श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-73
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
गङ्गास्नान की महिमा, गङ्गा के समीप श्राद्ध, जप, दान तथा तर्पण का माहात्म्य और काशी की महिमा
अथः त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे श्रीगङ्गामाहात्म्यकथनं

श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्महत्या करने वाला, गोवध करने वाला, सुरापान करने वाला तथा गुरुपत्नीगामी महापापी भी गङ्गा में स्नान कर लेने पर महादेवी गङ्गा की कृपा से घोर पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ११/२

श्रेष्ठ भक्ति से हीन मनुष्य भी बिना मन्त्र आदि के ही, ज्ञानपूर्वक अथवा अज्ञानपूर्वक मात्र एक बार गङ्गास्नान करके मुक्त हो जाता है ॥ २१/२

मुने! गङ्गातट पर भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक गङ्गाजल में स्नान करने से मनुष्य को सात जन्मों में हो सकने वाला अनन्त तथा अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और उसे विपुल धन तथा परम सुख की प्राप्ति होती है। वह नरश्रेष्ठ सभी पापों से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त हो जाता है ॥ ३–५ ॥ यदि मनुष्य गङ्गा का स्मरण करते हुए अन्यत्र कहीं भी स्नान करता है तो वहाँ भी उसे गङ्गास्नान से होने वाले पुण्य के समान पुण्य प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल गङ्गा के जल में स्नान करता है, उस पुण्यात्मा को साक्षात् दूसरे शिव के समान ही समझना चाहिये। उसके दर्शन से पापीलोग पाप से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ ७१/२

जो मनुष्य तुला, मकर और मेष की संक्रान्तियों में गङ्गाजल में प्रातः काल विधिपूर्वक स्नान करता है, उसके पुण्य के विषय में मुझसे सुनिये । वह मनुष्य उभयकुल (मातृ-पितृकुल) – के करोड़ों पितरों का उद्धार करके अन्त में अपना शरीर त्यागकर शिवत्व को प्राप्त हो जाता है; इसमें संदेह नहीं है ॥ ८-९ ॥ महामुने! हजारों महायज्ञ तथा सैकड़ों व्रत और पूजा आदि गङ्गास्नान की एक कला के भी बराबर नहीं हैं ॥ १० ॥ माघमास के शुक्लपक्ष की सप्तमीतिथि (अचला सप्तमी ) – को अरुणोदयकाल में गङ्गा स्नान करने पर मनुष्य सांसारिक जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाता है। उस दिन गङ्गा के तट पर सूर्य की पूजा करने से रोगी महारोग से मुक्त हो जाता है; यह सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥ पूर्णिमा तिथि को गङ्गा के जल में विधिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥ १३ ॥

कार्तिकमास की पूर्णिमा को गङ्गा का दर्शन करने तथा उनमें स्नान करने से मनुष्य महापातकों के समूह से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १४ ॥ चैत्रमास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को विधि-विधानपूर्वक गङ्गा में स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है। अतुलनीय ऐश्वर्य तथा अन्य जो भी  मुनिश्रेष्ठ ! आरोग्य, मनोवाञ्छित रहता है — वह सब गङ्गा की कृपा से प्राप्त हो जाता है ॥ १५-१६ ॥ महामते ! इसके अतिरिक्त किसी भी दिन गङ्गास्नान करने से मनुष्य सभी पापों से छूट जाता है और परम पद प्राप्त करता है ॥ १७ ॥ जो लोग एकाग्रचित्त होकर गङ्गा में पितरों का तर्पण करते हैं, उनके पितर निर्विकार ब्रह्मलोक पहुँच जाते हैं ॥ १८ ॥

गङ्गाजल उपलब्ध रहने पर उसे छोड़कर अन्य जल से पितरों का तर्पण नहीं करना चाहिये । यदि कोई अज्ञानवश ऐसा करता है तो वह प्रायश्चित्त का भागी होता है ॥ १९ ॥ जो समाहित होकर गङ्गा में पितरों का तर्पण करता है, उसे ही पुत्र कहा जाता है, अन्य को पुत्र नहीं कहा जाता ॥ २० ॥ मनुष्य को अपने पितरों की तृप्ति के लिये गङ्गातीर्थ में जाकर श्राद्ध तथा तर्पण करना चाहिये, अन्यथा वह नरकगामी होता है ॥ २१ ॥ गङ्गा को उद्देश्य करके जाते हुए मनुष्य को देखकर श्राद्धभोग की इच्छा रखने वाले उसके पितर प्रसन्न होकर हँसने तथा नाचने लगते हैं ॥ २२ ॥ मुने! श्राद्ध न करने के कारण पितर निराश होकर लौट जाते हैं । अतः यदि मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता है तो वह नरक में पड़ता है ॥ २३ ॥ गङ्गा के जल में पकाया हुआ अन्न देवताओं को भी दुर्लभ है । उस अन्न से श्राद्ध किये जाने पर पितरों को संतृप्ति होती है ॥ २४ ॥ जिसके पितर सन्तुष्ट रहते हैं, उसका जन्म सार्थक है और जिसके पितर कुपित रहते हैं उसका जीवन निरर्थक है ॥ २५ ॥ पितरों के रुष्ट रहने पर मनुष्यों को धर्म की प्राप्ति नहीं होती है। अतः पितरों को भलीभाँति तृप्त करके ही धार्मिक कृत्य करना चाहिये ॥ २६ ॥

चन्द्र अथवा सूर्यग्रहण के अवसरपर यदि भाग्य से गङ्गा का सांनिध्य प्राप्त होता है तो उस समय गङ्गा में स्नान करके विधि-विधानपूर्वक पितृश्राद्ध करना चाहिये । वह श्रेष्ठ श्राद्ध अक्षय, पितरों को तृप्त करने वाला, सौ गङ्गाश्राद्धों के समान और मोक्षपद प्रदान करनेवाला होता है ॥ २७१/२

उस समय पुरश्चरण करने से मनुष्य मन्त्रों को सिद्ध कर लेता है । वह असाध्य कार्यों को भी सम्पन्न कर लेता है और स्वयं शिव – तुल्य जाता है। पुरश्चरण कर रहे मनुष्य को किसी दूसरे अधिकारी पुरुष से अपने पितरों का श्राद्ध करा लेना चाहिये। किंतु अज्ञानवश उसे अपने पितरों को कभी श्राद्ध से वञ्चित नहीं करना चाहिये ॥ २८- २९१/२

अक्षय कही जाने वाली तथा युगादि तिथियों 1  पर गङ्गा के जल में स्नान करके श्राद्ध तथा दान आदि से पितरों को संतृप्त करने से मनुष्य पुनर्जन्म का भागी नहीं होता ॥ ३०-३१ ॥ उत्तम साधक गङ्गा में पुरश्चरण करके पाप से रहित होकर मन्त्रसिद्ध तथा महाज्ञानी होता है। मुनिश्रेष्ठ ! गङ्गा के सांनिध्य में किये गये दान, ध्यान, जप, होम, पूजन तथा श्राद्ध-तर्पण आदि महान् पुण्यकारक कहे गये हैं ॥ ३२-३३ ॥

भूलकर भी मनुष्य को गङ्गा में मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये । गङ्गा में मल-मूत्र का विसर्जन करने वाला व्यक्ति चौदह इन्द्रों के भोगकाल तक (एक कल्पपर्यन्त) नरक में वास करता है ॥ ३४ ॥ पुण्यात्मा व्यक्ति को चाहिये कि असत्य भाषण तथा लोभ का त्याग करके परनिन्दा और परद्रोह आदि पापों से रहित हो जाय । यदि भूल से ऐसा कर देता है, तब उस पाप की शान्ति के लिये उसे गङ्गास्नान करके तथा भगवती गङ्गा को प्रणाम करके उस क्षेत्र से अन्यत्र हट जाना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥ जो पुरुष जलरूपिणी, पूर्णा, परा प्रकृति तथा साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी भगवती गङ्गा को अज्ञानवश नदी — ऐसा मानता है, वह अनेक नरकों में जाता है। आदिशक्ति ही प्राणियों की रक्षा के लिये द्रवरूप में निकली हुई हैं — ऐसी भावना करनी चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ गङ्गा सभी स्थानों पर तो सुलभ हैं, किंतु हरिद्वार, प्रयाग और गङ्गासागरसङ्गम — इन तीन स्थानों पर दुर्लभ हैं। इन स्थानों पर गङ्गा महान् फल प्रदान करती हैं । अतः महान् बुद्धिवाले मनुष्य को चाहिये कि वहाँ पर विशेष प्रयत्न के साथ स्नान, दान आदि कृत्यों को करे ॥ ३९-४० ॥ जो मनुष्य काशी में आकर भक्तिभाव से सम्पन्न हो विधिपूर्वक उत्तरवाहिनी गङ्गा में स्नान करता है, वह साक्षात् शिवत्व को प्राप्त हो जाता है। वह व्यक्ति देवताओं का भी अत्यन्त पूजनीय कहा गया है और वहाँ पर किया गया पितृतर्पण भी निर्वाण प्रदान करता है ॥ ४१-४२ ॥

विश्वेश्वर सदाशिव की नगरी काशी अत्यन्त दुर्लभ है तथा सभी तीर्थों की आदि – निवासस्थली है । वह पृथ्वीमण्डल के अन्तर्गत रहते हुए भी भूमण्डल से पृथक् है [भगवान् विश्वनाथ के त्रिशूल पर स्थित है]। महामते ! ऐसी दिव्य भूमि तथा भगवती गङ्गा का पावन जल जहाँ है, वहाँ पापी प्राणियों के लिये भी मुक्ति हाथ में ही है ॥ ४३-४४ ॥ जहाँ देहधारियों की माता अन्नपूर्णा स्वयं अन्न प्रदान करती हैं, जहाँ भगवती गङ्गा जल और भगवती सरस्वती ज्ञान प्रदान करती हैं। मुनिश्रेष्ठ ! जहाँ मृत्यु ब्राह्म आदि से श्रेष्ठ परम पद [ मोक्ष] – को प्रदान करती हैं और जहाँ पर जगत्पिता विश्वेश्वर मोक्षमार्ग के उपदेशक के रूप में विराजमान हैं; उस काशी का जो सेवन नहीं करता, वह विधाता के द्वारा ठग लिया गया है। काशी में मणिकर्णिका पर स्नान करने वाला व्यक्ति बिल्वपत्र आदि से भगवान् विश्वेश्वर का पूजन करके शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ४५-४७ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! गङ्गा की मिट्टी से तिलक धारण करके मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वह सब पूर्ण हो जाता है ॥ ४८ ॥ जहाँ- कहीं भी श्रेष्ठ मनुष्य गङ्गा के जल से देवपूजन, श्राद्ध तथा अभिषेक आदि कर्म करता है – वह कर्म चाहे ज्ञान अथवा अज्ञान से हो, विधिहीन हो गया हो, श्राद्ध आदि के लिये अविहित देश अथवा काल में किया गया हो, दम्भभावना से युक्त होकर या द्रव्यरहित रूप में अथवा अन्यायोपार्जित द्रव्यों से या पापयुक्त मन से ही किया गया हो; फिर भी वह निश्चितरूप से सम्पूर्ण फल प्रदान करनेवाला होता है ॥ ४९-५१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीगङ्गामाहात्म्यकथन’ नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥

1. कार्तिक शुक्ल नवमी (सत्ययुग), वैशाख शुक्ल तृतीया (त्रेतायुग), माघमास की अमावास्या (द्वापरयुग) तथा भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी (कलियुग ) – इन चार तिथियों को युगों की आदि तिथि कहा गया है। (विष्णुपुराण ३ । १४ । १२-१३)

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