September 28, 2024 | aspundir | Leave a comment शिवमहापुराण — कोटिरुद्रसंहिता — अध्याय 19 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण कोटिरुद्रसंहिता उन्नीसवाँ अध्याय केदारेश्वर ज्योतिर्लिंगके प्राकट्य एवं माहात्म्यका वर्णन सूतजी बोले- हे द्विजो ! विष्णुके नर-नारायण नामक जिन दो अवतारोंने भारत [ वर्षके अन्तर्गत भरत] खण्डमें स्थित बदरिकाश्रममें तप किया था, उनके द्वारा पूजनहेतु प्रार्थना किये जानेपर भक्तके वशीभूत होनेके कारण सदाशिव नित्य इनके पार्थिव लिंगमें विराजमान हो जाते हैं ॥ १-२ ॥ इस प्रकार शिवकी पूजा करते हुए उन परम शिव- भक्त विष्णुके अवतारभूत धर्मपुत्र नर-नारायणका बहुत समय बीत गया। किसी समय प्रसन्न हुए परमेश्वरने कहा- मैं [आप दोनोंपर] प्रसन्न हूँ; वर माँगिये ॥ ३-४ ॥ तब उनके इस प्रकार कहनेपर स्वयं नर – नारायणने लोककल्याणकी कामनासे यह वचन कहा—॥ ५ ॥ नर-नारायण बोले- हे देवेश ! हे शंकर ! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि वर देना चाहते हैं, तो अपने स्वरूपसे पूजाके निमित्त स्वयं यहीं पर निवास करें ॥ ६ ॥ महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥ सूतजी बोले- तब उन दोनोंके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर हिमाच्छादित उस केदारक्षेत्रमें स्वयं महेश्वर सदाशिव ज्योतिरूपसे विराजमान हो गये ॥ ७ ॥ इस प्रकार उनसे पूजित होकर सम्पूर्ण संकट तथा भयको दूर करनेवाले शिवजी लोकका कल्याण करनेके लिये एवं भक्तोंको दर्शन देनेके लिये वहाँ केदारेश्वर नामसे स्वयं स्थित हो गये। वे दर्शन तथा पूजन करनेसे अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करते हैं ॥ ८-९ ॥ इनका पूजन सभी देवता तथा पुरातन ऋषि भी करते हैं और वे भलीभाँति प्रसन्न हुए महेश्वरसे मनोभिलषित वर प्राप्त करते हैं । बदरिकाश्रमके निवासी भी सदाशिवकी नित्य पूजा करनेका वांछित फल प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे [सदाशिव ] सदैव अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १०-११ ॥ उस दिनसे लेकर जिसने भी भक्तिसे केदारेश्वरकी पूजा की, उसे स्वप्नमें भी [किसी प्रकारका ] कष्ट नहीं हुआ ॥ १२ ॥ पाण्डवोंको देखकर जिन्होंने मायासे महिषका रूप धारणकर पलायन किया था और जब उन पाण्डवोंने महिषरूपधारी उन शिवको तथा उनकी पूँछ भी पकड़ ली, तब वे उन [पाण्डवों ] -के प्रार्थना करनेपर नीचेकी ओर मुखकर वहाँ स्थित हो गये। भक्तवत्सल नामवाले सदाशिव उसी रूपमें वहाँ विराजमान हुए। उस रूपका शिरोभाग नयपाल (नेपाल)-में प्रकट हुआ । उसके बाद शिवजीने उन्हें (पाण्डवोंको) पूजन करनेकी आज्ञा प्रदान की । तब उनके द्वारा पूजित होकर शिवजीने उन्हें अनेक वरदान दिये और स्वयं वहीं स्थित हो गये । पाण्डव भी उनकी पूजाकर प्रसन्न होकर सभी मनोवांछित फल प्राप्त करके समस्त दुःखोंसे मुक्त होकर वहाँसे चले गये ॥ १३–१७ ॥ भारतवासी लोगोंद्वारा उस केदारेश्वर क्षेत्रमें साक्षात् [भगवान् ] शंकरकी नित्य पूजा की जाती है ॥ १८ ॥ जो शिवप्रेमी वहाँका शिवरूपयुक्त कंकण उन्हें प्रदान करता है, वह शिवजीके समीप जाकर उनके उस रूपको देखकर सभी पापोंसे छूट जाता है। जो बदरीवनकी यात्रा करता है, वह भी जीवन्मुक्त हो जाता है । वहाँ नर-नारायण तथा केदारेश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य मुक्तिका अधिकारी हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १९–२१ ॥ केदारेश्वरके जो भक्त उनकी यात्रा करते हुए मार्गमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं करना चाहिये । वहाँ जाकर प्रसन्नतासे युक्त होकर केदारेश्वरका पूजनकर तथा वहाँका जल पीकर मनुष्य पुनर्जन्म नहीं पाता है ॥ २२ – २३ ॥ हे ब्राह्मणो ! इस भरतखण्डमें सभी प्राणियोंको नर- नारायण तथा केदारेश्वरकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। वे इस भूखण्डके स्वामी हैं और विशेष करके सबके स्वामी हैं, केदार नामक शम्भु सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २४-२५ ॥ वह हे महर्षियो! आपलोगोंने जो बात पूछी थी, सब मैंने कह दिया, इसे सुननेसे सारे पाप दूर हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ २६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें केदारेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्यवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe