श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-65
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
पैंसठवाँ अध्याय
गणेशजी द्वारा राजा जनक के दानशीलता जनित अभिमान का मर्दन
अथः पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
राजा जनकस्य सत्वहरणम्

[ मुनि ] कौण्डिन्य बोले — हे देवि ! किसी समय गजानन गणेशजी सुखासन में बैठे हुए थे । [ उसी समय ] नारदमुनि उनका दर्शन करने के लिये आये। वे बहुत दिनों के पश्चात् उनके पास आये थे ॥ १ ॥

उन्होंने [उन्हें] साष्टांग प्रणामकर कहा — ‘ हे गजानन! हमारा जन्म सफल हो गया, जो पुण्य-समूहों [-के उदय]-के फलस्वरूप आपका दर्शन हुआ है ॥ २ ॥

ऐसा कहकर मुनि हाथ जोड़कर उनके सम्मुख स्थित हो गये, तब महाभाग गजानन ने उन महान् भाग्यशाली महामुनि नारदजी का हाथ पकड़कर आसन पर बैठाया। गणेशजी द्वारा किये हुए उस सत्कार से मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी प्रसन्न हो गये ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर नारदजी ने उन गणाधिपति गणेशजी से कहा कि ‘मेरे हृदय में जो आश्चर्य व्याप्त है, उसे निवेदन करने के लिये मैं आया हूँ, तत्पश्चात् आपको प्रणामकर मैं पुनः चला जाऊँगा ॥ ५ ॥

गजानन बोले — [हे मुनिवर !] तुमने कौन-सा आश्चर्य देखा है ? तुम्हारे हृदय में क्या है ? उसे तुम विशेष रूप से बतलाओ; तदनन्तर अपने आश्रम को चले जाना ॥ ६ ॥

नारदजी बोले — हे देव! मिथिलापुरी में जनक नाम के एक श्रेष्ठ राजा हैं; वे अत्यन्त प्रतिष्ठासम्पन्न, दानी तथा वेद-वेदांगों के पारगामी विद्वान् हैं ॥ ७ ॥ वे नित्य अन्नदान में संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणों का अनेक प्रकार के अलंकारों, वस्त्रों और दक्षिणाओं से पूजन करते हैं। वे दीन-दुखियों, अन्धों और दरिद्रों को बहुत- सा धन प्रदान करते हैं। याचक उनसे जो-जो माँगते हैं, वे वह सब कुछ उनको प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥ फिर भी उन महान् आत्मावाले [राजा] – का धन समाप्त नहीं होता! क्या गजानन गणेशजी की कृपा से ही उनका धन बढ़ रहा है? इस महान् आश्चर्य को देखने के लिये मैं उनके राजभवन गया, [परंतु] उन्होंने ब्रह्मज्ञान के अभिमान से मेरा अपमान किया ॥ १०-११ ॥

मैंने उनसे इस प्रकार कहा कि हे नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, [तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर ] भगवान् गजानन तुम्हारे द्वारा चिन्तित वस्तु को तुम्हें प्रदान करते हैं। तब उन्होंने गर्व से कहा — ‘हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं ही त्रिलोकी का ईश्वर हूँ। मैं ही दान देने वाला और मैं ही दान दिलाने वाला हूँ; मैं ही भोक्ता तथा मैं ही पालनकर्ता हूँ। मेरे स्वरूप से [मुझसे] अतिरिक्त त्रिभुवन में दूसरा कुछ है ही नहीं। कर्ता, कारण और कार्य का साधनस्वरूप- सब कुछ मैं ही हूँ’ ॥ १२–१४ ॥

नारदजी बोले — [हे गजानन !] मैंने उनके इस प्रकार के वचन सुनकर क्रोधपूर्वक कहा — ‘ईश्वर के अतिरिक्त जगत् का कर्ता अन्य कोई नहीं है ॥ १५ ॥ हे राजन्! तुम यह धर्म का दम्भपूर्ण आचरण क्यों कर रहे हो? हे पुण्यात्मन् ! थोड़े ही समय में मैं तुम्हें इसका प्रमाण दिखला दूँगा।’ हे गजानन ! उनसे इस प्रकार कहकर मैं आपके पास चला आया ॥ १६१/२

[ मुनि ] कौण्डिन्य बोले — [हे प्रिये ! ] नारद मुनि के इस प्रकार के वचन सुनकर उन परमात्मा गणेशजी ने अर्घ्य, अलंकार और चन्दनसहित दिव्य पुष्पों से उनका पूजन किया। मुनि भी उनसे आज्ञा लेकर वैकुण्ठ में भगवान् विष्णु के पास चले आये ॥ १७-१८ ॥ [उधर] गजानन गणेशजी सर्वज्ञ होते हुए भी राजा जनक की भक्ति की परीक्षा करने के लिये निन्दनीय वेश धारणकर मिथिला गये । उनका अमांगलिक शरीर अनेक प्रकार के घावों से संयुक्त था और उनमें से रक्तस्राव हो रहा था। वे मक्खियों के समूह से आक्रान्त, दन्तहीन और अत्यन्त आतुर प्रतीत हो रहे थे ॥ १९-२० ॥ उन्हें मार्ग में जाते देखकर कुछ लोग नाक दबा लेते थे, कुछ लोग कपड़े से मुख ढक लेते थे और कुछ लोग इधर-उधर थूकने लगते थे ॥ २१ ॥

[इस प्रकार] लड़खड़ाते, गिरते-पड़ते, मूर्च्छित होते तथा पुनः उठकर चलते हुए वे [कुत्सित वेशधारी गणेशजी ] बालकों की टोलियों के साथ राजभवन के द्वार पर पहुँचकर द्वारपालों से बोले — हे दूतो ! राजा से जाकर निवेदन करो कि मैं वृद्ध भूखा ब्राह्मण अतिथि इच्छानुकूल भोजन की आकांक्षा से आया हूँ ॥ २२-२३ ॥

तब उन दूतों ने उनके इस तरह के वचन को सुनकर राजा जनक के पास जाकर उन वचनों को वैसे ही कह सुनाया। तब वे राजा जनक [दूतों से] बोले —  ‘हे दूतो ! उन्हें ले आओ, मैं उन कौतुकी ब्राह्मण को देखना चाहता हूँ।’ तब उन दूतों ने उस मलिन वस्त्रधारी और मलिन शरीरवाले ब्राह्मण को राजा जनक के पास पहुँचा दिया। राजा ने दूर से ही देखा कि वह मक्खियों से घिरा हुआ काँप रहा है ॥ २४-२५ ॥ पसीने से भीगे और घावों से रक्त स्रवित होते वृद्ध ब्राह्मण को देखकर राजा जनक ने मन में विचार किया कि क्या ये स्वयं परमात्मा ही हैं, जो मुझे छलने के लिये ऐसा रूप धारण करके आये हैं। यदि मेरा पुण्य होगा तो मैं इनका मनोवांछित समाधान करूँगा, नहीं तो जो कुछ भविष्य में होने वाला है, वह अन्यथा नहीं होता ॥ २६-२७ ॥

नृपश्रेष्ठ जनकजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने द्वारपालों के साथ उस ब्राह्मण को अपने सम्मुख [कक्ष में] प्रवेश करते देखा ॥ २८ ॥

ब्राह्मण बोला — हे राजन्! चन्द्रमा की किरणों के सदृश तुम्हारी उज्वल कीर्ति सुनकर मैं यहाँ आया हूँ । मुझे भोजन प्रदान कीजिये, मैं चिरकाल से अत्यन्त क्षुधित हूँ। हे नरेश्वर ! जबतक मेरी तृप्ति न हो जाय, तबतक अन्न प्रदान करते रहिये, इससे तुम्हें सौ यज्ञ करने का पुण्यफल प्राप्त होगा ॥ २९-३० ॥

[ मुनि ] कौण्डिन्य बोले — उन ब्राह्मणदेवता के इस प्रकार के वचन सुनकर राजा ने उन्हें अपने राजभवन के भीतर ले जाकर उनका सम्यक् प्रकार से विधिवत् पूजनकर [उनके लिये] स्वादिष्ट अन्न का परिवेषण किया ॥ ३१ ॥ उनके द्वारा दिया गया [ वह अन्न] वे तत्काल उनके सम्मुख ही भक्षण कर गये । [तब] असंख्य पात्रों में [उन ब्राह्मणरूपी गजानन के भोजनार्थ ] पकने के लिये उत्तम प्रकार के चावल डाले गये ॥ ३२ ॥ [ इस प्रकार ] जो भी पका हुआ चावल उनके सामने परिवेषित किया गया, उस सबका वे [ब्राह्मण देवता] भक्षण कर जाते । तब प्रजाजनों ने राजा से कहा — [हे राजन्!] यह तो राक्षस प्रतीत होता है। इसे इतना अधिक [अन्न] क्यों दिया जा रहा है ? [क्योंकि] राक्षसों को [अन्नादि] प्रदान करने से किंचिन्मात्र की भी पुण्य प्राप्ति नहीं होती ॥ ३३-३४ ॥

कुछ लोगों ने कहा — हे राजन्! त्रैलोक्य का भक्षण कर लेने पर भी इसकी परम तृप्ति नहीं हो सकती। इसलिये इसे अब धान्य[^1]  (अनाज) प्रदान करें ॥ ३५ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण ग्रामों और नगरों से, घरों तथा भूमि के नीचे दबाकर रखे गये समस्त धान्य को उस सर्वभक्षी द्विजरूपधारी अतिथि-पुरुष के सम्मुख लाकर डाल दिया गया, परंतु उन धान्यों को खा लेने पर भी उसे तृप्ति की प्राप्ति नहीं हुई ॥ ३६-३७ ॥ तत्पश्चात् दूतों ने राजा से कहा कि [हे राजन्!] धान्य भी कहीं नहीं प्राप्त हो रहा है। दूतों के इस प्रकार के वचन सुनकर राजा जनक के मुख के नीचे कर लेने पर वे
ब्राह्मणदेवता ‘स्वस्ति’ कहकर वहाँ से चले गये । वे तृप्त नहीं हुए थे, अतः घर-घर जाकर ‘अन्न दीजिये ‘ — ऐसा लोगों से कहने लगे। इस पर लोगों ने उनसे कहा — ‘ हे ब्रह्मन् ! हम सबके घर का सारा धान्य राजा ने मँगवा लिया और उस सम्पूर्ण धान्य का आपने भक्षण कर लिया, इसलिये अब आपकी जहाँ रुचि हो, वहाँ आप जायँ’ ॥ ३८–४० ॥

ब्राह्मण बोले — मैंने लोगों से इस राजा की इस प्रकार की कीर्ति सुनी थी कि ‘राजा जनक से श्रेष्ठ दानी कोई नहीं है।’ अतः तृप्ति की कामना से मैं यहाँ आया हूँ, बिना तृप्त हुए कैसे चला जाऊँ ?॥ ४१ ॥

[ कौण्डिन्य बोले—हे प्रिये ! ] — लोगों के मौन हो जाने पर भ्रमण करते हुए उन द्विजश्रेष्ठ ने विरोचना और त्रिशिरा नामक ब्राह्मण-दम्पती के सुन्दर भवन को देखा ॥ ४२ ॥ [ गणेशजी के गणों ने कहा- ] हे श्रेष्ठ [योगिजनो!] [तदनन्तर] वे [ द्विजरूपधारी भगवान् गजानन] सभी प्रकार के गृहोपकरणों से रहित और धातुपात्रों से हीन उस भवन में गृहस्वामी की भाँति प्रविष्ट हुए ॥ ४३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘जनकके सत्त्वका हरण’ नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥

[^1]: शस्यं क्षेत्रगतं प्राहुः सतुषं धान्यमुच्यते ।
आमान्नं वितुषं प्रोक्तं सिद्धमन्नं प्रकीर्तितम् ॥

अर्थात् खेत में जो भी तैयार फसल खड़ी है, उसे शस्य कहते हैं। तुष (छिलका)-युक्त अनाज को धान्य कहते हैं। छिलकारहित अनाज को आमान्न (कच्चा अन्न) तथा आग में पके हुए अनाज को सिद्ध अन्न कहते हैं।

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