August 29, 2015 | aspundir | Leave a comment ऐसे हुए श्रीराम अजेय भगवन् श्रीराम अपने युग के अजेय योद्धा थे । देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर, राक्षस आदि में भी उनके समान योद्धा न था । तीनों लोकों को जीतने वाले रावण पर विजय पाना कोई आसान काम नहीं था । तत्कालीन सभी शक्तियाँ व्यक्तिगत एवं सामूहिक रुप से रावण से परास्त हो चुकी थीं । अक्षौहिणी सेना के धनी दशरथ भी स्वयं को अपनी सेना सहित रावण से युद्ध करने में असमर्थ पाते थे (वाल्मीकि रामायण 1/20/20-24) । ऐसी स्थिति में रावण को परास्त कर सकने योग्य अजेय योद्धा की आवश्यकता थी, जो श्रीराम के रुप में अवतरित हुए । श्रीराम को अजेय उनके अस्त्र-शस्त्रों ने बनाया । अस्त्र-शस्त्रों की प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने बाल्यकाल में गुरुकुल में प्राप्त की थी, परन्तु वह रावण जैसे दुर्धर्ष योद्धा से युद्ध के लिए पर्याप्त न थी । उन्हें ऐसे दिव्यास्त्रों की आवश्यकता थी, जिनसे रावण पर विजय प्राप्त की जा सके । समय-समय पर ये दिव्यास्त्र उन्हें निम्नानुसार प्राप्त हुए । विश्वामित्र से प्राप्त दिव्यास्त्र रामयुग में विश्वामित्र सम्भवतः शस्त्र निर्माण कला एवं उनके प्रयोग में सर्वश्रेष्ठ थे । उनके समान शस्त्रविद्या को जानने वाला दूसरा कोई विद्वान् न था । विश्वामित्र कुशिकवंशीय (कौशिक) गाधि के पुत्र थे । राजत्व को छोड़कर उन्होंने ऋषित्व प्राप्त किया । दिव्यास्त्रों पर अधिकार के सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण (1/21/13-21) में एक प्रसंग का उल्लेख हुआ है । उसमें कहा गया है कि सभी अस्त्र-शस्त्र प्रजापति कृशाश्व के पुत्र थे । कृशाश्व के ये पुत्र दक्ष की दो पुत्रियों जया और सुप्रभा की सन्तानें हैं । जया के 50 पुत्र थे और सुप्रभा के भी 50 पुत्र थे । इस तरह सौ अस्त्र-शस्त्रों का जन्म हुआ । प्रजापति कृशाश्व ने उन्हें विश्वामित्र को सुपुर्द कर दिया । इसके अलावा विश्वामित्र जी ने हिमालय पर्वत के समीप तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न कर धनुर्वेद की पूर्ण शिक्षा प्राप्त की थी और उन्होंने शिव से विभिन्न प्रकार के अस्त्र भी प्राप्त किए थे (वाल्मीकि रामायण 1/55/16-19) । ताटका, मारीच, सुबाहु आदि के वध के लिए श्रीराम को विश्वामित्र जब अपने साथ ले गए, तब उन्होंने ये अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्रदान किए थे । सर्वप्रथम उन्होंने ‘बला’ और ‘अतिबला’ नामक मन्त्रविद्या राम और लक्ष्मण को प्रदान की । इन मन्त्रविद्याओं से भूख-प्यास, थकावट आदि का अनुभव नहीं होता था और न ही ज्वरादि रोग होता था । उनके प्रभाव से राक्षसादि सोते समय आक्रमण नहीं कर सकते थे । Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe