श्री गरुड़-पुराणोक्त रोग-नाशिनी श्री धन्वन्तरि व्रत-कथा
प्रथम अध्याय

सनकादिक मुनियों ने सूत जी से कहा – हे सूत महा-मुने ! आपने भगवान् धन्वन्तरि की पूजा-विधि का विस्तार-पूर्वक वर्णन किया, किन्तु इसे सुनने पर भी हमें तृप्ति नहीं हुई । अतः श्री धन्वन्तरि का माहात्म्य अधिक विस्तार से बताइए ।
मुनि-श्रेष्ठ सुत जी ने कहा – हे मुनियों ! आप पाप-विनाशिनी कथा को सुनिए । इस कथा को सुनने से सभी रोगों का नाश होता है –om, ॐ
एक समय नारद जी सभी लोगों के कल्याण की इच्छा से समुद्र-द्वीप-पर्वत-सहित सम्पूर्ण पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे । वहाँ उन्होंने सभी लोगों को विविध रोगों से दुःखी देखा । यह देखकर नारद जी चिन्तित हुए और वहाँ से स्वर्ग जा पहुँचे । स्वर्ग में इन्द्र आदि देवता भी रोगी हो रहे थे । यह देखकर नारद जी की चिन्ता और बढ़ गई । चिन्ता करते हुए वे वैकुण्ठ में पहुँचे ।
वैकुण्ठ में नारद जी ने शंख-चक्र-अमृत-कलश-धारी और अभय-हस्त धन्वन्तरि विष्णु को देखा । श्री (लक्ष्मी), भू (पृथ्वी) और नीला देवी उनकी चरण-सेवा कर रही थी । ऐसे महात्मा धन्वन्तरि-रुपी श्री विष्णु को नारद जी ने भक्ति-पूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ।
श्री नारद जी बोले – हे देवों के देव ! जगन्नाथ ! भक्तों पर दया करने वाले ! दीन-बन्धु ! दया-सागर ! जगत् की रक्षा में तत्पर ! आप मुझे शरणागत जानकर सन्तुष्ट कीजिए ।
हे भगवन् ! मैंने पृथ्वी आदि सभी लोकों में पर्यटन किया और वहाँ के निवासी जनों को नाना रोगों से दुःखी पाया । किसी को ज्वर ने गिराया है, तो किसी को राज-यक्ष्मा ने धर दबाया । कोई अतिसार, श्वास, खाँसी, संग्रहणी और पाण्डु-रोगादि से पीड़ित है । कोई वात-रोगों से पीड़ित है । कोई फोड़े, गिल्टी, प्लेग आदि से युक्त सन्निपात रोग और प्रमेहादि रोगों से घेरे गये हैं । इस प्रकार लोग अनेक रोगों से ग्रस्त और दुःखी हैं । उन्हें देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और बारम्बार मैंने चिन्ता की । मैंने सोचा कि ये लोग कैसे नीरोग होंगे और प्रसन्न होंगे ? इसी चिन्ता से मन मैं व्याकुल होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ ।
हे विश्वात्मन् ! शरणागत भूम्यादि लोकों की आप रक्षा कीजिये । त्रैलोक्य में आपके अतिरिक्त इनका कोई रक्षक नहीं है ।
भगवान् श्री विष्णु नारद जी के उक्त वचनों को सुनकर गम्भीर वाणी से बोले – हे मुने ! आप भय न कीजिये । मैं ‘आदि-धन्वन्तरि’ इन्द्र से आयुर्वेद प्राप्त कर पुनः अवतार लेकर सभी लोकों को नीरोग करुँगा । मैं कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, त्रयोदशी, गुरुवार, हस्त नक्षत्र के समय अवतार लेकर ‘आयुर्वेद’ का उद्धार करुँगा । इसमें सन्देह न करो ।
।।श्री धन्वन्तरि-व्रत-कथा का पहला अध्याय।।

दूसरा अध्याय
भगवान् विष्णु के उक्त वचनों को सुनकर नारद मुनि अति प्रसन्न हुए और हर्ष से बोले – हे भगवन् ! आप ‘धन्वन्तरि-पूजा’ की विधि बताइए । ‘धन्वन्तरि-पूजा में कौन-सा ध्यान या विधान किया जाए ? उसका नियम क्या है ? उसका फल क्या है ? किस समय, किसने उस पूजा को किया है ? पूजा में क्या-क्या चीजें चाहिए ? हे देव-देवेश्वर ! लोकों पर अनुग्रह करने की इच्छा से कृपा पूर्वक यह सब मुझे बताइए ।
श्री भगवान् ने कहा – हे मुने ! तुमने लोकोपकार की इच्छा से पूछा है । अतएव तुमसे ‘पाप-नाशिनी, रोग-नाशिनी कथा’ कहता हूँ ।
धनगुप्त राजा के निमित्त कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी गुरुवार हस्त नक्षत्र के समय मैं रात्रि के प्रथम प्रहर में गुप्त धन के समान ‘धन्वन्तरि’ नाम से अवतीर्ण होता हूँ । अतएव वह दिन संसार में ‘धन-त्रयोदशी’ (धन-तेरस) नाम से प्रसिद्ध होगा । यह तिथि सभी कामनाओं को देने वाली है ।
नारद जी ने पूछा – हे भगवन् ! कृपया विस्तार-पूर्वक बताइए कि बड़-बागी ‘धन-गुप्त’ कहाँ हुआ और आपके दर्शन की प्राप्ति के लिए उसने कौन-सा व्रत किया था और हे दया-सागर नारायण ! उसने आपका पूजन क्यों किया था ?
श्री भगवान् ने कहा – पहले अवन्तीपुर (उज्जैन) में ‘धनगुप्त’ नामक राजा धर्म-मार्ग से प्रजा का पालन करने वाला हुआ था । वह सभी लोगों का प्यारा, उदार-चित्त था । उसे क्षय-रोग हो गया । उससे वह दिन-रात पीड़ित होने लगा । पीड़ा की निवृत्ति के लिए उसने जप, होम, नाना प्रकार की औषधियाँ की, परन्तु नीरोग न हुआ । तब वह खिन्न होकर विलाप करने लगा ।
राजा की स्त्री त्रिलोक में प्रसिद्ध, पतिव्रता, सदाचारिणी थी । उसने भी पति के मंगल की आकांक्षा से अनेक नियम, उपवास आदि किए, पर इससे भी राजा नीरोग न हुआ और अन्त में वह स्त्री भी अतीसार रोग से रोगिणी हो गई । हे मुने ! उस राजा से उस पतिव्रता स्त्री के पाँच पुत्र हुए । वे क्रमशः आमवात, प्लीहा, कुष्ठ, खाँसी और श्वास से पीड़ित हुए । उनको भी रोग से छुटकारा न मिला । राजा और रानी अपने पुत्रों को रोगार्त देखकर अत्यन्त दुःखी हुए ।
स्त्री-पुत्रों को रोग के सागर से मुक्त कराने की इच्छा से चिन्तित राजा घोर वन को चला गया । वन में राजा ने महा-मुनि ‘भरद्वाज’ को बैठे देखा । राजा ने उन्हें भक्ति-पूर्वक प्रणाम किया और अपना दुःख बताया । महा-मुनि भरद्वाज से राजा ने रोग-कष्ट-निवारण हेतु उपाय पूछा ।
भरद्वाज मुनि ने कहा – हे राजन् ! तुम्हारा वृत्तान्त मैंने जान लिया । तुम अति शीघ्र महा-विष्णु धन्वन्तरि की शरण में जाओ । मनुष्य उनके दर्शन मात्र से घोर दुस्तर रोगों से मुक्त हो जाता है । राजा ने भरद्वाज मुनि से उक्त बात सुनकर उनसे पूछा – हे महात्मन् ! आप कृपा कर उनकी आराधना-विधि मुझे भली-भाँति बताइए । ऋषि भरद्वाज ने कहा – हे महाभाग राजन् ! उस विधि को मैं कहता हूँ, सावधान चित्त से सुनिए ।
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के शुभ दिन, प्रातः-काल उठकर शौच-मुख-मार्जन आदि से निवृत्त होकर स्नान करे । शुद्ध वस्त्र आदि धारण कर गुरु से प्राप्त उपदेशानुसार भगवान् धन्वन्तरि का ध्यान करे । निम्न मन्त्र पढ़कर व्रत का प्रारम्भ करे –
‘करिष्यामि व्रतं देव ! त्वद् -भक्तस्त्वत्-परायणः । श्रियं देहि जयं देहि, आरोग्यं देहि मे प्रभो !’
अर्थात् हे देव ! मैं आपका भक्त हूँ, आप में चित्त लगाकर आपका व्रत करुँगा । आप मुझे लक्ष्मी दीजिए, विजय दीजिए, आरोग्य दीजिए ।
देव-देव धन्वन्तरि से उक्त प्रार्थना कर, उनकी षोडशोपचार से पूजा करे। पूजा करने के बाद तेरह धागों का सूत्र लेकर तेरह गाँठ वाला ‘दोरक’ बनाए । इस ‘दोरक’ की भक्ति-पूर्वक पूजा करे और निम्न मन्त्र पढ़कर पुरुषों के दाहिने हाथ में तथा स्त्रियों के बाँएँ हाथ में बाँधे –
धन्वन्तरे ! महा-भाग ! जरा-रोग-निवारक !
दोर-रुपेण मां पाहि, स-कुटुम्बं दया-निधे !
आधि-व्याधि-जरा-मृत्यु-भयादस्मादहर्निशम्,
पीड्यमानं देव-देव ! रक्ष मां शरणागतम् ।।

अर्थात् – हे धन्वन्तरे ! हे महा-भाग ! आप जरा (बुढापा) और रोग के मिटाने वाले हैं । इसलिए हे दया-निधे ! आप इस सूत्र-रुप से स-कुटुम्ब मेरी रक्षा कीजिये । मैं दिन-रात आधि (मानसिक-दुःख) और व्याधि (रोग), जरा (बुढापा) तथा मृत्यु के भय से त्रस्त हो रहा हूँ । हे देव-देव ! शरण में आए हुए मेरी अब आप रक्षा करें ।
सूत्र-बन्धन के बाद ‘देव-देव धन्वन्तरि’ को भक्ति-पूर्वक ‘अर्घ्य’ निवेदन करे । अर्घ्य प्रदान करने का मन्त्र इस प्रकार है –
जातो लोक-हितार्थाय, आयुर्वेदाभिवृद्धये ।
जरा -मरण-नाशाय, मानवानां हिताय च ।।
दुष्टानां निधनायाय, जात्त धन्वन्तरे प्रभो !
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं, देव-देव कृपा-कर ।।

अर्थात् हे देव-देव, दया-कारी धन्वन्तरि ! आप लोकापकार के लिए, आयुर्वेद की अभिवृद्धि के निमित्त, मनुष्यों के हित तथा जरा-मरण का नाश करने के लिए अवतरित हुए हैं । मैं आपको अर्घ्य प्रदान करता हूँ । इसे स्वीकार कीजिए ।
अर्घ्य प्रदान करने के बाद ब्राह्मण को बायन-दान करे । बायन-दान के लिए गेहूँ के आटे में दूध, घी डालकर पकाए । पकने पर शक्कर डाले । केसर, कपूर, इलायची, लौंग, जावित्री डालकर इस सिद्ध नैवेद्य को भगवान् को अर्पित करे । आधा प्रसाद वेदज्ञ ब्राह्मण को अर्पित करे और आधा स्त्री-पुत्रादि सहित स्वयं प्रसाद-स्वरुप ग्रहण करे । हे राजन् इस विधि से व्रत करने से साक्षात् धन्वन्तरि स्वयं प्रकट होकर तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करेंगे । इतनी कथा सुनाकर भरद्वाज मुनि ने विश्राम लिया ।
।।श्री धन्वन्तरि-व्रत-कथा का दूसरा अध्याय।।

तीसरा अध्याय
सूत जी बोले – हे मुनि-वरों ! राजा धनगुप्त ने मुनि की आज्ञा पाकर उनके कहे अनुसार तेरह वर्ष पर्यन्त भक्ति-पूर्वक व्रत किया ।
एक दिन व्रत-समाप्ति के अवसर पर साक्षात् धन्वन्तरि प्रकट हुए । राजा ने साष्टांग प्रणाम कर उनकी स्तुति की । भक्ति-पूर्वक की गई स्तुति स्वीकार कर भगवान् धन्वन्तरि ने कहा – हे राजन् ! अब तुम डरो मत, तुम्हारा मंगल होगा । तुम हमसे वर माँगो । राजा ने यह सुनकर उन्हें पुनः साष्टांग प्रणाम किया और उनकी स्तुति की –
धन्वन्तरे नमस्तुभ्यं, नमो ब्रह्माण्ड-नायक !
सुरासुराराधितांघ्रे, नमो वेदैक-गोचर !
आयुर्वेद-स्वरुपाय, नमस्ते जगदात्मने ।।१
प्रपन्नं पाहि देवेश ! जगदानन्द-दायक !
दया-निधे महा-देव ! त्राहि मामपराधिनम् ।
जन्म-मृत्यु-जरा-रोगैः, पीड़ितं स-कुटुम्बिनम् ।।२

अर्थात् हे धन्वन्तरे ! ब्रह्माण्ड-नायक ! आपको नमस्कार ! आयुर्वेद-स्वरुप-जगत् के अन्तर्यामी आपको नमस्कार । हे जगत् के सुखदायी देव-देव ! दया-सागर, महा-देव ! आप मुझ शरणागत अपराधी की रक्षा करें । मैं कुटुम्ब सहित जन्म-मृत्यु जरा आदि रोगों से पीड़ित हूँ ।
भगवान् धन्वन्तरि ने यह स्तुति सुनकर मेघ-गर्जन के समान गम्भीर वाणी से मुस्कुराते हुए कहा – हे महा-राज ! ठीक है, ठीक है, मैं तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हूँ । अब हमसे वर माँग लो ।
राजा बोले – हे देव ! यदि आप प्रसन्न हैं, तो सबसे पहले स्त्री-पुत्रों सहित मुझे आरोग्य दीजिए ।
यह प्रार्थना सुनकर भगवान् ने कहा – राजन् ! तुमने जो प्रार्थना की है, वह पूर्ण होगी । इसके अतिरिक्त भी मैं वर देता हूँ । उसे सावधान होकर सुनो –
तुमने जिस प्रकार यह व्रत किया है । इसी तरह जो व्रत करेंगे, उनको आरोग्य प्रदान कर मैं उन्हें अपनी स्थिर भक्ति दूँगा ।
सूत जी बोले – भगवान् धन्वन्तरि यह कहकर अन्तर्धान हो गए और राजा धनगुप्त अपनी पुरी में लौट गया । राजा नित्य स्त्री-पुत्रों सहित अमृत-पाणि धन्वन्तरि की स्तुति करने लगा । उसने पृथ्वी-लोक में नाना प्रकार के सुख भोगे और अन्त में भगवान् धन्वन्तरि की कृपा से मोक्ष पद प्राप्त किया । इस प्रकार मैंने तुम लोगों को भगवान् धन्वन्तरि की जन्मोत्सव-कथा सुनाई । इसके सुनने से सभी पापों का नाश होता है।
।।श्री धन्वन्तरि-व्रत-कथा का तीसरा अध्याय।।

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