August 1, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-25 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पचीसवाँ अध्याय मरीचि आदि महर्षियों द्वारा भगवान् शंकर का विवाह – स्वीकृति का शुभ समाचार सुनाना, विवाह के लिये वैशाख शुक्लपक्ष की पञ्चमी तिथि निश्चित होना, देवर्षि नारद द्वारा ब्रह्मादि देवताओं को विवाह का निमन्त्रण देना अथः पञ्चविंशोऽध्यायः शिवविवाहे ब्रह्मादिदेवतानिमन्त्रणं श्रीमहादेवजी बोले — गिरिराज का वचन सुनकर वे महर्षि प्रसन्नचित्त हो पुनः भगवान् शंकर के निकट चले गये ॥ १ ॥ आये हुए उन महर्षियों को देखकर घबड़ाये-से वे भगवान् शंकर पूछने लगे कि ऐश्वर्यशाली गिरिराज ने आपलोगों से क्या कहा, वह मुझसे शीघ्र बताइये, विलम्ब मत कीजिये। ब्राह्मणो ! वे अपनी पुत्री मुझे अपनी इच्छा से देंगे अथवा नहीं, इसे बताकर मेरे मन को शान्त और सुस्थिर कीजिये ॥ २-३ ॥ ऋषियों ने कहा — देवेश ! गिरिराज भक्तिभाव से अपनी कन्या आपको प्रदान करेंगे। इसलिये अब आप चिन्ता न करें, शान्तचित्त रहें । गिरिराज ने कहा है कि उत्तम मुहूर्त देखकर जब आपकी ओर से वार्ता उन्हें भेजी जायगी तब विवाह होगा ॥ ४-५ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — पुनः भगवान् शंकर ने उन श्रेष्ठ मुनियों से कहा — शीघ्र दोषरहित शुभ मुहूर्त देखकर सुव्रती महात्मा गिरिराज से शीघ्र ही कहिये ॥ ६३ ॥ उनकी यह बात सुनकर मरीचि आदि तपोधन ऋषियों ने उनके विवाह का शुभ मुहूर्त निश्चित करके महेश्वर से कहा — वैशाख महीने में शुक्लपक्ष को पञ्चमी तिथि को गुरुवार के दिन संतानवृद्धि के लिये आप विवाह करें। सभी दोषों से रहित यह दिन अत्यन्त शुभ है। श्रेष्ठवर ! महात्मा गिरिराज से यह बात बता दीजिये ॥ ७–९१/२ ॥ इसके बाद महादेवजी ने कहा कि आप लोग नगाधिराज के पास जाइये और कहिये कि वे उस शुभ दिन को विधिवत् अपनी पुत्री मुझे प्रदान करें। मैं भी देवताओं के साथ महोत्सवपूर्वक उनके पुर में आऊँगा ॥ १०-१११/२ ॥ भगवान् शंकर की वह बात सुनकर उन महर्षियों ने भी पुनः गिरिराज के पास जाकर शंकरजी के द्वारा कही गयी बात उन्हें बतायी ॥ १२१/२ ॥ गिरिराज ने भी उनकी बात सुनकर प्रसन्न होकर ‘मङ्गल हो’ – ऐसा कहा। तत्पश्चात् यथाविधि उन महर्षियों का पूजन कर उन्हें विदा कर दिया ॥ १३१/२ ॥ वे लोग भी पुन: वहीं गये जहाँ भगवान् चन्द्रशेखर स्थित थे और गिरिराज ने उन लोगों से जो कहा था, वह भगवान् शंकर को बता दिया ॥ १४१/२ ॥ तब भगवान् शंकर ने उनसे कहा कि शुभ मुहूर्त में आप लोग यहाँ आकर मेरे साथ गिरिराजपुर में चलियेगा ॥ १५१/२ ॥ देवर्षि नारद से उन्होंने कहा — तात ! आप स्वयं अबाध गति वाले हैं। आप हमारा एक काम कीजिये, जिसे मैं इस समय आपसे कहता हूँ ॥ १६१/२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रादि सभी देवताओं से अलग-अलग मेरी हर्षदायिनी विवाह की बात कह दीजिये। मुनिश्रेष्ठ ! मेरी यह बात उन लोगों बता दीजिये कि मेरे विवाह के दिन सभी देव, गन्धर्व, किन्नर तथा आपलोग आकर मेरा कल्याण करें ॥ १७–१९ ॥ तब उन नारदजी ने कहा — प्रभो ! जैसी आपकी आज्ञा हो; आपकी आज्ञा के अधीन रहने वाला मैं वैसा ही करूँगा ॥ २० ॥ तब वे मरीचि आदि सभी महर्षिगण भगवान् शंकर को प्रणाम कर अपने-अपने स्थान पर जाने के लिये उनसे प्रार्थनापूर्वक कहने लगे — ॥ २१ ॥ आप आज्ञा दीजिये, इस समय हम लोग अपने स्थान को जायँ। आपके विवाह के दिन सभी देवताओं के साथ हम लोग आयेंगे ॥ २२ ॥ तदनन्तर पत्नी के विरहजन्य दुःख से शोकसंतप्त, अत्यधिक कामपीड़ित तथा आँखों में आँसू लिये भगवान् महादेव ने उन महामुनियों से कहा — ॥ २३ ॥ जबतक मैं अपनी एकमात्र प्राणवल्लभा गिरिराजतनया को पत्नीरूप में प्राप्त नहीं कर लूँगा, तबतक कष्टपूर्वक जीवन धारण करूँगा । काम से जलाया जाता हुआ मैं यह बात प्रतिज्ञापूर्वक निश्चय ही आपके सम्मुख कह रहा हूँ । जब उन प्राणवल्लभा पार्वती को प्राप्त कर लूँगा, तब उन देवी की सभी प्रकार से निरन्तर सेवा करता रहूँगा । कभी भी भूलकर जो उनको प्रिय नहीं है वैसा काम नहीं करूँगा। वे देवी जहाँ जायँगी, मैं भी वहीं जाऊँगा। मैं उन व्रतपरायणा को कभी आधे क्षण के लिये भी नहीं छोडूंगा ॥ २४–२७१/२ ॥ तपोधनो! अब आपलोग अपने-अपने स्थान को जाइये। मैं इसी कानन में उन गिरिराजकुमारी का ध्यान करता हुआ स्थित रहूँगा ॥ २८१/२ ॥ ऐसा कहकर भगवान् शंकर ने उन मुनियों को विदा कर दिया । महामते ! वे लोग भी उनको प्रणाम कर अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥ २९१/२ ॥ तब देवर्षि नारद शीघ्र ही ब्रह्माजी के पास पहुँच गये और उनसे उन्होंने भगवान् शंकर के विवाह से सम्बन्धित सम्पूर्ण बात बता दी । श्रेष्ठ वैकुण्ठलोक में जाकर भगवान् विष्णु से भी उसी प्रकार कहा । यह सुनकर वे दोनों अत्यन्त हर्षित हो गये और मुनिश्रेष्ठ नारदजी से बोले – हम दोनों अपने परिवार तथा गणों के साथ भगवान् शंकर का विवाह देखने अवश्य आयेंगे ॥ ३०–३२१/२ ॥ आप शीघ्र ही स्वर्गलोक में जाकर इन्द्र से कह दीजिये कि वे सभी देवता, सिद्ध, चारण और किन्नरों के साथ उत्तम सहायता करने के लिये भगवान् शंकर के इस विवाह में जायँ । तदनन्तर उन नारदजी ने भगवान् शिव के विवाह-संवाद तथा उसके सम्बन्ध में उन दोनों के द्वारा कही गयी बात इन्द्र को बता दी। उसे सुनकर हर्ष से प्रसन्नचित्त देवराज इन्द्र ने भी यह मान लिया कि अब निश्चितरूप से तारक की मृत्यु हो जायगी । तदनन्तर वे भगवान् शंकर के विवाह में जाने के लिये तैयारी में लग गये तथा नारद भी इन्द्र से पूजित होकर अपने स्थान को चले गये ॥ ३३-३७ ॥ ॥ इस प्रकार महाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में शिव-विवाहमें ‘ब्रह्मादिदेवतानिमन्त्रण’ नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe