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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय २६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय २६

सूत जी बोले — एक बार श्रावणमास की नागपञ्चमी के अवसर पर कलह-प्रिय महीपति (माहिल) ने दिल्ली को प्रस्थान किया। वहाँ के पञ्चमी उत्सव को जिसमें नृत्य-गान का महान समारोह होता है, देखते हुए पृथिवीराज के पास पहुँचकर नमस्कार के उपरांत विनम्र निवेदन किया – राजन् ! महावती (महोबा) नगर के कीर्तिसागर के मध्य में यवत्रीहि युक्त वामन-महोत्सव अत्यन्त समारोह के साथ सुसम्पन्न होता है। om, ॐअतः मेरी नितान्त कामना है कि अबकी बार आप उस महोत्सव को देखने की अवश्य कृपा करें। इसे सुनकर पृथ्वीराज ने धंधकार (धांधू) और चामुण्ड (चौंढा) समेत लाख सैनिकों को लेकर उस शृशिप नामक वन में पहुंचकर वहाँ अपना सैनिक-निवास बनाया। उसी बीच महीपति (माहिल) शीघ्र चन्द्रवंशी राजा परिमल के यहाँ आकर नमस्कार के उपरांत उस मायावी धूर्त ने अपने मुख को गम्भीर बनाकर उनसे कहा-राजन् ! तुमसे युद्ध करने के लिए पृथ्वीराज यहां आये हुए हैं। दिव्यलिंग की पूजा के उपरांत ये तुम्हारी पुत्री चन्द्रावली का अपहरण बलप्रयोग द्वारा करेंगे। इसलिए महामते ! अपनी सेना के साथ तुम मेरे साथ चलकर छल-छद्म द्वारा उन्हें पराजित कर अपनी राजधानी में सुख का अनुभव करो। इसे सुनकर दैववंश राजा परिमल ने अपनी चार लाख सेना लेकर आधीरात के समय वहां जाकर शत्रु के पाँच सहस्र सैनिक के वध करने के उपरांत उन तोपों का प्रयोग करना आरम्भ किया, जिसके द्वारा एक बार में ही अनेक सैनिक धराशायी हो जाते हैं । उस समय राजा पृथ्वीराज ने स्व्हसा उठकर कमर कसते हुए उन्हें महान् शत्रु समझकर उनसे भीषण युद्ध किया। दोनों सैनिकों के युद्ध करते समय रानी मलना ने अपने पुत्र की हित कामना से मंदिर में जाकर देवी शारदा की भक्ति समेत सादर पूजा की । और पश्चात् प्रार्थना की-महादेवि ! आप समस्त दुःख की हरण करने वाली देवी है। अतः देवि ! मेरी समस्त बाधा का अपहरण करो उदयसिंह को शीघ्र इसका ज्ञान कराओ । देवी के मंत्र की दश सहस्र आवृति जप, हवन, तर्पण और मार्जन करने के उपरांत उसी मन्दिर में उन्होंने शयन किया। स्वप्न में देवी शारदा ने उनसे यह कहकर कि ‘मलने देवि ! शोक मत करो, तुम्हारी यह बड़ी बाधा शीघ्र नष्ट हो जायेगी तथा उदयसिंह के पास जाकर स्वप्न में उनसे कहा-पुत्र ! तुम्हारी जन्म-भूमि राजा के द्वारा कष्टयुक्त है इसलिए उसका उद्धार करो अन्यथा वह शीघ्र विनष्ट हो जायेगी । देवी की इन बातों को सुनकर चकित होकर उन्होंने जाकर देव की सभी बातें कहा। उसे सुनकर घोर तप करती हुई पतिव्रता देवकी ने स्वर्णवती (सोना) समेत मानसिक पीड़ा से व्यथित होती हुई अत्यन्त रुदन किया। उस समय उदयसिंह ने दुःखी होकर देवसिंह से कहा-वीर! इस समय मेरा क्या कर्तव्य है, मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये । उसे सुनकर देवसिंह ने उन्हें तथा लक्षण (लाखन) को साथ लेकर दिग्विजय के व्याज से महावती (महोबा) को प्रस्थान किया। भीम सेनांश तालन अपनी सात लाख सेनाओं का संचालन करते हुए जा रहे थे । केवल आह्लाद (आल्हा) ही उस यात्रा से वंचित थे। कल्पक्षेत्र में पहुँचकर उन लोगों ने अपना योगी का वेष बनाकर उसी घोर जंगल में सेना रखकर उदयसिंह, तालन, देवसिंह और सबल लक्षण (लाखन) ने अपने नृत्य-गान की सामग्रियाँ लेकर उस रणक्षेत्र को प्रस्थान किया। वहाँ उन दोनों सैनिकों में सात दिन तक घोर युद्ध होता रहा। उसी सातवें दिन वे वीरगण भी वहाँ पहुँच गये थे। महाभाग ! उस दिन घोर युद्ध हुआ था। राजा परिमल ने अपने सैनिकों को पराजित देखकर विपत्तियों के जाल में फंसकर रथ पर बैठे हुए पृथ्वीराज के समीप गमन किया। उस समय चन्द्रावली के पति यादव ने हाथी पर बैठे धंधकार (धांधू) को उत्तेजित करते हुए उनसे धनुष युद्ध आरम्भ किया। एवं हरिनागर पर बैठे हुए व्रह्मानन्द अपने शत्रु तारक (ताहर) को ललकारकर उनसे धनुर्युद्ध करने लगे। उसी प्रकार रणजित् ने अपने शत्रु राजपुत्र मर्दन को अपने बाण प्रहारों से व्याकुल करते हुए उनके पुत्र का निधन कर दिया। रूपण अश्वारूढ़ होकर युद्ध कर रहा था, अहीरन के गर्भ से उत्पन्न गदन जो शंख के अंश से उत्पन्न था, राजपुत्र नृहरि के साथ घोर युद्ध में लीन था। इस प्रकार उन वीरों के युद्ध करते समय चामुण्ड ने महीपति (माहिल) के कथनानुसार दश सहस्र सैनिकों समेत महावती (महोवा) नगर को, जो परमरम्य, चारों वर्गों के नागरिकों से सुशोभित एवं धन-धान्य से परिपूर्ण था, देखते हुए धूर्त महीपति (माहिल) के साथ दुर्ग के अन्दर प्रवेश किया। दरवाजे पर पहुँचकर वह पापी माहिल केवल चामुण्ड को लेकर भीतर राजमहल में चला गया। उस समय भाई को देखकर मलना ने दुःखी होकर कहा-आज भाद्रपदमास के कृष्णपक्ष की अष्टमी का दिन है, इसीदिन यह यवव्रीहि जो घर में स्थित है। उसे कीर्तिसागर के पुष्पजल में जाना चाहिए किन्तु न जा सका, यह पापी पृथ्वीराज भी इसी वामनोत्सव के समय आ गया है । आह्लाद (आल्हा) और उदयसिंह के बिना इस समय मैं अत्यन्त कष्ट का अनुभव कर रही हूँ । उनके इतना कहने पर हंसते हुए उस महाबली (माहिल) ने कहा-उदयसिंह का भेजा हुआ एक देवीदत्त नामक ब्राह्मण कन्नौज से आया है, वही तुम्हारा सभी कार्य सुसम्पन्न करायेगा । उसे सुनकर समस्त आभूषणों से सुसज्जित देवी चन्द्रावली ने कामपीडित उस चामुण्ड नामक ब्राह्मण को देखकर माता से आकर निर्भीक होकर कहना आरम्भ किया-मातः ! यह व्राह्मण धूर्त है, निश्चय यह मेरा अपहरण करेगा। मैं यह भी नहीं जानती हूँ कि यह कौन वीर है। इसलिए पतिव्रता होकर मैं इसके साथ कैसे (कीतिसागर) जा सकती हैं। इसे सुनकर महीपति (माहिल) अत्यन्त लज्जित होकर चामुण्ड समेत उस रणरथल में चला गया। उसी बीच पराजित होकर ब्रह्मादि अपने शेष तीन लाख सैनिकों को लेकर दुर्ग के द्वार को दृढतर बन्दकर भीतर अत्यन्त चितित हो रहे थे। उधर माहिल के कथनानुसार पृथ्वी राज ने छः लाख सैनिकों समेत बामनोत्सव के कारण वहां के प्रमोदवन को घेर लिया था। दालन आदि चारों वीरों ने शृशिपपुर पहुँचकर वहाँ के नगर को केवल स्थंडिल (डीह) मात्र देखकर अत्यन्त आश्चर्य किया। वहाँ इधर-उधर घूमते उन लोगों ने मद नामक मुनि को देखकर नमस्कार पूर्वक चितित होकर पूछा-मुने ! रणप्रेमी बलखानि (मलखान) वीर कहाँ चला गया और नगर निवासी कहाँ गये । इसे सुनकर योगी मद ने कहा-पृथ्वीराज ने सब नष्ट कर दिया है, उसी ने छल-छद्म द्वारा बलखानि (मलखान) की हत्या की है, उसी की यह सुंदरी चिता दिखाई दे रही है। इस घोर वाणी को सुनकर उदयसिंह ने शोक-सागर में निमग्न होकर विलाप करना आरम्भ किया-हा बंधो ! धर्म पुत्र के अंश, तुम कहाँ चले गये । तुम्हारे विना इस भूतल में मेरा निवास करना अत्यन्त दुस्सह है, मुझे शीघ्र दर्शन प्रदान करो नहीं तो मैं प्राणत्याग के लिए तैयार हैं। इस प्रकार उनके विलाप करने पर पिशाचयोनिप्राप्त बलखानि (मलखान) ने पत्नी समेत वहाँ प्रत्यक्ष होकर अत्यन्न रुदन करते हुए जिस प्रकार दुर्मृत्यु हुई थी, सभी वृत्तान्त कह सुनाया। पश्चात् दिव्य विमान पर सुशोभित होकर उस रमणीक स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया और उसकी कला युधिष्ठिर में विलीन हो गई । उपरांत उदयसिंह दुःखी होते हुए भाई को तिलाञ्जलि प्रदान कर महावती (महोवा) के राजमहल में पहुँच गये। वहाँ उदयसिंह ने वंशी बजाते हुए अपने नृत्य द्वारा देखने वालों को मोहित कर दिया ! उस नृत्य में योगीरूप धारणकर तालन वीणा, देवसिंह मृदङ्ग और लक्षण (लाखन) मजीरा बजा रहे थे। उस सुरीलो तान को सुनकर राजा (परिमल) मोहित हो गये। उस समय रानी मलना उस वामनोत्सव को देखकर रुदन करती हुई कहने लगी-मेरा प्यारा कहाँ चला गया, भाई समेत उदयसिंह ने मुझ मन्द भागिनी को त्याग दिया है। मैं तुम्हें कहाँ पाऊँ। तुमसे शून्य जानकर इस प्रदेश को पृथ्वीराज ने लूट लिया है । इस प्रकार कहती हुई मलना को देख स्नेह से अधीर होकर उदयसिंह ने नम्रतापूर्वक उनसे कहा-देवि ! तुम मेरी बात स्वीकार करो ! रानी ! हम सभी योगी युद्ध करने में निपुण हैं, अतः तुम्हारे इन सभी कार्यों को सुसम्पन्न कराने के उपरांत नैमिषारण्य जाँयेगे । इसलिए तुम्हारे घर में जितने यवत्रीहि स्थित हैं, उन्हें लेकर स्त्रियाँ कीतिसागर के समीप चलने की तैयारी करें । हमलोग इस योगी के सेना द्वारा तुम्हारी रक्षा करेंगे । इसे सुनकर उनकी पतिव्रता पुत्री (चन्द्रावली) ने अपनी माता से कहा-यह नृत्य करने वाला उदयसिंह ही है, क्योंकि इसके दोनों नेत्र कमल के समान और अंग अत्यन्त मनोरम हैं । अतः माता! विना उदयसिंह के इस भूतल में (हम लोगों की) रक्षा के लिए कौन समर्थ हो सकता है । क्योंकि पृथ्वीराज सबके लिए दुर्जेय है, वह केवल उदयसिंह से ही पराजित हुआ है। इसे सुनकर प्रेम विभोर होकर रानी मलना ने उन यवव्रीहियों को उन सुसज्जित सुन्दरियों के हाथ में देकर डोला समेत प्रस्थान किया। चलती हुई सभी स्त्रियाँ उदयसिंह के चरित्र का वर्णन कर रही थी । उस लक्षण (लाखन) ने शीघ्रतापूर्वक अपने योगी वेषधारी सैनिकों को जो तालन आदि की अध्यक्षता में सुरक्षित होकर चल रहे। थे, संचालित करते हुए कीतिसागर पर पहुँचकर उस दश सहस्र डोले के रक्षार्थ उसको चारों ओर से घेर कर स्वतन्त्रता पूर्वक कार्य करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया। उस समय कलहप्रिय महीपति (माहिल) ने उदयसिंह का आगमन जानकर पुत्र समेत चन्द्रवंशी परिमल के पास पहुँचकर रुदम करते हुए उनसे कहा-महाराज ! उन योगियों ने सब स्त्रियों को लूट लिया, जिसमें मलना और चन्द्रावली का भी अपहरण हुआ है। योगी के वेष में आये हुए वे सभी सैनिक पृथ्वीराज के ही थे जिन्होंने पुत्री (चन्द्रावली) तारक (ताहर) को और मेरी भगिनी (मलना) को पृथ्वीराज को सौंप दिया है। इस घोर वाणी को सुनकर महाबली ब्रह्मानन्द ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने एक लक्ष सैनिकों समेत उस स्थान को प्रस्थान किया जहाँ पृथ्वीराज अपने एक सहस्र सैनिकों के सहित उपस्थित थे। उनकी सेनाओं की रक्षा कामसेन तथा रणजित विशेष सावधानी से कर रहे थे। वहाँ की रणस्थली में दोनों सेनाओं का घोर संग्राम हो रहा था, उस समय योगी के वेषधारी तालन व्रह्मानन्द के लक्षण (लाखन) शूर प्रवर, अभयसिंह के और देवसिंह स्वयं महीपति के पास पहुँचकर सहायता करने लगे। उस बीच अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्ति पूर्वक उन्हें बाँध लेने एवं उन दोनों के प्रसन्न होने पर वहाँ कामसेन सहसा आ पहुँचा। उसे देखकर लक्षण (लाखन) ने कामसेन को और देवसिंह ने रणजित को पराजित कर बाँध लिया तथा वहीं अवस्थित भी रहे। उस समय बलवान् ब्रह्मा ने तालन को बाँधकर लक्षण (लाखन) के पास पहुँचकर उनसे धनुर्युद्ध आरम्भ किया । धनुष के विनष्ट हो जाने पर लक्षण (लाखन) को भी उन्होंने बाँध लिया और देवसिंह को मूर्च्छित कर दिया। इससे योगियों की सेना में हाय-हाय मच गया और वे (सैनिक) इधर-उधर भागने लगे। ऐसा अनर्थ देखकर उदयसिंह ने नम्रता पूर्वक उन सभी स्त्रियों से कहा-‘ब्रह्मानन्द यहाँ आकर मेरी सेनाओं को विनष्ट कर रहे हैं, इसलिए मेरे साथ में तुम सभी शीघ्र चलो। इतना कहकर उन्हें साथ लिए उदयसिंह ब्रह्मानन्द के पास ज्योंही पहुँचे कि दोनों (नर और नारायण) में घोर युद्ध आरम्भ हो गया। बलवान् उदयसिंह ने आकाश मार्ग से उनके रथ पर पहुँचकर तलवार द्वारा उन्हें मूच्छित कर दिया। पश्चात् उनके मूच्छित हो जाने पर उन्होंने दालन आदि को मुक्त बंधन किया। उपरांत अपनी योगी वेषधारी सेना समेत रणस्थल से प्रस्थान कर दिया। योगी सैनिकों के पराजित होने पर महाबली ब्रह्मानन्द ने उन समस्त स्त्रियों को साथ लेकर घर के लिए प्रस्थान किया। उसी बीच महीपति (माहिल) के अनुमोदन करने पर बलवान् पृथ्वीराज ने जिन्हें शिव जी द्वारा वरदान प्राप्त था, उन स्त्रियों को चारों ओर से घेर लिया। पश्चात् युद्ध होते समय नृहर अभय के साथ, मर्दन रूपण के साथ सरदन मदन के साथ, तारक (ताहर) ब्रह्मानन्द के साथ और चामुण्ड (चौढा) कामसेन के साथ धनुर्युद्ध करने लगे। अनन्तर महावीर अभय ने धनुष के टंकार करने वाले शत्रु नृहर के धनुष को भग्नकर उनसे खड्गयुद्ध करना आरम्भ किया, किन्तु खड्ग के भग्न हो जाने पर युद्ध से विमुख होते नृहर को देखकर अभय ने अत्यन्त रुष्ट होकर उनसे कहा-आप पृथ्वीराज के पुत्र एवं मेरे मौसेरे भाई होकर क्षत्रिय धर्म का संहार (युद्ध से भागना, क्यों कर रहे हैं? ) इसे सुनकर नृहर ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर परिध अस्त्र का घातक प्रहार अभय के शिर में किया जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई, वे स्वर्ग पहुँच गये। उनका जन्म कृतवर्मा के अंश से हुआ था, इसलिए वे उन्हीं कृतवर्मा में विलीन हो गये। उसी प्रकार वली सरदन ने गोपपुत्र मदन के निधन करने के उपरांत शत्रु सेना विध्वंस करके उच्चस्वर से ‘जय’ शब्द की ध्वनि की । मदन का जन्म उत्तर के अंश से हुआ था, इसलिए ये उत्तर के अंश मे विलीन हो गये। उस समय रूपण ने मूच्छित मदन के पास पहुँचकर सरदन से खड्ग युद्ध करना आरम्भ किया। उधर ब्रह्मानन्द ने क्रुद्ध होकर तारक (ताहर) को बाँध लिया पश्चात् पृथ्वीराज के पास पहुँचकर उनसे धनुर्युद्ध आरम्भ किया। विजयाभिलाषी रणजित् ने अत्यन्त रुष्ट होकर अपने भल्ल अस्त्र द्वारा पृथ्वीराज पुत्र उस नृहर का शिरच्छेदन कर दिया । नृहर का जन्म दुःशासन के अंश से हुआ था, इसीलिए निधन होने पर उसी के अंश में विलीन हो गया। नृहर के मरणोपरांत क्रुद्ध होकर मर्दन अपने वाणों द्वारा उस सात्विक अंश (रणजित्) पर घात-प्रतिघात करना आरम्भ किया। परिमल पुत्र रणजित् ने उनके वाणों को छिन्न-भिन्नकर अपने भल्लास्त्र द्वारा मर्दन के शिर को शरीर से पृथकू कर दिया। वीर मर्दन के निधन होने पर वली सरदन ने अपने भल्लास्त्र द्वारा वीर रणजित् के वक्षस्थल में प्रहार किया। मलना-पुत्र रणजितु ने उस अस्त्र द्वारा ताडित होने पर अत्यन्त कष्ट का अनुभव करते हुए अपने खड्ग द्वारा उस वैरी के शिर को छिन्न-भिन्न कर दिया। तीनों भाइयों के निधन हो जाने पर रथ स्थायी तारक (ताहर) ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर रथ स्थित रणजितू पर वाणों का प्रहार किया। उसी प्रकार रणजित् ने भी शत्रु के धनुष-बाण को विनष्टकर अपने तीन बाणों द्वारा शत्रु के हृदय में भीषण प्रहार किया। पश्चात् दण्ड से आहत सर्प की भाँति अत्यन्त क्रुद्ध होकर तारक (ताहर) ने शिवजी का ध्यान करते हुए अपने विषाक्त वाण द्वारा शत्रु रणजित् का कण्ठच्छेदन कर दिया और उसी अस्त्र से आहत होकर रणजित् अपनी शरीर का त्यागकर स्वर्ग पहुँच गये। उस महापराक्रमी के निधन होने पर ब्रह्मानन्द अत्यन्त दुःखी हुए। पश्चात् उस भाद्रकृष्ण अष्टमी के दिन ब्रह्मानन्द ने शेष साठ सहस्र अपने सैनिकों को सुरक्षित उन स्त्रियों समेत अपने घर आकर पृथ्वीराज के भय से (सदर दरवाजे के) किंवाड़ को दृढ़तापूर्वक बन्द कराकर शारदा की शरण प्राप्त की। बलवान् पृथ्वीराज ने भी पुत्र शोक से दुःखी होकर सभी राजाओं के सामने प्रतिज्ञा की कि जिस प्रकार शृंशिपपुर को मैंने शून्यस्थल बना दिया, उसी भाँति ब्रह्मानन्दादि चन्द्रवंशियों समेत महावती (महोवा) नगर भी मेरे वाणों द्वारा विध्वंस कर दिया जायेगा। इतना कहकर राजा ने धंधुकार (धांधू) को बुलाकर कहा—प्रिय ! पाँच लाख सैनिकों को लेकर तुम भी शीघ्र यहाँ आ जाओ । इसे सुनकर धुंधुकार (धांधू) दिल्ली जाकर सात दिन के भीतर पुनः उस रणभूमि में आ गये । पश्चात् तारक (ताहर) समेत महाबली पृथ्वीराज ने अपने आठ लाख सैनिकों को साथ ले पुनः युद्ध की तैयारी की ।
(अध्याय २६)

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