December 7, 2025 | aspundir | Leave a comment ऋणहर्ता गणेश – मन्त्र का विधान कैलासपर्वते रम्ये शम्भुं चन्द्रार्धशेखरम् । षडाम्नायसमायुक्तं पप्रच्छ नगकन्यका ॥ रमणीय कैलास पर्वत पर छः आम्नायों से युक्त चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिव बैठे थे, उस समय गिरिराजनन्दिनी पार्वतीजी ने उनसे पूछा — पार्वत्युवाच देवेश परमेशान सर्वशास्त्रार्थपारग । उपायमृणनाशस्य कृपया वद साम्प्रतम् ॥ पार्वती बोलीं — सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ-ज्ञान में पारंगत देवेश्वर परमेश्वर ! इस समय कृपापूर्वक मुझे ऋण-नाश का उपाय बताइये । शिव उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया भद्रे लोकानां हितकाम्यया । तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय ॥ शिवजी ने कहा — कल्याणि ! तुमने लोकहित की कामना से यह बहुत उत्तम बात पूछी है; मैं इस विषय में सब कुछ बताऊँगा; तुम सावधान होकर सुनो- । विनियोग — ॐ अस्य श्रीऋणहरणकर्तृगणपतिस्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीऋणहरण- कर्तृगणपतिर्देवता, ग्लौं बीजम्, गः शक्तिः, गों कीलकम्, मम सकलर्णनाशने जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास — ॐ सदाशिवर्षये नमः, शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः, मुखे। श्रीऋणहर्तृगणेशदेवतायै नमः हृदि । ग्लौं बीजाय नमः, गुह्ये (मूलाधारे) । गः शक्तये नमः, पादयोः। गों कीलकाय नमः, सर्वाङ्गे । करन्यास ‘ॐ गणेश’ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ‘ ऋणं छिन्धि’ तर्जनीभ्यां नमः। ‘वरेण्यम्’ मध्यमाभ्यां नमः । ‘हुम्’ अनामिकाभ्यां नमः। ‘नमः’ कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ‘फट्’ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।’ हृदयादिन्यास — ‘ॐ गणेश’ हृदयाय नमः । ‘ऋणं छिन्धि’ शिरसे स्वाहा । ‘वरेण्यम्’ शिखायै वषट्। ‘हुम्’ कवचाय हुम्। ‘नमः’ नेत्रत्रयाय वौषट् । ‘फट्’ अस्त्राय फट् । ध्यान — सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम् । ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम् ॥ ‘सच्चिदानन्दमय भगवान् गणेश की अंगकान्ति सिन्दूर के समान है। उनके दो भुजाएँ हैं। वे लम्बोदर हैं और कमलदल पर विराजमान हैं । ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवामें लगे हैं तथा वे सिद्धसमुदाय से युक्त हैं। ऐसे श्रीगणपतिदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।’ इस प्रकार ध्यान करनेके पश्चात् निम्नांकित स्तोत्र का पाठ करे- सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजितः फलसिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ हिरण्यकश्यपादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ तारकस्य वधात् पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ भास्करेण गणेशस्तु पूजितश्छविसिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ शशिना कान्तिसिद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ पालनाय च तपसा विश्वामित्रेण पूजितः । सदैव पार्वतीपुत्र ऋणनाशं करोतु मे ॥ इदं त्वृणहरं स्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनम् । एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः ॥ दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेरसमतां व्रजेत् । फडन्तोऽयं महामन्त्रः सार्धपञ्चदशाक्षरः ॥ “सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टिरूप फल की सिद्धि के लिये जिनका सम्यक् पूजन किया था, वे पार्वतीपुत्र सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। त्रिपुरवध के पूर्व भगवान् शिव ने जिनकी सम्यक् आराधना की थी, वे पार्वतीनन्दन गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। भगवान् विष्णु ने ‘हिरण्यकश्यप’ आदि दैत्यों के वध के लिये जिनकी पूजा की थी, वे पार्वतीकुमार गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। महिषासुर के वध के लिये देवी दुर्गा ने जिन गणनाथ की उत्कृष्ट पूजा की थी, वे पार्वतीनन्दन गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। कुमार कार्तिकेय ने तारकासुर के वध से पूर्व जिनका भलीभाँति पूजन किया था, वे पार्वतीपुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। भगवान् सूर्यदेव ने अपनी प्रभा की रक्षा के लिये जिनकी आराधना की थी, वे पार्वतीनन्दन गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें । चन्द्रमा ने अपनी कान्ति की सिद्धि के लिये जिन गणनायक का पूजन किया था, वे पार्वतीपुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। विश्वामित्र ने अपनी रक्षा के लिये तपस्या द्वारा जिनकी पूजा की थी, वे पार्वतीपुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें। “यह ऋणहरस्तोत्र दारुण दरिद्रता का नाश करनेवाला है। इसका एक वर्ष तक प्रतिदिन एक बार एकाग्रचित्त होकर पाठ करे। जो ऐसा करेगा, वह दुस्सह दरिद्रता को त्यागकर धन की दृष्टि से कुबेर की समता प्राप्त करेगा । यह ऋणहर्ता महामन्त्र ‘ॐ’ से लेकर ‘फट्’ तक साढ़े पन्द्रह अक्षरों का है। ” इस मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है – ॐ गणेश ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट् । ‘ स्तोत्रपाठ के अन्त में इस मन्त्र का एक बार जप करने से अन्तःकरण पवित्र होता है। इक्कीस संख्या में इसका पुरश्चरण बताया गया है । छः महीने तक प्रतिदिन एक सहस्र जप करने से साधक गणेश का प्रिय हो जाता है। वह ज्ञान में बृहस्पति और धन में धनपति ( कुबेर)- के समान हो सकता है। इसका एक पुरश्चरण दस हजार जप का बताया गया है। एक लाख जप करने से भलीभाँति मनोवांछित फल की प्राप्ति हो सकती है। इसके स्मरणमात्र से भूत, प्रेत और पिशाचों का भी नाश हो जाता है। श्रीकृष्णयामलतन्त्र के अन्तर्गत उमामहेश्वर-संवाद के रूप में ‘ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र’ का ऐसा विधान कहा गया है। Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe