August 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-71 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ इकहत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थी व्रत के उद्यापन की विधि, संकष्टचतुर्थी व्रत के अनुष्ठान से राजा कृतवीर्य को पुत्रप्राप्ति अथः एकसप्ततितमोऽध्यायः सङ्कष्टचतुर्थीव्रतोद्यापनाविधिः राजा बोले — हे महाप्राज्ञ [ब्रह्माजी ] ! इस (संकष्ट चतुर्थी)- व्रत का उद्यापन कैसे करना चाहिये ? संसार हित की कामना से उसे मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे नरेन्द्र ! व्रत की सम्पूर्णता के लिये प्रथम, पंचम अथवा सप्तम मास में उद्यापन करना चाहिये ॥ २ ॥ भक्तिमान् मनुष्य पूर्व में बतलाये गये विधान के अनुसार [गणेशजी का] पूजन करे । पुष्पमण्डपिका का निर्माणकर उसे अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित करे। उसमें अनेक प्रकार के रंगों से सर्वतोभद्र मण्डल की रचना करके पूर्व की भाँति वहाँ कलश के ऊपर देवेश्वर गणेशजी [-की प्रतिष्ठा कर उन] – का पूजन करे ॥ ३-४ ॥ [तदनन्तर] सावधानचित्त होकर सुगन्धित चन्दन, अनेक प्रकार के पुष्पों और नारिकेल फल से [ निम्न मन्त्र से] अर्घ्यदान करे। तिथियों में उत्तम हे देवि ! हे गणेशजी की प्रिय वल्लभा ! [ इस ] अर्घ्य को ग्रहण कीजिये और मेरे संकटों का निवारण कीजिये। हे देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ५-६ ॥ [ तदनन्तर गणेशजी को निम्न मन्त्र से अर्घ्य प्रदान करे — ] हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी ! आपको निरन्तर नमस्कार है । हे देव ! अर्घ्य को ग्रहण कीजिये और [ इस] मेरे संकटों का निवारण कीजिये, आपको नमस्कार है ॥ ७ ॥ [तत्पश्चात् निम्न मन्त्र से चन्द्रदेव को अर्घ्य दे — ] ‘ क्षीरसागर [- का मन्थन होने] से प्रकट हुए, अत्रिगोत्र में उत्पन्न हे चन्द्रदेव ! मेरे द्वारा दिये गये अर्घ्य को रोहिणी सहित ग्रहण करें ॥ ८ ॥ तदनन्तर गणेशजी को भोज्य, भक्ष्य, लेह्य (चाटकर खाये जाने वाले पदार्थ, यथा चटनी आदि), पेय तथा चोष्य (चूसकर खाये जाने वाले) पदार्थ निवेदित करे । अन्य अनेक प्रकार के बहुत-से फलों से भी गणनायक गणेशजी को प्रसन्न करे ॥ ९ ॥ उसके बाद आचार्य और इक्कीस ऋत्विजों का वहाँ वरण करे और ‘गणानां त्वा०’ इस मन्त्र से अथवा मूल मन्त्र से दस हजार, एक हजार अथवा उसकी आधी (पाँच सौ) या एक सौ आठ आहुतियों से हवन करे; तदनन्तर बलि प्रदान करे ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर पूर्णाहुति हवन करके [हवन की अग्नि में] वसोर्धारा गिराये। हवन के शेष कृत्यों का सम्पादन करके उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् उन ब्राह्मणों को यथाशक्ति वस्त्रयुगल (धोती-उत्तरीय), कलश और आसनसहित दक्षिणा प्रदान करे। इस कार्य में वित्तशाठ्य (कंजूसी) न करे ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् वस्त्रों एवं अलंकरणों आदि से आचार्य का पूजन करे। उनके भोजन कर लेने के उपरान्त उन्हें फल सहित वायन प्रदान करे। वायन से पूर्णतया भरे हुए सूप को लाल वस्त्र से लपेटकर गणेशजी की सुवर्ण प्रतिमा को दक्षिणासहित उन्हें (आचार्य को ) प्रदान करे ॥ १४-१५ ॥ तदुपरान्त व्रत की सम्पूर्ति के लिये एक आढक (६४ मुट्ठी) तिल तथा सम्यक् रूप से विभूषित सवत्सा कपिला गौ भी उन्हें प्रदान करे ॥ १६ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणों से क्षमा-याचनाकर ‘अनेन पूजनेन भगवान् विघ्नेशः प्रीयताम्’ (इस पूजन से भगवान् गणेश प्रसन्न हों) – ऐसा कहे। इस प्रकार से इस व्रत का उद्यापन करके (मनुष्य) अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥ १७ ॥ [कृतवीर्य के ] पिता बोले — [ हे पुत्र !] इस प्रकार से ब्रह्माजी ने लोकोपकार के लिये मुझे जिस व्रत का उपदेश दिया था, उसे ही मैंने इस समय तुम्हें बतलाया है । पुत्र की प्राप्ति के लिये तुम इसे आदरपूर्वक करो ॥ १८ ॥ इन्द्र बोले — [ हे राजा शूरसेन !] जिस प्रकार से इस महान् व्रत को करने का पिता ने उपदेश दिया था, बुद्धिमान् कृतवीर्य ने वैसे ही उसे किया ॥ १९ ॥ पण्डितों ने उस उत्तम व्रत का भलीभाँति व्याख्यान करके प्रतिपादन किया। [उस व्रताराधन के अवसर पर ] स्वर्णनिर्मित तथा सिद्धि एवं बुद्धि से युक्त गणपति- मूर्ति को महामण्डपिका के मध्य स्थल में स्थापित करके ब्राह्मणों के द्वारा कहीं पुराणों का पाठ किया जाता था, कहीं शास्त्रों की मीमांसा हो रही थी, कहीं नृत्य-गान हो रहा था । विविध प्रकार के वाद्यों की ध्वनियाँ निकलकर आकाश को व्याप्त कर रहीं थीं । कहीं शास्त्रीय तात्पर्य- निर्णय लोगों के द्वारा किया जा रहा था, जिसमें कुछ लोग निर्णायक बने थे ॥ २०–२२ ॥ उस महाबुद्धिमान् राजा ( कृतवीर्य) -ने [ गणपति के] श्रेष्ठ मन्त्र का जप किया। जप करने के पश्चात् हवन तथा पूजन करके बहुत-से ब्राह्मणों को भोजन भी करवाया और उन्हें [वस्त्राभूषणों से] अलंकृत करके अलंकारों से युक्त गायें भी प्रदान कीं । उसने दीन, अन्धे तथा दुखी जनों को भोजन और उनको अनेक प्रकार के दान भी दिये ॥ २३-२४ ॥ [भोजनादि से] सन्तुष्ट हुए उन सभी जनों से उस राजा ने पुत्र – प्राप्ति का आशीर्वाद ग्रहण किया। उन तपोनिष्ठ तथा सर्वदा सत्य – भाषण करने वाले द्विजों के आशीर्वाद से थोड़े ही समय में रानी गर्भवती हो गयी और उसने मंगलमय मुहूर्त में [ श्रेष्ठ] लक्षणों वाले पुत्र को जन्म दिया ॥ २५-२६ ॥ पुत्रजन्म से अत्यन्त हर्षित उस राजा ने अनेकविध दान दिये और यथावसर उसका यज्ञोपवीत तथा विवाह भी सम्पन्न किया । ज्ञान-विज्ञान से समन्वित उस पुत्र का राज्याभिषेक करके वह श्रेष्ठ पुत्रवाला तथा नानाविध भोगों से सम्पन्न राजा अन्त में भगवान् गणेशजी के परम पद को प्राप्त हुआ ॥ २७-२८ ॥ उस राजा के पुण्य से वे सभी ऋत्विज, पण्डित तथा सभी दर्शक भी उसीके साथ भगवान् गणपति के परम धाम को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘संकष्टचतुर्थीव्रतोद्यापन-विधि-वर्णन’ नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥ Content is available only for registered users. 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