ब्रह्मवैवर्तपुराण-गणपतिखण्ड-अध्याय 14
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥
चौदहवाँ अध्याय
पार्वती को देवताओं द्वारा कार्तिकेय का समाचार प्राप्त होना

तदनन्तर, पहले शंकर का वीर्य पृथ्वी पर गिरने से कार्तिकेय के उत्पन्न होने की बात आयी थी, उसी के सम्बन्ध में बात छिड़ने पर —

श्रीधर्म ने कहा — भगवन् ! प्रकोप के कारण रति से उठते हुए शंकरजी का वह अमोघ वीर्य भूतल पर गिरा था, यह मुझे ज्ञात है ।

भूमि ने कहा — ब्रह्मन् ! उस वीर्य का वहन करना अत्यन्त कठिन था, इसलिये जब मैं उसका भार सहन न कर सकी, तब मैंने उसे अग्नि में डाल दिया; अतः मुझ अबला को क्षमा कीजिये ।

अग्नि ने कहा — जगन्नाथ ! मैंने भी उस वीर्य का भार उठाने में असमर्थ होकर उसे सरकंडों के वन में फेंक दिया। भला, दुर्बल का पुरुषार्थ ही क्या और उसका यश ही कैसा ?

गणेशब्रह्मेशसुरेशशेषाः सुराश्च सर्वे मनवो मुनीन्द्राः । सरस्वतीश्रीगिरिजादिकाश्च नमन्ति देव्यः प्रणमामि तं विभुम् ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

वायु ने कहा — विष्णो ! स्वर्णरेखा नदी के तट पर सरकंडों में गिरा हुआ वह वीर्य तुरंत ही अत्यन्त सुन्दर बालक हो गया ।

श्रीसूर्य ने कहा — भगवन्! कालचक्र से प्रेरित हुआ मैं उस रोते हुए बालक को देखकर अस्ताचल की ओर चला गया; क्योंकि मैं रात में ठहरने के लिये असमर्थ हूँ।

चन्द्रमा ने कहा — विष्णो! उसी समय कृत्तिकाओं का समुदाय बदरिकाश्रम से आ रहा था। उन्होंने उस रुदन करते हुए बालक को देखा और उसे उठाकर वे अपने भवन को चली गयीं ।

जल ने कहा — प्रभो ! कृत्तिकाओं ने उस रोते हुए शिशु को अपने घर लाकर और उसके भूखे होने पर उसे अपने स्तनों का दूध पिलाकर बढ़ाया । वह शिव-पुत्र सूर्य से भी अधिक प्रभावशाली था ।

दोनों संध्याओं ने कहा — भगवन् ! इस समय वह बालक छहों कृत्तिकाओं का पोष्य पुत्र है । उन्होंने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उसका ‘कार्तिकेय’ ऐसा नाम रखा है।

रात्रि ने कहा — प्रभो ! वे कृत्तिकाएँ उस बालक को आँखों से ओझल नहीं करती हैं। उनके लिये वह प्राणों से भी बढ़कर प्रेमपात्र है; क्योंकि जो पालन करने वाला होता है, उसी का वह पुत्र कहलाता है ।

दिन ने कहा — देव ! जो-जो वस्तुएँ त्रिलोकी में दुर्लभ हैं और अपने स्वाद के लिये प्रशंसित हैं, उन्हीं को वे उस बालक को खिलाती हैं ।

जब उस सभा में उन सब लोगों ने प्रसन्नमन से श्रीहरि से यों कहा, तब उनके उस कथन को सुनकर मधुसूदन संतुष्ट हो गये । पुत्र का पूरा समाचार पाकर पार्वती का मन हर्ष से खिल उठा। उन्होंने ब्राह्मणों को करोड़ों रत्न, बहुत-सा धन और विभिन्न प्रकार के सभी वस्त्र दिये । तत्पश्चात् लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, मेना आदि सभी महिलाओं तथा विष्णु आदि सभी देवताओं ने ब्राह्मणों को धन दिया ।           (अध्याय १४)

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे तृतीये गणेशखण्डे नारदनारायणसंवादे कार्त्तिकेयजन्मकथनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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