ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 27
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥
सताईसवाँ अध्याय
सावित्री – धर्मराज के प्रश्नोत्तर

सावित्री ने कहा — धर्मराज! जिस कर्म के प्रभाव से पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग अथवा अन्य लोक में जाते हैं, वह मुझे बताने की कृपा करें ।

धर्मराज बोले — पतिव्रते ! ब्राह्मण को अन्न दान करनेवाला पुरुष इन्द्रलोक में जाता है और दान किये हुए अन्नमें जितने दाने होते हैं उतने वर्षों तक वह वहाँ निवास पाता है ।

अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति ।
नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियमः क्वचित् ॥ ३ ॥

अन्नदान से बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा । इसमें न कभी पात्र की परीक्षा की आवश्यकता होती है और न समय की । साध्वि ! यदि ब्राह्मणों अथवा देवताओं को आसन दान किया जाय तो हजारों वर्षों तक अग्निदेव के लोक में रहने की सुविधा प्राप्त हो जाती है। जो पुरुष ब्राह्मण को दूध देने वाली गौ दान करता है, वह गौ के शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षों तक वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठित रहता है । यह गोदान साधारण दिनों की अपेक्षा पर्व के समय चौगुना, तीर्थ में सौगुना और नारायणक्षेत्र में कोटिगुना फल देने वाला होता है। जो मानव भारतवर्ष में रहकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गौ प्रदान करता है, वह हजारों वर्षों तक चन्द्रलोक में रहने का अधिकारी बन जाता है। दुग्धवती गौ ब्राह्मण को देने वाला पुरुष उसके रोमपर्यन्त वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता । जो ब्राह्मण को वस्त्रसहित शालग्राम-शिला का दान करता है, वह चन्द्रमा और सूर्य के स्थितिकाल तक वैकुण्ठ में सम्मानपूर्वक रहता है । ब्राह्मण को सुन्दर स्वच्छ छत्र दान करने वाला व्यक्ति हजारों वर्षों तक वरुण के लोक में आनन्द करता है । साध्वि ! जो ब्राह्मण को दो पादुकाएँ प्रदान करता है, उसे दस हजार वर्ष तक वायुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मनोहर दिव्य शय्या ब्राह्मण को देने से दीर्घकाल तक चन्द्रलोक में प्रतिष्ठा होती है। जो देवताओं अथवा ब्राह्मणों को दीप दान करता है, वह ब्रह्मलोक में वास करता है । उस पुण्य से उसके नेत्रों में ज्योति बनी रहती है तथा वह यमलोक में नहीं जाता।

भारतवर्ष में जो मनुष्य ब्राह्मण को हाथी दान करता है, वह इन्द्र की आयुपर्यन्त उनके आधे आसन पर विराजमान होता है । ब्राह्मण को घोड़ा देने वाला भारतवासी मनुष्य वरुणलोक में आनन्द करता है । ब्राह्मण को उत्तम शिविका – पालकी प्रदान करने वाला विष्णुलोक में जाता है। जो ब्राह्मण को पंखा तथा सफेद चँवर अर्पण करता है, वह वायुलोक में सम्मान पाता है। जो भारतवर्ष में ब्राह्मण को धान का पर्वत देता है, वह धान के दानों के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है । दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही वैकुण्ठलोक में चले जाते हैं ।

जो भारतवर्ष में निरन्तर भगवान् श्रीहरि के नाम का कीर्तन करता है, उस चिरञ्जीवी मनुष्य को देखते ही मृत्यु भाग जाती है। भारतवर्ष में जो विद्वान् मनुष्य पूर्णिमा को रातभर दोलोत्सव मनाने का प्रबन्ध करता है, वह जीवन्मुक्त है । इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह भगवान् विष्णु के धाम को प्राप्त होता है। उत्तराफाल्गुनी में उत्सव मनाने से इससे दुगुना फल मिलता है।

जो भारतवर्ष में ब्राह्मण को तिलदान करता है, वह तिल के बराबर वर्षों तक विष्णुधाम में सम्मान पाता है । उसके बाद उत्तम योनि में जन्म पाकर चिरजीवी हो सुख भोगता है । ताँबे के पात्र में तिल रखकर दान करने से दूना फल मिलता है। जो मनुष्य ब्राह्मण को फलयुक्त वृक्ष प्रदान करता है, वह फल के बराबर वर्षों तक इन्द्रलोक में सम्मान पाता है । फिर उत्तम योनि में जन्म पाकर वह सुयोग्य पुत्र प्राप्त करता है । फल वाले वृक्षों के दान की महिमा इससे हजारगुना अधिक बतायी गयी है अथवा ब्राह्मण को केवल फल का भी दान करने वाला पुरुष दीर्घकाल तक स्वर्ग में वास करके पुनः भारतवर्ष में जन्म पाता है । भारतवर्ष में रहने वाला जो पुरुष अनेक द्रव्यों से सम्पन्न तथा भाँति-भाँति के धान्यों से भरे-पूरे विशाल भवन ब्राह्मण को दान करता है, वह उसके फलस्वरूप दीर्घकाल तक कुबेर के लोक में वास पाता है । तत्पश्चात् उत्तम योनि में जन्म पाकर वह महान् धनवान् होता है ।

साध्वि ! हरी-भरी खेती से युक्त सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को अर्पण करने वाला पुरुष निश्चयपूर्वक वैकुण्ठधाम में प्रतिष्ठित होता है । जो मानव उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मण को दान करता है, उसकी वैकुण्ठलोक में प्रतिष्ठा होती है । फिर, जहाँ की उत्तम प्रजाएँ हों, जहाँ की भूमि पकी हुई खेतियों से लहलहा रही हो, अनेक प्रकार की पुष्करिणियों से संयुक्त हो तथा फल वाले वृक्ष और लताएँ जिसकी शोभा बढ़ा रही हों, ऐसा श्रेष्ठ नगर जो पुरुष भारतवर्ष में ब्राह्मण को दान करता है, वह बहुत लंबे समयपर्यन्त वैकुण्ठधाम में सुप्रतिष्ठित होता है । फिर भारतवर्ष में उत्तम जन्म पाकर राजेश्वर होता है। उसे लाखों नगरों का प्रभुत्व प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है। निश्चितरूप से सम्पूर्ण ऐश्वर्य भूमण्डल पर उसके पास विराजमान रहते हैं । अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणी का भी नगर प्रजाओं से सम्पन्न हो, वापी, तड़ाग तथा भाँति-भाँति के वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हों, ऐसे सौ नगर ब्राह्मण को दान करनेवाला पुण्यात्मा वैकुण्ठलोक में सुप्रतिष्ठित होता है । जैसे इन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर स्वर्गलोक में शोभा पाते हैं, वैसे ही भूमण्डल पर उस पुरुष की शोभा होती है । दीर्घकाल तक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती। वह महान् सम्राट् होता है। अपना सम्पूर्ण अधिकार ब्राह्मण को देनेवाला पुरुष चौगुने फल का भागी होता है; इसमें संशय नहीं है।

पतिव्रते ! जो पुरुष ब्राह्मण को जम्बूद्वीप का दान करता है, उसे निश्चितरूप से सौगुने फल प्राप्त होते हैं। जो सातों द्वीपों की पृथ्वी का दान करने वाले, सम्पूर्ण तीर्थों में निवास करने वाले, समस्त तपस्याओं में संलग्न, सम्पूर्ण उपवास – व्रत के पालक, सर्वस्व दान करने वाले तथा सम्पूर्ण सिद्धियों के पारङ्गत तथा श्रीहरि के भक्त हैं, उन्हें पुनः जगत् मेंं जन्म धारण करना नहीं पड़ता। उनके सामने असंख्य ब्रह्माओं का पतन हो जाता है, परंतु वे श्रीहरि के गोलोक या वैकुण्ठधाम में निवास करते रहते हैं । विष्णु-मन्त्र की उपासना करने वाले पुरुष अपने मानव-शरीर का त्याग करने के पश्चात् जन्म, मृत्यु एवं जरा से रहित दिव्य रूप धारण करके श्रीहरि का सारूप्य पाकर उनकी सेवामें संलग्न हो जाते हैं। देवता, सिद्ध तथा अखिल विश्व – ये सब-के-सब समयानुसार नष्ट हो जाते हैं, किंतु श्रीकृष्ण-भक्तों का कभी नाश नहीं होता । जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था उनके निकट नहीं आ सकती ।

जो पुरुष कार्तिकमास में श्रीहरि को तुलसी अर्पण करता है, वह पत्र संख्या के बराबर युगों तक भगवान् ‌के धाम में विराजमान होता है । फिर उत्तम कुल में उसका जन्म होता और निश्चितरूप से भगवान्‌ के प्रति उसके मन में भक्ति उत्पन्न होती है, वह भारत में सुखी एवं चिरञ्जीवी होता है। जो कार्तिक में श्रीहरि को घी का दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षों तक हरिधाम में आनन्द भोगता है । फिर अपनी योनि में आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान् | नेत्र की ज्योति से युक्त तथा दीप्तिमान् होता है। जो पुरुष माघ में अरुणोदय के समय प्रयाग की गङ्गा में स्नान करता है, उसे दीर्घकाल तक भगवान् श्रीहरि के मन्दिर में आनन्द लाभ करने का सुअवसर मिलता है । फिर वह उत्तम योनि में आकर भगवान् श्रीहरि की भक्ति एवं मन्त्र पाता है; भारत में जितेन्द्रिय-शिरोमणि होता है । पुनः यथासमय मानव शरीर को त्यागकर ‘भगवद्धाम’ में जाता है। वहाँ से पुनः पृथ्वीतल पर आने की स्थिति उसके सामने नहीं आती। भगवान्‌ का सारूप्य प्राप्त कर वह उन्हीं की सेवामें सदा लगा रहता है ।

गङ्गा में सर्वदा स्नान करने वाला पुरुष सूर्य की भाँति भूमण्डल पर पवित्र माना जाता है । उसे पद-पद पर अश्वमेध-यज्ञ का फल प्राप्त होता है, यह निश्चित है। उसकी चरण-रज से पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है । वह वैकुण्ठलोक में सुखपूर्वक निवास करता है । उस तेजस्वी पुरुष को जीवन्मुक्त कहना चाहिये । सम्पूर्ण तपस्वी उसका आदर करते हैं। जो पुरुष मीन और कर्क के मध्यवर्ती काल में भारतवर्ष में सुवासित जल का दान करता है, वह वैकुण्ठ में आनन्द भोगता रहता है । फिर उत्तम योनि में जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा वेद और वेदाङ्ग का पारगामी विद्वान् होता है । वैशाख मास में ब्राह्मण को सत्तू दान करने वाला पुरुष सत्तू-कण के बराबर वर्षों तक विष्णु-मन्दिर में प्रतिष्ठित होता है ।

भारतवर्ष में रहने वाला जो प्राणी श्रीकृष्णजन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है । इसमें संशय नहीं है। वह दीर्घकाल तक वैकुण्ठलोक में आनन्द भोगता है । फिर उत्तम योनि में जन्म लेने पर उसे भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है – यह निश्चित है । इस भारतवर्ष में ही शिवरात्रि का व्रत करने वाला पुरुष दीर्घकाल तक शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो शिवरात्रि के दिन भगवान् शंकर को बिल्वपत्र चढ़ाता है, वह पत्र-संख्या के बराबर युगों तक कैलास में सुखपूर्वक वास करता है । पुनः श्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर भगवान् शिव का परम भक्त होता है । विद्या, पुत्र, सम्पत्ति, प्रजा और भूमि – ये सभी उसके लिये सुलभ रहते हैं ।

जो व्रती पुरुष चैत्र अथवा माघ मास में शंकर की पूजा करता है तथा बेंत लेकर उनके सम्मुख रात-दिन भक्तिपूर्वक नृत्य करने में तत्पर रहता है, वह चाहे एक मास, आधा मास, दस दिन, सात दिन अथवा दो ही दिन या एक ही दिन ऐसा क्यों न करे, उसे दिन की संख्या के बराबर युगों तक भगवान् शिव के लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है।

साध्वि ! जो मनुष्य भारतवर्ष में रामनवमी का व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरों तक विष्णुधाम में आनन्द का अनुभव करता है, फिर अपनी योनि में आकर रामभक्ति पाता और जितेन्द्रिय-शिरोमणि होता है। जो पुरुष भगवती की शरत्कालीन महापूजा करता है; साथ ही नृत्य, गीत तथा वाद्य आदि के द्वारा नाना प्रकार के उत्सव मनाता है, वह पुरुष भगवान् शिव के लोक में प्रतिष्ठित होता है । फिर श्रेष्ठ योनि में जन्म पाकर वह निर्मल बुद्धि पाता है। अतुल सम्पत्ति, पुत्र-पौत्रों की अभिवृद्धि, महान् प्रभाव तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन – ये सभी उसे प्राप्त हो जाते हैं। वह राजराजेश्वर भी होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। जो पुरुष पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में रहकर भाद्रपद मास की शुक्लाष्टमी के अवसर पर एक पक्ष तक नित्य भक्ति-भाव से महालक्ष्मी की उपासना करता है, सोलह प्रकार के उत्तम उपचारों से भली-भाँति पूजा करने में संलग्न रहता है, वह वैकुण्ठधाम में रहने का अधिकारी होता है ।

भारतवर्ष में कार्तिक की पूर्णिमा के अवसर पर सैकड़ों गोप एवं गोपियों को साथ लेकर रासमण्डल-सम्बन्धी उत्सव मनाने की बड़ी महिमा है । उस दिन पाषाणमयी प्रतिमा में सोलह प्रकार के उपचारों द्वारा श्रीराधा-कृष्ण की पूजा करे। इस पुण्यमय कार्य को सम्पन्न करने वाला पुरुष गोलोक में वास करता है और भगवान् श्रीकृष्ण का परम भक्त बनता है । उसकी भक्ति क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होती है । वह सदा भगवान् श्रीहरि का मन्त्र जपता है । वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण के समान रूप प्राप्त करके उनका प्रमुख पार्षद होता है। जरा और मृत्यु को जीतने वाले उस पुरुष का पुनः वहाँ से पतन नहीं होता ।

जो पुरुष शुक्ल अथवा कृष्ण-पक्ष की एकादशी का व्रत करता है, उसे वैकुण्ठ में रहने की सुविधा प्राप्त होती है। फिर भारतवर्ष में आकर वह भगवान् श्रीकृष्ण का अनन्य उपासक होता है। क्रमशः भगवान् श्रीहरि के प्रति उसकी भक्ति सुदृढ़ होती जाती है। शरीर त्यागने के बाद पुनः गोलोक में जाकर वह भगवान् श्रीकृष्ण का सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है । पुनः उसका संसार में आना नहीं होता। जो पुरुष भाद्रपद मास की शुक्ल द्वादशी तिथि के दिन इन्द्र की पूजा करता है, वह सम्मानित होता है । जो प्राणी भारतवर्ष में रहकर रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य की पूजा करके हविष्यान्न भोजन करता है, वह सूर्यलोक में विराजमान होता है । फिर भारतवर्ष में जन्म पाकर आरोग्यवान् और धनाढ्य पुरुष होता है । ज्येष्ठ महीने की कृष्ण चतुर्दशी के दिन जो व्यक्ति भगवती सावित्री की पूजा करता है, वह ब्रह्मा के लोक प्रतिष्ठित होता है । फिर वह पृथ्वी पर आकर श्रीमान् एवं अतुल पराक्रमी पुरुष होता है। साथ ही वह चिरंजीवी, ज्ञानी और वैभव-सम्पन्न होता है। जो मानव माघ मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी तिथि के दिन संयम-पूर्वक उत्तम भक्ति के साथ षोडशोपचार से भगवती सरस्वती की अर्चना करता है, वह वैकुण्ठधाम में स्थान पाता है । जो भारतवासी व्यक्ति जीवनभर भक्ति के साथ नित्यप्रति ब्राह्मण को गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह वैकुण्ठ में सुख भोगता है ।

भारतवर्ष में जो प्राणी ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन कराता है, वह ब्राह्मण की रोमसंख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो भारतवासी व्यक्ति भगवान् श्रीहरि के नाम का स्वयं कीर्तन करता है अथवा दूसरे को कीर्तन करने के लिये उत्साहित करता है, वह नाम-संख्या के बराबर युगों तक वैकुण्ठ में विराजमान होता है । यदि नारायणक्षेत्र में नामोच्चारण किया जाय तो करोड़ोंगुना अधिक फल मिलता है । जो पुरुष नारायण-क्षेत्र में भगवान् श्रीहरि के नाम का एक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापों से छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है – यह ध्रुव सत्य है। वह पुनः जन्म न पाकर विष्णुलोक में विराजमान होता है । उसे भगवान् का सारूप्य प्राप्त हो जाता है। वहाँ से वह फिर गिर नहीं सकता ।

जो पुरुष प्रतिदिन पार्थिव मूर्ति बनाकर शिवलिङ्ग की अर्चा करता है और जीवनभर इस नियम का पालन करता रहता है, वह भगवान् शिव के धाम में जाता है और लंबे समय तक शिवलोक प्रतिष्ठित रहता है; तत्पश्चात् भारतवर्ष में आकर राजेन्द्रपद को सुशोभित करता है । निरन्तर शालग्राम की पूजा करके उनका चरणोदक पान करने वाला पुण्यात्मा पुरुष अतिदीर्घकालपर्यन्त वैकुण्ठ में विराजमान होता है। उसे दुर्लभ भक्ति सुलभ हो जाती है । संसार में उसका पुनः आना नहीं होता । जिसके द्वारा सम्पूर्ण तप और व्रत का पालन होता है, वह पुरुष इन सत्कर्मों के फलस्वरूप वैकुण्ठ में रहने का अधिकार पाता है । पुनः उसे जन्म नहीं लेना पड़ता । जो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करके पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है, उसे इन्द्र के आधे आसन पर विराजमान रहता है। राजसूययज्ञ करने से मनुष्य को इससे चौगुना फल मिलता है।

सुन्दरि ! सम्पूर्ण यज्ञों से भगवान् विष्णु का यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है । ब्रह्मा ने पूर्वकाल में बड़े समारोह के साथ इस यज्ञ का अनुष्ठान किया था । पतिव्रते ! उसी यज्ञ में दक्ष प्रजापति और शंकर में कलह मच गया था। ब्राह्मणों ने क्रोध में आकर नन्दी को शाप दिया था और नन्दी ने ब्राह्मणों को । यही कारण है कि भगवान् शंकर ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर डाला । पूर्वकाल में दक्ष, धर्म, कश्यप, शेषनाग, कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुव ने विष्णुयज्ञ किया था । उसके अनुष्ठान से हजारों राजसूययज्ञों का फल निश्चितरूप से मिल जाता है । वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पों तक जीवन धारण करने वाला तथा जीवन्मुक्त होता है।

भामिनि ! जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, वैष्णव-पुरुषों में शिव, शास्त्रों में वेद, वर्णों में ब्राह्मण, तीर्थों में गङ्गा, पुण्यात्मा पुरुषों में वैष्णव, व्रतों में एकादशी, पुष्पों में तुलसी, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में गरुड़, स्त्रियों में भगवती मूलप्रकृति राधा, आधारों में वसुन्धरा, चञ्चल स्वभाववाली इन्द्रियों में मन, प्रजापतियों में ब्रह्मा, प्रजेश्वरों में प्रजापति, वनों में वृन्दावन, वर्षों में भारतवर्ष, श्रीमानों में लक्ष्मी, विद्वानों में सरस्वती, पतिव्रताओं में भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्णपत्त्रियों में श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञों में विष्णुयज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। सम्पूर्ण तीर्थों का स्नान, अखिल यज्ञों की दीक्षा तथा व्रतों एवं तपस्याओं और चारों वेदों के पाठ का तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा का फल अन्त में यही है कि भगवान् श्रीकृष्ण की मुक्तिदायिनी सेवा सुलभ हो। पुराणों, वेदों और इतिहास में सर्वत्र श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की अर्चना को ही सारभूत माना गया है । भगवान्‌ के स्वरूप का वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम और गुणों का कीर्तन, स्तोत्रों का पाठ, नमस्कार, जप, उनका चरणोदक और नैवेद्य ग्रहण करना – यह नित्य का परम कर्तव्य है । साध्वि ! इसे सभी चाहते हैं और सर्वसम्मति से यही सिद्ध भी है ।

वत्से ! अब तुम प्रकृति से पर तथा प्राकृत गुणों से रहित परब्रह्म श्रीकृष्ण की निरन्तर उपासना करो । तुम्हारे पतिदेव को लौटा देता हूँ । इन्हें लो और सुखपूर्वक अपने घर को जाओ। मनुष्यों का यह मङ्गलमय कर्म विपाक मैंने तुमको सुना दिया। यह प्रसङ्ग सर्वेप्सित, सर्वसम्मत तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है ।  (अध्याय २७)

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे द्वितीये प्रकृतिखण्डे नारद नारायणसंवादे सावित्रीयमसंवादे सावित्र्युपाख्याने शुभकर्मविपाकप्रकथनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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