May 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-04 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चतुर्थोऽध्यायः चौथा अध्याय सरस्वती की पूजा का विधान तथा कवच सरस्वतीस्तोत्रपूजाकवचादिवर्णनम् नारदजी बोले — हे भगवन्! मैंने आपकी कृपा से यह अमृततुल्य सारी कथा तो सुन ली, अब आप प्रकृतिदेवियों के पूजन का विस्तृत वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ किसने किस देवी की पूजा की और उसने मृत्युलोक में किस प्रकार पूजा का विस्तार किया ? हे प्रभो ! किस मन्त्र से किस देवी की पूजा तथा किस स्तोत्र से किस देवी की स्तुति की गयी ? उन देवियों के स्तोत्र, ध्यान, प्रभाव तथा पवित्र चरित्र के विषय में मुझे बताइये। साथ ही किन-किन देवियों ने किन-किन भक्तों को वर प्रदान किये, कृपा करके मुझे वह भी बताइये ॥ २-३ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! मूलप्रकृति सृष्टिकार्य के प्रयोजनार्थ गणेशजननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा सावित्री — इन पाँच रूपों वाली कही गयी हैं ॥ ४ ॥ इन देवियों की पूजा अत्यन्त प्रसिद्ध है, इनका प्रभाव परम अद्भुत है और इनका चरित्र अमृततुल्य तथा सभी मंगलों का कारण है ॥ ५ ॥ हे ब्रह्मन् ! प्रकृति की अंशसंज्ञक तथा कलासंज्ञक जो देवियाँ हैं, उनका सम्पूर्ण पवित्र चरित्र मैं आपको बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ६ ॥ काली, वसुन्धरा, गंगा, षष्ठी, मंगलचण्डिका, तुलसी, मनसा, निद्रा, स्वधा, स्वाहा तथा दक्षिणा — इन देवियों के महान् पुण्यदायक तथा सुनने में प्रिय चरित्र का एवं प्राणियों के कर्मविपाक का मैं संक्षिप्त तथा सुन्दर वर्णन करूँगा ॥ ७-८ ॥ दुर्गा और राधा का चरित्र बहुत विस्तृत है, उसी का विस्तार बाद में कहूँगा । पहले संक्षेप के क्रम से सुन लीजिये ॥ ९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने सरस्वती की पूजा प्रारम्भ की, जिनकी कृपा से मूर्ख भी विद्वान् हो जाता है ॥ १० ॥ जब देवी सरस्वती कृष्णवल्लभा राधा के मुख से प्रकट हुईं, तब उन कामरूपा कामिनी ने श्रीकृष्ण को काम भाव से प्राप्त करने की लालसा की ॥ ११ ॥ उनका अभिप्राय समझकर सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण ने सबकी माता उन सरस्वती से सत्य, हितकर तथा परिणाम में सुखकर बात कही ॥ १२ ॥ श्रीकृष्ण बोले — हे साध्वि ! तुम मेरे ही अंशस्वरूप चतुर्भुज नारायण का सेवन करो। वे सदा तरुणावस्था में विराजमान, सुन्दर रूप वाले, सभी गुणों से सम्पन्न तथा मेरे ही समान हैं। वे कामिनियों की कामनाओं को जानने वाले तथा उनकी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर हैं और लीलामय अलंकारों से अलंकृत हैं तथा ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं ॥ १३-१४ ॥ हे कान्ते! मुझे पति बनाकर यदि तुम यहाँ रहना चाहती हो, तो तुमसे भी अधिक बलवती राधा यहाँ हैं, अत: तुम्हारा कल्याण नहीं होगा ॥ १५ ॥ जो मनुष्य जिससे बलवान् होता है, वह उससे तो दूसरे प्राणी की रक्षा करने में समर्थ है; किंतु यदि स्वयं सामर्थ्यरहित है तो दूसरों की रक्षा कैसे कर सकता है ? ॥ १६ ॥ सबका ईश्वर तथा सब पर शासन करने वाला मैं राधा को रोक पाने में असमर्थ हूँ; क्योंकि वे भी तेज, रूप तथा गुण में मेरे ही समान हैं । किन्हीं भी पुरुषों के लिये कोई पुत्र क्या प्राण से अधिक प्रिय हो सकता है अर्थात् नहीं। वे राधा तो मेरे प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं तो फिर उन प्राणरूपा राधा को छोड़ने में मैं कैसे समर्थ हो सकता हूँ। हे भद्रे! तुम वैकुण्ठलोक जाओ; तुम्हारा कल्याण होगा। उन्हीं ऐश्वर्यसम्पन्न विष्णु को पति बनाकर दीर्घ काल तक सुखपूर्वक आनन्द प्राप्त करो ॥ १७–१९ ॥ लोभ, मोह, काम, क्रोध, मान और हिंसा से रहित एवं तेज, रूप और गुण में तुम्हारे ही समान [ उनकी पत्नी] लक्ष्मी भी वहाँ हैं । उनके साथ तुम्हारा समय सदा प्रेमपूर्वक व्यतीत होगा और विष्णु भी तुम दोनों का समान-रूप से सम्मान करेंगे ॥ २०-२१ ॥ सुन्दरि ! प्रत्येक ब्रह्माण्ड में माघ शुक्ल पंचमी तिथि को विद्यारम्भ के अवसर पर मनुष्य, मनुगण, देवता, मुनीन्द्र, मुमुक्षुजन, वसु, योगी, सिद्ध, नाग, गन्धर्व और राक्षस मेरे वर प्रभाव से आज से लेकर प्रलयपर्यन्त प्रत्येक कल्प में भक्तिपूर्वक षोडशोपचार पूजा अर्पण करके बड़े गौरव के साथ तुम्हारी उत्कृष्ट पूजा सम्पन्न करेंगे ॥ २२–२४ ॥ जितेन्द्रिय तथा संयमशील व्यक्ति कण्वशाखा में कही गयी विधि अनुसार ध्यान तथा स्तुतिपूर्वक घट अथवा पुस्तक में आवाहित करके तुम्हारा पूजन करेंगे। तुम्हारे कवच को लिखकर उसे सोने की गुटिका (डिब्बी) – में रखकर पुनः उसे गन्ध – चन्दन आदि से सुपूजित करके लोग अपने गले अथवा दाहिनी भुजा में धारण करेंगे। पूजा के पावन अवसर पर विद्वज्जन तुम्हारे इस कवच का पाठ करेंगे ॥ २५-२६१/२ ॥ ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण ने सभी लोगों के द्वारा पूजित उन भगवती सरस्वती का पूजन किया । तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, सनकादि मुनीश्वर, देवता, मुनिगण, राजा और मनुष्य आदि — ये सब भी सरस्वती की उपासना करने लगे। तभी से ये सरस्वती सम्पूर्ण प्राणियों के द्वारा सदा पूजित होने लगीं ॥ २७–२९ ॥ नारदजी बोले — हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! आप उन भगवती के पूजाविधान, कवच, ध्यान, पूजा के उपयुक्त नैवेद्य, पुष्प, चन्दन आदि के विषय में मुझे बतायें। यह सब सुनने की लालसा मेरे हृदय में निरन्तर बनी रहती है। सुनने में इससे अधिक सुन्दर (प्रिय) क्या हो सकता है ? ॥ ३०-३१ ॥ श्रीनारायण बोले — हे नारद! सुनिये, जगज्जननी सरस्वती की पूजाविधि से संयुक्त कण्वशाखोक्त पद्धति का वर्णन कर रहा हूँ ॥ ३२ ॥ माघ शुक्ल पंचमी तथा विद्यारम्भ के दिन भी पूर्वाह्नकाल में प्रतिज्ञा करके आराधक उस दिन संयम तथा पवित्रता से युक्त रहे । स्नान और नित्यक्रिया करके भक्तिपूर्वक कलश स्थापन करने के बाद अपनी शाखा में कही गयी विधि से अथवा तान्त्रिक विधि से पहले गणेशजी का पूजन करके अभीष्ट देवी सरस्वती की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये ॥ ३३-३४१/२ ॥ बताये गये ध्यान के द्वारा बाह्य घट में देवी का ध्यान करके तत्पश्चात् व्रती को चाहिये कि फिर ध्यानपूर्वक षोडशोपचार विधि से भगवती सरस्वती का पूजन करे । हे सौम्य ! सरस्वती पूजा के लिये उपयोगी जो कुछ नैवेद्य वेदों में बताये गये हैं और जैसा मैंने आगमशास्त्र में अध्ययन किया है, उसे आपको बता रहा हूँ — मक्खन, दही, दूध, धान का लावा, तिल का लड्डू, सफेद गन्ना, गन्ने का रस, उसे पकाकर बनाया हुआ गुड़, मधु, स्वस्तिक (एक प्रकार का पक्वान्न), शक्कर, सफेद धान का बिना टूटा हुआ चावल (अक्षत), बिना उबाले हुए श्वेत धान का चिउड़ा, सफेद लड्डू, घी और सेंधा नमक डालकर बनाया गया शास्त्रोक्त हविष्यान्न, जौ अथवा गेहूँ के आटे से घृत में तले हुए पदार्थ, स्वस्तिक तथा पके हुए केले का पिष्टक, उत्तम अन्न को घृत में पकाकर उससे बना हुआ अमृततुल्य मधुर मिष्टान्न, नारियल, नारियल का जल, कसेरु, मूली, अदरक, पका हुआ केला, सुन्दर बेल, बेर का फल, देश और काल के अनुसार उपलब्ध सुन्दर, श्वेत और पवित्र ऋतुफल — ये नैवेद्य (प्रशस्त) हैं ॥ ३५–४२ ॥ हे मुने! सुगन्धित श्वेत पुष्प, सुगन्धित श्वेत चन्दन, नवीन श्वेत वस्त्र तथा सुन्दर शंख, श्वेत पुष्पों की माला, श्वेत वर्ण का हार तथा आभूषण भगवती सरस्वती को अर्पण करने चाहिये ॥ ४३१/२ ॥ हे महाभाग ! भगवती सरस्वती का जैसा ध्यान वेद में वर्णित है; उस प्रशंसनीय, सुनने में सुन्दर तथा भ्रम का नाश करनेवाले ध्यानके विषयमें सुनिये ॥ ४४१/२ ॥ ‘मैं भक्तिपूर्वक शुक्ल वर्णवाली, मुसकानयुक्त, अत्यन्त मनोहर, करोड़ों चन्द्रमाकी प्रभाको तिरस्कृत करनेवाले परिपुष्ट तथा श्रीसम्पन्नविग्रह वाली, अग्निसदृश विशुद्ध वस्त्र धारण करनेवाली, हाथमें वीणा तथा पुस्तक धारण करनेवाली, उत्कृष्ट कोटिके रत्नोंसे निर्मित नवीन आभूषणों से विभूषित, ब्रह्मा – -विष्णु-शिव आदि देवगणोंसे सम्यक् पूजित तथा मुनीश्वरों, मनुगण और मनुष्योंसे वन्दित भगवती सरस्वतीकी वन्दना करता हूँ’ – इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष समस्त पूजन-सामग्री मूलमन्त्रसे विधिपूर्वक सरस्वतीको अर्पण करके स्तुति करे और कवचको धारण करके दण्डकी भाँति भूमिपर गिरकर सरस्वतीको प्रणाम करे । हेमुने! ये सरस्वती जिन लोगोंकी इष्ट देवी हैं, उनके लिये तो यह नित्यक्रिया है । अन्य सभी लोगोंको विद्यारम्भके अवसरपर, वर्षके अन्तमें तथा पंचमी तिथिको यह आराधना अवश्य करनी चाहिये ॥ ४५–४९ ॥ वैदिक अष्टाक्षर मूल मन्त्र परम श्रेष्ठ तथा सबके लिये उपयोगी है। अथवा जिन्हें जिसने जिस मन्त्रका उपदेश दिया है, उनके लिये वही मूल मन्त्र है । सरस्वती – इस शब्दके अन्तमें चतुर्थी तथा अन्तमें ‘स्वाहा’ लगाकर सबके आदिमें लक्ष्मीबीज और मायाबीज लगाकर बना हुआ यह मन्त्र ‘ श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’ कल्पवृक्षके समान है ॥ ५०-५११/२ ॥ प्राचीन कालमें कृपानिधि भगवान् नारायणने पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें गंगाके तटपर वाल्मीकिको यह मन्त्र प्रदान किया था। इसी प्रकार भृगुमुनिने पुष्करक्षेत्रमें सूर्यग्रहणपर्वके अवसरपर यह मन्त्र शुक्राचार्यको प्रदान किया, मारीच (कश्यप) – ने चन्द्रग्रहणके समयपर प्रसन्न होकर बृहस्पतिको इसका उपदेश किया और ब्रह्माजीने भृगुसे सन्तुष्ट होकर बदरिकाश्रममें उन्हें यह मन्त्र दिया था ॥ ५२-५४ ॥ जरत्कारुमुनिने क्षीरसागरके समीप आस्तिकको यह मन्त्र दिया था और विभाण्डकमुनिने मेरुपर्वतपर बुद्धिमान् ऋष्यशृंगको इसका उपदेश दिया था। भगवान् शिवने आनन्दित होकर कणादमुनि तथा गौतमको यह मन्त्र प्रदान किया था और सूर्यने याज्ञवल्क्य तथा कात्यायनको इस मन्त्रका उपदेश किया था। शेषनागने सुतल लोकमें बलिकी सभा में पाणिनि, बुद्धिमान् भारद्वाज और शाकटायनको यह मन्त्र दिया था ॥ ५५–५७ ॥ चार लाख जप कर लेनेसे यह मन्त्र मनुष्योंके लिये सिद्ध हो जाता है । यदि मनुष्य इस मन्त्रमें सिद्ध हो जाय, तो वह बृहस्पतिके समान हो जाता है ॥ ५८ ॥ हे विप्रवर! अब आप विश्वपर विजय प्राप्त कराने वाले सरस्वतीकवच के विषय में सुनिये, जिसे पूर्वकाल में जगत् का सृजन करनेवाले ब्रह्माजीने गन्धमादनपर्वतपर भृगुमुनिको प्रदान किया था ॥ ५९ ॥ भृगु बोले — ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मज्ञान में पारंगत, सब कुछ जानने वाले, सबकी सृष्टि करनेवाले, सबके स्वामी तथा सभी के द्वारा पूजित हे ब्रह्मन् ! हे प्रभो! आप मुझे मन्त्रोंके समूह से युक्त तथा परम पवित्र ‘विश्वजय’ नामक सरस्वती- कवच बतलाइये ॥ ६०-६१ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे वत्स ! सुनिये; मैं आपसे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, वेदोंके सारस्वरूप, कानोंको सुख देनेवाले, वेदप्रतिपादित तथा वेदपूजित कवचका वर्णन करूँगा। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने गोलोक वृन्दावनमें रासलीलाके अवसरपर रासमण्डलमें मुझे यह कवच बताया था ॥ ६२-६३ ॥ हे ब्रह्मन् ! यह कवच परम गोपनीय, कल्पवृक्ष के समान श्रेष्ठ तथा न सुने हुए अद्भुत मन्त्रसमूहों से युक्त है, जिसे धारण करके भगवान् शुक्राचार्य समस्त दैत्यों के पूज्य बन गये और जिसे धारण करके इसका पाठ करने से बृहस्पति परम बुद्धिमान् हो गये ॥ ६४-६५ ॥ इसी प्रकार इस कवच के धारण करने तथा इसका पाठ करने से वाल्मीकिमुनि विद्वान् तथा कवीश्वर हो गये और स्वायम्भुव मनु इसे धारण करके सभी के पूज्य हो गये ॥ ६६ ॥ इस कवच को धारण करके ही स्वयं कणाद, गौतम, कण्व, पाणिनि, शाकटायन, दक्ष और कात्यायन ग्रन्थ-रचना करने में समर्थ हुए ॥ ६७ ॥ इसी प्रकार स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यासजी ने भी इसे धारण करके लीलामात्र में वेदों का विभाग तथा सम्पूर्ण पुराणों का प्रणयन किया ॥ ६८ ॥ शातातप, संवर्त, वसिष्ठ, पराशर तथा याज्ञवल्क्य ने इसे धारण करके इसके पाठ से ग्रन्थ-रचना की । इसी प्रकार ऋष्यश्रृंग, भरद्वाज, आस्तिक, देवल, जैगीषव्य और ययाति इस कवच को धारण करके सर्वत्र पूजित हुए ॥ ६९-७० ॥ हे विप्रेन्द्र! इस कव चके ऋषि स्वयं प्रजापति ही हैं इसका छन्द बृहती है और देवता माता शारदा हैं । सभी तत्त्वों के परिज्ञान करने में, सम्पूर्ण अर्थों के साधन में तथा सभी कविताओं के विवेचन में इस कवच का विनियोग बताया गया है ॥ ७१-७२ ॥ ‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र सभी ओर से मेरे सिर की रक्षा करे । ‘श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा’– यह मन्त्र सदा मेरे ललाट की रक्षा करे ॥ ७३ ॥ ‘ॐ ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र मेरे दोनों कानों की निरन्तर रक्षा करे और ‘ॐ श्रीं ह्रीं भगवत्यै सरस्वत्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र मेरे दोनों नेत्रों की सदा रक्षा करे ॥ ७४ ॥ ‘ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र मेरी नासिका की सदा रक्षा करे और ‘ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा’- यह मन्त्र सदा मेरे ओष्ठ की रक्षा करे ॥ ७५ ॥ ‘ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहा’ – यह मन्त्र मेरी दन्तपंक्ति की सदा रक्षा करे और ‘ऐं’ यह एकाक्षरमन्त्र मेरे कण्ठ की सदा रक्षा करे ॥ ७६ ॥ ‘ॐ श्रीं ह्रीं’ – यह मन्त्र मेरी गर्दन की रक्षा करे तथा ‘श्रीं’ – यह मन्त्र मेरे दोनों कन्धों की सदा रक्षा करे । ‘ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा’– यह मन्त्र सदा मेरे वक्ष:स्थल की रक्षा करे ॥ ७७ ॥ ‘ह्रीं विद्याधिस्वरूपायै स्वाहा’ – यह मन्त्र मेरी नाभि की रक्षा करे और ‘ॐ ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र सदा मेरे दोनों हाथों की रक्षा करे ॥ ७८ ॥ ‘ॐ सर्ववर्णात्मिकायै [ स्वाहा ] ‘ – यह मन्त्र मेरे दोनों पैरों की सदा रक्षा करे और ‘ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा’ सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करे ॥ ७९ ॥ ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र – यह मन्त्र सदा मेरे पूर्व दिशा में सदा मेरी रक्षा करे और ‘ॐ सर्वजिह्वा-ग्रवासिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र अग्निकोण में मेरी रक्षा करे ॥ ८० ॥ ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा’ यह मन्त्रराज दक्षिण दिशा में सर्वदा निरन्तर मेरी रक्षा करे ॥ ८१ ॥ ‘ऐं ह्रीं श्रीं’ – यह त्र्यक्षर मन्त्र नैर्ऋत्य-कोण में सदा मेरी रक्षा करे और ‘ॐ ऐं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करे ॥ ८२ ॥ ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा’ – यह मन्त्र वायव्यकोण में सदा मेरी रक्षा करे और ‘ॐ ऐं श्रीं क्लीं गद्यवासिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र सदा उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करे ॥ ८३ ॥ ‘ॐ ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र ईशानकोण में सदा मेरी रक्षा करे और ‘ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा’ – यह मन्त्र ऊपर से सदा मेरी रक्षा करे ॥ ८४ ॥ ‘ॐ ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहा’ – यह मन्त्र नीचे से सदा मेरी रक्षा करे। ‘ॐ ग्रन्थबीजस्वरूपायै स्वाहा’ – यह मन्त्र सब ओर से मेरी रक्षा करे ॥ ८५ ॥ हे विप्र ! मैंने आपको ब्रह्ममन्त्र समूह के विग्रहरूप इस सरस्वतीकवच को बतला दिया । ‘विश्वजय’ नामक यह कवच साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है ॥ ८६ ॥ पूर्व काल में मैंने गन्धमादनपर्वत पर धर्मदेव के मुख से यह कवच सुना था। आपके स्नेह के कारण मैंने आपको इसे बतलाया है। किसी अन्य व्यक्ति को इसे नहीं बताना चाहिये ॥ ८७ ॥ विद्वान् पुरुष को चाहिये कि नानाविध वस्त्र, अलंकार तथा चन्दन से भलीभाँति गुरु की पूजा करके दण्ड की भाँति जमीन पर गिरकर प्रणाम करे और पाँच लाख जप कर लेने से यह कवच सिद्ध हो जाता है । इस कवचको यदि साधक सिद्ध कर ले तो इसके बाद इस कवच को धारण करे ॥ ८८ ॥ वह बृहस्पति के समान हो जाता है । इस कवच के प्रसाद से मनुष्य महान् वक्ता, कवियों का सम्राट् तथा तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला हो जाता है और वह सब कुछ जीत लेने में समर्थ हो जाता है ॥ ८९-९० ॥ हे मुने! मैंने कण्वशाखा के अन्तर्गत वर्णित यह सरस्वती-कवच आपको बतला दिया। अब आप सरस्वती के स्तोत्र, पूजाविधान, ध्यान तथा वन्दन के विषय में सुनिये ॥ ९१ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘सरस्वती- स्तोत्रपूजा-कवचादि का वर्णन’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ Content is available only for registered users. 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