श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-सप्तमः स्कन्धः-अध्याय-28
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-सप्तमः स्कन्धः-अष्टाविंशोऽध्यायः
अट्ठाईसवाँ अध्याय
दुर्गम दैत्य की तपस्या; वर-प्राप्ति तथा अत्याचार, देवताओं का भगवती की प्रार्थना करना, भगवती का शताक्षी और शाकम्भरी रूप में प्राकट्य, दुर्गम का वध और देवगणों द्वारा भगवती की स्तुति
शताक्षीचरित्रवर्णनम्

जनमेजय बोले — हे मुने ! भगवती शताक्षी के चरणों के उपासक एवं धर्मपरायण राजर्षि हरिश्चन्द्र की यह बड़ी अद्भुत कथा आपने कही । हे मुने! वे कल्याणमयी देवी भगवती किस प्रकार से शताक्षी (सौ नेत्रों वाली) हुईं? उसका कारण बताइये । मेरे जन्म को सार्थक कीजिये। कौन ऐसा विमल बुद्धि वाला मनुष्य होगा, जो भगवती के गुणों का श्रवण करके पूर्णरूप से तृप्त हो जाय ! इसे सुनने से पद-पद पर अश्वमेध- यज्ञ का फल मनुष्य को प्राप्त होता है ॥ १- ३ ॥

व्यासजी बोले — हे राजन् ! मैं शताक्षी की मंगलकारिणी उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ, आप सुनिये । आप सदृश देवीभक्त के प्रति कोई भी बात मेरे लिये अवाच्य नहीं है ॥ ४ ॥ प्राचीन काल की बात है — दुर्गम नामक एक अत्यन्त भयंकर महादैत्य था । हिरण्याक्ष के वंश में उत्पन्न वह महान् दुष्ट दुर्गम रुरु का पुत्र था ॥ ५ ॥ ‘देवताओं का बल वेद है । उस वेद के नष्ट हो जाने पर देवताओं का भी नाश हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं है । अत: पहले वही (वेदनाश) किया जाना चाहिये’ — ऐसा सोचकर वह तप करने के लिये हिमालय पर्वत पर चला गया । वहाँ पर मन में ब्रह्माजी का ध्यान करके उसने केवल वायु पीकर रहते हुए एक हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की । उसके तेज से देव-दानवसहित समस्त प्राणी सन्तप्त हो उठे ॥ ६–८ ॥

तब [उसके तप से] प्रसन्न होकर विकसित कमल के समान सुन्दर मुख वाले चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हंस पर आरूढ़ होकर उसे वर देने के लिये वहाँ गये ॥ ९ ॥

नेत्र मूँदकर समाधि की स्थिति में बैठे हुए उस दैत्य से चार मुख वाले ब्रह्माजी ने स्पष्ट वाणी में कहा — ‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मन में जो भी इच्छा हो, उसे वर के रूप में माँग लो। वरदाताओं का स्वामी मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर इस समय उपस्थित हुआ हूँ’ ॥ १०१/२

ब्रह्माजी के मुख से यह वाणी सुनकर वह दैत्य समाधि से उठ खड़ा हुआ और उसने पूजा करके वर माँगते हुए कहा — हे सुरेश्वर ! मुझे सभी वेद देने की कृपा कीजिये। साथ ही हे महेश्वर ! तीनों लोकों में ब्राह्मणों और देवताओं के पास जो मन्त्र हों, वे सब मेरे पास आ जायँ और मुझे वह बल दीजिये, जिससे मेरे द्वारा देवताओं की पराजय हो जाय ॥ ११–१३ ॥

उसकी यह बात सुनकर चारों वेदों के परम अधिष्ठाता ब्रह्माजी ‘ऐसा ही हो’ – यह वचन कहते हुए सत्यलोक चले गये ॥ १४ ॥ उसी समय से ब्राह्मणों को समस्त वेद विस्मृत हो गये। स्नान, संध्या, नित्य होम, श्राद्ध, यज्ञ और जप आदि का लोप हो गया, जिससे भूमण्डल में बड़ा हाहाकार मच गया। ब्राह्मण आपस में कहने लगे ‘यह क्या हो गया, यह क्या हो गया; अब इसके बाद वेद के अभाव की स्थिति में हम लोगों को क्या करना चाहिये ?’ ॥ १५-१६१/२

इस प्रकार जगत् में अत्यन्त भयंकर तथा घोर अनर्थ उत्पन्न होने पर हविभाग न मिलने के कारण सभी देवता जरारहित होते हुए भी जराग्रस्त हो गये । तब उसने देवताओं की नगरी अमरावती को घेर लिया ॥ १७-१८ ॥ देवतागण वज्र के समान शरीर वाले उस दैत्य के साथ युद्ध करने में असमर्थ हो गये । अतः भागकर वे देवता पर्वत की कन्दराओं और सुमेरुपर्वत की गुफाओं में स्थान बनाकर परम शक्तिस्वरूपा पराम्बिका का ध्यान करते हुए रहने लगे ॥ १९-२० ॥ हे राजन् ! अग्नि में हवन आदि न होने के कारण वर्षा का भी अभाव हो गया । वर्षा के अभाव में भूतल शुष्क तथा जलविहीन हो गया । कुएँ, बावलियाँ, तालाब और नदियाँ – ये सभी सूख गये । हे राजन् ! यह अनावृष्टि सौ वर्षों तक बनी रही, जिससे बहुत-सी प्रजाएँ और गाय-भैंस आदि पशु मर गये। इस प्रकार घर-घर में मनुष्यों के शव के ढेर लग गये ॥ २१-२३ ॥

इस प्रकार अनर्थ के उपस्थित होने पर शान्त चित्तवाले वे ब्राह्मण कल्याणस्वरूपिणी जगदम्बा की आराधना करने के विचार से हिमालय पर्वत पर जाकर समाधि, ध्यान और पूजा के द्वारा भगवती को निरन्तर प्रसन्न करने लगे। वे निराहार रहते हुए एकमात्र उन्हीं भगवती में चित्त लगाकर उनके शरणापन्न हो गये [ और उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे – ] ॥ २४-२५ ॥

दयां कुरु महेशानि पामरेषु जनेषु हि ।
सर्वापराधयुक्तेषु नैतच्छ्लाघ्यं तवाम्बिके ॥ २६ ॥
कोपं संहर देवेशि सर्वान्तर्यामिरूपिणि ।
त्वया यथा प्रेर्यतेऽयं करोति स तथा जनः ॥ २७ ॥
नान्या गतिर्जनस्यास्य किं पश्यसि पुनः पुनः ।
यथेच्छसि तथा कर्तुं समर्थासि महेश्वरि ॥ २८ ॥
समुद्धर महेशानि संकटात्परमोत्थितात् ।
जीवनेन विनास्माकं कथं स्यात्स्थितिरम्बिके ॥ २९ ॥
प्रसीद त्वं महेशानि प्रसीद जगदम्बिके ।
अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिके ते नमो नमः ॥ ३० ॥
नमः कूटस्थरूपायै चिद्‌रूपायै नमो नमः ।
नमो वेदान्तवेद्यायै भुवनेश्यै नमो नमः ॥ ३१ ॥
नेति नेतीति वाक्यैर्या बोध्यते सकलागमैः ।
तां सर्वकारणां देवीं सर्वभावेन सन्नताः ॥ ३२ ॥

हे महेश्वरि ! हम असहाय जनों पर दया कीजिये । हे अम्बिके! समस्त अपराधों से युक्त हम लोगों पर कृपा न करना आपके लिये शोभनीय नहीं है । सभी के भीतर निवास करने वाली हे देवेश्वरि ! आप अपना कोप दूर कीजिये। आप प्राणी को जैसी प्रेरणा देती हैं, वैसा ही वह करता है। इस मानव की अन्य गति है ही नहीं । हे महेश्वरि ! आप बार- बार क्या देख रही हैं ? आप जैसा चाहें, वैसा करने में पूर्ण समर्थ हैं । हे महेशानि !  इस उत्पन्न हुए घोर संकट से हमारा उद्धार कीजिये । हे अम्बिके! जीवनी शक्ति के अभाव में हमारी स्थिति कैसे रह सकती है ? हे महेश्वरि ! आप प्रसन्न हो जाइये। हे जगदम्बिके ! आप प्रसन्न हो जाइये । अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड की अधीश्वरि ! आपको बार-बार नमस्कार है। कूटस्थरूपिणी देवी को नमस्कार है, चिद्रूपा देवी को बार- बार नमस्कार है, वेदान्तों के द्वारा ज्ञात होने वाली को नमस्कार है और अखिल स्वामिनी को बार-बार नमस्कार है । सम्पूर्ण भुवन की आगमशास्त्र ‘नेति-नेति’ इन वचनों से जिनका ज्ञान कराते हैं, हम सब प्रकार से उन  सर्वकारण – स्वरूपिणी भगवती के शरणागत हैं ॥ २६-३२ ॥

इस प्रकार ब्राह्मणों के प्रार्थना करने पर समस्त भुवन पर शासन करने वाली भगवती भुवनेशी महेश्वरी पार्वती ने उन्हें अनन्त नेत्रों से युक्त अपना रूप दिखाया । उनका विग्रह काले कज्जल के सदृश था, नीलकमल के समान विशाल नेत्रों से सम्पन्न था और अत्यन्त कठोर, समान आकार-प्रकार वाले, उन्नत, स्थूल एवं गोल, सुडौल स्तनों से सुशोभित था। वे  अपने हाथों में मुट्ठीभर बाण, विशाल धनुष, कमल, पुष्प-पल्लव, जड़ तथा फलों से सम्पन्न, अनन्त रस से युक्त तथा भूख-प्यास और बुढ़ापे को दूर करने वाले शाक आदि धारण किये हुए थीं ॥ ३३–३५१/२

सम्पूर्ण सुन्दरता के सारस्वरूप, कमनीयता-सम्पन्न, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान और करुणा रस के सागरस्वरूप उस विग्रह का दर्शन कराकर अनन्त नेत्रों के साथ प्रकट वे जगद्धात्री भगवती समस्त लोकों में अपनी आँखों से सहस्रों जलधाराएँ गिराने लगीं। इस तरह उनके नेत्रों से निकले हुए जल से नौ राततक महान् वृष्टि होती रही ॥ ३६- ३८ ॥ समस्त प्राणियों को दुःखी देखकर भगवती अपने नेत्रों से आँसू गिराती रहीं, उससे वे सभी प्राणी और सभी औषधियाँ भी तृप्त हो गयीं। हे राजन् ! उस वृष्टि के द्वारा सभी नदियाँ और समुद्र जल से परिपूर्ण हो गये। पहले जो देवता छिपकर रह रहे थे, वे अब बाहर निकल आये। इसके बाद सभी देवता और ब्राह्मण एक साथ मिलकर देवी की स्तुति करने लगे – ॥ ३९-४०१/२

हे वेदान्तवेद्ये! आपको नमस्कार है । हे ब्रह्मस्वरूपिणि! आपको नमस्कार है । अपनी माया से सम्पूर्ण जगत् की रचना करने वाली, भक्तों के लिये देह धारण करने वाली तथा कल्पवृक्ष के समान उनके मनोरथ पूर्ण करने वाली हे देवि ! आपको बार- बार नमस्कार है । सदा सन्तुष्ट रहने वाली और सभी उपमाओं से रहित हे भुवनेश्वरि ! आपको नमस्कार है । हे देवि ! हमारी शान्ति के लिये आपने सहस्र नेत्रों से सम्पन्न अनुपम रूप धारण किया है, अतः आप ‘ शताक्षी’ नाम से विख्यात हों। हे जननि! भूख से अत्यन्त पीडित होने के कारण आपकी स्तुति करने के लिये हम लोगों में सामर्थ्य नहीं है । महेशानि! हे अम्बिके ! अब आप कृपा कीजिये और हमें वेदों को प्राप्त कराइये ॥ ४१-४४१/२

व्यासजी बोले — उनका यह वचन सुनकर कल्याण-कारिणी भगवती ने उन्हें खाने के लिये अपने हाथ में स्थित शाक तथा स्वादिष्ट फल- मूल प्रदान किये। साथ ही नानाविध अन्न तथा पशुओं के खाने योग्य पदार्थ और अनन्त काम्य रसों से सम्पन्न भोज्य पदार्थ उन्हें नवीन अन्नोत्पत्ति तक के लिये प्रदान किये। हे नृप ! उसी दिन से शाकम्भरी – यह उनका एक और भी नाम पड़ गया ॥ ४५–४७ ॥

इसके बाद जगत् में कोलाहल मच जाने तथा दूत के सब कुछ बता देने पर वह दुर्गम नामक दैत्य युद्ध करने के लिये अस्त्र-शस्त्र लेकर सेना के साथ चल पड़ा। एक हजार अक्षौहिणी सेना से युक्त उस दैत्य ने शीघ्रतापूर्वक बाण छोड़ते हुए पहले देवी के आगे स्थित देवसेना को अवरुद्ध कर दिया और उसी प्रकार उसने सभी ब्राह्मणों को भी चारों ओर से रोक दिया। इससे देवताओं की मण्डली में चीख- पुकार की ध्वनि होने लगी। सभी ब्राह्मण तथा देवता ‘रक्षा करो, रक्षा करो’ – इस प्रकार के शब्द बोलने लगे ॥ ४८–५०१/२

तत्पश्चात् भगवती शिवा ने देवताओं की रक्षा के लिये उनके चारों ओर तेजयुक्त चक्र (मण्डल) बना दिया और स्वयं उससे बाहर आकर खड़ी हो गयीं ॥ ५११/२

तदनन्तर भगवती और दैत्य दुर्गम- इन दोनों के मध्य युद्ध होने लगा। बाणों की वर्षा से अद्भुत सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया । बाणों के परस्पर घर्षण से तीव्र प्रभा वाली अग्नि निकलने लगती थीं । धनुष की कठोर प्रत्यंचा के टंकार से अपने प्रान्तभाग तक दिशाएँ बहरी-सी हो जाती थीं ॥ ५२-५३१/२

तत्पश्चात् देवी के शरीर से अनेक उग्र शक्तियाँ प्रकट हुईं। उनमें कालिका, तारिणी, बाला, त्रिपुरा, भैरवी, रमा, बगला, मातंगी, त्रिपुरसुन्दरी, कामाक्षी, तुलजादेवी, जम्भिनी, मोहिनी, छिन्नमस्ता, गुह्यकाली तथा दस हजार हाथोंवाली देवी [ये सोलह ], पुनः बत्तीस, इसके बाद चौंसठ और फिर अनन्त देवियाँ हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए प्रकट हुईं ॥ ५४–५७ ॥ वह युद्धस्थल मृदंग, शंख, वीणा आदि वाद्यों से गूँज उठा। उन शक्तियों के द्वारा दैत्यों की एक सौ अक्षौहिणी सेना का संहार कर दिये जाने पर देवशत्रु वह दैत्यसेनाध्यक्ष दुर्गम तुरन्त सामने आ खड़ा हुआ और शक्तियों के साथ अद्भुत युद्ध करने लगा ॥ ५८-५९ ॥

जहाँ वह घोर युद्ध हो रहा था, वहाँ रक्त की धारा बहने लगी। दस दिनों में उस दैत्य की वे सभी अक्षौहिणी सेनाएँ नष्ट हो गयीं ॥ ६० ॥ तदनन्तर अत्यन्त भयंकर ग्यारहवाँ दिन आने पर वह दैत्य लाल रंग की माला एवं वस्त्र धारण किये तथा शरीर में लाल चन्दन लगाये महान् उत्सव मनाकर युद्ध के लिये रथ पर आरूढ़ हुआ । बड़े उत्साह के साथ सभी शक्तियों को जीतकर वह दैत्य महादेवी के रथ के सामने अपना रथ ले गया ॥ ६१-६२१/२

अब देवी और दुर्गम दैत्य–इन दोनों में भीषण युद्ध होने लगा। हृदय को त्रास पहुँचाने वाला वह युद्ध दो प्रहर तक होता रहा। इसके बाद भगवती ने पाँच भीषण बाण छोड़े, जिनमें चार बाणों से उसके चार घोड़ों और एक बाण से सारथि को मार डाला। पुनः जगदम्बा ने दो बाणों से उसके दोनों नेत्रों को वेध दिया, दो बाणों से उसकी दोनों भुजाएँ एवं एक बाण से उसकी ध्वजा काट डाली और पाँच बाणों से उसके वक्षःस्थल का भेदन कर दिया ॥ ६३–६५१/२

तदनन्तर वह दैत्य रुधिर का वमन करता हुआ भगवती परमेश्वरी के सामने मृत्यु को प्राप्त हो गया और उसके शरीर से तेज निकलकर देवी के विग्रह में प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार उस महापराक्रमी दैत्य का संहार हो जाने पर तीनों लोकों में शान्ति व्याप्त हो गयी ॥ ६६-६७ ॥ इसके बाद ब्रह्मा आदि सभी देवता भगवान् विष्णु और शिव को आगे करके भक्तिपूर्वक गद्गद वाणी में जगदम्बा की स्तुति करने लगे ॥ ६८ ॥

देवता बोले — भ्रान्ति तथा अविद्याजन्य मोह से युक्त इस जगत् की एकमात्र कारण हे परमेश्वरि ! आपको नमस्कार है । हे शिवे ! हे शाकम्भरि ! हे शतलोचने! आपको नमस्कार है । समस्त उपनिषदों का उद्घोष करने वाली तथा दुर्गम नामक दैत्य का संहार करने वाली हे मायेश्वरि ! पंचकोश के भीतर सदा विराजमान रहनेवाली हे शिवे ! आपको नमस्कार है । मुनीश्वर विशुद्ध मन से जिनका ध्यान करते हैं, उन प्रणव के अर्थरूप विग्रह वाली भगवती भुवनेश्वरी का हम आश्रय ग्रहण करते हैं । अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों का प्रादुर्भाव करने वाली, ब्रह्मा-विष्णु आदि को उत्पन्न करने वाली तथा दिव्य विग्रह वाली भगवती के समक्ष हम लोग सम्पूर्ण भाव से नतमस्तक हैं । दयामयी परमेश्वरी माता शताक्षी के अतिरिक्त ऐसा कौन सर्वेश्वर है, जो दीन-दु:खी प्राणियों को देखकर रुदन कर सकता है? ॥ ६९–७३ ॥

व्यासजी बोले — [हे राजन् ! ] ब्रह्मा, विष्णु आदि श्रेष्ठ देवताओं के इस प्रकार स्तवन तथा विविध द्रव्यों से पूजन करने पर भगवती उसी क्षण सन्तुष्ट हो गयीं ॥ ७४ ॥ कोयल के समान मधुर स्वरवाली उन भगवती ने दुर्गम दैत्य से वेदों को वापस लाकर सौंप दिया और विशेषरूप से ब्राह्मणों से कहा — जिस वेदराशि के अभाव में यह अनर्थ उत्पन्न हुआ था और उस अनर्थ को आप लोगों ने अभी-अभी प्रत्यक्ष देखा भी है, वह वेदराशि मेरा उत्कृष्ट विग्रह है; आप लोगों को विशेषरूप से इसकी रक्षा करनी चाहिये । आप लोगों को सर्वदा मेरी पूजा तथा सेवा करनी चाहिये । आप लोगों के कल्याण के लिये इससे बढ़कर कोई अन्य उपदेश नहीं है। आप लोगों को चाहिये कि मेरे इस उत्तम माहात्म्य का सर्वदा पाठ करें, उससे प्रसन्न होकर मैं आप लोगों के समस्त कष्ट दूर कर दूँगी। दुर्गम असुर का संहार करने के कारण दुर्गा तथा शताक्षी – मेरे इन नामों का जो प्राणी उच्चारण करता है, वह माया का भेदन करके मेरे लोक को प्राप्त होता है । अब अधिक कहने की क्या आवश्यकता । हे देवगण ! मैं वस्तुतः साररूप में यही कहती हूँ कि सभी देवताओं तथा दैत्यों को सर्वदा मेरी उपासना करनी चाहिये ॥ ७५–८० ॥

व्यासजी बोले —[ हे राजन् ! ] सच्चिदानन्द- स्वरूपिणी जगदम्बा ऐसा कहकर देवताओं को आनन्दित करती हुई उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गयीं। यह सब मैंने आपको बता दिया। सबका कल्याण करने वाले इस अति महान् रहस्य को प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये, जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर इस अध्याय का नित्य श्रवण करता है, वह सभी मनोरथों को प्राप्त कर लेता है और देवीलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ८१-८३ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत सातवें स्कन्ध का ‘शताक्षीचरित्रवर्णन’ नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

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