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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १६२ से १६३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १६२ से १६३
महिषी एवं मेघी-दानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं — राजन् ! अब मैं पापनाशक, पुण्यप्रद तथा आयु और सुखप्रदायक महिषी के दान की विधि बता रहा हूँ । सूर्य-चन्द्रग्रहण, कार्तिक पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी आदि पर्व-दिनों में अथवा जब भी सामर्थ्य हो, उसी समय संसारिक दुःख की निवृति के लिये महिषी-दान करना चाहिये । शुभ लक्षणों से सम्पन्न तथा अलंकृत महिषी उत्तम विद्वान् ब्राह्मण को देनी चाहिये । दान देने के समय इस मन्त्र को पढ़ना चाहिये —om, ॐ

“इन्द्रादिकपालानां या राजमहिषी शुभा ।
महिषीदानमाहात्म्यात् सास्तु मे सर्वकामदा ।।
धर्मराजस्य साहाय्ये यस्य पुत्रः प्रतिष्ठितः ।
महिषासुरस्य जननी या सास्तु वरदा मम ।।”
(उत्तरपर्व १६२ । ९-१०)
‘जो इन्द्रादि लोकपालों की कल्याणकारिणी राजमहिषी है और धर्मराज की सहायता करने के लिये जिसका पुत्र (महिष) उनका वाहन बना हुआ है तथा जो महिषासुर की जननी है, वह मेरे लिये वरदायिनी हो । इस महिषी-दान से मेरी सम्पूर्ण कामनाएं पूर्ण हो जायें ।’

प्रदक्षिणा के पश्चात् पृष्ठ-भाग से महिषी का दान करना चाहिये । वस्त्र, आभूषण और दक्षिणा के साथ महिषी ब्राह्मण को देकर विसर्जन करना चाहिये । इस विधि से जो व्यक्ति महिषी का दान करता है, वह इस लोक तथा परलोक में वाञ्छित फल प्राप्त करता है ।

महाराज ! इसी प्रकार मेषी-दान भी सभी पापों को दूर करनेवाला है । एक सुवर्णमयी मेषी की प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम भूषण, रेशमी वस्त्र, चन्दन, पुष्पमाला आदि से अलंकृतकर अथवा प्रत्यक्ष मेषी को अलंकृतकर उसका दान करना चाहिये । ग्रहण, विषुवयोग, अयनसंक्रान्ति आदि पवित्र दिनों में, दुःस्वप्न देखने पर, अमावास्या में अथवा जब भी श्रद्धा हो तब इसका दान करना चाहिये । दान के समय शिव-पार्वती, ब्रह्मा-गायत्री, लक्ष्मी-नारायण तथा रति-कामदेव की पूजा करनी चाहिये, साथ ही लोकपालों और ग्रहों की भी पूजा करनी चाहिये । तदनन्तर हवन करना चाहिये । ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिये । पूजन के बाद मेषी की प्रतिमा को तिल के कलश पर स्थापित कर उसके सामने नमक रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और गृहस्थ ब्राह्मण को उसका दान कर दे । इस दान के प्रभाव से निःसंतान को पुत्र और निर्धन को धन प्राप्त हो जाता है । जो व्यक्ति इस दान की विधि को सुनता हैं, वह भी अहोरात्र में किये गये पापों से छूट जाता है ।
(अध्याय १६२-१६३)

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