का लक्षण दिया गया है, उसी से यह भी गतार्थ हो जाता है; फिर भी विशेष संज्ञा देने के लिये यहाँ पुनरुक्ति की गयी है। 8. –9. –10. इन सबमें व्यूह की रीति से या ‘निवृत्’ मानकर पादपूर्ति की जाती है। 11. यहाँ ‘नामा असि’, ‘निर्मितः असि’ — इस प्रकार संधिव्यूह से पादपूर्ति की जाती है। कात्यायन ने इसे गायत्री छन्द में गिना है। सायण ने इसे ‘द्विपदा’ कहा है। 12. यहाँ ‘निचृत्’ होने से एक अक्षर की न्यूनता है। 13. यहाँ ‘भूरिक्’ होने से एक अक्षर की अधिकता है। अन्यत्र भी अक्षरों की न्यूनता या अधिकता दीखने पर इसी प्रकार समझना चाहिये। 14. उदाहरण ऋग्वेद में — तमुष्टुहीन्द्रं यो ह स त्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः। प्रतीचश्चिद् यो धीमान् वृषण्वान् ववब्रुषश्चित्तमसो विहन्ता ॥ (१। १७३।५) 15. उदाहरण ऋग्वेद में — अबोध्याग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यूषाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा। आयुक्षातामाश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत् पृथक् ॥ (१। १५७।१) 16. उदाहरण मन्त्रब्राह्मण में — इमं तमुपस्थं मधुना संसृजामि। प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयं तेन पुंसोऽभिभवासि, सर्वान् कामान् वशिन्यसि राज्ञी ॥ 17. उदाहरण ऋग्वेद में — बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा । भरद्वाजे समिधानो यविषय रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥ (६।४८।७) 18. उदाहरण मन्त्रब्राह्मण में — अग्निं क्रव्यादमकृण्वन्, गुहाना स्त्रीणामुपस्थम्। ऋषयः पुराणाः, तेन आज्यमकृण्वं त्रैशुद्धं त्वयि त्वद्दधातु । 19. उदाहरण ऋग्वेद में — नवानां नवतीनां विषस्य रोपुषीणाम्। सर्वासामग्रभंनामा अरे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ॥ (१।१९१।१३) Content is available only for registered users. 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