श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-75
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
राजा शूरसेन का संकष्टचतुर्थीव्रत करना और उसके प्रभाव से सम्पूर्ण प्रजासहित उनको ले जाने के लिये गणेशलोक से विमान आना
अथः पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
शूरसेनकृतचतुर्थीव्रतफलनिरूपणं

ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यासजी !] संकष्ट- चतुर्थीव्रतजनित [पुण्य] – की महिमा को सुनकर और देखकर राजा शूरसेन ने उस व्रत को करने का मन बनाकर मुनिवर वसिष्ठ से कहा — ॥ १ ॥

राजा [ शूरसेन ] बोले — [हे मुनिश्रेष्ठ !] संकष्ट- चतुर्थीव्रत हेतु मुहूर्त बतलाइये। मैं यहाँ (पृथ्वीलोक में) इस सद्यः फल देने वाले व्रत को करना चाहता हूँ ॥ २ ॥

वसिष्ठजी बोले — हे नृपश्रेष्ठ! माघमास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जब मंगलवार हो, तब तुम इस सर्वसिद्धिकारक और सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाले इस उत्तम व्रत (संकष्टचतुर्थी) का अनुष्ठान करो ॥ ३ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] तदनन्तर वसिष्ठजी द्वारा बतलाये गये शुभ दिन के शीघ्र आ जाने पर [गणेशजी के प्रति] भक्तिभावान्वित राजा ने पत्नीसहित व्रतहेतु समस्त आवश्यक सामग्री का संग्रह किया और उत्तम चतुर्थी व्रत को करने की इच्छा से प्रातः स्नानकर नित्यकर्म का समापन किया ॥ ४-५ ॥ तत्पश्चात गणेशजी का पूजन और स्वस्तिवाचन करके, श्रेष्ठ द्विजों और वसिष्ठजी का पूजनकर और उनकी अनुज्ञा लेकर गणेशजी को मन में धारण करके उनके नाम-जप में तत्पर हो गये और वे पैर के एक अँगूठे पर तबतक स्थित रहे, जबतक कि सूर्य अस्त [नहीं] हुआ ॥ ६-७ ॥

तदनन्तर पुनः स्नान के बाद [राजा ने] सायं सन्ध्योपासना की और वसिष्ठजी के सहित [गणेशजी का] पूजन करना प्रारम्भ किया ॥ ८ ॥ [राजा ने] केले के खम्भों से सुसज्जित एक विशाल मण्डपिका का निर्माण कराकर उसे अनेक प्रकार के वस्त्रों और अलंकारों से समन्वित तथा छत्र एवं चामर से सुशोभित कराया। वह महामण्डपिका पुष्पमालाओं से विभूषित अनेक प्रकाशमान मणियों से युक्त, दीपावलियों से सुशोभित और दर्पणों की पंक्ति के कारण मनोहर लग रही थी ॥ ९-१० ॥ उस महामण्डपिका के मध्यभाग में सोने के कलश पर गजानन गणेशजी की सर्वांगसुन्दर सुवर्णनिर्मित सुन्दर प्रतिमा स्थापित करके उसे अनेक अलंकारों से सुसज्जित और अनेक रत्नों से विभूषित किया। उस समय श्रेष्ठ द्विजगण [वेद-] पाठ कर रहे थे और गायक [ भगवान् गणपति का] गुणगान कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥ राजा ने तुरही आदि सभी प्रकार के वाद्यों की ध्वनि और नर्तकों के नृत्य के मध्य वैदिक एवं पौराणिक मन्त्रों से उस मूर्ति का सम्यक् प्रकार से पूजन किया ॥ १३ ॥

उन्होंने पंचामृत से उस गणेशमूर्ति को स्नान कराते हुए षोडशोपचार पूजन किया। मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर, पंचामृतसहित अनेक प्रकार के व्यंजनों से सुशोभित नैवेद्य एवं सुगन्धयुक्त जल को उस गजाननमूर्ति के सम्मुख रखकर गणेशजी की प्रसन्नता के लिये राजा ने उन्हें समर्पित किया। तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकार के फल, सुपारीयुक्त पान, रत्न और स्वर्ण की दक्षिणा तथा दूर्वा अर्पित करके आरती की और नाना प्रकार के पुष्पों से मन्त्रपुष्पांजलि दी । तत्पश्चात् चतुर्थी तिथि, गणेशजी और चन्द्रमा के लिये अर्घ्य प्रदान किया ॥ १४-१७ ॥ तदनन्तर उन्होंने आदरपूर्वक ब्राह्मणों का पूजन किया और उन्हें भोजन कराया तथा उन्हें वस्त्र, अलंकार और दक्षिणासहित दस हजार गायें प्रदान कीं ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् सुहृज्जनों और बन्धु-बान्धवों के साथ स्वयं राजा ने भोजन किया। रात्रि में उन्होंने गणेशजी से सम्बन्धित कथाओं और वाद्य-ध्वनि के साथ उनके गुणगान का श्रवण करते हुए जागरण किया ॥ १९ ॥

प्रभातकाल में निर्मल जल में स्नानकर राजा ने पहले की भाँति पुनः सम्यक् प्रकार से पूजनकर गणेशजी की उस मूर्ति को दक्षिणा एवं उपस्करोंसहित वसिष्ठजी को प्रदान किया। इससे गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी प्रकार की सम्पत्तियों से युक्त विमान भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ गजानन के स्वरूपवाले गणेशजी के दूतों ने वहाँ ले जाकर उस विमान को स्थापित किया। वह विमान देखने वाले सभी लोगों के मन को आनन्दित कर रहा था ॥ २२ ॥ राजा जब गणेशचतुर्थीव्रत के पुण्यप्रभाव से देव- लोक के लिये जाने लगे, उस समय अनेक प्रकार के अलंकारों से सुशोभित और सिर पर मुकुट धारण किये हुए गणेशजी के स्वरूपवाले देवदूतों ने उनसे कहा कि [आपके द्वारा किये गये इस व्रत से] गणेशजी प्रसन्न हुए हैं, उन्होंने आपके दर्शन की उत्सुकता के कारण यह विमान भेजा है, तभी हम लोग यहाँ आये हैं, उनके इस प्रकार के वचन सुनकर राजा [गणेशजी की कृपा का स्मरणकर] अश्रुपात करने लगे ॥ २३–२५ ॥ उस समय उनका गला भर आया और शरीर रोमांचित हो उठा। तदनन्तर राजा शूरसेन ने आश्चर्यचकित होते हुए उनसे कहा — ॥ २६ ॥

हे दूतो! अव्यक्त, अप्रमेय, नित्य, वाणी और मन से भी अगोचर जगदीश्वर को मेरे दर्शन का कोई हेतु नहीं है। जिनका निरूपण करने में वेद और शास्त्र भी समर्थ नहीं हैं, ब्रह्मा और शंकर आदि देवगण जिनका निरन्तर स्मरण करते हैं। उन्होंने मेरा स्मरण किया — यह मेरा महान् भाग्य है। राजा की यह बात सुनकर दूतों ने पुनः उनसे कहा — ॥ २७–२९ ॥

हे राजन्! हम भक्तों की महिमा को नहीं जानते, जिनके कारण वे निर्गुण-निराकार परमात्मा साकार होते हैं ॥ ३० ॥

राजा बोले —देवाधिदेव गणेशजी और आप सबके प्रसन्न होने पर मेरी एक महती इच्छा यह है कि मैं अपनी नगरी को छोड़कर गणेशजी के पास कैसे जाऊँ? इन लोगों के बिना तो मैंने कभी हलाहल विष का भी भक्षण नहीं किया है, तो हे निष्पाप [दूतो ] ! इन सबको साथ लिये बिना मैं परमानन्द का भोग कैसे कर सकता हूँ ? ॥ ३१-३२ ॥

तब उन [गणपति] दूतों ने पुनः कहा कि तुम्हारी इच्छा पूरी होनी चाहिये, नहीं तो गणेशजी हम सभी को क्रोधपूर्वक दण्डित करेंगे ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] हे ब्रह्मन् ! तदनन्तर उन्होंने चारों वर्णों के सभी लोगों और सभी प्राणियों को ले जाने के लिये क्षणभर में विमानमें  बैठा लिया। वे सभी दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे और सभी दिव्य अलंकारों से सुशोभित थे। वे सब आपस में कहने लगे कि ‘यह कैसी महान् अद्भुत घटना है, हम लोगों ने तो कोई पुण्य किया नहीं, फिर यह विमान कैसे ? ‘ ॥ ३४-३५ ॥ [उस विमान में बैठे] अन्य लोग कहने लगे कि यह सब राजा के पुण्य-प्रताप से हुआ है, जैसे पारस के स्पर्श से धातुमात्र सुवर्ण हो जाती है ॥ ३६ ॥ जैसे अत्यन्त पापी भी साधु पुरुष के वचन से सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार राजा के पुण्य से हम सबका सम्यक् उद्धार हुआ है। तदनन्तर गणेशजी के दूतों ने विमान को ऊर्ध्व गति दी, परंतु वह जड़ीभूत हो गया और पृथ्वीतल से ऊपर नहीं उठा ॥ ३७-३८१/२

तब तो सभी लोग इस विषय में संशयग्रस्त हो गये कि यह कैसे अन्तरिक्ष में जायगा और वे आपस में कहने लगे कि [ह] भाग्यहीनों को निधि कैसे प्राप्त होगी ? भिक्षापात्र महत्तर छींके पर कैसे चढ़ सकता है ? [यह कहते हुए लोगों के] सब ओर देखने पर कोई [ महापापी ] कुष्ठरोगी दिखायी पड़ा। तब किसी ने राजा से कहा कि आप इस कुष्ठी का त्याग करें। इसके नीचे उतरने पर यान ऊर्ध्व गति करेगा (उड़ान भरेगा ) ॥ ३९-४११/२उस कुष्ठी को त्यागने की इच्छावाले उन दूतों से शूरसेन ने कहा — ‘मैं पापी और त्याज्य हूँ न कि ये सब; इन्हें आप ले जायँ अथवा इस कुष्ठी के पूर्वजन्म में किये पाप को कहिये। आप सब सब कुछ जानने वाले हैं, मेरे प्रति आप सबका स्नेह है, अतः कृपा करके [विमान के उड़ने का] उपाय बतलायें ॥ ४२-४३१/२

दूतों ने कहा — हे नृप! आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये, हम आपको इस कुष्ठी के [ पूर्व ] जन्म के पाप, दुष्कर्म तथा [विमान के उड़ने का ] उपाय भी बतायेंगे ॥ ४४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शूरसेनकृत संकष्टचतुर्थीव्रताचरण का वर्णन’ नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥

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