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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [द्वितीय-सतीखण्ड] – अध्याय 24
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
चौबीसवाँ अध्याय
दण्डकारण्य में शिव को राम के प्रति मस्तक झुकाते देख सती का मोह तथा शिव की आज्ञा से उनके द्वारा राम की परीक्षा

नारदजी बोले — हे ब्रह्मन् ! हे विधे ! हे प्रजानाथ ! हे महाप्राज्ञ ! हे कृपाकर ! आपने भगवान् शंकर तथा देवी सती के मंगलकारी यश का श्रवण कराया है ॥ १ ॥ अब इस समय पुनः प्रेमपूर्वक उनके उत्तम चरित्र का वर्णन कीजिये । उन दम्पती शिवा-शिव ने वहाँ रहकर कौन-कौन-सा चरित्र किया था ? ॥ २ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! आप मुझसे सती और शिव के चरित्र का प्रेमपूर्वक श्रवण कीजिये । वे दोनों दम्पती वहाँ लौकिक गति का आश्रय ले नित्य-निरन्तर क्रीडा करते थे ॥ ३ ॥ हे मुने ! तदनन्तर महादेवी सती को अपने पति शंकर का वियोग प्राप्त हुआ — ऐसा कुछ श्रेष्ठ बुद्धिवाले विद्वानों का कथन है ॥ ४ ॥ परंतु हे मुने ! वास्तव में उन दोनों शक्ति और शक्तिमान् का परस्पर वियोग कैसे हो सकता है; क्योंकि चिन्मय वे दोनों वाणी और अर्थ के समान एक-दूसरे से सदा मिले-जुले हैं ॥ ५ ॥

शिवमहापुराण

फिर भी सर्वसमर्थ सती एवं शिव लीलाप्रिय होने के कारण लोक-व्यवहार का अनुसरण करते हुए जो कुछ भी करते हैं, वह सब समीचीन ही है ॥ ६ ॥ दक्षकन्या सती ने जब देखा कि मेरे पति ने मुझे त्याग दिया है, तब वे अपने पिता दक्ष के यज्ञ में गयीं और वहाँ भगवान् शंकर का अनादर देखकर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया ॥ ७ ॥ वे ही सती पुनः हिमालय के घर पार्वती के नाम से प्रकट हुईं और कठोर तपस्या करके उन्होंने विवाह के द्वारा पुनः भगवान् शिव को प्राप्त कर लिया ॥ ८ ॥

सूतजी बोले — [हे महर्षियो!] ब्रह्माजी की इस बात को सुनकर नारदजी ब्रह्माजी से शिवा और शिव के महान् यश के विषय में इस प्रकार पूछने लगे- ॥ ९ ॥

नारदजी बोले — हे विष्णुशिष्य ! हे महाभाग ! हे विधे ! आप मुझे शिवा-शिव के लोक-आचार से सम्बन्ध रखनेवाले उनके चरित्र को विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १० ॥ हे तात ! भगवान् शंकरजी ने प्राणों से भी प्यारी अपनी धर्मपत्नी सती का किसलिये त्याग किया ? यह घटना बड़ी विचित्र जान पड़ती है, अतः इसे आप अवश्य कहिये ॥ ११ ॥ आपके पुत्र दक्ष प्रजापति ने यज्ञ में भगवान् शंकर का अनादर क्यों किया और वहाँ अपने पिता के यज्ञ में जाकर सती ने अपने शरीर का त्याग क्यों किया ? ॥ १२ ॥ पुनः उसके बाद क्या हुआ ? महेश्वर ने क्या किया ? ये सब बातें मुझसे कहिये । मैं इस वृत्तान्त को श्रद्धायुक्त होकर सुनना चाहता हूँ ॥ १३ ॥

ब्रह्माजी बोले — मेरे पुत्रों में श्रेष्ठ हे महाप्राज्ञ ! हे तात ! हे नारद ! आप महर्षियों के साथ बड़े प्रेम से भगवान् चन्द्रमौलि का चरित्र सुनिये । श्रीविष्णु आदि देवताओं से सेवित परब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार करके मैं उनके महान् अद्भुत चरित्र का वर्णन करता हूँ ॥ १४-१५ ॥ हे मुने ! यह सब शिव की लीला है । वे प्रभु अनेक प्रकार की लीला करनेवाले, स्वतन्त्र और निर्विकार हैं । देवी सती भी वैसी ही हैं । हे मुने ! अन्यथा वैसा कर्म करने में कौन समर्थ हो सकता है । परमेश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा हैं ॥ १६-१७ ॥ जिनका भजन सदा श्रीपति विष्णु, मैं ब्रह्मा, समस्त देवतागण, महात्मा, मुनि, सिद्ध तथा सनकादि सदैव करते रहते हैं । शेषजी प्रसन्नतापूर्वक जिनके यश का निरन्तर गान करते रहते हैं, किंतु कभी भी उनका पार नहीं पाते हैं, वे ही शंकर सबके प्रभु तथा ईश्वर हैं ॥ १८-१९ ॥

यह सब तत्त्वविभ्रम उन्हीं की लीला से हो रहा है । इसमें किसी का दोष नहीं है; क्योंकि वे सर्वव्यापी ही प्रेरक हैं । एक समय की बात है तीनों लोकों में विचरण करनेवाले, लीलाविशारद भगवान् रुद्र सती के साथ वृषभ पर आरूढ़ हो पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे ॥ २०-२१ ॥ सागर और आकाश में घूमते-घूमते दण्डकारण्य में आकर सत्य प्रतिज्ञावाले वे प्रभु सती को वहाँ की शोभा दिखाने लगे । वहाँ उन्होंने लक्ष्मणसहित श्रीराम को देखा, जो रावण द्वारा बलपूर्वक हरी गयी अपनी प्रिया पत्नी सीता की खोज कर रहे थे ॥ २२-२३ ॥ वे ‘हा सीते !’ इस प्रकार उच्च स्वर से पुकार रहे थे, जहाँ-तहाँ देख रहे थे और बार-बार रो रहे थे, उनके मन में विरह का आवेश छा गया था ॥ २४ ॥ वे उनकी प्राप्ति की इच्छा कर रहे थे, मन में उनकी दशा का विचार कर रहे थे. वृक्ष आदि से उनके विषय में पूछ रहे थे, उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, वे लज्जा से रहित हो गये थे और शोक से विह्वल थे ॥ २५ ॥

वे सूर्यवंश में उत्पन्न, वीर, भूपाल, दशरथनन्दन, भरताग्रज थे । आनन्दरहित होने के कारण उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी । उस समय उदारचेता पूर्णकाम भगवान् शंकर ने लक्ष्मण के साथ वन में घूमते हुए माता कैकेयी के वरों के अधीन उन राम को बड़ी प्रसन्नता के साथ प्रणाम किया और जय-जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये । उन भक्तवत्सल शंकर ने उस वन में श्रीराम को पुनः दर्शन नहीं दिया ॥ २६–२८ ॥ मोह में डालनेवाली भगवान् शिव की ऐसी लीला को देखकर सती को बड़ा आश्चर्य हुआ । वे उनकी माया से मोहित हो उनसे इस प्रकार कहने लगीं — ॥ २९ ॥

सती बोलीं — हे देवदेव ! हे परब्रह्म ! हे सर्वेश ! हे परमेश्वर ! ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता आपकी ही सेवा सदा करते रहते हैं । आप ही सबके द्वारा प्रणाम करनेयोग्य हैं । सबको आपका ही सर्वदा सेवन और ध्यान करना चाहिये । वेदान्तशास्त्र के द्वारा यत्नपूर्वक जाननेयोग्य निर्विकार तथा परमप्रभु आप ही हैं ॥ ३०-३१ ॥ हे नाथ ! ये दोनों पुरुष कौन हैं, इनकी आकृति विरहव्यथा से व्याकुल दिखायी पड़ रही है । ये दोनों धनुर्धर वीर वन में विचरण करते हुए दुःख के भागी और दीन हो रहे हैं । उन दोनों में नीलकमल के समान ज्येष्ठ पुरुष को देखकर किस कारण से आप आनन्दविभोर हो उठे और भक्त की भाँति अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये ? ॥ ३२-३३ ॥ हे स्वामिन् ! हे शंकर ! आप मेरे संशय को दूर कीजिये । हे प्रभो ! सेव्य [स्वामी] अपने सेवक को प्रणाम करे — यह उचित नहीं जान पड़ता ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] कल्याणमयी परमेश्वरी आदिशक्ति सती देवी ने शिव की माया के वशीभूत होकर जब भगवान् शिव से इस प्रकार पूछा । तब सती की यह बात सुनकर लीला करने में प्रवीण परमेश्वर शंकरजी हँसकर सती से कहने लगे — ॥ ३५-३६ ॥

परमेश्वर बोले — ‘ देवि ! हे सति ! सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक सत्य बात कह रहा हूँ । इसमें किसी प्रकार का छल नहीं है । वरदान के प्रभाव से ही मैंने इन्हें आदरपूर्वक प्रणाम किया है ॥ ३७ ॥ हे देवि! ये दोनों भाई वीरों द्वारा सम्मानित हैं, इनके नाम श्रीराम और लक्ष्मण हैं, ये सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हैं, परम बुद्धिमान् हैं और राजा दशरथ के पुत्र हैं ॥ ३८ ॥ इनमें जो गौरवर्ण के छोटे भाई हैं, वे शेष के अंश हैं, उनका नाम लक्ष्मण है । इनमें ज्येष्ठ भाई का नाम श्रीराम है । ये भगवान् विष्णु के पूर्ण अंश तथा उपद्रवरहित हैं । ये साधुपुरुषों की रक्षा और हमलोगों के कल्याण के लिये इस पृथिवी पर अवतरित हुए हैं ।’ इतना कहकर सृष्टि करनेवाले भगवान् शम्भु चुप हो गये ॥ ३९-४० ॥

इस प्रकार शिव का वचन सुनकर भी उनके मन को विश्वास नहीं हुआ; क्योंकि शिव की माया बलवती है, वही तीनों लोकों को मोहित किये रहती है ॥ ४१ ॥ सती के मन में मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ है, ऐसा जानकर लीलाविशारद सनातन प्रभु शम्भु यह वचन कहने लगे — ॥ ४२ ॥

शिवजी बोले — हे देवि ! मेरी बात सुनो, यदि तुम्हारे मन को [ मेरे कथनपर] विश्वास नहीं होता है, तो तुम वहाँ [जाकर] अपनी ही बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा स्वयं कर लो । हे सति ! हे प्रिये ! जिस प्रकार तुम्हारा भ्रम दूर हो, वैसा ही तुम करो । तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो, तबतक मैं इस वटवृक्ष के नीचे बैठा हूँ ॥ ४३-४४ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] भगवान् शिव की आज्ञा से ईश्वरी सती वहाँ जाकर सोचने लगीं कि मैं वनचारी राम की कैसे परीक्षा करूँ । मैं सीता का रूप धारण करके राम के पास चलूँ । यदि राम [साक्षात्] विष्णु हैं, तो सब कुछ जान लेंगे, अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे ॥ ४५-४६ ॥

इस प्रकार विचार करके मोह में पड़ी हुई वे सती सीता का रूप धारणकर श्रीराम के पास उनकी परीक्षा लेने के लिये गयीं । सती को सीता के रूप में देखकर शिव-नाम का जप करते हुए रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम सब कुछ जानकर उन्हें प्रणाम करके हँसकर कहने लगे — ॥ ४७-४८ ॥

श्रीराम बोले — हे सति ! आपको नमस्कार है, आप प्रेमपूर्वक बताइये कि शिवजी कहाँ गये हैं, आप पति के बिना अकेली ही इस वन में क्यों आयी हैं ? ॥ ४९ ॥ हे सति ! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह रूप धारण किया है ? हे देवि ! मुझपर कृपा करके इसका कारण बताइये ? ॥ ५० ॥

ब्रह्माजी बोले — रामजी की यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं । वे शिवजी की कही हुई बात का स्मरण करके और उसे सत्य समझकर बहुत लज्जित हुईं । श्रीराम को साक्षात् विष्णु जानकर अपना रूप धारण करके मन-ही-मन शिव के चरणों का चिन्तनकर प्रसन्नचित्त हुई सती ने उनसे इस प्रकार कहा — ॥ ५१-५२ ॥

‘[हे रघुनन्दन !] स्वतन्त्र परमेश्वर प्रभु शिव मेरे तथा अपने पार्षदों के साथ पृथिवी पर भ्रमण करते हुए इस वन में आये हुए हैं ॥ ५३ ॥ यहाँ उन्होंने सीता की खोज में लगे हुए, उनके विरह से युक्त और दुखी चित्तवाले आपको लक्ष्मणसहित देखा । वे आपको प्रणाम करके चले गये और आपकी वैष्णवी महिमा की प्रशंसा करते हुए अत्यन्त आनन्द के साथ वटवृक्ष के नीचे बैठे हैं ॥ ५४-५५ ॥ वे आपके चतुर्भुज विष्णुरूप को देखे बिना ही आनन्दविभोर हो गये । इस निर्मल रूप को देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । शम्भु के वचन को सुनकर मेरे मन में भ्रान्ति उत्पन्न हो गयी । अतः हे राघव ! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है ॥ ५६-५७ ॥ हे श्रीराम ! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप [साक्षात्] विष्णु हैं । मैंने आपकी सम्पूर्ण प्रभुता देख ली है । अब मेरा संशय दूर हो गया है, तो भी महामते ! आप मेरी बात सुनें ॥ ५८ ॥ मेरे सामने यह सच-सच बतायें कि आप उन शिव के वन्दनीय कैसे हो गये ? आप मुझे संशयरहित कीजिये और शीघ्र ही मुझे शान्ति प्रदान कीजिये ॥ ५९ ॥’

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] उनकी यह बात सुनकर श्रीराम के नेत्र प्रफुल्लित हो उठे । उन्होंने अपने प्रभु शिव का स्मरण किया । इससे उनके हृदय में अत्यधिक प्रेम उत्पन्न हो गया । हे मुने ! शिव की आज्ञा के बिना वे राघव सती के साथ भगवान् शिव के समीप नहीं गये तथा [मन-ही-मन] उनकी महिमा का वर्णन करके सती से कहने लगे ॥ ६०-६१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के द्वितीय सतीखण्ड में रामपरीक्षा वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

 

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