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भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – २०
दिव्य, भौम एवं अन्तरिक्षजन्य उत्पात तथा उनकी शान्तिके उपाय

सूतजी कहते हैं — ब्राह्मणो ! अब मैं विविध प्रकार के अपशकुनों, उत्पातों एवं उनके फलों का वर्णन कर रहा हूँ । आपलोग सावधान होकर सुनें । जिस व्यक्ति की लग्न-कुण्डली अथवा गोचर मे पाप-ग्रह का योग हो तो उसकी शान्ति करानी चाहिये । दिव्य, अन्तरिक्ष और भौम — ये तीन प्रकार के उत्पात होते हैं । ग्रह, नक्षत्र आदि से जो अनिष्ट की आशंका होती है । वह दिव्य उत्पात कहलाता है । उल्कापात, दिशा का दाह (मण्डलों का उदय, सूर्य-चन्द्र के इर्द-गिर्द पड़नेवाले घेरे का दिखायी देना), आकाश में गन्धर्व-नगर का दर्शन, खण्डवृष्टि, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि अन्तरिक्ष-जन्य उत्पात हैं । जलाशयों, वृक्षों, पर्वतों तथा पृथ्वी से प्रकट होनेवाले भूकम्प आदि उत्पात भौम उत्पात कहलाते हैं । om, ॐअन्तरिक्ष एवं दिव्य उत्पात का प्रभाव एक सप्ताह तक रहता है । इसकी शान्ति के लिये तत्काल उपाय करना चाहिये अन्यथा वे बहुत काल तक प्रभावी रहते हैं । देवताओं का हँसना, रुधिर-स्राव होना, अकस्मात् बिजली एवं वज्र का गिरना, हिंसा और निर्दयता का बढ़ना, सर्पों का आरोहण करना — ये सब दैव दुर्निमित्त है । मेघ से उत्पन्न वृष्टि केवल शिलातल पर ही गिरे तो एक सप्ताह के अंदर उत्पन्न प्राणी नष्ट हो जाते है । एक राशि पर शनि, मंगल और सूर्य — ये पापग्रह स्थित हो जायँ और पृथ्वी अकस्मात् धुएँ से ढकी दीखे तो भारी जनसंहार की सम्भावना होती है । यदि बृहस्पति अपनी राशि का अतिचार एक राशि का भोगकाल समाप्त हुए बिना तीव्रगति से आगे चला जाना । यह स्थिति केवल मंगल से लेकर शनि तक के ग्रहों की होती है । करे और शनि वहाँ स्थित न हो तो राज्य-नष्ट होने की सम्भावना रहती है । यदि सूर्य कुछ समय तक न दिखायी दे और दिशाओं में दाह होने लगे, धूमकेतु दिखायी दे और बार-बार भूकम्प होता हो तथा राजा के जन्म-दिन में इन्द्रधनुष दिखायी पड़े तो वह उसके लिये भारी दुर्निमित्त है । भयंकर आँधी-तूफान आ जाय, ग्रह का आपस में युद्ध दिखायी दे, तीन महीने में ही दूसरा ग्रहण लग जाय अथवा उल्कापात हो, आकाश और भूमि पर मेढ़क दौड़ने लगें, हल्दी के समान पीली वृष्टि हो, पत्थरों में सिंह और विल्ली की आकृति दिखलायी पड़े तो राष्ट्र में दुर्भिक्ष और राजा का विनाश होता है । चैत्र मे अथवा कुम्भ के सूर्य में (फाल्गुन मासमें) नदी का वेग अकस्मात् बहुत बढ़ जाय तो राष्ट्र में विप्लव होता है । ये सब सूर्यजन्य अद्भुत उत्पात है । हवन आदि द्वारा इनकी शान्ति करानी चाहिये । ‘आ कृष्णेन० ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31)  इस सूर्यमन्त्र द्वारा हवन कराना चाहिये । धान्यादि का निस्सार हो जाना, गौओं का निस्तेज हो जाना, कुओं का जल सहसा सूख जाना—ये सब भी सूर्यजनित उत्पात हैं, इनकी शान्ति के लिये कमल-पुष्पों से एक सहस्र आहुतियाँ देनी चाहिये । विकृत पक्षी, पाण्डुवर्ण कपोत, श्वेत उल्लू, काला कौआ और कराकुल पक्षी यदि घर में गिरें तो उस घर में महान् उत्पात मच जाता है । गले की मालाएँ आपस में टकराने लगे, सद्यः उत्पन्न बालक को दाँत हो, देवताओं की मूर्तियाँ हँसती हों, मूर्तियों में पसीना दीख पड़े और घड़े में अथवा घर में सर्प और मण्डूक का प्रसव हो जाय तो उस घर की गृहिणी छः मास के अंदर नष्ट हो जाती है । घर पर या वृक्ष पर बिजली कड़कड़ाकर गिरने और आग की ज्वालाएँ दिखायी देने पर महान् उत्पात होता है । इन सबकी शान्ति के लिये रविवार के दिन भगवान् सूर्य की प्रसन्नता-हेतु उनकी पूजा करे । तिल एवं पायस की दस हजार आहुतियाँ प्रदान करे । गो-दान करे और ब्राह्मणों को दक्षिणा दे । इससे शीघ्र शान्ति होती है । अचानक ध्वज, चामर, छत्र तथा सिंहासन से विभूषित रथ पर राजा का दिखलायी देना तथा स्त्री-पुरुष की लड़ाई — ये भी महान् उत्पात है । पृथ्वी का कॉपना, पहाड़ों का टकराना, कोयल और उल्लू का रोना आदि सुनायी पड़े तो राजा, मन्त्री, राजपुत्र, हाथी आदि विनष्ट होते हैं ।ताड़ एवं सुपारी के वृक्ष एक साथ उत्पन्न हो जाये तो उस घर में रहनेवालों पर विपत्ति को सम्भावना होती है । दूसरे वृक्षों में अन्य वृक्षों के फूल-फल लगे हुए दीखें तो ये सोमग्रहजन्य उत्पात है । इसकी शान्ति के लिये सोमवार के दिन सोम के निमित्त दधि, मधु, घृत तथा पलाश आदि से ‘इमं देवा० ‘ ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा ॥(यजु. 10 । 18) ) इस मन्त्र से एक हजार आहुतियाँ दे और चरु से भी हवन करे ।

उड़द और जौ की ढेरियाँ सहसा लुप्त हो जायँ, दही, दूध, घी और पक्वान्नों में रुधिर दिखलायी पड़े, एकाएक घर में आग जैसा लगना दिखायी दे, बिना बादल के ही बिजली चमकने लगे, घर के सभी पशु तथा मनुष्य रुग्ण—से दिखायी पड़े, तो मङ्गल ग्रह से उत्पन्न उत्पात समझने चाहिये । इनसे राजा, अमात्य तथा घर के स्वामियों का विनाश होता है । ऐसे भयंकर उपद्रवों को देखकर मङ्गल की शान्ति के लिये दही, मधु, घी से युक्त खैर और गूलर की समिधा से ‘अग्निर्मूर्धा० ‘ ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3 । 12) इस मन्त्र से दस हजार आहुतियां देनी चाहिये । तीन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा में लाल वस्तुएँ देनी चाहिये तथा सोने या ताँबे की मङ्गल की प्रतिमा बनाकर दान में देनी चाहिये । इससे शान्ति होती है ।

गौएँ यदि घर में पूँछ उठाकर स्वयं दौड़ने लगे और कुत्ते तथा सूअर घर पर चढ़ने लगे तो उस घर की स्त्रियों को भीषण क्लेश की आशंका होती है । गृहस्वामी का पूर्णतः मिथ्यावादी होना तथा राजा का वाद-विवाद में फँसना, घर में गौओं का चिल्लाना, पृथ्वी का हिलना, घर में मेढ़क तथा साँप का जन्म लेना — ये सभी उत्पात बुध ग्रहजन्य हैं । इसमें राज्य तथा घर के नष्ट होने की सम्भावना होती है । इन उत्पातों की शान्ति के लिये बुधवार के दिन बुध ग्रह के उद्देश्य से दही, मधु, घी तथा अपामार्ग की समिधा एवं चरु से ‘ उद्बुध्यस्व० ‘ ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15 । 54) इस मन्त्र द्वारा दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये । बुध की सुवर्ण की प्रतिमा तथा पयस्विनी गाय ब्राह्मण को दान में देनी चाहिये ।

पशुओं का असमय में समागम और उनसे यमल संततियों की उत्पत्ति, जौ, व्रीहि आदि का सहसा लुप्त हो जाना, गृह-स्तम्भ का सहसा टूटना, आँगन में बिल्ली तथा मेढक का नखों से जमीन कुरेदना और इनका घर पर चढ़ना, ये सभी दोष जहाँ दिखायी दें, वहाँ छः महीने के भीतर ही घर का विनाश होता है— कोई प्राणी मर जाता है या कुटुम्ब में कलह होता है तथा अनेक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं । बिल्व वृक्ष पर गृध्र और गृध्री का एक साथ दिखलायी देना राजा के लिये विभ्रमकारक तथा प्रासाद के लिये हानिकारक होता है । इस दोष से अमात्यवर्ग राजा के विपरीत हो जाता है । ये सभी बृहस्पतिजनित दोष हैं । इनकी शान्ति के लिये बृहस्पति के निमित्त शान्ति-होम करना चाहिये तथा पयस्विनी गाय एवं स्वर्ण की बृहस्पति की प्रतिमा का दान करना चाहिये ।

राक्षस द्वारा घड़े का जल पीने का आभास होना; सिंह, शर्करा, तेल, चाँदी, ताण्डव-नृत्य, उड़द-भात, धान्य आदि का आभास होना; घर में ताँबा, काँसा, लोहा, सीसा तथा पीतल आदि का रखा दिखायी देने का आभास होना; ऐसे उत्पात पर धन के नाश होने की सम्भावना रहती है और अनेक व्याधियाँ होती हैं, राजा भयंकर उपद्रव तथा बन्धन में पड़ जाता है । गौ, अश्च तथा सेवकों का विनाश होता है । दन्तपंक्ति को छोड़कर दाँतो के ऊपर दाँतों का निकलना, शलाका के समान दाँत निकलना— ये भी दोषकारक हैं । बर्तनों में, घड़ों में यदि बादल के गरजने की आवाज सुनायी दे तो गृहस्वामी पर विपत्ति की सम्भावना होती है — ये शुक्रग्रहजनित दोष हैं । इनकी शन्ति के लिये शुक्रवार के दिन दही, मधु, घृत-युक्त शमीपत्र से हवन करे तथा दो सफेद वस्त्र, पयस्विनी श्वेत गौ, और सुवर्ण की शुक्र की प्रतिमा का दान करना चाहिये ।

मन्दिर की जमीन यदि रक्त वर्ण की अथवा पुष्पित दिखलायी दे तो वहाँ भी उत्पात की सम्भावना होती है । आकाश में जलती हुई आग दिखायी दे तो स्त्री-पुरुषों की हानि और राष्ट्र में विप्लव की सम्भावना होती है । सभी ओषधियाँ और सस्य रसविहीन हो जायँ; हाथी, घोड़े, मतवाले होकर हिंसक हो जायँ; राजा के लिये नगर तथा गाँव में सभी शत्रु हो जायँ गौ, महिष आदि पशु अनायास उत्पात मचाने लगे; घर के दरवाजे में गोह और शंखिनी प्रवेश करे तो अशुभ समझना चाहिये; इससे राज-पीड़ा और धन-हानि होती है । ये सभी उत्पात शनिग्रहज़नित समझने चाहिये । इनकी शान्ति के लिये विविध सस्यों तथा समिधाओं से शनिवार के दिन ‘शं नो देवी० ‘  ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36 । 12) इस मन्त्र से दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और चरु से भी हवन करना चाहिये । नीली सवत्सा पयस्विनी गाय, दो वस्त्र, सोना, चाँदी, शनि की प्रतिमा आदि दक्षिणा में ब्राह्मण को देनी चाहिये ।

बादल के गरजे बिना लाल-पीली शिलावृष्टि का दिखलायी देना, बिना हवा के वृक्ष का हिलना-डुलना दिखलायी देना, इन्द्रध्वज़ तथा इन्द्रधनुष का गिरना, दिन में सियारों का तथा रात्रि में उलूक का रोना, एक बैल का दूसरे बैल के ककुद् पर मुँह रखकर रँभाना, ऐसे दोष होने पर देश में पाप की वृद्धि होती है तथा राजा राज्य एवं धर्म से च्युत हो जाता है । गौ और ब्राह्मण में परस्पर द्वन्द्व मच जाता है, वाहन नष्ट हो जाते हैं । यदि आकाश में ध्वज की छाया दिखलायी पड़े तो राष्ट्र में महान् विप्लव होता है । यदि जल में जलती हुई आग दिखलायी दे और सिर अथवा शरीर पर बिजली गिर जाय तो उसका जीवन दुर्लभ हो जाता है । दरवाजों के किनारे पर अथवा स्तम्भ पर अग्नि अथवा धूम दिखायी दे तो मृत्यु का भय होता है । आकाश में वज्राघात, अग्नि की ज्वाला के मध्य धुआं, नगर के मध्य किसी अनहोनी घटना का दिखलायी देना, शव ले जाते समय उस शव का उठकर बैठ जाना; स्थापित लिङ्ग का गमन करना; भूकम्प, आँधी-तूफान, उल्कापात होना; बिना समय वृक्षों में फल-फूल लगना—ये सभी उत्पात राहुजन्य हैं । इनकी शान्ति के लिये दही, मधु, घी, दूब, अक्षत आदि से ‘कया नश्चित्र० ‘ ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4) इस मन्त्र द्वारा रविवार के दिन दस हजार आहुतियाँ राहु के लिये दे, चरु से भी हवन करे । पयस्विनी कपिला गौ, अतसी, तिल, शंख और युग्मवस्त्र ब्राह्मण को दान दे । वारुणहोम भी करे । इससे सारे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं ।
यदि जम्बूक, गृध्र, कौए आदि भीषण ध्वनि करते हों तथा भयंकर नृत्य करते हों तो मृत्यु की आशंका होती है, जलती हुई आग के समान धूमकेतु का दिखलायी पड़ना, जमीन का खिसकना मालूम होना — ऐसी स्थिति में राजा पीड़ित होता है, राज्य में अकाल पड़ता है तथा अनेक प्रकार के अनिष्ट होते हैं । इनकी शान्ति के लिये स्वर्ण-छत्र-युक्त सात घोड़ों से युक्त सूर्यमण्डप बनाकर ब्राह्मण को दान करे । बिल्वपत्र भी दे, ऐन्द्र मन्त्र से हवन करे । यदि अकस्मात् शाल, ताल, अक्ष, खदिर, कमल आदि घर के अंदर ही उत्पन्न हों तो ये सभी केतुग्रहजन्य दोष है । इनकी शान्ति के लिये ‘त्र्यम्बकं० ‘ (यजु० ३ । ६०) इस मन्त्र से दही, मधु. घृत से दस हजार आहुतियाँ दे तथा चरु भी प्रदान करे । नीली सवत्सा पयस्विनी गाय, वस्त्र, केतु की प्रतिमा आदि ब्राह्मणों को दान करे ।

दक्षिण दिशा में अपनी छाया अपने पैर के एकदम समोप आ जाय और छाया में दो या पाँच सिर दिखलायी दें अथवा छिन्न-भिन्न रूप में सिर दिखलायी दे तो देखनेवाले की सप्ताह के भीतर ही मृत्यु की आशंका होती है । कौआ, बिल्ली, तोता तथा कपोत का मैथुन दिखायी दे तो ये दुर्निमित राहुजन्य उत्पात हैं । इनकी शान्ति के लिये शनिवार के दिन शनि के निमित दस हजार आहुतियाँ देनी चहिये । अर्क-पुष्प से शनि की पूजा करे तथा चरु से सौ बार आहुति दे । वाम और दक्षिण के क्रम से यदि बाहु, पैर तथा आँख में स्पन्दन हो तो इससे मृत्यु का भय होता है । यह सोमग्रहजनित दुर्निमित है । पुस्तक, यज्ञोपवीत, चरु तथा इन्द्र-ध्वज में आग लग जाय तो यह सूर्यजन्य दुर्निमित हैं । इसकी शान्ति के लिये सूर्य के निमित्त त्रिमधुयुक्त कनेर के पुष्पों से आहुतियाँ देनी चाहिये । जिन ग्रहों का दुर्निमित दिखलायी दे, उस की शान्ति के लिये ग्रहों तथा उसके अधिदेवता और प्रत्यधिदेवता के निमित्त भी विधिपूर्वक पूजन-हवन-स्तवन, दान आदि करना चाहिये । विधि अनुसार क्रिया नहीं करने से दोष होता है । अतः ये सभी शान्त्यादि-कर्म शास्त्रोक्त विधान के अनुसार ही करने चाहिये । इससे शान्ति प्राप्त होती है और सर्वविध कल्याण-मङ्गल होता है ।
(अध्याय २०)

ॐ शान्तिः ! ॐ शान्तिः !! ॐ शान्तिः !!!

॥ ॐ तत्सत् भविष्यपुराणान्तर्गत मध्यमपर्व तृतीय भाग शुभं भूयात् ॥
॥ ॐ तत्सत् भविष्यपुराणान्तर्गत मध्यमपर्व शुभं भूयात् ॥

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय १
5. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय २ से ३
6. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय ४ से ८
7. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय ९ से ११
8. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय १२ से १३
9. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय १४ से १७
10. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय १८ से १९

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