श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-84
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
चौरासीवाँ अध्याय
कामदेव द्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकर को विचलित करना, उनकी नेत्राग्नि से काम का दग्ध होना, पार्वती द्वारा शंकर की स्तुति तथा शिव-पार्वती का कैलासगमन
अथः चतुरशीतितमोऽध्यायः
शङ्करस्य समीपं कामदेवस्य भस्मीभवनम्

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर कामदेव देवताओं के कार्य को सफल बनाने के लिये निकल पड़े और उन्होंने भगवान् शंकर का वह स्थान देखा, जो अनेक प्रकार के वृक्षों तथा लताओं से सुशोभित था, सिंहों तथा शार्दूलों से सेवित था और पक्षियों तथा हिंसक पशुओं से समन्वित था। तब कामदेव ने उसी समय क्षणभर में वहाँ एक मायामय उपवन की संरचना की ॥ १-२ ॥ उस उपवन में अनेक सरोवर थे, जो अमृतोपम जल से परिपूर्ण थे। वहाँ अनेक वृक्ष तथा पुष्प थे, जिनकी सुगन्ध दो कोस तक व्याप्त थी । वहाँ भली-भाँति पके हुए जामुन, आम तथा बेर के फलवाले वृक्ष थे। उसी प्रकार उस उपवन में केला, कटहल, नारियल, खर्जूर, इलायची, लौंग तथा मिरच के अनेकों प्रकार के वृक्ष थे। भगवान् शिव के द्वारा [ इससे पूर्व ] ग्रहण न की जाने वाली वह पुष्पों की सुगन्ध (कामदेव के प्रभाव से) उनके नासापुटों में प्रविष्ट हो गयी ॥ ३–५ ॥

उषाकाल होने पर भगवान् शिव ने कामदेव के द्वारा माया से निर्मित उस अद्भुत उपवन को देखा, जो चन्द्रमा की चाँदनी से अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था और अनेक फलों तथा पुष्पों से समन्वित था ॥ ६ ॥ उसी समय कामदेव ने त्रिशूली भगवान् शंकर के मन को अपने कामबाणों से विद्ध कर डाला। [कामदेव द्वारा माया से निर्मित उस वाटिका को देखकर] भगवान् शिव ने मन-ही-मन अपनी अशोकवाटिका को धिक्कारा ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् शिव का देहभाव जाग्रत् हो गया, तब वे इसका कारण सोचने लगे कि किसने मेरी तपस्या में विघ्न उपस्थित किया और इस सुन्दर उपवन की रचना किसने की ? क्रोध से शिवके नेत्र लाल हो उठे, उनकी भौंहें तन गयीं और वे बोले — ‘मृत्यु के समीप पहुँचे हुए किस दुष्ट ने अकस्मात् इस उपवन की रचना कर डाली है।’ कामदेव भय से संत्रस्त होकर छिप गया, किसी के लिये दृश्य नहीं हुआ। उसने उस समय इन्द्रादि देवताओं का स्मरण किया, किंतु स्मरण किये जाने पर भी वे देवता वहाँ नहीं आये ॥ ८-१० ॥

सभी देवता कार्य की सफलता को देखने के लिये अपने- अपने विमानों में आरूढ़ हो गये थे। उसी समय भगवान् शिव ने कामदेव को देखा, जो अत्यन्त लघु एवं कृश शरीर वाला हो गया था। तब उन्होंने कामदेव को भस्म करने के लिये अपने तीसरे नेत्र को खोला। उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी, स्वर्ग तथा पाताल भी कम्पित हो उठा ॥ ११-१२ ॥

‘इस कामदेव को मत मारिये ‘ — ऐसा जबतक देवता कह ही रहे थे कि उनके नेत्र से उत्पन्न अग्नि ने उसी बीच कामदेव को भस्म कर डाला। अब वह केवल भस्ममात्र ही शेष रह गया था । तदनन्तर तीनों लोकों के कल्याण की कामना से भिल्लीरूप धारण की हुई देवी पार्वती ने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और बड़े ही आदरपूर्वक उनसे प्रार्थना की ॥ १३-१४ ॥

हे शंकर! तीनों लोकों को जला देनेवाली इस अग्नि को आप शान्त करें । ब्रह्माजी से वरदान प्राप्तकर दैत्य तारक अत्यन्त बलशाली हो गया है। उसने तीनों लोकों को आक्रान्त कर डाला है। अब न तो कहीं वेदादि शास्त्रों का स्वाध्याय होता है और न यज्ञादि की आहुतियाँ ही पड़ती हैं। सभी देवता अपने-अपने स्थानों से च्युत हो गये हैं । हे अनघ ! उन सभी देवताओं ने आपको तपस्या में लीन देखकर आपको देहभाव की प्राप्ति कराने के लिये शीघ्र ही कामदेव को बुलाकर आपके पास भेजा, किंतु वह आप श्रेष्ठ व्यक्ति के प्रति किये गये अपराध के कारण भस्म हो गया है ॥ १५–१७ ॥ हे देव! इस समय आप हमारी रक्षा करें। हम सब आपकी शरण में आये हैं। आप शरण में आये हुए की रक्षा करनेवाले हैं — इस रूप में आप तीनों लोकों में विख्यात हैं। हे महादेव! हे करुणाकर! हे शंकर! आपकी शरण ग्रहण करने की इच्छा रखने वाले दीन देवताओं के अपराध को आप क्षमा करें ॥ १८-१९ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने! अपने चरणों में सिर रखी हुई उन भिल्लीरूपा पार्वती के इस प्रकार के वचनों को सुनकर भगवान् शंकर ने अपनी नेत्राग्नि को शान्त कर लिया और प्रसन्नमुख होकर वे कहने लगे — उठो – उठो, आज तुमने मेरे चरणों में गिरकर अपने वचनों के द्वारा तथा अपने स्नेह के द्वारा देवताओं की रक्षा की है ॥ २०-२१ ॥

तदनन्तर उन भिल्लीरूपा पार्वती का सहसा आलिंगनकर भगवान् शंकर ने उन्हें अपनी गोद में ले लिया और वे उन्हें लेकर अपने वृषभ में आरूढ़ होकर कैलास की ओर चले गये ॥ २२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘कामदहन’ नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥

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