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ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – २०
फल-द्वितीया (अशून्यशयन-व्रत) का व्रत-विधान और द्वितीया-कल्प की समाप्ति

राजा शतानीक ने कहा – मुने ! कृपाकर आप फल-द्वितीया का विधान कहें, जिसके करने से स्त्री विधवा नहीं होती और पति-पत्नी का परस्पर वियोग भी नहीं होता ।

सुमन्तु मुनि ने कहा – राजन ! मैं फल-द्वितीया का विधान कहता हूँ, इसीका नाम अशून्यशयना-द्वितीया भी हैं । इस व्रत को विधिपूर्वक करने से स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री-पुरुष का परस्पर वियोग भी नहीं होता । क्षीरसागर में लक्ष्मी के साथ भगवान् विष्णु के शयन करने के समय यह व्रत होता है । श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया के दिन लक्ष्मी के साथ श्रीवत्सधारी भगवान् श्रीविष्णु का पूजन कर हाथ जोडकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये –
om, ॐ

“श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीवत्स श्रीपतेऽव्यय ।
गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं में यातु धर्मार्थकामदम् ॥
गावश्च मा प्रणश्यन्तु मा प्रणश्यन्तु में जनाः ॥
जामयो मा प्रणश्यन्तु मत्तो दाम्पत्यभेदतः ।
लक्ष्म्या वियुज्येऽहं देव न कदाचिद्यथा भवान् ॥
तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम् ।
लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा ॥
शय्या ममाप्यशुन्यास्तु तथा तू मधुसुदन ।” (ब्रह्मपर्व- २० । ७-११)

अर्थात् हे श्रीवत्स – चिह्न को धारण करने वामे लक्ष्मी के स्वामी शाश्वत भगवान् विष्णु ! धर्म, अर्थ और काम को पूर्ण करने करने वाला मेरा गृहस्थ आश्रम कभी नष्ट न हो । मेरी गौएँ भी नष्ट न हों न कभी मेरे परिवार के लोग कष्ट में पड़ें एवं न नष्ट हों । मेरे घर की स्त्रियाँ भी कभी विपत्तियों में न पड़ें और हम पति-पत्नी में भी कभी मतभेद न हो । हे देव ! मैं लक्ष्मी से कभी वियुक्त न होऊँ और पत्नी से भी कभी मुझे वियोग की प्राप्ति न हो । प्रभो ! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मी से शून्य नहीं होती, उसी प्रकार मेरी शय्या भी कभी शोभारहित एवं लक्ष्मी तथा पत्नी से शून्य न हो ।
इस प्रकार विष्णु की प्रार्थना करके व्रत करना चाहिये । जो फल भगवान् को प्रिय हैं, उन्हें भगवान की शय्या पर समर्पित करना चाहिये और स्वयं भी रात्रि के समय उन्हीं फलों को खाकर दुसरे दिन ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिये ।

राजा शतानीक ने पूछा – महामुने ! भगवान विष्णु को कौन-से फल प्रिय हैं, आप उन्हें बतायें । दुसरे दिन ब्राह्मणों को क्या दान देना चाहिये ? उसे भी कहें ।

सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! उस ऋतु में जो भी फल हों और पके हों, उन्हींको भगवान् विष्णु के लिये समर्पित करना चाहिये । कड़ुवे-कच्चे तथा खट्टे फल उनकी सेवामें नही चढाने चाहिये । भगवान विष्णु को खजूर, नारिकेल, मातुलुङ्ग अर्थात् बिजौरा आदि मधुर फलों को समर्पित करना चाहिये । भगवान् मधुर फलों से प्रसन्न होते हैं । दुसरे दिन ब्राह्मणों को भी इसी प्रकार के मधुर फल, वस्त्र, अन्न तथा सुवर्ण का दान देना चाहिये ।

इस प्रकार जो पुरुष चार मास तक व्रत करता है, उसका तीन जन्मों तक गार्हस्थ्य जीवन नष्ट नही होता और न तो ऐश्वर्य की कमी होती है । जो स्त्री इस व्रत को करती है वह तीन जन्मों तक न विधवा होती है न दुर्भगा और न पति से पृथक् ही रहती है ।

इस व्रत के दिन अश्विनीकुमारों की भी पूजा करनी चाहिये । राजन् ! इसप्रकार मैंने द्वितीया-कल्प का वर्णन किया है ।्
(अध्याय २०)

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

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