May 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-02 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-द्वितीयोऽध्यायः दुसरा अध्याय परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधा से प्रकट चिन्मय देवताओं एवं देवियों का वर्णन पञ्चप्रकृतितद्भर्तृगणोत्पत्तिवर्णनम् नारदजी बोले — हे प्रभो ! देवियों का सम्पूर्ण चरित्र मैंने संक्षेप में सुन लिया, अब सम्यक् प्रकार से बोध प्राप्त करने के लिये विस्तार से वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ सृष्टिप्रक्रिया में सृष्टि की आद्यादेवी का प्राकट्य कैसे हुआ? हे वेदज्ञों में श्रेष्ठ ! वे प्रकृति पुन: पाँच रूपों में कैसे आविर्भूत हुईं, यह बतायें । इस संसार में उन त्रिगुणात्मिका प्रकृति के कलांशों से जो देवियाँ उत्पन्न हुईं, उनका चरित्र मैं अब विस्तार से सुनना चाहता हूँ ॥ २-३ ॥ हे विज्ञ ! उनके जन्म की कथा, उनके पूजा-ध्यान की विधि, स्तोत्र, कवच, ऐश्वर्य और मंगलमय शौर्य का वर्णन कीजिये ॥ ४ ॥ श्रीनारायण बोले — जैसे आत्मा नित्य है, आकाश नित्य है, काल नित्य है, दिशाएँ नित्य हैं, ब्रह्माण्डगोलक नित्य है, गोलोक नित्य है तथा उससे थोड़ा नीचे स्थित वैकुण्ठ नित्य है; उसी प्रकार ब्रह्म की सनातनी लीलाशक्ति प्रकृति भी नित्य है ॥ ५-६ ॥ जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति, चन्द्रमा तथा कमल में शोभा, सूर्य में दीप्ति सदा विद्यमान रहती और उससे अलग नहीं होती है; उसी प्रकार परमात्मा में प्रकृति विद्यमान रहती है ॥ ७ ॥ जैसे बिना स्वर्ण के स्वर्णकार कुण्डलादि आभूषणों का निर्माण करने में असमर्थ होता है और बिना मिट्टी के कुम्हार घड़े का निर्माण करने में सक्षम नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृति के सहयोग के बिना परमात्मा सृष्टि की रचना में समर्थ नहीं होता । वे प्रकृति ही सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं तथा उनसे ही परमात्मा सदा शक्तिमान् रहता है ॥ ८-९ ॥ ‘श’ ऐश्वर्य का तथा ‘क्ति’ पराक्रम का वाचक है। जो इनके स्वरूपवाली है तथा इन दोनों को प्रदान करनेवाली है; उस देवी को शक्ति कहा गया है ॥ १० ॥ ज्ञान, समृद्धि, सम्पत्ति, यश और बल को ‘भग’ कहते हैं। उन गुणों से सदा सम्पन्न रहने के कारण ही शक्ति को भगवती कहते हैं तथा वे सदा भगरूपा हैं। उनसे सम्बद्ध होने के कारण ही परमात्मा भी भगवान् कहे जाते । वे परमेश्वर अपनी इच्छाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण साकार और निराकार दोनों रूपों से अवस्थित रहते हैं ॥ ११-१२ ॥ उस तेजस्वरूप निराकार का योगीजन सदा ध्यान करते हैं तथा उसे परमानन्द, परब्रह्म तथा ईश्वर कहते हैं ॥ १३ ॥ अदृश्य, सबको देखने वाले, सर्वज्ञ, सबके कारणस्वरूप, सब कुछ देने वाले, सर्वरूप उस परब्रह्म को वैष्णवजन नहीं स्वीकार करते ॥ १४ ॥ वे कहते हैं कि तेजस्वी सत्ता के बिना किसका तेज प्रकाशित हो सकता है ? अतः तेजोमण्डल के मध्य अवश्य ही तेजस्वी परब्रह्म विराजते हैं ॥ १५ ॥ वे स्वेच्छामय, सर्वरूप और सभी कारणों के भी कारण हैं । वे अत्यन्त सुन्दर तथा मनोहर रूप धारण करने वाले हैं, वे किशोर अवस्था वाले, शान्तस्वभाव, सभी मनोहर अंगों वाले तथा परात्पर हैं । वे नवीन मेघ की कान्ति के एकमात्र धामस्वरूप श्याम विग्रह वाले हैं, उनके नेत्र शरद् ऋतु मध्याह्न में खिले कमल की शोभा को तिरस्कृत करने वाले हैं और उनकी मनोरम दन्तपंक्ति मुक्ता की शोभा को भी तुच्छ कर देनेवाली है ॥ १६–१८ ॥ उन्होंने मयूरपिच्छ का मुकुट धारण किया है, उनके गले में मालती की माला सुशोभित हो रही है । उनकी सुन्दर नासिका है, उनका मुखमण्डल मुसकानयुक्त तथा सुन्दर है और वे भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हैं। वे प्रज्वलित अग्नि के सदृश विशुद्ध तथा देदीप्यमान पीताम्बर से सुशोभित हो रहे हैं। उनकी दो भुजाएँ हैं, उन्होंने मुरली को हाथ में धारण किया है, वे रत्नों के आभूषणों से अलंकृत हैं। वे सर्वाधार, सर्वेश, सर्वशक्ति से युक्त, विभु, सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, सब प्रकार से स्वतन्त्र तथा सर्वमंगलरूप हैं ॥ १९–२१ ॥ वे परिपूर्णतम सिद्धावस्था को प्राप्त, सिद्धों के स्वामी तथा सिद्धियाँ प्रदान करने वाले हैं । वे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भय को दूर करते हैं, ऐसे उन सनातन परमेश्वर का वैष्णवजन सदा ध्यान करते रहते हैं ॥ २२१/२ ॥ ब्रह्माजी की आयु जिनके एक निमेष की तुलना में है, उन परमात्मा परब्रह्म को ‘कृष्ण’ नाम से पुकारा जाता है । ‘कृष्’ उनकी भक्ति तथा ‘न’ उनके दास्य के वाचक शब्द हैं। इस प्रकार जो भक्ति और दास्य प्रदान करते हैं, उन्हें कृष्ण कहा गया है। अथवा ‘कृष्’ सर्वार्थ का तथा ‘न’ – कार बीज का वाचक है, अतः श्रीकृष्ण ही आदि में सर्वप्रपंच के स्रष्टा तथा सृष्टि के एकमात्र बीजस्वरूप हैं । उनमें जब सृष्टि की इच्छा उत्पन्न हुई, तब उनके अंशभूत काल के द्वारा प्रेरित होकर स्वेच्छामय वे प्रभु अपनी इच्छा से दो रूपों में विभक्त हो गये। उनका वाम भागांश स्त्री रूप तथा दक्षिणांश पुरुष रूप कहा गया है ॥ २३-२७ ॥ उन [वामभागोत्पन्न] काम की आधारस्वरूपा को उन सनातन महाकामेश्वर ने देखा । उनका रूप अतीव मनोहर था। चन्द्रबिम्बविनिन्द्यैकनितम्बयुगलां पराम् । सुचारुकदलीस्तम्भनिन्दितश्रोणिसुन्दरीम् ॥ २९ ॥ श्रीयुक्तश्रीफलाकारस्तनयुग्ममनोरमाम् । पुष्पजुष्टां सुवलितां मध्यक्षीणां मनोहराम् ॥ ३० ॥ अतीव सुन्दरीं शान्तां सस्मितां वक्रलोचनाम् । वह्निशुद्धांशुकाधारां रत्नभूषणभूषिताम् ॥ ३१ ॥ शश्वच्चक्षुश्चकोराभ्यां पिबन्तीं सततं मुदा । कृष्णस्य मुखचन्द्रं च चन्द्रकोटिविनिन्दितम् ॥ ३२ ॥ कस्तूरीबिन्दुना सार्धमधश्चन्दनबिन्दुना । समं सिन्दूरबिन्दुं च भालमध्ये च बिभ्रतीम् ॥ ३३ ॥ वक्रिमं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषितम् । रत्नेन्द्रसारहारं च दधतीं कान्तकामुकीम् ॥ ३४ ॥ कोटिचन्द्रप्रभामृष्टपुष्टशोभासमन्विताम् । गमनेन राजहंसगजगर्वविनाशिनीम् ॥ ३५ ॥ वे सुन्दर कमल की शोभा धारण किये हुए थीं। उन परादेवी का नितम्ब-युगल चन्द्रबिम्ब को तिरस्कृत कर रहा था और अपने जघनप्रदेश से सुन्दर कदलीस्तम्भ को निन्दित करते हुए वे मनोहर प्रतीत हो रही थीं। शोभामय श्रीफल के आकार वाले स्तनयुगल से वे मनोरम प्रतीत हो रही थीं। वे मस्तक पर पुष्पों की सुन्दर माला धारण किये थीं, वे सुन्दर वलियों से युक्त थीं, उनका कटिप्रदेश क्षीण था, वे अति मनोहर थीं, वे अत्यन्त सुन्दर, शान्त मुसकान और कटाक्ष से सुशोभित थीं। उन्होंने अग्नि के समान पवित्र वस्त्र धारण कर रखा था और वे रत्नों के आभूषणों से सुशोभित थीं ॥ २८-३१ ॥ वे अपने चक्षुरूपी चकोरों से करोड़ों चन्द्रमाओं को तिरस्कृत करने वाले श्रीकृष्ण के मुखमण्डल का प्रसन्नतापूर्वक निरन्तर पान कर रही थीं। वे देवी ललाट के ऊपरी भाग में कस्तूरी की बिन्दी के साथ-साथ नीचे चन्दन की बिन्दी तथा ललाट के मध्य में सिन्दूर की बिन्दी धारण किये थीं। अपने प्रियतम में अनुरक्त चित्तवाली वे देवी मालती की माला से भूषित घुँघराले केश से शोभा पा रही थीं तथा श्रेष्ठ रत्नों की माला धारण किये हुए थीं । कोटि चन्द्र की प्रभा को लज्जित करने वाली शोभा धारण किये वे अपनी चाल से राजहंस और गज के गर्व को तिरस्कृत कर रही थीं ॥ ३२-३५ ॥ उन्हें देखकर रासेश्वर तथा परम रसिक श्रीकृष्ण ने उनके साथ रासमण्डल में उल्लासपूर्वक रासलीला की । ब्रह्मा के दिव्य दिवस की अवधि तक नाना प्रकार की श्रृंगार-चेष्टाओं से युक्त उन्होंने मूर्तिमान् श्रृंगाररस के समान सुखपूर्वक क्रीड़ा की । तत्पश्चात् थके हुए उन जगत्पिता ने नित्यानन्दमय शुभ मुहूर्त में देवी के क्षेत्र में तेज का आधान किया । हे सुव्रत ! क्रीडा के अन्त में हरि के तेज से परिश्रान्त उन देवी के शरीर से स्वेद निकलने लगा और महान् परिश्रम से खिन्न उनका श्वास भी वेग से चलने लगा। तब वह सम्पूर्ण स्वेद विश्वगोलक बन गया और वह निःश्वास वायु जगत् में सब प्राणियों के जीवन का आधार बन गया ॥ ३६–४१ ॥ उस मूर्तिमान् वायु के वामांग से उसकी प्राणप्रिय पत्नी प्रकट हुईं, पुनः उनके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए जो जीवों के प्राण के रूप में प्रतिष्ठित हैं । प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान — ये पाँच वायु और उनके पाँच अधोगामी प्राणरूप पुत्र भी उत्पन्न हुए ॥ ४२-४३ ॥ स्वेद के रूप में निकले जल के अधिष्ठाता महान् वरुणदेव हुए। उनके वामांग से उनकी पत्नी वरुणानी प्रकट हुईं। श्रीकृष्ण की उन चिन्मयी शक्ति ने उनके गर्भ को धारण किया । वे सौ मन्वन्तरोंतक ब्रह्मतेज से देदीप्यमान बनी रहीं। वे श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठातृदेवी हैं, कृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। वे कृष्ण की सहचरी हैं और सदा उनके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं। सौ मन्वन्तर बीतने पर उन सुन्दरी ने स्वर्ण की कान्तिवाले, विश्व के आधार तथा निधानस्वरूप श्रेष्ठ बालक को जन्म दिया ॥ ४४–४७ ॥ उस बालक को देखकर उन देवी का हृदय अत्यन्त दुःखित हो गया और उन्होंने उस बालक को कोपपूर्वक उस ब्रह्माण्डगोलक में छोड़ दिया। बालक के उस त्याग को देखकर देवेश्वर श्रीकृष्ण हाहाकार करने लगे और उन्होंने उसी क्षण उन देवी को समयानुसार शाप दे दिया — हे कोपशीले ! हे निष्ठुरे ! तुमने पुत्र को त्याग दिया है, इस कारण आज से तुम निश्चित ही सन्तानहीन रहोगी । तुम्हारे अंश से जो-जो देवपत्नियाँ प्रकट होंगी, वे भी तुम्हारी तरह सन्तानरहित तथा नित्ययौवना रहेंगी ॥ ४८–५१ ॥ इसके बाद देवी के जिह्वाग्र से सहसा ही एक सुन्दर गौरवर्ण कन्या प्रकट हुई। उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा था तथा वे हाथ में वीणा-पुस्तक लिये हुए थीं। सभी शास्त्रों की अधिष्ठात्री वे देवी रत्नों के आभूषण से सुशोभित थीं । कालान्तर में वे भी द्विधारूप से विभक्त हो गयीं। उनके वाम अर्धांग से कमला तथा दक्षिण अर्धांग से राधिका प्रकट हुईं ॥ ५२-५४ ॥ इसी बीच श्रीकृष्ण भी द्विधारूप से प्रकट हो गये । उनके दक्षिणार्ध से द्विभुज रूप प्रकट हुआ तथा वामार्ध से चतुर्भुज रूप प्रकट हुआ । तब श्रीकृष्ण ने उन सरस्वती-देवी से कहा कि तुम इस (चतुर्भुज) विष्णु की कामिनी बनो। ये मानिनी राधा इस द्विभुज के साथ यहीं रहेंगी। तुम्हारा कल्याण होगा। इस प्रकार प्रसन्न होकर उन्होंने लक्ष्मी को नारायण को समर्पित कर दिया । तत्पश्चात् वे जगत्पति उन दोनों के साथ वैकुण्ठ को चले गये ॥ ५५-५७ ॥ राधा के अंश से प्रकट वे दोनों लक्ष्मी तथा सरस्वती निःसन्तान ही रहीं । भगवान् नारायण के अंग से चतुर्भुज पार्षद प्रकट हुए। वे तेज, वय, रूप और गुणों में नारायण के समान ही थे। उसी प्रकार लक्ष्मी के अंग से उनके ही समान करोड़ों दासियाँ प्रकट हो गयीं ॥ ५८-५९ ॥ हे मुने ! गोलोकनाथ श्रीकृष्ण के रोमकूपों से असंख्य गोपगण प्रकट हुए; जो वय, तेज, रूप, गुण, बल तथा पराक्रम में उन्हीं के समान थे । वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्ण के प्राणों के समान प्रिय पार्षद बन गये ॥ ६०-६१ ॥ श्रीराधा के अंगों के रोमकूपों से अनेक गोपकन्याएँ प्रकट हुईं। वे सब राधा के ही समान थीं तथा उनकी प्रियवादिनी दासियों के रूप में रहती थीं। वे सभी रत्नाभरणों से भूषित और सदा स्थिरयौवना थीं, किंतु परमात्मा के शाप के कारण वे सभी सदा सन्तानहीन रहीं । हे विप्र ! इसी बीच श्रीकृष्ण की उपासना करने वाली सनातनी विष्णुमाया दुर्गा सहसा प्रकट हुईं। वे देवी सर्वशक्तिमती, नारायणी तथा ईशाना हैं और परमात्मा श्रीकृष्ण की बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं ॥ ६२-६५ ॥ सभी शक्तियों की बीजरूपा वे मूलप्रकृति ही ईश्वरी, परिपूर्णतमा तथा तेजपूर्ण त्रिगुणात्मिका हैं। वे तपाये हुए स्वर्णकी कान्तिवाली, कोटि सूर्यो की आभा धारण करने वाली, किंचित् हास्य से युक्त प्रसन्नवदनवाली तथा सहस्र भुजाओं से शोभायमान हैं । वे त्रिलोचना भगवती नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र-समूहों को धारण करती हैं, अग्निसदृश विशुद्ध वस्त्र धारण किये हुए हैं और रत्नाभरण से भूषित हैं ॥ ६६-६८ ॥ उन्हीं की अंशांशकला से सभी नारियाँ प्रकट हुई हैं। उनकी माया से विश्व के सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं । वे गृहस्थ सकामजनों को सब प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाली, वैष्णवजनों को वैष्णवी कृष्णभक्ति देने वाली, मोक्षार्थी-जनों को मोक्ष देने वाली तथा सुख चाहने वालों को सुख प्रदान करने वाली हैं ॥ ६९-७० ॥ वे देवी स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी, गृहों में गृहलक्ष्मी, तपस्वियों में तप तथा राजाओं में राज्यलक्ष्मी के रूप में स्थित हैं। वे अग्नि में दाहिका शक्ति, सूर्य में प्रभारूप, चन्द्रमा तथा कमलों में शोभारूप से और परमात्मा श्रीकृष्ण में सर्वशक्तिरूप से विद्यमान हैं ॥ ७१-७३ ॥ हे नारद! जिनसे परमात्मा शक्तिसम्पन्न होता है तथा जगत् भी शक्ति प्राप्त करता है और जिनके बिना सारा चराचर विश्व जीते हुए भी मृतकतुल्य हो जाता है, जो सनातनी संसाररूपी बीजरूप से वर्तमान हैं, वे ही समस्त सृष्टि की स्थिति, वृद्धि और फलरूप से स्थित हैं ॥ ७४-७५ ॥ वे ही भूख-प्यास, दया, निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, मति, शान्ति, लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, भ्रान्ति तथा कान्तिरूप से सर्वत्र विराजती हैं । सर्वेश्वर प्रभु की स्तुति करके वे उनके समक्ष स्थित हो गयीं । राधिका के ईश्वर श्रीकृष्ण ने उन्हें रत्नसिंहासन प्रदान किया ॥ ७६-७७ ॥ हे महामुने ! इसी समय वहाँ सपत्नीक ब्रह्माजी पद्मनाभ भगवान् के नाभिकमल से प्रकट हुए। ज्ञानियों में श्रेष्ठ तथा परम तपस्वी वे ब्रह्मा कमण्डलु धारण किये हुए थे। देदीप्यमान वे ब्रह्मा चारों मुखों से श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे ॥ ७८-७९ ॥ सैकड़ों चन्द्रमा के समान कान्तिवाली, अग्नि के समान चमकीले वस्त्रों को धारण किये और रत्नाभरणों से भूषित प्रकट हुईं वे सुन्दरी सबके कारणभूत परमात्मा की स्तुति करके अपने स्वामी श्रीकृष्ण के साथ रमणीय रत्नसिंहासन पर उनके समक्ष प्रसन्नतापूर्वक बैठ गयीं ॥ ८०-८१ ॥ उसी समय वे श्रीकृष्ण दो रूपों में विभक्त हो गये। उनका वाम अर्धांग महादेव के रूप में परिणत हो गया और दक्षिण अर्धांग गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण ही बना रह गया। वे महादेव शुद्ध स्फटिक के समान प्रभायुक्त थे, शतकोटि सूर्य की प्रभा से सम्पन्न थे, त्रिशूल तथा पट्टिश धारण किये हुए थे तथा बाघम्बर पहने हुए थे। वे परमेश्वर तप्त स्वर्ण के समान कान्तिवाले थे, वे जटाजूट धारण किये हुए थे, उनका शरीर भस्म से विभूषित था, वे मन्द-मन्द मुसकरा रहे थे। उन्होंने मस्तक पर चन्द्रमा को धारण कर रखा था। वे दिगम्बर नीलकण्ठ सर्पों के आभूषण से अलंकृत थे । उन्होंने दाहिने हाथ में सुसंस्कृत रत्नमाला धारण कर रखी थी ॥ ८२–८५ ॥ वे पाँचों मुखों से सनातन ब्रह्मज्योति का जप कर रहे थे। उन सत्यस्वरूप, परमात्मा, ईश्वर, सभी कारणों के कारण, सभी मंगलों के भी मंगल, जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि-शोक और भय को दूर करने वाले, काल के काल, श्रेष्ठ श्रीकृष्ण की स्तुति करके मृत्युंजय नाम से विख्यात हुए वे शिव विष्णु के समक्ष रमणीय रत्नसिंहासन पर बैठ गये ॥ ८६–८८ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘पंचप्रकृतितद्भर्तृगणोत्पत्तिवर्णन’ नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥ Content is available only for registered users. 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