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भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय २ से ३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — प्रथम भाग)
अध्याय २ से ३
सृष्टि तथा सात ऊर्ध्व एवं सात पाताल लोकों का वर्णन

श्रीसूतजी बोले — मुनियों ! अब मैं कल्प के अनुसार सैकड़ों मन्वन्तरों के अनुगत ईश्वर-सम्बन्धी कालचक्र का वर्णन करता हूँ ।

सृष्टि के पूर्व यह सब परम अन्धकार-निमग्न एवं सर्वथा अप्रतिज्ञात-स्वरुप था । उस समय परम कारण, व्यापक एकमात्र रूद्र ही अवस्थित थे । सर्वव्यापक भगवान् ने आत्मस्वरूप में स्थित होकर सर्वप्रथम मन की सृष्टि की । फिर अहंकार की सृष्टि की । उससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध नामक पञ्चतन्मात्रा तथा पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति की ।om, ॐ इसमें से आठ प्रकृति हैं (अर्थात् दूसरे को उत्पन्न करनेवाली हैं) — प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श की तन्मात्राएँ । पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन — ये सोलह इनकी विकृतियाँ हैं । ये किसी की भी प्रकृति नहीं हैं, क्योंकि इनसे किसी की उत्पत्ति नहीं होती । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध — ये पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं । कान का शब्द, त्वक् का स्पर्श, चक्षु का रूप, जिह्वा का रस, नासिका का गन्ध है । प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान के भेद से वायु के पाँच प्रकार हैं । सत्त्व, रज और तम — ये तीन गुण कहे गये हैं । प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और उससे उत्पन्न सारा चराचर विश्व भी त्रिगुणात्मक हैं । उस भगवान् वासुदेव के तेज से ब्रह्मा, विष्णु और शम्भु का आविर्भाव हुआ है । वासुदेव अशरीरी, अजन्मा तथा अयोनिज हैं । उनसे परे कुछ भी नहीं हैं । वे प्रत्येक कल्प में जगत् और प्राणियों की सृष्टि एवं उपसंहार भी करते हैं ।बहत्तर युगों का एक मन्वन्तर तथा चौदह मन्वन्तर का एक कल्प होता हैं । यह कल्प ब्रह्मा का एक दिन और रात हैं । भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक और ब्रह्मलोक — ये सात लोक कहे गये हैं । पाताल, वितल, अतल, तल, तलातल, सुतल और रसातल — ये सात पाताल हैं । इनके आदि, मध्य और अन्त में रूद्र रहते हैं । महेश्वर लीला के लिये संसार को उत्पन्न करते हैं और संहार भी करते हैं । ब्रह्मप्राप्ति की इच्छा करनेवाले की ऊर्ध्वगति कही गयी है ।

ऋषि सर्वदर्शी (परमात्मा)— ने सर्वप्रथम प्रकृति की सृष्टि की । उस प्रकृति से विष्णु के साथ ब्रह्मा उत्पन्न हुए । द्विजश्रेष्ठो ! इसके बाद बुद्धि से नैमित्तिकी सृष्टि उत्पन्न हुई । इस सृष्टिक्रम में स्वयम्भुव ब्रह्मा ने सर्वप्रथम ब्राह्मणों को उत्पन्न किया । अनन्तर क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र की सृष्टि की । पृथ्वी, अन्तरिक्ष और दिशाओं की कल्पना की । लोकालोक, द्वीपों, नदियों, सागरों, तीर्थों, देवस्थानों, मेघगर्जनों, इन्द्रधनुषों, उल्कापातों, केतुओं तथा विद्युत् आदि को उत्पन्न किया । यथासमय ये सभी उसी परब्रह्म में लीन हो जाते हैं । ध्रुव से ऊपर एक करोड़ योजन विस्तृत महर्लोक है । ब्राह्मण-श्रेष्ठ वहाँ कल्पान्तपर्यन्त रहते हैं । महर्लोक से ऊपर दो करोड़ योजन विस्तृत जनलोक हैं, वहाँ ब्रह्मा के पुत्र सनकादि रहते हैं । जनलोक से ऊपर तीन करोड़ योजनवाला तपोलोक हैं, वहाँ तापत्रयरहित देवगण रहते हैं । तपोलोक से ऊपर छः करोड़ योजन विस्तृत सत्यलोक हैं, जहाँ भृगु, वसिष्ठ, अत्रि, दक्ष, मरीचि आदि प्रजापतियों का निवास है । जहाँ सनत्कुमार आदि सिद्ध योगिगण निवास करते हैं, वह ब्रह्मलोक कहा जाता है । उस लोक में विश्वात्मा विश्वतोमुख गुरु ब्रह्मा रहते हैं । आस्तिक ब्रह्मवादी, यतिगण, योगी, तापस, सिद्ध तथा जापक उन परमेष्ठी ब्रह्माजी की गाथा का गान इस प्रकार करते हैं — ‘परमपद की प्राप्ति की इच्छा करनेवाले योगियों का द्वार यही परमपद लोक है । वहाँ जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं होता । वहाँ जानेवाला विष्णु एवं शंकरस्वरुप हो जाता है । करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान यह स्थान बड़े कष्ट से प्राप्त होता है । ज्वालामालाओं से परिव्याप्त इस पुर का वर्णन नहीं किया जा सकता ।’ इस ब्रह्मधाम में नारायण का भी भवन है । माया-सहचर परात्पर श्रीमान् हरि यहाँ शयन करते हैं । इसे ही पुनरावृत्ति से रहित विष्णुलोक भी कहा जाता है । यहाँ आने पर कोई भी लौटकर नहीं जाता । भगवान् के प्रपन्न महात्मागण ही जनार्दन को प्राप्त करते हैं । ब्रह्मासन से ऊर्ध्व परम ज्योतिर्मय शुभ स्थान है । उसके ऊपर वह्रि परिव्याप्त है, वहीं पार्वती के साथ भगवान् शिव विराजमान रहते हैं । सैकड़ों-हजारों विद्वान् और मनीषियों द्वारा वे चिन्त्यमान होकर प्रतिष्ठित रहते हैं । वहाँ नियत ब्रह्मवादी द्विजगण ही जाते हैं । महादेव में सतत ध्यानरत, तापस, ब्रह्मवादी, अहंता-ममता के अभ्यास से रहित, काम-क्रोध से शून्य, ब्रह्मत्व-समन्वित ब्राह्मण ही उनको देख सकते हैं — वही रुद्रलोक हैं । ये सातों महालोक कहे गये हैं ।द्विजगणों ! पृथ्वी के नीचे महातल आदि पाताललोक हैं । महातल नामक पाताल स्वर्णमय तथा सभी वर्णों से अलंकृत हैं । वह विविध प्रासादों और शुभ देवालयों से समन्वित है । वहाँ पर भगवान् अनन्त, बुद्धिमान् मुचुकुन्द तथा बलि भी निवास करते हैं । भगवान् शंकर से सुशोभित रसातल शैलमय हैं । सुतल पीतवर्ण और वितल मूँगे की कान्तिवाला हैं । वितल श्वेत और तल कृष्णवर्ण है । यहाँ वासुकि रहते हैं । कालनेमि, वैनतेय, नमुचि, शङ्कुकर्ण तथा विविध नाग भी यहाँ निवास करते हैं । इनके नीचे रौरव आदि अनेकों नरक हैं, उनमें पापियों को गिराया जाता है । पातालों के नीचे शेष नामक वैष्णवी शरीर है । वहाँ कालाग्नि रुद्रस्वरूप नरसिंह भगवान् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु नागरुपी अनन्त के नाम से प्रसिद्ध हैं ।
(अध्याय २-३)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १

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