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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३६ से ३८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ३६ से ३८
सर्पों की भिन्न-भिन्न जातियाँ, सर्पों के काटने के लक्षण, पञ्चमी तिथि का नागों से सम्बन्ध और पञ्चमी-तिथि में नागों के पूजन का फल एवं विधान

गौतम मुनि ने कश्यपजी से पूछा – महात्मन् ! सर्प, सर्पिणी, बालसर्प, सूतिका, नपुंसक और व्यन्तर नामक सर्पों के काटने में क्या भेद होता है, इनके लक्षण आप अलग-अलग बतायें ।

कश्यपजी बोले – मैं इन सबको तथा सर्पों के रूप-लक्षणों को संक्षेप में बतलाता हूँ, सुनिये –

यदि सर्प काटे तो दृष्टि ऊपर को हो जाती हैं, सर्पिणी के काटने से दृष्टि नीचे, बालसर्प के कटने से दाहिनी ओर और बालसर्पिणी के काटने से दृष्टि बायीं ओर झुक जाती हैं । गर्भिणी काटने से पसीना आता है, प्रसूती काटे तो रोमाञ्च और कम्पन होता है तथा नपुंसक के काटने से शरीर टूटने लगता है । सर्प दिन में, सर्पिणी रात्रि में और नपुंसक संध्या के समय अधिक विषयुक्त होता है । यदि अँधेरे में, जलमें, वनमें सर्प काटे या सोते हुए या प्रमत्त को काटे, सर्प न दिखायी पड़े अथवा दिखायी पड़़े, उसकी जाति न पहचानी जाय और पूर्वोक्त लक्षणों की जानकारी न हो तो वैद्य उसकी कैसे चिकित्सा कर सकता हैं ।
om, ॐ
सर्प चार प्रकार के होते हैं – दर्वीकर, मण्डली, राजिल और व्यन्तर । इनमे दर्वीकर का विष वात-स्वभाव, मण्डली का पित्त-स्वभाव, राजिल का कफ-स्वभाव और व्यन्तर सर्प का संनिपात – स्वभाव का होता है अर्थात् उसमें वात, पित्त और कफ – इन तीनों की अधिकता होती है । इन सर्पों के रक्त की परीक्षा इसप्रकार करनी चाहिये । दर्वीकर सर्प में रक्त कृष्णवर्ण और स्वल्प होता है, मण्डली में बहुत गाढ़ा और लाल रंग का रक्त निकलता हैं, राजिल तथा व्यन्तर में स्निग्ध और थोडा-सा रुधिर निकलता हैं । इन चार जातियों के अतिरिक्त सर्पों की अन्य कोई पाँचवी जाति नहीं मिलती । सर्प ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र – इन चार वर्णों के होते हैं । ब्राह्मण सर्प काटे तो शरीर में दाह होता हैं, प्रबल मूर्च्छा आ जाती है, मुख काला पड़ जाता है, मज्जा स्तम्भित हो जाती है और चेतना जाती रहती है । ऐसे लक्षणों के दिखायी देने पर अश्वगन्धा, अपामार्ग, सिंदुवार को घी में पीसकर नस्य दे और पिलाये तो विष की निवृत्ति हो जाती है । क्षत्रिय वर्ण के सर्प के काटनेपर शरीर में मूर्च्छा छा जाती हैं, दृष्टि ऊपर को हो जाती है, अत्यधिक पीड़ा होने लगती है और व्यक्ति अपने को पहचान नहीं पाता । ऐसे लक्षणों के होनेपर आक की जड़, अपामार्ग, इन्द्रायण और प्रियंगु को घी में पीसकर मिला ले तथा इसीका नस्य देने से एवं पिलाने से बाधा मिट जाती है । वैश्य सर्प डँसे तो कफ बहुत आता है, मुखसे लार बहती है, मूर्च्छा आ जाती है और वह चेतनाशून्य हो जाता है । ऐसा होनेपर अश्वगन्धा, गृहधूम, गुग्गुल, शिरीष, अर्क, पलाश और श्वेत गिरिकर्णिका (अपराजिता) – इन सबको गोमूत्र में पीसकर नस्य देने तथा पिलाने से वैश्य सर्प की बाधा तत्क्षण दूर हो जाती है । जिस ब्यक्ति को शुद्र सर्प काटता हैं, उसे शीत लगकर ज्वर होता है, सभी अङ्ग चुलचुलाने लगते हैं, इसकी निवृत्ति के लिये कमल, कमल का केसर, लोध्र, क्षौद्र, शहद, मधुसार और श्वेतगिरिकर्णी – इन सबको समान भाग में लेकर शीतल जल के साथ पीसकर नस्य आदि दे और पान कराये । इससे विष का वेग शांत हो जाता है ।

ब्राह्मण सर्प मध्याह्न के पहले, क्षत्रिय सर्प मध्याह्न में, विचरण सर्प मध्याह्न के बाद और शुद्र सर्प संध्या के समय विचरण करता है । ब्राह्मण सर्प वायु एवं पुष्प, क्षत्रिय मूषक, वैश्य मेढक और शुद्र सर्प सभी पदार्थों का भक्षण करता हैं । ब्राह्मण सर्प आगे, क्षत्रिय दाहिने, वैश्य बायें और शुद्र सर्प पीछे से काटता हैं । मैथुन की इच्छा से पीड़ित सर्प विष के वेग के बढ़ने से व्याकुल होकर बिना समय भी काटता है । ब्राह्मण सर्प में पुष्प के समान गन्ध होती है, क्षत्रिय में चंदन के समान, वैश्य में घृत के समान और शुद्र सर्प में मत्स्य के समान गन्ध होती है । ब्राह्मण सर्प नदी, कूप, तालाब, झरने, बाग़-बगीचे और पवित्र स्थानों में रहते हैं । क्षत्रिय सर्प ग्राम, नगर आदि के द्वार, तालाब, चतुष्पथ तथा तोरण आदि स्थानों में; वैश्य सर्प श्मशान, ऊषर स्थान, भस्म, घास आदि के ढेर तथा वृक्षोंमें; इसीप्रकार शुद्र सर्प अपवित्र स्थान, निर्जन वन, शून्य घर, श्मशान आदि बुरे स्थानों में निवास करते हैं । ब्राह्मण सर्प श्वेत एवं कपिल वर्ण, अग्नि के समान तेजस्वी, मनस्वी और सात्त्विक होते हैं । क्षत्रिय सर्प मूँगे के समान रक्तवर्ण अथवा सुवर्ण के तुल्य पीत वर्ण तथा सूर्य के समान तेजस्वी, वैश्य सर्प अलसी अथवा बाण-पुष्प के समान वर्णवाले एवं अनेक रेखाओं से युक्त तथा शुद्र सर्प अञ्जन अथवा काक के समान कृष्णवर्ण और धुम्रवर्ण के होते हैं । एक अङ्गुष्ठ के अन्तर में दो दंश हो तो बालसर्प का काटा हुआ जानना चाहिये । दो अङ्गुल अन्तर हो तो तरुण सर्प का, ढाई अङ्गुल अन्तर हो तो वृद्ध सर्प का दंश समझना चाहिये ।

अनन्तनाग सामने, वासुकि बायीं ओर, तक्षक दाहिनी ओर देखता है एवं कर्कोटक की दृष्टि पीछे की ओर होती है । अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल और कुलिक – ये आठ नाग क्रमशः पूर्वादि आठ दिशाओं के स्वामी हैं । पद्म, उत्पल, स्वस्तिक, त्रिशूल, महापद्म, शूल, क्षत्र और अर्धचन्द्र – ये क्रमशः आठ नागों के आयुध हैं । अनन्त और कुलिक – ये दोनों ब्राह्मण नाग-जातियाँ हैं, शंख और वासुकि क्षत्रिय, महापद्म और तक्षक वैश्य तथा पद्म और कर्कोटक शुद्र नाग है । अनन्त और कुलिक नाग शुक्लवर्ण तथा ब्रह्माजी से उत्पन्न हैं, वासुकि और शंखपाल रक्तवर्ण तथा अग्निसे उत्पन्न हैं, तक्षक और महापद्म स्वल्प पीतवर्ण तथा इंद्रसे उत्पन्न हैं, पद्म और कर्कोटक कृष्णवर्ण तथा यमराज से उत्पन्न हैं ।

सुमन्तु मुनि ने पुनः कहा – राजन् ! सर्पों के ये लक्षण और चिकित्सा महर्षि कश्यप ने महामुनि गौतम को उपदेश के प्रसंग कहे थे और यह भी बताया कि सदा भक्तिपूर्वक नागों की पूजा करे और पञ्चमी को विशेषरूप से दूध, खीर आदि से उनका पूजन करे । श्रावण शुक्ल पञ्चमी को द्वार के दोनों ओर गोबर के द्वारा नाग बनाये । दही, दूध, दूर्वा, पुष्प, कुश, गन्ध, अक्षत और अनेक प्रकार के नैवेद्यों से नागों का पूजनकर ब्राह्मणों को भोजन कराये । ऐसा करनेपर उस पुरुष के कुल में कभी सर्पों का भय नहीं होता ।

भाद्रपद की पञ्चमी को अनेक रंगों के नागों को चित्रितकर घी, खीर, दूध, पुष्प आदि से पूजनकर गुग्गुल की धुप दे । ऐसा करने से तक्षक आदि नाग प्रसन्न होते हैं और उस पुरुष की सात पीढ़ी तक साँप का भय नहीं रहता ।

आश्विन मास की पञ्चमी को कुश का नाग बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उनका पूजन करें । दूध, घी, जल से स्नान कराये । दूध में पके हुए गेहूँ और विविध नैवेद्यों का भोग लगाये । इस पञ्चमी को नाग की पूजा करने से वासुकि आदि नाग सन्तुष्ट होते हैं और वह पुरुष नागलोक में जाकर बहुत कालतक सुख का भोग करता है । राजन् ! इस पञ्चमी तिथि के कल्प का मैंने वर्णन किया । जहाँ ‘ॐ कुरुकुल्ले फट् स्वाहा’ – यह मंत्र पढ़ा जाता हैं, वहाँ कोई सर्प नहीं आ सकताकश्मीर नागों का देश माना जाता है । ‘नीलमतपुराण’ में इसका विस्तृत वर्णन है

(अध्याय ३६-३८)
See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

15. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २२

16. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २३

17. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २४ से २६

18. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २७

19. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २८

20. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २९ से ३०

21. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३१

22. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३२

23. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३३

24. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३४

25. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३५

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