॥ ब्रह्मचारिणी ॥

हेमवती पार्वती ने शिव को ही अपना पति मानने हेतु कठोर तपस्या की एवं प्रतिज्ञा की यदि मैं शिव को प्रसन्न करने में असफल रही तो ब्रह्मचारिणी रहूंगी । पिता ने उसे उस समय समझाया कि उ-मा अर्थात् उसे मत कर इसी से उनका नाम उमा हो गया ।

उमेति चपले पुत्रि त्वयोक्ता तनया ततः ।
उमेति नाम तेनास्या भुवनेषु भविष्यति ॥

कालिका पुराण में ब्रह्मचारिणी होने के लिये लिखा है –

विनापि शंभुं रुद्राणी भक्तस्तु परिचिन्तयेत् ।

उमा मन्त्र हेतु पार्वती का बीज मन्त्र कहा है ।

पादिः समाप्ति साहितः फडन्ती नान्त एव च ।
एकाक्षरस्त्र्यक्षरश्च उमा मंत्र इति स्मृत ॥

१. एकाक्षर मन्त्र – पां
२.त्र्यक्षर मन्त्र – पार्वती ॥
३. षडक्षर मन्त्र – उं उमायै नमः
४. ॐ ब्रां ब्रीं बूं ब्रह्मचारिण्यै नमः

॥ द्विभुजा ध्यानम् – (कालिका पुराणे) ॥
द्विभुजां स्वर्ण गौरांगी पद्मचामर धारिणीम् ।
व्याघ्रचर्म स्थिते पद्मे पद्मासन गता सदा ॥
पद्म का रंग नील तथा चामर का श्वेत वर्ण कहा गया है ।

॥ चतुर्भुजा ध्यानम् ॥
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।
देवी प्रसीदस्तु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥

॥ यन्त्रार्चनम् ॥
यन्त्र रचना – बिन्दु, त्रिकोण, षट्कोण, अष्टदल एवं भूपुर बनायें ।

ॐ मं मण्डूकादि पीठ देवतायै नमः से पीठ पूजा कर देवी का ध्यान मन्त्र से आवाहन करें ।
प्रथमावरणम् – (त्रिकोणे) ॐ सत्त्वाय नमः। ॐ रजसे नमः। ॐ तमसे नमः।
द्वितीयावरणम् – (षट्कोणे) ॐ हृदय शक्तये नमः। ॐ शिर शक्तये नमः। ॐ शिखा शक्तये नमः। ॐ कवच शक्तये नमः। ॐ नेत्र शक्तये नमः । ॐ अस्त्र शक्तये नमः।
तृतीयावरणम् – (अष्टदले) कालिका पुराणे ॐ जयायै नमः। ॐ विजयायै नमः । ॐ मातङ्ग्यै नमः। ॐ ललितायै नमः। ॐ नारायण्यै नमः। ॐ सावित्र्यै नमः। ॐ स्वधायै नमः। ॐ स्वाहायै नमः।
पुनः असिताङ्ग भैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, कपालभैरव, उन्मत्तभैरव, भीषणभैरव, संहारभैरव का पूजन करें ।
चतुर्थावरणम् – (भूपुरे चतुर्दारे) पूर्वे – गं गणेशाय नमः। दक्षिणे – वं वटुकाय नमः। पश्चिमे – यां योगिन्यै नमः। उत्तरे – क्षा क्षेत्रपालाय नमः।
पञ्चमावरण हेतु भूपुर में इन्द्रादि दिक्पालों का एवं षष्ठमावरण में उनके अस्त्रों का पूजन करें ।
देवि की पूजा अर्चना कर मन्त्र का अनुष्ठान करें । किंशुक पुष्पों को अर्पण करें आसन व पूजा द्रव्यों की कुशा से शुद्धि करें ।

 

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