August 3, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-33 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ तैंतीसवाँ अध्याय कार्तिकेय जी द्वारा तारकासुर का वध, देवसेना में हर्षोल्लास अथः त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः महादेवनारदसंवादे तारकासुरवधः श्रीमहादेवजी बोले — तदनन्तर युद्धभूमि में भयानक गर्जना करते हुए कार्तिकेय जी ने दैत्यराज तारकासुर पर यमदण्ड के समान भयंकर बाणों से प्रहार किया । तत्पश्चात् क्रोध से उन्मत्त हुए तारकासुर ने अपनी रत्नजटित भयंकर शक्ति लेकर देवसेनापति के ऊपर चलाई । देवताओं के लिये असहनीय उस शक्ति को आती देखकर देवगण भय से मोहित होकर काँपने लगे ॥ १-३ ॥ ब्रह्माजी दिव्य महर्षियों के साथ स्वस्तिवाचन करने लगे । पार्वती पुत्र देवसेनानी कार्तिकेय जी ने हँसते हुए सबके देखते-देखते अपनी शक्ति से उस शक्ति को भस्मसात् कर दिया । तब देवगण अत्यंत प्रसन्न होकर कार्तिकेय जी के ऊपर पुष्पवृष्टि करने लगे । ब्रह्माजी ने बार-बार उनकी प्रशंसा की । सिद्ध, गन्धर्वगण महादेवपुत्र कार्तिकेय के पराक्रम को देखकर अत्यन्त विस्मित हुए । नारदजी ! तब दैत्यराज तारकासुर ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक शीघ्र ही धनुष उठाकर युद्ध में दुर्जय स्कन्द के ऊपर घनघोर शरवृष्टि करके उन्हें ढक दिया तथा उनके वाहन मयूर पर भी प्रहार किया । मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर शिवपुत्र कार्तिकेय जी ने भी बाणों के उस जाल को काट दिया और वे करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा से सुशोभित होने लगे ॥ ४-९ ॥ इसी बीच वृत्रासुर का संहार करने वाले इन्द्र भी दूसरे बड़े-बड़े राक्षसों को मारकर पार्वती पुत्र कार्तिकेय के निकट आये ॥ १० ॥ उस युद्धभूमि में मरकतमणी के विशाल पर्वत के समान अपने चित्र-विचित्र वर्ण वाले मयूर वाहन पर स्थित पार्वती पुत्र कार्तिकेय तथा ऐरावत नाम के गजराज पर स्थित इन्द्र अत्यन्त सुशोभित हुए । मुनिवर नारद ! उन दोनों को युद्धभूमि में सन्नद्ध देखकर भयंकर पराक्रमी तारकासुर ने कुमार कार्तिकेय तथा इन्द्र — दोनों पर बाणों की वर्षा करते हुए प्रहार किया ॥ ११-१२१/२ ॥ उस घोर संग्राम में तारकासुर के उस शरजाल को काटकर महाबली कुमार और इन्द्र सिंहनाद करने लगे तथा उन्होंने अनेक प्रकार के भयंकर शस्त्रों से तारकासुर पर प्रहार किया ॥ १३-१४ ॥ नारदजी ! इन्द्र ने उस दैत्य की ओर वेगपूर्वक अपना वज्र चलाया, किंतु उसके वक्षःस्थल से टकराकर आधे क्षण में ही उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये । तब क्रोध से लाल आँखें किये हुए दैत्यराज ने तलवार उठाकर कार्तिकेय को छोड़कर देवराज इन्द्र की ओर धावा किया । तदनन्तर पार्वतीपुत्र भगवान् कार्तिकेय ने क्रोधित होकर अपने वाहन मयूर को उस ओर मोड़ते हुए तलवार लिये उसके हाथ को क्षणमात्र में काट डाला ॥ १५-१७ ॥ तब दैत्यराज तारकासुर दाएँ हाथ में भयंकर परिघ लेकर अत्यन्त क्रोधपूर्वक देवसेनापति की ओर दौड़ा । ब्रह्माजी की दी हुई अत्यन्त भयंकर उस शक्ति को लेकर रणभूमि में कार्तिकेय जी ने अपनी ओर आते हुए दैत्यराज तारकासुर पर प्रहार किया । उस शक्ति द्वारा बेधे जाने से नीलाचल पर्वत के समान महाबली वह दैत्यराज धरणी को कोलाहलपूर्ण करता हुआ भूमि पर गिर पड़ा ॥ १८-२० ॥ उस भयंकर दैत्य के मारे जाने से देवता, गन्धर्व, किन्नरगणों को महान् हर्ष प्राप्त हुआ, सभी दिशाएँ प्रकाश से भर गई, सूर्य सतेज हो गये और संसार सुव्यवस्थित हो गया ॥ २१-२२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागव महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘तारकासुरवध’ नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe