भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – १९ से २१
प्रतिष्ठा-मुहूर्त एवं जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणों ! ऋषियों ने देवता आदि की प्रतिष्ठा माघ, फाल्गुन आदि छः मास नियत किये हैं । जब तक भगवान् विष्णु शयन नहीं करते, तबतक प्रतिष्ठा आदि कार्य करने चाहिये । शुक्र, गुरु, बुध, सोम — ये चार वार शुभ हैं । जिस लग्न में शुभ ग्रह स्थित हो एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो, उस लग्न में प्रतिष्ठा करनी चाहिये । तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा तिथियाँ उत्तम हैं । om, ॐप्राण-प्रतिष्ठा एवं जलाशय आदि कार्य प्रशस्त शुभ मुहूर्त में ही करने चाहिये । देवप्रतिष्ठा और बड़े याग में सोलह हाथ का एवं चार द्वारों से युक्त मण्डप का निर्माण करके उसके दिशा-विदिशाओं में शुभ ध्वजाएँ फहरानी चाहिये । पाकड़, गूलर, पीपल तथा बरगद के तोरण चारों द्वारों पर पूर्वादि क्रम से बनाये । मण्डप को मालाओं आदि से अलंकृत करे । दिक्पाल की पताकाएँ उनके वर्णों के अनुसार बनवानी चाहिये । मध्य में नीलवर्ण की पताका लगानी चाहिये । ध्वज-दण्ड यदि दस हाथ का हो तो पताका पाँच हाथ की बनवानी चाहिये । मण्डप के द्वारों पर कदली-स्तम्भ रखना चाहिये तथा मण्डप को सुसज्जित करना चाहिये । मण्डप के मध्य में एवं कोणों में वेदियों की रचना करनी चाहिये । योनि और मेखला-मण्डित कुण्ड का तथा वेदी पर सर्वतोभद्र-चक्र का निर्माण करना चाहिये । कुण्ड के ईशान-भाग में कलश की स्थापना कर उसे माला आदि से अलंकृत करना चाहिये ।यजमान पञ्चदेव एवं यज्ञेश्वर नारायण को नमस्कार कर प्रतिष्ठा आदि क्रिया का संकल्प करके ब्राह्मणों से इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त करे — ‘मैं इस पुण्य देश में शास्त्रोक्त-विधि से जलाशय आदि की प्रतिष्ठा करूँगा । आप सभी मुझे इसके लिये आज्ञा प्रदान करें ।’ ऐसा कहकर मातृ-श्राद्ध एवं वृद्धि-श्राद्ध सम्पन्न करे । भेरी आदि के मङ्गलमय वाद्यों के साथ मण्डप में षोडशाक्षर ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।’ आदि मन्त्र लिखे एवं इन्द्रादि दिक्पाल देवताओं तथा उनके आयुधों आदि का भी यथास्थान चित्रण करे । फिर आचार्य और ब्रह्मा का वरण करे । वरण के अनन्तर आचार्य तथा ब्रह्मा यजमान से प्रसन्न हो उसके सर्वविध कल्याण की कामना करके ‘स्वस्ति’ ऐसा कहे । अनन्तर सपत्नीक यजमान को सर्वौषधियों से ‘आपो हि ष्ठा० ‘ (यजुः ११ । ५०) इस मन्त्र द्वारा ब्रह्मा, ऋत्विक् आदि स्नान करायें । यव, गोधूम, नीवार, तिल, साँवा, शालि, प्रियंगु और व्रीहि — ये आठ सर्वौषधि कहे गये हैं । आचार्यादि द्वारा अनुज्ञात सपत्नीक यजमान शुद्ध वस्त्र तथा चन्दन आदि धारणकर पुरोहित को आगे कर मङ्गल-घोष के साथ पुत्र-पौत्रादि सहित पश्चिमद्वार से यज्ञ-मण्डप में प्रवेश करे । वहाँ वेदी की प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे । ब्राह्मण की आज्ञा के अनुसार यजमान निश्चित आसन पर बैठे । ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन करें । अनन्तर यजमान पाँच देवों का पूजन करे । फिर सरसों आदि से विघ्नकर्ता भूतों का अपसर्पण कराये । यजमान अपने बैठने के आसन का पुष्प-चन्दन से अर्चन करे । अनन्तर भूमि का हाथ से स्पर्श कर इस प्रकार कहे —

 ‘पृथ्वीमाता ! तुमने लोक को धारण किया है और तुम्हें विष्णु ने धारण किया है । तुम मुझे धारण करो और मेरे आसन को पवित्र करो ।’
“पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुनां धृता ॥
त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रमासनं कुरु ।” (मध्यमपर्व २ । २० । २३-२४)

फिर सूर्य को अर्घ्य देकर गुरु को हाथ जोड़कर प्रणाम करे । हृदयकमल में इष्ट देवता का ध्यान कर तीन प्राणायाम करे । ईशान दिशा में कलश के ऊपर विघ्नराज गणेशजी की गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्य आदि से ‘गणानां त्वा० ‘ (यजु० २३ । १९) मन्त्र से पूजन करे । अनन्तर ‘आ ब्रह्मन्० ‘ (यजु० २२ । २२) इस मन्त्र से ब्रह्माजी की, ‘तद्विष्णोः० ‘ (यजु० ६ । ५) इस मन्त्र से भगवान् विष्णु की पूजा करे । फिर वेदों के चारों ओर सभी देवताओं को स्व-स्व स्थान पर स्थापित कर उनका पूजन करें । इसके बाद ‘राजाधिराजाय प्रसह्य० ‘ इस मन्त्र से भूशुद्धि कर श्वेत पद्मासन पर विराजमान, शुद्धस्फटिक तथा शङ्ख, कुन्द एवं इन्दु के समान उज्ज्वल वर्ण, किरीट-कुण्डलधारी, श्वेत कमल, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र से अलंकृत, श्वेत गन्ध से अनुलिप्त, हाथ में पाश लिये हुए, सिद्ध गन्धर्वों तथा देवताओं से स्तूयमान, नागलोककी शोभारूप, मकर, ग्राह, कूर्म आदि नाना जलचरों से आवृत, जलशायी भगवान् वरुणदेवका ध्यान करे । ध्यान के अनन्तर पञ्चाङ्गन्यास करे । अर्घस्थापन कर मूलमन्त्र का जप करे तथा उस जल से आसन, यज्ञ-सामग्री आदि का प्रोक्षण करे । फिर भगवान् सूर्य को अर्घ्य दे । अनन्तर ईशानकोण में भगवान् गणेश, अग्निकोण में गुरुपादुका तथा अन्य देवताओं का यथाक्रम पूजन करे । मण्डलके मध्य शक्ति, सागर, अनन्त, पृथ्वी, आधारशक्ति, कूर्म, सुमेरु तथा मन्दर और पञ्चतत्व का साङ्गोपाङ्ग पूजन करे । पूर्व दिशा में कला के ऊपर श्वेत अक्षत और पुष्प लेकर भगवान् वरुणदेव का आवाहन करे । वरुण को आठ मुद्रा दिखाये । गायत्री से स्नान कराये तथा पाद्य, अर्घ्य, पुष्पाञ्जलि आदि उपचारों से वरुण का पूजन करे । ग्रहों, लोकपालों, दस दिक्पालों तथा पीठपर ब्रह्मा, शिव, गणेश और पृथ्वी को गन्ध, चन्दन आदि से पूजन करे । पीठ के ईशानादि कोणों में कमला, अम्बिका, विश्वकर्मा, सरस्वती तथा पूर्वादि द्वारों में उनचास मरुद्गणों का पूजन करे । पीठ के बाहर पिशाच, राक्षस, भूत, बेताल आदि की पूजा करे । कलश पर सूर्यादि नवग्रहों का आवाहन एवं ध्यान कर पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य एवं बलि आदि द्वारा मन्त्रपूर्वक उनकी पूजा करे और उनकी पताकाएँ उन्हें निवेदित करे । विधिपूर्वक सभी देवताओं का पूजनकर शतरुद्रिय का पाठ करना चाहिये । हवन करने के समय वारुणसूक्त, रात्रिसूक्त, रौद्रसूक्त, पवमानसूक्त, पुरुषसूक्त, शाक्तसूक्त, अग्निसूक्त, सौरसूक्त, ज्येष्ठसाम, वामदेवसाम, रथन्तरसाम तथा रक्षोघ्न आदि सूक्त का पाठ करना चाहिये । अपने गृह्योक्त-विधि से कुण्डों में अग्नि प्रदीप्त कर हवन करना चाहिये । जिस देव का यज्ञ होता है अथवा जिस देवता की प्रतिष्ठा हो उसे प्रथम आहुतियाँ देनी चाहिये । अनन्तर तिल, आज्य, पायस, पत्र, पुष्प, अक्षत तथा समिधा आदि से अन्य देवताओं के मन्त्रों से उन्हें आहुतियाँ देनी चाहिये ।

पञ्चदिवसात्मक प्रतिष्ठायाग में प्रथम दिन देवताओं का आवाहन एवं स्थापन करना चाहिये । दूसरे दिन पूजन और हवन, तीसरे दिन बलि-प्रदान, चौथे दिन चतुर्थी कर्म और पाँचवें दिन नीराजन करना चाहिये । नित्यकर्म करने के अनन्तर ही नैमित्तिक कर्म करने चाहिये । इसी से कर्मफल की प्राप्ति होती है ।

दूसरे दिन प्रातःकाल सर्वप्रथम प्रतिष्ठाप्य देवता का सर्वौषधिमिश्रित जल से ब्राह्मणों द्वारा वेदमन्त्रों के पाठपूर्वक महास्नान तथा मन्त्राभिषेक कराये, तदनन्तर चन्दन आदि से उसे अनुलिप्त करे । तत्पश्चात् आचार्य आदि की पूजाकर उन्हें अलंकृत कर गोदान करें । फिर मङ्गल-घोष-पूर्वक तालाब में जल छोड़ने के लिये संकल्प करे । इसके बाद उस तालाब के जल में नागयुक्त वरुण, मकर, कच्छप आदि की अलंकृत प्रतिमाएँ छोड़े । वरुणदेव की विशेषरूप से पूजा कर उन्हें अर्घ्य निवेदित करे । पुनः उसी तालाब के जल, सप्तमृत्तिका-मिश्रित जल, तीर्थ-जल, पञ्चामृत, कुशोदक तथा पुष्पजल आदि से वरुणदेव को स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करे । सभी देवताओं को बलि प्रदान करे । मङ्गल-घोष के साथ नीराजन कर प्रदक्षिणा करे । एक वेदी पर भगवान् वरुण तथा पुष्करिणीदेवी की यथाशक्ति स्वर्ण आदि को प्रतिमा बनाकर भगवान् वरुणदेव के साथ देवी पुष्करिणी का विवाह कराकर उन्हें वरुणदेव के लिये निवेदित कर दे । एक काष्ठ का यूप जो यजमान की ऊँचाई के बराबर हो, उसे अलंकृत कर तडाग के ईशान दिशा में मन्त्रपूर्वक गाड़कर स्थिर कर दे । प्रासाद के ईशानकोण में, प्रपा के दक्षिण भाग में तथा आवास के मध्य में यूप गाड़ना चाहिये । इसके अनन्तर दिक्पालों को बलि प्रदान करे । ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा प्रदान करे ।

उस तड़ाग के जल के मध्य में ‘जलमातृभ्यो नमः’ ऐसा कहकर जलमातृकाओं का पूजन करे और मातृकाऑ से प्रार्थना करे कि मातृका देवियों ! तीनों लोकों के चराचर प्राणियों की संतृप्ति के लिये यह जल मेरे द्वारा छोड़ा गया है, यह जल संसार के लिये आनन्ददायक हो । इस जलाशय की आपलोग रक्षा करें । ऐसी ही मङ्गल-प्रार्थना भगवान् वरुणदेव से भी करे । अनन्तर वरुणदेव को बिम्ब, पद्य तथा नागमुद्राएँ दिखाये । ब्राह्मणों को उस जलाशय का जल भी दक्षिणा के रूप में प्रदान करे । अनन्तर तर्पण कर अग्नि की प्रार्थना करे । स्वयं भी उस जल का पान करे। पितरों को अर्घ्य प्रदान करे । अनन्तर पुनः वरुणदेव की प्रार्थना कर, जलाशय की प्रदक्षिणा करे । फिर ब्राह्मणों द्वारा वेद-ध्वनियों के उच्चारणपूर्वक यजमान अपने घर में प्रवेश करे और ब्राह्मणों, , दीनों अन्धों, कृपणों तथा कृमारिकाओं को भोजन कराकर संतुष्ट करे एवं भगवान् सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे ।
(अध्याय १९ – २१)

॥ ॐ तत्सत् भविष्यपुराणान्तर्गत मध्यमपर्व द्वितीय शुभं भूयात् ॥

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १ से २
4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ३ से ५

5. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ६
6. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ७ से ८
7. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय ९
8. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १० से १३
9. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १४ से १६
10. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १७ से १८

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