श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-26
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-षड्‌विंशोऽध्यायः
छब्बीसवाँ अध्याय
रानी का चाण्डालवेशधारी राजा हरिश्चन्द्र से अनुमति लेकर पुत्र के शव को लाना और करुण विलाप करना, राजा का पत्नी और पुत्र को पहचानकर मूर्च्छित होना और विलाप करना
हरिश्चन्द्रोपाख्याने राज्ञो हुताशनप्रवेशोद्योगवर्णनम्

सूतजी बोले — तत्पश्चात् राजा हरिश्चन्द्र नीचे की ओर मुख करके रानी से कहने लगे — हे बाले! मुझ पापी के सामने यहाँ आकर बैठ जाओ । यदि मेरा हाथ मारने में समर्थ हो सका तो मैं तुम्हारा सिर काट लूँगा ॥ ११/२

ऐसा कहकर हाथ में तलवार लेकर रानी को मारने के लिये राजा हरिश्चन्द्र उनकी ओर गये । उस समय राजा न तो अपनी पत्नी को पहचान रहे थे और न तो रानी राजा को ही पहचान रही थीं। तब अत्यन्त पीड़ित रानी दुःख से कहने लगीं ॥ २-३ ॥

अपनी मृत्यु की इच्छा रखती हुई स्त्री ने कहा — हे चाण्डाल ! यदि तुम थोड़ा भी उचित समझते हो तो मेरी बात सुनो। इस नगर से बाहर थोड़ी ही दूरी पर मेरा पुत्र मृत पड़ा है। मैं जब तक उस बालक को आपके पास लाकर उसका दाह न कर दूँ, तब तक के लिये मेरी प्रतीक्षा कीजिये, इसके बाद मुझे तलवार से मार डालियेगा ॥ ४-५ ॥

‘बहुत अच्छा’ – ऐसा कहकर उसने रानी को बालक के पास भेज दिया। वे अत्यन्त शोक से सन्तप्त होकर करुण विलाप करती हुई वहाँ से चली गयीं ॥ ६ ॥ उन राजा हरिश्चन्द्र की भार्या ‘ हा पुत्र ! हा वत्स ! हा शिशो !’ ऐसा बार-बार कहती हुई सर्प से हँसे हुए उस बालक को लेकर तुरंत श्मशानभूमि में आकर उसे जमीन पर लिटाकर स्वयं बैठ गयी। उस समय उनका शरीर दुर्बल हो गया था, उनका वर्ण विकृत था, उनका शरीर मलिन था और सिर के बाल धूल से धूमिल हो गये थे ॥ ७-८ ॥

[ रानी यह कहकर विलाप कर रही थी] हे राजन्! अपने मित्रों के साथ खेलते समय क्रूर सर्प के द्वारा डँस लिये जाने से मरे हुए पुत्र को आज आप पृथ्वीतल पर पड़ा हुआ देख लीजिये । तब उनके रुदन की वह ध्वनि सुनकर राजा हरिश्चन्द्र शव के समीप आये और उन्होंने उसके ऊपर का वस्त्र हटाया। दीर्घ समय से प्रवास-सम्बन्धी दुःख भोगने के कारण दूसरे स्वरूप में परिणत उन विलाप करती हुई अपनी अबला भार्या को उस समय राजा नहीं पहचान सके। पहले सुन्दर केशोंवाले उन नृपश्रेष्ठ को अब जटाधारी के रूप में तथा शुष्क वृक्ष की छाल- सदृश देखकर वे रानी भी उन्हें नहीं पहचान पायीं ॥ ९–११ ॥

सर्प के विष से ग्रस्त होकर धरती पर पड़े हुए बालक को देखकर वे महाराज हरिश्चन्द्र उसके राजोचित लक्षणों पर विचार करने लगे इसका मुख पूर्णिमा चन्द्रमा सदृश है; इसकी नासिका अत्यन्त सुन्दर, उन्नत तथा व्रणरहित है और इसके दर्पण समान चमकीले तथा ऊँचे दोनों कपोल अनुपम शोभा दे रहे हैं। इसके केश कृष्णवर्ण, घुँघराले अग्रभागवाले, स्निग्ध, लम्बे तथा लहरों के समान हैं। इसके दोनों नेत्र कमल के समान हैं । इसके दोनों ओठ बिम्बाफल के सदृश हैं। यह बालक चौड़े वक्षःस्थल, विशाल नेत्र, लम्बी भुजाओं और ऊँचे स्कन्धोंवाला है। इसके बड़े-बड़े पैर हैं, इसकी छोटी-छोटी अँगुलियाँ हैं और यह गम्भीर स्वभाववाला कोई राजलक्षणयुक्त बालक जान पड़ता है। यह कमलनाल – सदृश चरणों वाला, गहरी नाभिवाला और ऊँचे कन्धों वाला है । अहो, महान् कष्ट की बात है कि किसी राजा के कुल में उत्पन्न हुए इस बालक को दुरात्मा यमराज ने अपने कालपाश में बाँध लिया ॥ १२–१६१/२

सूतजी बोले — माता की गोद में पड़े हुए उस बालक को देखकर ऐसा विचार करने के उपरान्त राजा हरिश्चन्द्र को पूर्वकाल की स्मृति हो आयी और वे ‘हाय, हाय’ – ऐसा कहकर अश्रुपात करने लगे। वे कहने लगे कि ‘कहीं मेरे ही पुत्र की यह दशा तो नहीं हो गयी है और क्रूर यमराज ने उसे अपने अधीन कर लिया है’, इस प्रकार विचार करके वे राजा हरिश्चन्द्र कुछ समय के लिये ठहर गये । तत्पश्चात् अत्यन्त शोक सन्तप्त रानी ऐसा कहने लगीं ॥ १७–१९१/२

रानी बोलीं — हा वत्स ! किस पाप या अनिष्ट चिन्तन के परिणामस्वरूप यह महान् दारुण दुःख मेरे सामने आ पड़ा है ? इसका कारण भी समझ में नहीं आ रहा है। हे नाथ! हे राजन्! मुझ अत्यन्त दुःखिनी को छोड़कर इस समय आप किस स्थान पर विद्यमान हैं ? आप किस कारण से निश्चिन्त हैं ? राजर्षि हरिश्चन्द्र को राज्य से हाथ धोना पड़ा, उनके सुहृद्वर्ग अलग हो गये और उन्हें भार्या तथा पुत्र तक को बेच देना पड़ा । हा विधाता ! तुमने यह क्या कर दिया ? ॥ २०-२२१/२

तब रानी की यह बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र अपने स्थान से उठकर उनके समीप आ गये । तत्पश्चात् अपनी साध्वी पत्नी तथा मृत पुत्र को पहचानकर वे कहने लगे —  ‘महान् कष्ट है कि यह स्त्री मेरी ही पत्नी है और यह बालक भी मेरा ही पुत्र है ‘ ॥ २३-२४ ॥

यह सब जानकर असीम दुःख से सन्तप्त राजा हरिश्चन्द्र मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और वे रानी भी उन्हें पहचानकर उसी स्थिति को प्राप्त हो गयीं। वे दुःख के मारे मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं और उनकी समस्त इन्द्रियाँ चेष्टारहित हो गयीं । पुनः कुछ समय बाद चेतना आने पर शोक के भार से पीडित राजा और रानी दोनों अत्यन्त दुःखित होकर एक साथ विलाप करने लगे ॥ २५-२६१/२

राजा बोले — हा वत्स ! कुंचित अलकावली से घिरा हुआ तुम्हारा मुख बड़ा ही सुकुमार है । तुम्हारे दीन मुख को देखकर मेरा हृदय विदीर्ण क्यों नहीं हो जाता? पहले तुम ‘तात, तात’ – ऐसा मधुर वाणी में बोलते हुए मेरे पास स्वयं आ जाते थे, किंतु अब मैं तुम्हें बाहों में भरकर ‘वत्स, वत्स’ – ऐसा प्रेमपूर्वक कब पुकारूँगा ? अब भूमि की पीतवर्ण वाली धूल से सने हुए किसके घुटने मेरी चादर, गोद और शरीर के अंगों को मलिन करेंगे ? हे हृदयनन्दन ! मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं हो सका; (क्योंकि जिसने सामान्य वस्तु की भाँति तुम्हें बेच दिया था, उसी पिता से तुम पिता वाले बने थे ।) बहुत से बन्धु-बान्धवों तथा अपार धन-सहित मेरा सम्पूर्ण राज्य चला गया। (आज दुर्भाग्य के कारण मुझ निर्दयी को अपना ही पुत्र दिखायी पड़ गया।) विषधर सर्प के द्वारा डँसे गये पुत्र के कमलसदृश मुख को देखता हुआ मैं इस समय स्वयं भीषण विष से ग्रस्त हो गया हूँ ॥ २७–३११/२

इस प्रकार विलाप करके आँसू से भरे हुए कण्ठ वाले राजा हरिश्चन्द्र ने उस बालक को उठा लिया और वे उसे वक्षःस्थल से लगाकर मूर्च्छा से अचेत होकर गिर पड़े ॥ ३२१/२

तदनन्तर पृथ्वी पर गिरे हुए उन राजा को देखकर रानी शैव्या ने मन में ऐसा सोचा कि पुरुषों में श्रेष्ठ ये महानुभाव तो अपने स्वर से ही पहचान में आ जाते हैं। इसमें अब कोई सन्देह नहीं कि ये विद्वानों के मन को प्रसन्न करने वाले चन्द्रमारूपी हरिश्चन्द्र ही हैं । इन परम यशस्वी महात्मा पुरुष की सुन्दर तथा ऊँची नासिका तिल के पुष्प के समान शुभ है और इनके दाँत पुष्पों की अधखिली कलियों की भाँति प्रतीत हो रहे हैं । इस प्रकार यदि ये वे ही राजा हरिश्चन्द्र हैं, तो इस श्मशान पर वे कैसे आ गये ? ॥ ३३-३५१/२

अब पुत्र-शोक का त्याग करके वे रानी भूमि पर गिरे हुए अपने पति को देखने लगीं। उस समय पति और पुत्र दोनों के दुःख से पीडित असहाय उन रानी के मन में विस्मय और हर्ष – दोनों उत्पन्न हो उठे । राजा को देखती हुई वे सहसा मूर्च्छित होकर पृथ्वीतल पर गिर पड़ीं और धीरे-धीरे चेतना में आने पर गद्गद वाणी में कहने लगीं — ‘ अरे दयाहीन, मर्यादारहित तथा निन्दनीय दैव! तुम्हें धिक्कार है, जो कि तुमने देवतुल्य इन नरेश को चाण्डाल बना दिया । इनका राज्य नष्ट हो गया, इनके बन्धु बान्धव इनसे अलग हो गये और इन्हें अपनी पत्नी तथा पुत्र तक बेचने पड़े, ऐसी स्थिति में पहुँचाने के बाद भी तुमने इन्हें चाण्डाल बना दिया ॥ ३६-३९१/२

[ हे राजन्!] आज मैं आपके छत्र, सिंहासन, चामर अथवा व्यजन – कुछ भी नहीं देख रही हूँ; विधाता की यह कैसी विडम्बना है ! ॥ ४० ॥ पहले जिनके यात्रा करते समय राजालोग भी सेवाकार्य में लग जाते थे और अपने उत्तरीय वस्त्रों से धूलयुक्त भूमि मार्ग को स्वच्छ करते थे, वे ही ये महाराज इस समय दुःख से व्यथित होकर अपवित्र श्मशान में भटक रहे हैं; जहाँ सर्वत्र खोपड़ियाँ बिखरी पड़ी हैं, फूटे हुए घड़े तथा फटे वस्त्र पड़े हैं, जो मृतकों के शरीर से उतारे गये सूत्र तथा उनमें लगे हुए केश से अत्यन्त भयंकर लगता है, जहाँ की भूमि शुष्क चर्बियों की विशाल स्थिर राशि से पटी पड़ी है, जो भस्म, अंगारों, अधजली हड्डियों और मज्जाओं के समूह से अति भीषण दिखायी पड़ता है, जहाँ गीध और सियार सदा बोलते रहते हैं, जहाँ क्षुद्र जाति के हृष्ट-पुष्ट पक्षी मँडराते रहते हैं, जहाँ की सभी दिशाएँ चिता से निकले धुएँरूपी मेघ से अन्धकारयुक्त रहती हैं और जहाँ पर शवों के मांस को खाकर प्रसन्नता से युक्त निशाचर दृष्टिगोचर हो रहे हैं ॥ ४१-४५१/२

ऐसा कहकर दुःख तथा शोक से सन्तप्त रानी शैव्या राजा के कण्ठ से लिपटकर कातर वाणी में विलाप करने लगीं —  हे राजन् ! यह स्वप्न है अथवा सत्य, जिसे आप मान रहे हैं । हे महाभाग ! यह आप स्पष्ट बतायें; क्योंकि मेरा मन व्याकुल हो रहा है । हे धर्मज्ञ ! यदि ऐसा ही है तो धर्म में, सत्यपालन में, ब्राह्मण और देवता आदि के पूजन में सहायता करने की शक्ति विद्यमान नहीं है । जब आप – जैसे धर्मपरायण पुरुष को अपने राज्य से च्युत होना पड़ा तो फिर धर्म, सत्य, सरलता और अनृशंसता (अहिंसा) – का कोई महत्त्व ही नहीं रहा ॥ ४६–४९१/२

सूतजी बोले — उनका यह वचन सुनकर राजा ने उष्ण श्वास छोड़कर रुँधे कण्ठ से उन कृश शरीर वाली शैव्या से वह सब कुछ बताया, जिस प्रकार उन्हें चाण्डालत्व प्राप्त हुआ था। इसके बाद वह वृत्तान्त सुनकर रानी अत्यन्त दुःखित होकर बहुत देरतक रोती रहीं; फिर उष्ण श्वास छोड़कर उन्होंने भीरतापूर्वक अपने पुत्र के मरणसम्बन्धी वृत्तान्त का यथावत् वर्णन राजा से कर दिया । वह वृत्तान्त सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े और फिर उठकर मृतपुत्र को बाहों में लेकर बार- बार जिह्वा से उसके मुखका स्पर्श करने लगे ॥ ५०-५२१/२

तत्पश्चात् शैव्या ने हरिश्चन्द्र से गद्गद वाणी में कहा — अब आप मेरा सिर काटकर अपने स्वामी की आज्ञा का पालन कीजिये, जिससे आपको स्वामिद्रोह का दोष न लगे और आप सत्य से च्युत न हों । हे राजेन्द्र ! आपकी वाणी असत्य नहीं होनी चाहिये और दूसरों के प्रति द्रोह भी महान् पाप है ॥ ५३-५४१/२

यह सुनते ही राजा हरिश्चन्द्र मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। थोड़ी ही देर में सचेत होने पर वे अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे ॥ ५५१/२

राजा बोले — हे प्रिये ! तुमने ऐसा अतिनिष्ठुर वचन कैसे कह दिया ? जो बात कही नहीं जा सकती, उसे कार्यरूप में कैसे परिणत किया जाय ? ॥ ५६१/२

पत्नी ने कहा — हे प्रभो ! मैंने भगवती गौरी की उपासना की है और उसी प्रकार मैंने देवताओं तथा ब्राह्मणों की भी भलीभाँति पूजा की है। उनके आशीर्वाद से आप अगले जन्म में भी मेरे पति होंगे ॥ ५७ ॥

रानी की यह बात सुनकर राजा भूमि पर गिर पड़े और दुःखित होकर अपने मरे हुए पुत्र का मुख चूमने लगे ॥ ५८१/२

राजा बोले — हे प्रिये ! अब दीर्घ समय तक इस प्रकार का कष्ट भोगना मुझे अभीष्ट नहीं है । अब मैं अपने शरीर को स्वयं बचाये रखने में समर्थ नहीं हूँ । हे तन्वंग ! मेरी मन्दभाग्यता को तो देखो कि यदि मैं इस चाण्डाल से बिना आज्ञा लिये ही आग में जल जाऊँ तो अगले जन्म में मुझे फिर चाण्डाल की दासता करनी पड़ेगी और मैं घोर नरक में पड़कर भयंकर यातना भोगूँगा। इतना ही नहीं, महारौरव नरक में भी गिरकर अनेक प्रकार के संताप सहने पड़ेंगे, फिर भी दुःखरूपी सागर में डूबे हुए मुझ अभागे का अब प्राण त्याग देना ही श्रेयस्कर है ॥ ५९-६२ ॥ वंश की वृद्धि करने वाला मेरा जो यह एकमात्र पुत्र था, वह भी आज बलवान् दैव के प्रकोप से मर गया। इस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त हुआ मैं पराधीन होने के कारण प्राणों का त्याग कैसे करूँ ? फिर भी इस असीम दुःख से ऊबकर अब मैं अपना शरीर त्याग ही दूँगा ॥ ६३-६४ ॥ तीनों लोकों में, असिपत्रवन में और वैतरणीनदी में वैसा क्लेश नहीं है; जैसा पुत्रशोक में है। अतः हे तन्वंगि! मैं पुत्र-देह के साथ प्रज्वलित अग्नि में स्वयं भी कूद पडूंगा, इसके लिये तुम मुझे क्षमा करना ॥ ६५-६६ ॥ हे कमललोचने ! पुन: कुछ भी मत कहना । हे तन्वंगि ! सन्तप्त मन वाली तुम मेरी बात सुन लो । हे पवित्र मुसकान वाली प्रिये ! अब तुम मेरी आज्ञा के अनुसार ब्राह्मण के घर जाओ । यदि मैंने दान किया है, हवन किया है और सेवा आदि से गुरुजनों को सन्तुष्ट किया है तो उसके फलस्वरूप परलोक में तुम्हारे साथ और अपने इस पुत्र के साथ मेरा मिलन अवश्य होगा । इस लोक में अभिलषित मिलन अब कहाँ से होगा ? ॥ ६७–६९ ॥ हे शुचिस्मिते! अब यहाँ से प्रस्थान करते हुए मेरे द्वारा एकान्त में हँसी के रूप में जो कुछ भी अनुचित वचन तुम्हें कहा गया हो, उन सबको तुम क्षमा कर देना । हे शुभे ! ‘मैं राजा की पत्नी हूँ’ – ऐसा सोचकर अभिमानपूर्वक तुम्हें मेरे उस ब्राह्मण की अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि स्वामी को देवतुल्य समझकर पूर्ण प्रयत्न के साथ उन्हें सन्तुष्ट रखना चाहिये ॥ ७०-७१ ॥

रानी बोली — हे राजर्षे! हे देव! अत्यधिक दुःख के भार को सहन करने में असमर्थ मैं भी इस आग में कूद पडँगी और आपके साथ ही चलूँगी। हे मानद ! आपके साथ जाने में मेरा परम कल्याण है, इसमें सन्देह नहीं है। आपके साथ रहकर मैं स्वर्ग और नरक – सबकुछ भोगूँगी । यह सुनकर राजा बोले हे पतिव्रते ! ऐसा ही हो ॥ ७२-७३ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत सातवें स्कन्ध का ‘हरिश्चन्द्रो- पाख्यान में राजा का हुताशनप्रवेशोद्योगवर्णन’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥

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