August 29, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-67 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ सड़सठवाँ अध्याय दूर्वांकुर की महिमा के प्रति संशयग्रस्त आश्रया को कौण्डिन्यमुनि का इन्द्र के पास दूर्वांकुर के भार के बराबर स्वर्ण लाने के लिये भेजना और एक दूर्वांकुर पर त्रैलोक्य की सम्पदा का भी न्यून होना अथः सप्तषष्टितमोऽध्यायः एकस्यापि दूर्वाङ्कुरस्य कौण्डिन्यपत्न्यै आश्रयप्रदाने सामर्थ्यम् [ गणेशजी के ] गण बोले — [ हे योगीश्वरो !] उन मुनि कौण्डिन्य के द्वारा आज्ञा दिये जाने पर अपने अभिप्राय की सिद्धि के लिये आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर इन्द्र के पास गयी और उनसे कहा — ‘हे शक्र ! हे सुरेश्वर ! मैं अपने पति की आज्ञा से तुम्हारे पास याचना करने आयी हूँ; मुझे शुद्ध स्वर्ण प्रदान कीजिये ‘ ॥ १-२ ॥ इन्द्र बोले — [ हे साध्वि !] तुम यहाँ क्यों आयी हो ? तुम्हारे पति की जो आज्ञा थी, उसे तुम मुझे प्रेषित कर देती तो मैं अपनी शक्ति के अनुसार तुमको स्वर्ण भिजवा देता ॥ ३ ॥ आश्रया बोली — हे देव ! हे शचीपते ! मैं [इस ] दूर्वांकुर की तौलभर ही स्वर्ण लूँगी, न उससे कम और न ही उससे अधिक ॥ ४ ॥ इन्द्र बोले — हे दूत ! तुम इन्हें शीघ्र ही कुबेर के भवन में ले जाओ। वे [इस] दूर्वांकुर के परिमाणभर शुद्ध स्वर्ण दे देंगे ॥ ५ ॥ [गणेशजीके ] गण बोले — तदनन्तर देवराज इन्द्र की आज्ञा से वह देवदूत आश्रया के साथ कुबेर के भवन गया ॥ ६ ॥ दूत बोला — [ हे धनाधिपति!] इन साध्वी मुनिपत्नी को इन्द्र ने मेरे साथ भेजा है, मैंने इन्हें आपके भवन पहुँचा दिया। इन्हें आप [इस] दूर्वांकुर के परिमाण भर स्वर्ण प्रदान कर दें । हे देव ! आपको नमस्कार है, अब मैं जाता हूँ ॥ ७१/२ ॥ कुबेर बोले — [ हे दूत!] मैं अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया हूँ कि मुनि कौण्डिन्य, इन्द्र तथा आश्रया भी अज्ञान के वशीभूत हो गये; वे यह नहीं जानते कि दूर्वांकुर का परिमाण कितना होगा ? उतने सोने में क्या होगा ? उन्होंने अधिक स्वर्ण की माँग क्यों नहीं की ? ॥ ८-९ ॥ [ गणेशजी के ] गण बोले —[ इस प्रकार कहकर ] कुबेर ने उसे बहुत-सा स्वर्ण दे दिया, परंतु आश्रया ने पति के भय से उस स्वर्ण को ग्रहण नहीं किया; क्योंकि उसे शंका थी कि यह सुवर्ण [दूर्वांकुर के परिमाण से ] कम या अधिक हो सकता है ॥ १० ॥ उसने [उस] दूर्वांकुर को स्वर्णकार की तुला पर रखा, परंतु [कुबेरप्रदत्त] वह स्वर्ण उसके तौल के बराबर न हुआ। तदनन्तर वणिक्- तुला लायी गयी, फिर भी [ स्वर्ण और दूर्वांकुर की] समतुल्यता नहीं हुई । तब तैलकार की तुला द्वारा तोलने का कार्य किया गया, परंतु फिर भी स्वर्ण और दूर्वांकुर की समतुल्यता नहीं हो सकी ॥ ११-१२ ॥ तत्पश्चात् वहाँ धट (बड़ा तराजू) बाँधा गया। उसके एक पलड़े में स्वर्ण रखा गया और दूसरे पलड़े पर दूर्वांकुर रखा गया। यहाँपर भी दूर्वांकुर वाला पलड़ा भारी होने के कारण नीचे चला गया। तब कुबेर ने अन्य बहुत- सा स्वर्ण [स्वर्णवाले पलड़े पर] रखा, परंतु वह भी उस दूर्वांकुर के समतुल्य नहीं हो पाया ॥ १३-१४ ॥ तब उन्होंने अपने कोश का पर्वतराज हिमालय की भाँति [बृहदाकार] सम्पूर्ण द्रव्य दे दिया, फिर भी उस द्रव्य से दूर्वांकुर की समता न हो सकी ॥ १५ ॥ तदनन्तर आश्चर्यचकित कुबेर ने पत्नी को बुलाया और उनसे कहा कि हे सुभ्रु ! मेरे आदेश से पहले तुम इस धट [-के पलड़े] – पर चढ़ो, यदि तब भी यह दूर्वांकुर के समतुल्य नहीं हुआ, तो अपने सत्त्व की रक्षा के लिये मैं भी इसपर आरूढ़ हो जाऊँगा । तब वह पतिव्रता पति की आज्ञा से उस धट [-के पलड़े] – पर चढ़ गयी ॥ १६-१७ ॥ जब वह भी उस दूर्वांकुर की समतुल्यता न कर सकी, तो कुबे ने स्वयं सहित अपनी सम्पूर्ण (अलका) – पुरी को उस धट के (पलड़े के) मध्य में रखवा दिया, परंतु फिर भी वह दूर्वांकुर वाला पलड़ा ऊपर न उठा ॥ १८ ॥ [इस आश्चर्यमयी घटना का ] दूत के मुख से वृत्तान्त सुनकर इन्द्र गजारूढ़ हो वहाँ पर आये और अपने द्रव्यसहित स्वयं भी धट [ – के पलड़े ] – पर चढ़ गये ॥ १९ ॥ तब भी वह दूर्वांकुर ऊपर की ओर नहीं उठा । [यह देख] इन्द्र यह सोचते हुए कि यह क्या हो रहा है ? चिन्तित हो गये। उन्होंने [लज्जित होकर ] अपना मुख नीचे कर लिया ॥ २० ॥ उन्होंने उस तराजू के पलड़े पर चढ़ने के लिये विष्णु और शिव का स्मरण किया। तब वे दोनों [महान् देवता] भी अपने-अपने नगरों सहित वहाँ आ गये और उन दोनों ने भी उस धट पर आरोहण किया ॥ २१ ॥ परंतु तब भी वह दूर्वांकुर स्पष्ट रूप से ऊपर नहीं उठा। तब वे — शिव, विष्णु, धनाधिपति कुबेर, वरुण, इन्द्र, अग्नि और वायु आदि देवता उस धट से उतर आये तथा कौण्डिन्यमुनि के पास गये। सभी देवता, देवर्षि, सिद्धगण, विद्याधर और नाग उन मुनि के पास वैसे ही पहुँचे, जैसे दिन की समाप्ति पर सायंकाल में पक्षी अपने घोंसले में पहुँच जाते हैं । [तदनन्तर] उद्विग्न चित्तवाले उन सबने मुनि को नमस्कारकर कहा — ॥ २२–२४ ॥ सभी [ देवता, ऋषि आदि ] बोले — हे मुने! हमारे पूर्वजन्मों के पुण्यों का उदय हुआ है, जो आपका दर्शन हुआ। इससे हमारे सारे पाप नष्ट हो गये और अब हमारा कल्याण हो जायगा ॥ २५ ॥ आपकी पत्नी ने हम सबके सत्त्व (बल) – का आज हरण कर लिया है – यह स्पष्ट रूप से प्रकट है। दूर्वांकुर की उत्पत्ति और उसकी महिमा को हम नहीं जानते ॥ २६ ॥ आपके द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित और गणेशजी के सिर पर स्थित एक ही दूर्वांकुर की समतुल्यता तीनों लोक भी नहीं कर सकते ॥ २७ ॥ दूर्वांकुर की महिमा को सम्यक् रूप से कौन जान सकता है; यज्ञ, दान, व्रत, तप और स्वाध्याय भी उसकी समता नहीं कर सकते ॥ २८ ॥ निरन्तर जप और तप में लीन रहने वाले गजानन गणेशजी के एकनिष्ठ भक्त आपकी भी महिमा को सम्पूर्ण प्राणियों में भला कौन जान सकता है ? ॥ २९ ॥ इस प्रकार कहकर उन सबने पहले गणेशजी का पूजनकर तदनन्तर भार्यासहित मुनि का गीत, नृत्य और स्तवन [आदि ] – से पूजन किया ॥ ३० ॥ [तदनन्तर गणेशजी का स्तवन करते हुए उन सबने कहा —] हे देव ! आपका स्वरूप वेदों द्वारा भी अज्ञात है, आपकी महिमा को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वायु, अग्नि, सूर्य, यम, शेष, सम्पूर्ण ( षोडश) कलाओं से युक्त चन्द्रमा, वरुण, अश्विनीकुमारद्वय, बृहस्पति, गरुड़, यक्षराज कुबेर और देवी सरस्वती भी नहीं जानते हैं ॥ ३१ ॥ इस प्रकार देवाधिदेव गजानन गणेशजी का स्तवनकर उन सबने मुनि कौण्डिन्य की आज्ञा लेकर अपने-अपने निवास स्थान के लिये प्रस्थान किया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर आश्रया भी दूर्वा के उत्तम माहात्म्य को जानकर पति के वचनों के प्रति विश्वस्त होकर उन विघ्नेश्वर गणेशजी का पूजन करने लगी, जो सभी देवताओं के भी देवता हैं और सभी के द्वारा दूर्वांकुरों से अर्चित हैं। अत्यन्त निर्मल चित्त से उसने अपने पति कौण्डिन्यमुनि को प्रणाम किया और अपने-आपकी अत्यन्त निन्दा करते हुए कहने लगी — ॥ ३३–३४१/२ ॥ आश्रया बोली — हे स्वामिन्! मुझ जैसी कोई दुष्टा नहीं है, जिसने आपके भी वचनों पर संशय किया। आप विशेष ज्ञानवालों से भी अधिक विशेष ज्ञानवाले हैं। सम्पूर्ण प्राणियों पर दयाभाव रखने वाले हे प्रभो ! आपने उचित ही किया । [ मैंने जो आपके वचनों पर अविश्वास किया,] मेरे उस अपराध को अब आप क्षमा करें। मैं आपकी शरण में आयी हूँ ॥ ३५-३६१/२ ॥ तदनन्तर दूर्वा के उत्तम माहात्म्य को जानकर उन दोनों ने प्रातः काल शीघ्र उठकर और दूर्वा लाकर स्नान करके सम्यक् प्रकार से गणेशजी का पूजनकर अनन्य भक्तिभाव से दूर्वांकुर का अर्पण किया ॥ ३७-३८ ॥ वे दोनों यज्ञ, व्रत, दान आदि का त्याग करके सायं-प्रातः निरन्तर देवाधिदेव गणेशजी का ही पूजन करते थे। यह जानकर परम दयालु भगवान् गजानन गणेशजी ने उन्हें अपने धाम में पहुँचा दिया ॥ ३९१/२ ॥ [ गणेशजीके ] गण बोले — [ हे मुनीश्वरो ! हमने] दूर्वा के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया, जो अगाध है। जिसके एक पत्र की तुलना तीनों लोक नहीं कर सकते, उस दूर्वांकुर की सम्पूर्ण महिमा का वर्णन करने में न तो [सहस्र मुखवाले] शेषनाग समर्थ हैं, न ही विष्णु और शिव ॥ ४०-४१ ॥ दूर्वा के स्मरणमात्र से त्रिविध पाप नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उसका स्मरण करने पर भगवान् गजानन का भी स्मरण हो जाता है। इस प्रकार चिन्तामणिक्षेत्र के माहात्म्य का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया, जिसके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करने से भोग और मोक्षरूपी फल की प्राप्ति होती है ॥ ४२-४३ ॥ इसी कारण उन तीनों (रासभ, वृषभ और चाण्डाली) – के लिये सुन्दर विमान भेजा गया था । गधे और बैल के मुख से [निकलकर] दूर्वा भगवान् गणेशजी [के मस्तक ]- पर पहुँची थी। चाण्डाली द्वारा तृणों का भार शीतनाश के लिये लाया गया था। प्रबल वायु के झोंके से [उड़कर उसमें से] एक दूर्वा गजानन गणेशजी [के मस्तक]-पर पहुँच गयी; क्योंकि दूर्वा उनको प्रिय है, इसलिये वे विनायक उससे प्रसन्न हो गये और उन तीनों के निष्पाप हो जाने के कारण उन्होंने उन्हें अपना सान्निध्य प्रदान किया ॥ ४४–४६ ॥ दूर्वा के गन्धमात्र से वे प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, भक्तिपूर्वक उसकी चर्चा करने से प्रसन्न हो जाते हैं, तो फिर मस्तक पर दूर्वा के अर्पण से होने वाली उनकी प्रसन्नता का भला क्या कहना ? ॥ ४७ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी ! ] इस प्रकार [गणेशजी के] गणों द्वारा कही गयी दूर्वा की महिमा का राजा [कृतवीर्य के पिता ] -ने श्रवण किया, जिसे मुनियों ने भी [कभी] न देखा था, न सुना था ॥ ४८ ॥ तदनन्तर राजा ने स्नानकर दूर्वांकुरों को लेकर [उनसे] भगवान् विनायक का पूजन किया, तत्पश्चात् उसके सेवकों ने भी दूर्वांकुरों से श्रीगजानन का अर्चन किया ॥ ४९ ॥ [इससे] वे सभी दिव्य शरीरवाले और तेज से सूर्यसदृश कान्तिमान् हो गये। उन सबने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनके अंगों में दिव्य चन्दन का लेप लगा था। देवताओं द्वारा बजाये जा रहे वाद्यों की अनेक प्रकार की ध्वनियों का श्रवण करते हुए वे एक श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर गणेशजी के धाम को चले गये और उनमें से कुछ ने उनका रूप धारण कर लिया अर्थात् उन्हें सारूप्य मुक्ति प्राप्त हो गयी ॥ ५०-५१ ॥ उस [गणेश]-महोत्सव को देखने के लिये कुछ नागरिक जन भी आये थे, उन्होंने भी गणेशजी के पृथक्- पृथक् इक्कीस नामों [^1] से दूर्वांकुरार्चन किया ॥ ५२ ॥ वे सभी समस्त भोगों का भोगकर गणेशजी के धाम को चले गये और उनके पुण्यसमूह के प्रभाव से विमान भी ऊर्ध्वगामी हो गया ॥ ५३ ॥ इसलिये गणेशजी के भक्त को दूर्वांकुरों से उनका अर्चन करना चाहिये। जो मनुष्य प्रमादवश दूर्वांकुरों से उनका अर्चन नहीं करता, उसे चाण्डाल जानना चाहिये । वह अनेक नरकों में जाता है। मनुष्य को कभी भी उसका मुख नहीं देखना चाहिये ॥ ५४-५५ ॥ उन देवदेव गजानन का जो व्यक्ति दूर्वांकुरों से अर्चन करता है, उसके दर्शन से अन्य पापी व्यक्ति भी शुद्धि को प्राप्त कर लेते हैं ॥ ५६ ॥ यदि बहुत-से दूर्वांकुरों की प्राप्ति न हो सके तो एक दूर्वा से ही पूजन करे, उस एक दूर्वा से भी की गयी पूजा [बिना दूर्वा के की गयी पूजा से] करोड़ों गुना फल देती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५७ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे राजन् ! इस प्रकार मैंने अनेक प्रकार से दूर्वा की महिमा का इतिहास सहित वर्णन कर दिया है, इसके श्रवण से पाप का नाश होता है। इसे अपने प्रिय पुत्र को बतलाना चाहिये, दुष्ट बुद्धि वाले को न बतलाये ॥ ५८१/२ ॥ इन्द्र बोले — इस परम उत्तम आख्यान को ब्रह्माजी के मुख से सुनकर कृतवीर्य के पिता आनन्दित और परम प्रसन्न हुए। उन्होंने कमलासन ब्रह्माजी को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा लेकर मन में आश्चर्य करते हुए अपने स्थान को चले गये ॥ ५९-६० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में दूर्वामाहात्म्य के अन्तर्गत सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ [^1]: १. गणाधिपाय नमः, २.उमापुत्राय नमः, ३. अघनाशनाय नमः, ४. एकदन्ताय नमः, ५. इभवक्त्राय नमः, ६. मूषकवाहनाय नमः, ७, विनायकाय नमः, ८.ईशपुत्राय नमः, ९.सर्वसिद्धिप्रदाय नमः, १०. लम्बोदराय नमः, ११. वक्रतुण्डाय नमः, १२.मोदकप्रियाय नमः, १३. विघ्नविध्वंसक नमः, १४. विश्ववन्द्याय नमः, १५. अमरेशाय नमः, १६. गजकर्णाय नमः, १७. नागयज्ञोपवीतिने नमः, १८. भालचन्द्राय नमः, १९. परशुधारणे नमः, २०. विघ्नाधिपाय नमः, २१. विद्याप्रदाय नमः । (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड ६९ । ३५) Content is available only for registered users. 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