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संत श्री जलाराम बापा

संत श्री जलाराम बापा एक हिन्दु संत थे । वे राम-भक्त थे । वे ‘बापा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं । जलाराम बापा का जन्म सन्‌ 1799 (4 नवम्बर 1799 विक्रम सम्वत 1856, वीरपुर-(खेरडी राज्य) में गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गाँव में हुआ था । ये लोहाणा क्षत्रियकुल में उत्पन्न हुए थे । इनके पिता का नाम था — प्रधान ठाकुर और माता का राजबाई । दम्पती के बड़े पुत्र का नाम बोधाभाई था । माँ राजबाई एक धार्मिक महिला थी, जो साधु-सन्तों की बहुत सेवा करती थी ।

प्रथम पुत्र के जन्म से पाँच वर्ष पश्चात् ठाकुर के गृह में एक महात्मा संत रघुवीर दास जी अतिथि बनकर आये । प्रधान ठाकुर व माँ राजबाई ने उन महात्मा का यथोचित आतिथ्य किया । महात्मा ने प्रसन्न होकर ठाकुर से वरदान माँगने को कहा । ठाकुर ने वरदानरूप में अपने वंश में भी महात्माओं की सेवा करनेवाला एक पुत्र माँगा । महात्मा प्रसन्नचित्त से ‘तथास्तु’ कहकर यात्रार्थ निकल गये।

सत्पुरुषों के वचन अन्यथा नहीं होते । प्रभु की लीला अवर्णनीय है । वि० संवत् १८५६ की कार्तिक शुक्ला सप्तमी, सोमवार को राजबाई के उदर से एक पुत्ररत्न का जन्म हुआ । इनका नाम जलाराम रखा गया । बाल्यकाल से ही जलारामजी तेजस्वी थे । पुत्र के ऊपर माता-पिता का अत्यधिक प्रेम था । भक्त जलारामजी बचपन से ही सदाचार-पालन, सत्पुरुषों की सेवा, सत्संग-सेवन और नाम-जप में रुचि रखते थे ।

थोड़े ही समय बाद जलारामजी के माता-पिता परलोकवासी हो गये । अब जलारामजी के पोषकवर्ग में केवल वालजी भाई नामक एक चाचा ही थे । उनके कोई पुत्र न था, इसलिये उन्होंने जलारामजी को अपने साथ रख लिया । चाचा ने जलारामजी को दूकान का काम सौंप रखा था, अतएव वे भगवच्चिन्तनपरायण होकर दूकान का काम करते हुए ही भगवत्सेवा भी किया करते । ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’-गीता का यह मन्त्र उनके जीवन का आदर्श था । इस कारण बालसूर्य की किरणों के समान जलारामजी का सुयश चारों ओर फैलने लगा ।

16 साल की उम्र में श्री जलाराम का विवाह वीरबाई से हुआ । परन्तु वे वैवाहिक बन्धन से दूर होकर सेवा कार्यो में लगना चाहते थे । जब श्री जलाराम ने तीर्थयात्राओं पर निकलने का निश्चय किया तो पत्नी वीरबाई ने भी बापा के कार्यो में अनुसरण करने का निश्चय दिखाया । 18 साल की उम्र में जलाराम बापा ने फतेहपूर के संत श्री भोजलराम को अपना गुरू स्वीकार किया । गुरू ने ‘गुरूमाला’ और ‘श्री राम’ नाम का मंत्र लेकर उन्हें सेवा कार्य में आगे बढ़ने के लिये कहा, तब जलाराम बापा ने ‘सदाव्रत’ नाम की भोजनशाला बनायी जहाँ 24 घंटे साधु-सन्त तथा जरूरतमंद लोगों को भोजन कराया जाता था । इस जगह से कोई भी बिना भोजन किये नही जा पाता था । वे और वीरबाई माँ दिन-रात मेहनत करते थे ।

बीस वर्ष के होते तक सरलता व भगवतप्रेम की ख्याति चारों तरफ फैल गयी । लोगों ने तरह-तरह से उनके धीरज या धैर्य, प्रेम प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति की परीक्षा ली । जिन पर वे खरे उतरे । इससे लोगों के मन में संत जलाराम बापा के प्रति अगाध सम्मान उत्पन्न हो गया । उनके जीवन में उनके आशीर्वाद से कई चमत्कार लोगों ने देखें । जिनमे से प्रमुख बच्चों की बीमारी ठीक होना व निर्धन का सक्षमता प्राप्त कर लोगों की सेवा करना देखा गया । हिन्दु-मुसलमान सभी बापा से भोजन व आशीर्वाद पाते ।


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एक दिनकी बात है, प्रात:काल का समय था । ब्राह्मण शिवालय में वेद-मन्त्रों से पूजन कर रहे थे । भक्तजन हरिनाम का उच्चारण कर रहे थे, श्रमिक लोग अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे और वैश्यवर्ग अपनी-अपनी दूकानों को झाड़ रहा था । इसी समय साधुओं की एक मण्डली गाँव में आयी । अच्छे-अच्छे व्यापारियों से साधुओं ने सीधे ( भोजन सामग्री) कI याचना की, परंतु प्रात:काल होने के कारण किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया । बोहनी के समय देने का नाम किसको सुहाता ?
साधु लोग निराश होकर जाने लगे, तभी किसी ने उनसे कहा — ‘महाराज !’ इस बाजार में जलाराम की दूकान पर जाइये । वह भक्तों की सेवा किया करता है । यहाँ और कोई आपकी नहीं सुनेगा । अन्ततोगत्वा साधु-मण्डली जलारामजी के यहाँ पहुँची । मण्डली के मुखिया ने पूछा — ‘जला भगत की दूकान यही है?’

‘आपके दास की यही दुकान है, महाराज ! क्या आज्ञा है ?’ जलारामजी ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया ।

‘जलाराम ! यदि तेरी इच्छा हो तो सब संतों के लिये सीधा दे दे । हमलोग वृन्दावन से आ रहे हैं और गिरनार की यात्रा करने जा रहे हैं । यहाँ से भोजन करके
चलने का विचार है ।’ संत ने कहा ।

साधु-महात्माओं को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना तो जलारामजी का नित्य का नियम ही था । इसे देखकर बगल का एक बनिया इनको बड़ी क्रूर दृष्टि से देखता था और मन-ही-मन कुढ़कर कहा करता — ‘यह जलिया वालजी भाई की दूकान का सत्यानाश कर डालेगा ।’ आज तो साधुओं की इस जमात को देखते ही वह और भी जल-भुन गया । जलारामजी ने अपने सहज स्वभाव के अनुसार साधुओं के लिये आटा, दाल, चावल आदि सामान तौल दिया ।

साधुओं के पास घी का कोई पात्र नहीं था, इसलिये जलारामजी ने अपने ही लोटे में पाँच सेर घी भर दिया और वह घी तथा गुड़ स्वयं उठाकर साधुओं के ठहरने की जगह पर पहुँचाने के लिये चल पड़े । बगल का बनिया यह सब देख रहा था । जलारामजी को जाते देख वह तुरंत वालजी भाई के पास पहुँचा और उन्हें सारा हाल सुनाते हुए उसने कहा — ‘चाचाजी ! जल्दी चलो और देखो, जलिया सारी दूकान साधुओं को लुटाये देता है ।’

वालजी चाचा शीघ्र ही दूकान की ओर चल पड़े । मार्ग में ही उनकी भेंट जलारामजी से हो गयी । चाचा का स्वभाव जलारामजीसे छिपा नहीं था; अतएव उन्हें देखते ही जलारामजी सूख-से गये । उन्होंने मन में सोचा — ‘आज चाचाजी अवश्य दण्ड देंगे । खैर, जैसी श्रीराम की इच्छा ।’ वालजी चाचा के नेत्रों से क्रोध के मारे मानो अंगारे झर रहे थे । उन्होंने कड़ककर पूछा — ‘जलिया ! इस धोती में क्या जलाया है ?’

सत्यवादी जलारामजी के मुख से मानो किसी ने बरबस कहला दिया — ‘काठ के टुकडों के अतिरिक्त और क्या जलाया जाता है, चाचाजी ?’
‘और इस लोटे में ?’
‘इसमें जल है ।’
चाचाजी ने गुड़ की गठरी खोलकर देखा तो उसमें सचमुच काठ के टुकड़े ही थे और लोटा जल से भरा था । इस दृश्य को देखकर उस बनिये तथा अन्य उपस्थित व्यक्तियों को बड़ा विस्मय हुआ । चाचाजी का क्रोध सर्वथा शान्त हो गया । अब उन्होंने नम्र आवाज में पूछा — ‘कहाँ जा रहा है ?’
‘चाचाजी ! इस गाँव के बाहर ठहरी हुई साधु-मण्डली के लिये यह सामान पहुँचाने जा रहा हूँ ।’
‘अच्छा’ कहकर चाचाजी दूकान पर चले गये और जलारामजी साधुओं के पास पहुँचे । कहना न होगा, साधुओं के पास जाने पर घी और गुड़ अपने मूल स्वरूप में बदल गये थे । भगवान् क्या नहीं कर सकते ? जलाराम की वाणी भी झूठी नहीं हुई और चाचा का सन्देह भी दूर हो गया ।

इस घटना से भक्तजी के हृदय में कितना आनन्द हुआ होगा, इसका अनुमान स्वयं पाठक लगा सकते हैं । सच है, भक्तवत्सल भगवान् को अपने भक्त के लिये सब प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ती है । जलारामजी उस दिन से और भी उत्साह के साथ साधु-सेवा करने लगे ।
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‘जलाराम किसका नाम है ?’ आगन्तुक एक साधु ने दूकानदारों से प्रश्न किया ।
‘बगल की ही दूकान जलाराम की है ।’ उसी द्वेषी बनिये ने उत्तर दिया ।
साधु जलाराम की दूकान पर आये । भक्तजी ने उन्हें देखते ही नम्रतापूर्वक प्रणाम किया और पूछा — ‘क्या आज्ञा हैं, महाराज !’
भक्तराज ! वस्त्र के बिना दुःख पा रहा हूँ । एक टुकड़ा वस्त्र साफी के लिये दे दें ।’ साधु ने कहा ।
जलारामजी ने प्रसन्न होकर खादी के थान में से पाँच हाथ का एक टुकड़ा फाड़कर दे दिया । साधु बाबा प्रसन्न होकर बाजार में ‘भक्त और भगवान् की जय’ बोलते हुए चले गये ।
दुर्जन स्वयं दुःख उठाकर भी सत्पुरुष को बाधा पहुँचाने में कोई कोर-कसर नहीं रखते । वे सदा इसी चेष्टा में रहते हैं कि कब कोई अवसर हाथ लगे और अपना काम बनाया जाय । आज उस द्वेषी बनिये को फिर मौका मिला । उसने विचार किया — ‘अब देखें जलिया कौन-सा उपाय करता है ? खादी का थान बीस हाथ था । वालजी चाचा को प्रत्यक्ष दिखाऊँगा कि इसी तरह यह सब कुछ उड़ा देता है ।’
दूसरे दिन वालजी चाचा दूकान पर आये । जलारामजी अभीतक साधु-सेवा से निवृत्त नहीं हुए थे । वह बनिया भी आज और दिनों से पहले ही दुकानपर आ डटा था । आज उसे अपनी सफलता की पूरी आशा थी । उसने वालजी चाचा को अकेले दूकान पर देखकर कहा — ‘चाचाजी ! आप कभी मेरा कहना नहीं सुनते । आज जरा खादी का थान तो देख लो । ऐसे ही आपका सब कुछ मुफ्त में चला जाता है ।’
तब तक जलारामजी भी आ गये । चाचा वस्त्र नापने लगे । यह क्या ?’ आश्चर्य के साथ चाचा ने कहा — ‘यह थान तो बीस ही हाथ का था, अब पचीस हाथ कैसे हो गया ?” उन्होंने फिर नापा, किंतु वही पचीस-का-पचीस हाथ निकला । उस बनिये ने फिर भी दबती जबान से कहा — ‘चाचाजी ! चार-पाँच हाथ“साधु को ……. ।’
‘तू चुप रह, तू मेरे जलिया से द्वेष रखता है । चल यहाँ से ।’ बीच में ही चाचाजी बोल उठे । बनिया चुपचाप चला गया । उसने भक्ति का प्रभाव जाना और उस दिन से उसने जलारामजी को न सताने की प्रतिज्ञा कर ली ।

मनुष्य स्वयं कितना ही गुणवान्, बुद्धिमान् और सावधान क्यों न हो, यदि उसकी धर्मपत्नी सद्गुणवती नहीं है तो उसका यश संसार में उतना नहीं बढ़ सकता । जिस तरह गाड़ी में दोनों पहियों को समान और दृढ़ होने की आवश्यकता है, उसी तरह गृहस्थी चलाने के लिये स्त्री-पुरुष-दोनों को योग्य होने की आवश्यकता है । ईश्वर-कृपा से जलारामजी की पत्नी भी उन्हीं की भाँति धार्मिक बुद्धिवाली थीं । उनका नाम था — वीरबाई । वीरबाई स्वभाव से सुशील और पतिव्रता थीं । जिस तरह भक्तजी श्रीराम-भजन में मस्त थे, उसी तरह वीरबाई भी भजन और पतिसेवा में लीन रहती थीं ।
कुछ दिनों से भक्तजी के मन में यह चिन्ता हो रही थी कि मेरा बर्ताव चाचाजी को अच्छा नहीं लगता, ऐसी दशा में मैं क्या करूँ ? क्या अलग हो जाऊँ ? किंतु मेरा निर्वाह कैसे होगा ? इसी बीच एक दिन गीता का पाठ करते समय उनकी दृष्टि नौवें अध्याय के बाईसवें श्लोक पर पड़ी —
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

भक्तजी जाग उठे । सोचने लगे — ‘हरि! हरि !! यह क्या ? स्वयं भगवान् ही आज्ञा दे रहे हैं तो फिर मैं क्यों भ्रम में पड़ा हूँ ? क्या प्रभु मेरे आधार नहीं ?’ वे रोमांचित हो गये । उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे । दूसरे ही दिन जलारामजी वालजी चाचा से अलग हो गये और निश्चिन्त होकर अन्नदान, साधुसेवा एवं सत्संग करने लगे ।
जलारामजी ने अपने यहाँ एक अन्नसत्र-सदाव्रत खोल दिया, जहाँ अनेकों भूखे नर-नारियों को भोजन मिलने लगा । उसी समय में संवत् १९३४ का भयंकर अकाल पड़ा था । ऐसे कठिन काल में भी श्रीहरि-कृपा से वह अन्नसत्र यथावत् चलता ही रहा ।
एक बार गुणातीत स्वामी जूनागढ़ जाते समय रास्ते में वीरपुर में ही रुक गये जहाँ जलाराम बापा ने उनकी सेवा की। जलाराम बापा की इस सेवा से गुणातीत स्वामी काफी खुश हुए और उन्होंने जलाराम को आशीर्वाद दिया की भारत में उनके नाम को सदैव याद रखा जाएंगा और भविष्य में वीरपुर ग्राम एक तीर्थस्थल के रूप में पहचाना जाएंगा। जल्द ही उनकी प्रसिद्धि दिव्य ज्योति के रूप में देश भर में फ़ैल गयी। इसके बाद जो भी वीरपुर आता, उसे बिना किसी भेदभाव के जलाराम द्वारा संचित (खाना खिलाना) किया जाता। वह परंपरा आज भी वीरपुर में बरकरार है।
एक बाद हरजी नाम का दर्जी जब गंभीर पेट के दर्द से जूझ रहा था, तो वह स्वयं जलाराम के पास आया और ठीक हो गया। जलाराम बापा ने जैसे ही भगवान से प्रार्थना की वैसे ही हरजी ठीक हो गया। ऐसा होते ही वह जलाराम के पैरो पर गिर पड़ा और उसने जलाराम को बापा के नाम से पुकारा। तभी से उन्हें जलाराम बापा के नाम से जाना जाता है। तभी से उनकी प्रसिद्धि आग की तरह देशभर में फैलने लगी और लोग अपनी मुश्किलों का हल ढूंडने और परेशानियों को दूर करने के लिए भी उनके पास आते थे। जलाराम बाप हमेशा भगवान राम को प्रार्थना करते और चमत्कार हो जाता था। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्म के लोग उनके शिष्य बन चुके थे।
सन 1822 में समृद्ध मुस्लिम व्यापारी का बेटा जमाल बीमार हो गया और डॉक्टर्स ने भी उसका ईलाज करने से मना कर दिया था। उसी समय, हरजी ने जमाल को उनके अनुभव के बारे में बताया। जमाल ने अपने घर से ही प्रार्थना की के यदि उसका बेटा ठीक हो जाता है तो वह 40 गेहू की बोरियां जलाराम बापा को सदाव्रत के लिए देंगा। भगवान ने भी उसकी प्रार्थना सुन ली और उसका बेटा ठीक हो गया और फिर जमाल भी गेहू की बोरियां लेकर जलाराम बापा के दर्शन के लिए गया।
वि०संवत् १९३७ माघ कृष्ण दशमी २३ फरवरी १८८१ के दिन भक्तराज जलारामजी ने साकेत-निवास किया । आज भी जनता को ज्ञान देनेके लिये उनको कीर्तिमयी देह वर्तमान है और आगे भी रहेगी ।

 

 

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