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ग्रह आदि बाधा, रोग-निवारक प्रयोग
बगलामुखी मन्त्र प्रयोग
संकल्पः-
ॐ अद्यैतस्य…………………….अमुक-मासे अमुक-पक्षे अमुक वासरे अमुक-गोत्रोत्पन्नो अमुक-शर्माऽहं (वर्माऽहं, गुप्तोऽहं वा) मम स्व-शरीरस्य (मम अमुक-यजमानस्य शरीरस्य वा) सम्पूर्ण-रोग-समूह-वात्तिक-पैत्तिक-श्लैष्मिक-द्वन्द्वज-नाना-रोगा-दुष्ट-रोगा-जन्मज-पातकज-नाना-ग्रहोपग्रह-प्रयोग-ग्रह-प्रवेश-ग्रह-प्रयोग-ग्रहादि-शान्त्यर्थे सर्व-ग्रहोच्चाटनार्थे श्रीबगलामुखी-देवता-मन्त्रस्य अयुत-जप-तद्-दशांश-होम-तर्पण-मार्जनाय संकल्पमहं करिष्ये ।baglamukhi
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य नारद ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । बगलामुखी देवता । ह्लीं बीजं । स्वाहा शक्तिः । मम शरीरे (यजमानस्य शरीरे वा) नाना-ग्रहोपग्रह-प्रयोग-ग्रह-प्रवेश-ग्रह-प्रयोग-सम्पूर्ण-रोग-समूह-वात्तिक-पैत्तिक-श्लैष्मिक-द्वन्द्वजादि-नाना-दुष्ट-रोग-जन्मज-पातकजादि-शान्त्यर्थे सर्व-दुष्ट-बाधा-कष्ट-कारक-ग्रहस्य उच्चाटनार्थे शीघ्रारोग्य-लाभार्थे एवं मम अन्य-अभीष्ट-कार्य-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यासः- नारद ऋषये नमः शिरसि । त्रिष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । बगलामुखी देवतायै नमः हृदि । ह्लीं बीजाय नमः गुह्ये । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः । मम शरीरे (यजमानस्य शरीरे वा) नाना-ग्रहोपग्रह-प्रयोग-ग्रह-प्रवेश-ग्रह-प्रयोग-सम्पूर्ण-रोग-समूह-वात्तिक-पैत्तिक-श्लैष्मिक-द्वन्द्वजादि-नाना-दुष्ट-रोग-जन्मज-पातकजादि-शान्त्यर्थे सर्व-दुष्ट-बाधा-कष्ट-कारक-ग्रहस्य उच्चाटनार्थे शीघ्रारोग्य-लाभार्थे एवं मम अन्य-अभीष्ट-कार्य-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

षडङ्ग-न्यास  कर-न्यास अंग-न्यास
ॐ ह्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
बगलामुखि तर्जनीभ्यां स्वाहा शिरसे स्वाहा
सर्व-दुष्टानां मध्यमाभ्यां वषट् शिखायै वषट्
वाचं मुखं स्तम्भय अनामिकाभ्यां हुं कवचाय हुं
जिह्वां कीलय कीलय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् नेत्र-त्रयाय वौषट्
बुद्धिं नाशय ह्लीं ॐ स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट् अस्त्राय फट्

ध्यानः- हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे –
मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्यां, सिंहासनोपरि-गतां परिपीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीं, देवीं स्मरामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।।
जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् ।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ।।
पूजा-विधिः- उपर्युक्त ‘ध्यान’ करके चित्र के सामने या किसी पीतल के पात्र में हाथ का अक्षत-फूल रखकर निम्न-प्रकार पूजन करे –
श्री बगलामुखी-देव्यै नमः आवाहनं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः ध्यानं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः आसनं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः पाद्यं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः अर्घ्यं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः आचमनीयं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः अक्षतान् समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः पुष्पं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः पुष्पं समर्पयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः धूपं आघ्रापयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः दीपं दर्शयामि, नैवेद्यं निवेदयामि, श्री बगलामुखी-देव्यै नमः नैवेद्यान्ते पानीयं समर्पयामि ।
जप हेतु मन्त्रः-
ॐ ह्लीं बगलामुखि ! सर्व-दुष्टानां वाचं मुखं अमुक-देह-स्थित-नाना-रोगान् आश्रित-आवाहित-सर्व-दुष्ट-प्रयोग-प्रतिबन्धक-ग्रहान् फट् उच्चाटनं कुरु-कुरु स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ।
ॐ ह्लीं बगलामुखि ! सर्व-दुष्टानां वाचं मुखं अमुक-देह-स्थिर ज्वर (वातज/पित्तज/कफज/त्रिदोषज) दुष्ट-प्रतिबन्ध-ग्रहान् फट् उच्चाटनं कुरु-कुरु स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ।
ॐ ह्लीं बगलामुखि ! सर्व-दुष्टानां वाचं मुखं अमुक-देह-स्थित ज्वर (वातादि) पर-प्रयोगादि-सर्व-दुष्ट-प्रयोह–ग्रहान् फट् उच्चाटनं कुरु-कुरु स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ।

उपरोक्त तीनों में से किसी एक मन्त्र का दस हजार जप करे । जप का दशांश ‘हवन’ – घी, शहद, चीनी, दूब, गुरुच, धान के लावा, कुम्हार के चाक की मिट्टी, चार-चार अंगुल के रेंड-काष्ठ के टुकड़े, गिद्ध व कौवे के पंख, पीली सरसों का तेल – सब मिलाकर उससे बैर की लकड़ी की अग्नि में करे ।
‘हवन’ के बाद उसका दशांश ‘तर्पण’, फिर उसका दशांश ‘मार्जन’ क्रमशः ‘श्रीबगलामुखि देव्यै नमः तर्पयामि, मार्जयामि’ मन्त्रों से करे । इसके बाद सात या नौ कुमारी कन्याओं तथा एक वटुक (आठ वर्ष के बालक) का पूजन कर उन्हें भोजन कराएँ । भोजनोपरान्त यथा-शक्ति ‘दक्षिणा’ देकर पैर छूकर उन्हें प्रणाम करे और उन सबके हाथ से अपनी पीठ और सिर पर आशीर्वाद लें । भोजन में केला और बेसन का लड्डू रहे, अन्य कोई सामग्री नहीं ।
एक से चार आवृत्ति करने से कठिन-से-कठिन रोगों से छुटकारा प्राप्त होगा ।

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