श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-099
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
निन्यानबेवाँ अध्याय
नौवें वर्ष में गुणेश्वर का बालकों के साथ जलक्रीडा करना, गुणेश द्वारा अश्वरूपी दैत्य का वध, नागकन्याओं का गुणेश को नागलोक ले जाना, भगासुर नामक दैत्य के वध की कथा
अथः नवनवतिमोऽध्यायः
मयूरेशपातालप्रयाणं

ब्रह्माजी बोले — गुणेश्वर ने नौवें वर्ष की अवस्था में एक अद्भुत कार्य किया। एक बार वे अपने वाहन मयूर पर विराजमान होकर चारों हाथों में पाश, अंकुश, पद्म और परशु — इन चार आयुधों को धारणकर बालकों के साथ क्रीड़ा के लिये निकल पड़े। उस समय उन्होंने विविध अलंकार धारण किये हुए थे, वे मृग की नाभि से प्राप्त होने वाली कस्तूरी का तिलक लगाये हुए थे और उन्होंने दिव्य वस्त्रों को धारण किया हुआ था ॥ १-२ ॥ पूर्णिमा के चन्द्रमा की कान्ति के समान वे सुशोभित हो रहे थे, श्रीसम्पन्न वे गुणेश्वर बालकों के द्वारा जय-जयकार के साथ स्तुत हो रहे थे। कुछ बालक उनको प्रणाम कर रहे थे और कुछ उनका छत्र और ध्वज पकड़े हुए थे। कुछ बालक चँवर डुला रहे थे, उनके दर्शन से बालकों को महोत्सव की प्रतीति हो रही थी । क्रीडा करते हुए वे सभी एक सरोवर के पास जा पहुँचे, जो पाँच योजन विस्तार वाला था ॥ ३-४ ॥

वह सरोवर अगाध जल वाला था और मगर, मत्स्य, कछुआ तथा मेढकों से समन्वित था। वह चारों ओर से लताओं तथा वृक्षों से घिरा हुआ था, वहाँ नाना प्रकार के पक्षीगण रहते थे। कुछ बालक उछलकर उस सरोवर के जल में कूद पड़े और कुछ धीरे-धीरे उस सरोवर के जल में उतरे। उस सरोवर के तटप्रदेश पर फलों से लदा हुआ एक विशाल आम का वृक्ष देखकर मयूरेश उसपर चढ़ गये और अन्य बालक भी आम के फलों को खाने की इच्छा से उसपर चढ़े ॥ ५–६१/२

आम के फलों के द्वारा वे बालक परस्पर में एक- दूसरे को मारते हुए इस प्रकार से क्रीड़ा करने लगे कि किसी का अंग-भंग न हो। इस क्रीड़ा में पलायित कुछ बालक उस वृक्ष की डालियों को तोड़ते हुए उस सरोवर के जल में गिर रहे थे। इस प्रकार वे सब खेल खेल ही रहे थे कि एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा, वह घोड़े का रूप बनाया हुआ था ॥ ७-८ ॥ उस दैत्य के पावों के प्रहार से पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे और उसके हिनहिनाने के शब्द से तीनों लोक काँप उठते थे। वह अपनी पूँछ की चंचलता से अनेक प्राणियों को मार डालता था। अश्वरूपी वह दैत्य उस आम के वृक्ष के तने पर अपने कन्धे को रगड़ने लगा । उस दैत्य के [दारुण] गर्जन से वृक्ष के कम्पित हो जाने पर बालक गुणेश गिर पड़े ॥ ९-१० ॥

जब गुणेश वृक्ष से सरोवर के जल में गिर पड़े तो कुछ बालक भयभीत होकर भाग गये और वृक्ष से गिरने से कुछ बालकों के सिर फूट गये, कुछ बालक जल्दी- जल्दी उस वृक्ष से उतरने लगे ॥ ११ ॥ जब गुणेश को जल के भीतर रहते हुए दो मुहूर्त का समय व्यतीत हो गया, तो वे सभी मुनिबालक रोने लगे । वे आपस में कहने लगे कि हम माता उमा से क्या कहेंगे और कैसे उन्हें अपना मुख दिखलायेंगे ? ॥ १२ ॥ भगवान् शंकर भी क्रुद्ध होकर हमें भस्म कर डालेंगे। सरोवर के इस अगाध जल के भीतर प्रवेश करने में हम समर्थ नहीं हैं। वे गुणेश तो हमारे माता-पिता, पालन करने वाले, भाई, रक्षा करने वाले तथा सखा हैं ॥ १३१/२

ब्रह्माजी बोले — वे बालक इस प्रकार जब शोक कर रहे थे, उसी समय मयूरेश ने उस अश्वरूपी दैत्य के दोनों कान पकड़ लिये और उसे जल के भीतर खींचा। वे बलवान् प्रभु मयूरेश बलपूर्वक उस दैत्य के ऊपर आरूढ़ हो गये और अपने भार से उस दैत्य को बार-बार जल के भीतर डुबाने लगे ॥ १४-१५ ॥ वह अश्वरूपी दैत्य अपने नेत्रों से तथा मुख से बार-बार बहुत-सा जल उगलने लगा। उसके कानों में तथा श्वासमार्ग में जल भर गया और भीषण शब्द करते हुए उसने प्राण त्याग दिये । मयूरेश ने अपने एक हाथ से पकड़कर हिला-डुलाकर उस दैत्य को जल से बाहर फेंक दिया । यह देखकर वे सभी बालक अत्यन्त हर्षित हो गये और बार-बार नृत्य करने लगे ॥ १६-१७ ॥ उन्होंने उस महान् दैत्य को भूमि पर सौ टुकड़ों में विभक्त हुआ देखा। उन सभी बालकों ने महान् बल तथा पराक्रम से सम्पन्न उन मयूरेश की प्रशंसा की । तदनन्तर वे सभी उन देव मयूरेश से कहने लगे — हम आपको मृत जानकर बहुत रोने लगे, किंतु तभी हमने दैत्य को मारकर सरोवर से बाहर आते हुए आपको देखा ॥ १८-१९ ॥

इसके अनन्तर वे सभी बालक उस सरोवर के जल में प्रविष्ट होकर अपनी-अपनी अंजलि में जल भरकर पुनः एक-दूसरे को भिगोने लगे । तदनन्तर उन सभी ने एक साथ ही गणनायक मयूरेश को जल से उसी प्रकार भिगो डाला, जैसे कि वर्षाकाल में मेघ पृथ्वी तथा पर्वतों को भिगो डालते हैं ॥ २०१/२

अपनी छः भुजाओं के द्वारा भी जब वे मयूरेश उन बालकों को भिगोने में सफल न हो सके, तब उन्होंने उन बालकों पर अपने असंख्य हाथों से जल छिड़का। उस समय उस प्रकार का आश्चर्य देखकर वे सभी बालक परस्पर में एक-दूसरे से कहने लगे — ॥ २१-२२ ॥ ये छह भुजाओं वाले मयूरेश असंख्य भुजाओं वाले कैसे हो गये, तदनन्तर कुछ निराश-से हुए वे मुनियों के बालक उनसे कहने लगे — हे प्रभो ! कहाँ तो हम दो हाथ- वाले और कहाँ आप बल तथा ओज से सम्पन्न असंख्य भुजाओं वाले भुवनेश्वर। पुनः वे सभी कुछ रुष्ट-से होकर उन मयूरेश के ऊपर जल फेंकने लगे ॥ २३-२४ ॥ तदनन्तर अनन्त स्वरूप धारण करनेवाले वे गणनायक मयूरेश अपने तेज के प्रभाव से एक-एक बालक के सामने छः भुजावाला होकर उन सभी को जल से सींचने लगे। दूसरे ही क्षण वे मयूर पर आरूढ़ होकर चार आयुधों वाले रूप में दिखायी दिये। तब उन बालकों ने दोनों हाथ जोड़कर उन देव गुणेश्वर को प्रणाम किया ॥ २५-२६ ॥

तदनन्तर उन्होंने उन गुणेश्वर के मुख के भीतर सभी स्वर्गों से समन्वित विश्व को देखा। इसके साथ ही गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, नदियों, समुद्रों, वृक्षों और देवताओं, असुरों तथा मनुष्यों से युक्त समस्त चराचर विश्व का दर्शन किया। इस प्रकार का दृश्य देखकर वे बालक भय से व्याकुल हो उठे और उन प्रभु की इस प्रकार प्रार्थना करने लगे ॥ २७-२८ ॥

बालक बोले — हे अखिल विश्व के स्वामी ! इस समय हम न अपने को जान पा रहे हैं और न किसी दूसरे को ही जान पा रहे हैं, हे विभो ! हम पर कृपा करके आप एक रूप वाले हो जायँ ॥ २९ ॥

ब्रह्माजी बोले — उन सबकी इस प्रकार की प्रार्थना को सुनकर वे प्रभु अपने पूर्ववत् स्वरूप में हो गये। इसी समय की बात है, वहाँ कुछ नागकन्याएँ क्रीड़ा करने लगीं। जिनको देख लेनेमात्र से आठ प्रकार की नायिकाएँ अत्यन्त लज्जित हो उठती थीं और जिनके नेत्रों को देखकर हरिणियाँ अत्यन्त लज्जित होकर भाग जाती थीं ॥ ३०-३१ ॥ उनका शरीर अतिसुन्दर था, वे सभी प्रकार के अलंकारों से विभूषित थीं, वे मयूरेश को देखकर कामाग्नि से जलती हुई अत्यन्त विह्वल हो उठीं ॥ ३२ ॥ वे सभी नागकन्याएँ एक साथ कहने लगीं कि यदि ये हमारे स्वामी हो जाते तो हमारा जन्म लेना सफल हो जाता, हमारा जीवन सफल हो जाता और हमारी तरुणावस्था भी सफल हो जाती ॥ ३३ ॥

तब उन्होंने धैर्य धारणकर उन गुणेश से पूछा — आपका आगमन कहाँ से हुआ है, आपके मुखमण्डल को देखकर हम लोगों के चित्त में अत्यन्त व्याकुलता हो उठती है। हे नरश्रेष्ठ! आप अपने शरीर का सम्पर्क कराकर हमारे चित्त को शान्ति प्रदान कीजिये ॥ ३४१/२

देव गुणेश बोले — मैं भगवान् शिव का पुत्र हूँ और मेरा ‘मयूरेश’ यह नाम विख्यात है। मुनियों के बलवान् बालकों ने मुझे सरोवर में डुबा दिया था, संयोगवश मुझे आपके चरणकमलों का दर्शन हुआ है ॥ ३५-३६ ॥

वे नागकन्याएँ बोलीं — आप हमारे घर में क्षणभर ठहरकर विश्राम करने की कृपा करें ॥ ३६१/२

देव गुणेश बोले — चूँकि मेरे वियोग में मेरी माता पार्वती अत्यन्त दुखी हो उठेंगी, अतः मैं आपके स्थान पर नहीं आऊँगा। आप सभी नागकन्याएँ वापस चली जायँ ॥ ३७१/२

ब्रह्माजी बोले — वे ऐसा कह ही रहे थे कि उसी समय वे नागकन्याएँ उन्हें पकड़कर अपने घरों को ले चलीं। उस समय पुनः उन गुणेश को न देखकर वे सभी मुनिबालक शोक करने लगे ॥ ३८१/२

बालक बोले — दयालु होने पर भी आज वे गुणेश्वर न जाने क्यों निष्ठुर हो गये हैं ? ॥ ३९ ॥ अमृतवर्षिणी किरणों वाला चन्द्रमा कभी भी उष्णता को प्राप्त नहीं होता, अपराधी होने पर भी पिता अपने पुत्रों का परित्याग नहीं करता। आप कहाँ चले गये हैं, आपके बिना हमारे प्राण चले जायँगे ॥ ४०१/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से कहते हुए कुछ बालक भूमि पर गिर पड़े। कुछ अपना सिर पीटने लगे और कुछ बालक अपने आश्रम को चल पड़े। मार्ग में उन बालकों ने गुणेश्वर के चरणकमलों का चिह्न देखा तो उन्होंने उन पदचिह्नों को प्रणाम किया और वे रो पड़े। उसी समय उन बालकों ने एक भगासुर नामक दैत्य को देखा ॥ ४१-४२ ॥ उस दैत्य के बालों के आघात से आकाशमण्डल के ग्रह-नक्षत्र जमीन पर गिर जाते थे। उसके पैर सौ योजन तक विस्तार वाले थे। वह भगासुर भूमि में अपना मुख फैलाकर उन बालकों के मार्ग में सोया हुआ था, वे बालक मयूरेश का ध्यान करते हुए और उन्हीं के विषय में चिन्ता करते हुए विह्वल होकर उसी मार्ग से आगे जा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥

आगे जाते हुए वे बालक उस भगासुर के पेट में उसी प्रकार प्रविष्ट हो गये, जैसे नदियाँ समुद्र के अन्दर चली जाती हैं। तब घबड़ाकर वे बालक आपस में अनेक प्रकार की बातें करने लगे। मयूरेश कहाँ चला गया, हम लोग कहाँ जायँ, हम दिशाओं को भी नहीं जान पा रहे हैं और न तो हमें अपने घर ही कहीं दिखायी दे रहे हैं ! ॥ ४५-४६ ॥ हमारी इन्द्रियों का स्वामी जो मन है, उसे तो उस गुणेश्वर ने अपने वश में कर रखा है, मन से रहित हम बालकों को कहाँ से ज्ञान हो सकता है ? ॥ ४७ ॥ हमारी माताएँ कहाँ हैं, हमारे भाई कहाँ हैं, हमारे पिता कहाँ हैं और वह गुणेश्वर कहाँ है, वे बालक जब इस प्रकार कह ही रहे थे कि उसी समय सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाले वे मयूरेश उनके सामने वहाँ पर प्रकट हो गये, उन्होंने अपने चार हाथों में अंकुश, पाश आदि चार आयुधों को धारण कर रखा था ॥ ४८१/२

गुणेश बोले — तुम लोग शोक मत करो, तुम लोगों के दुःख को समझकर ही मैं शीघ्र आ गया हूँ। वे बालक यह नहीं जान पाये थे कि वे भगासुर के पेट के अन्दर स्थित हैं ॥ ४९१/२  ॥

ब्रह्माजी बोले — गुणेश्वर ने उन मुनिपुत्रों को माया से मोहित कर दिया था ॥ ५० ॥ वे प्रभु गुणेश्वर उस दैत्य के उदर के भीतर स्थित होकर उसी प्रकार बढ़ने लगे, जिस प्रकार कि वामन भगवान् बढ़े थे। तब उन गुणेश्वर ने शीघ्रतापूर्वक उस दैत्य के शरीर को दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया ॥ ५१ ॥ इधर भगवान् सूर्य के अस्त हो जाने पर भी मुनिबालक अपने घर वापस नहीं लौटे तो उनके माता-पिता शोक से युक्त होकर अत्यन्त चिन्ता में पड़ गये ॥ ५२ ॥

वे परस्पर कहने लगे कि वह महाबलशाली पार्वतीपुत्र गुणेश हमारे बालकों को लेकर कहाँ चला गया अथवा बालकों के साथ वह भी क्या मृत्यु को प्राप्त हो गया है ? ॥ ५३ ॥ यदि वह जीवित होता तो वह भूख से पीड़ित होता हुआ सायंकाल को घर आ गया होता। कुछ बालकों के माता-पिता ने अपने बालकों को न पाकर अपने प्राणों का त्याग कर दिया था ॥ ५४ ॥ कुछ बालकों के माता-पिता ने यह कहा कि यह सारा वृत्तान्त गुणेश्वर की माता पार्वती को बता देना चाहिये। उनमें से कुछ मुनिजन वन में गये, उन्होंने वनों तथा पर्वतों में घूम-घूमकर देखा, किंतु वहाँ जब अपने बालकों को नहीं पाया तो वे खिन्न होकर वापस अपने घरों को लौट आये । बालकों के माता-पिता और सहोदर भाई लोग अनेक प्रकार से कोलाहल करने लगे ॥ ५५-५६ ॥

उनके रोने-चिल्लाने की आवाज को सुनकर कृपालु मयूरेश ने उन-उन बालकों के रूप में स्वयं को ही अलग-अलग प्रकट कर लिया। वे उन-उन बालकों के वैसे ही आभूषण धारण किये हुए थे, जैसे कि वे [बालक] पहनते थे, उनके वही – वही वस्त्र पहने हुए थे, जैसे वे पहनते थे, वे उन बालकों के समान ही शील एवं गुणों से समन्वित थे, उनके शरीर के जैसे-जैसे अंग-प्रत्यंग थे, वैसे ही उन्होंने भी बना लिये थे, इस प्रकार उन-उन बालकों के जैसा ही स्वरूप बनाकर वे उन-उनके घरों में प्रविष्ट हुए ॥ ५७-५८ ॥ बालक गुणेश ने उन-उन बालकों की अवस्था के समान अवस्था, वेषभूषा के समान वेषभूषा और उनकी लम्बाई-चौड़ाई के माप के समान ही सुन्दर शरीर की माप बनायी। तब माताएँ उन बालकों को उठाकर शीघ्र ही घर के अन्दर ले गयीं और उन्होंने प्रेमयुक्त तथा परम आनन्द में निमग्न होकर उन्हें अपना स्तनपान कराया। इस प्रकार पिता तथा माताओं के साथ उस समय अपने- अपने बालक ही दिखायी दिये ॥ ५९-६० ॥

तदनन्तर उन माताओं ने कुछ क्रुद्ध-सा होकर उनसे कहा — तुम लोग कहाँ थे, तुमलोग उषाकाल में ही कहाँ चले गये थे, न तो तुमने स्नान किया, न भोजन ही किया और न कुछ खाया ही है। अब आज के बाद तुम उस मयूरेश्वर के साथ कहीं नहीं जाओगे ॥ ६११/२

ब्रह्माजी बोले — बालकों को इस प्रकार से भलीभाँति समझाकर माताओं ने अपने-अपने बालकों का आलिंगन किया और अत्यन्त सुख का अनुभव किया ॥ ६२ ॥ शिवा पार्वती ने भी मयूरेश को सामने आया हुआ देखकर उनका आलिंगन करने के अनन्तर उनसे पूछा कि तुमने वन में क्या भोजन किया था ? तुम्हारे वियोग से उत्पन्न दुःख के कारण मैंने कुछ भी नहीं खाया है। हे वत्स ! दूध से भरे हुए मेरे स्तनों का पान करो और भलीभाँति भोजन करो । तदनन्तर माता ने जो-जो कहा, गुणेश्वर ने उन सभी (बातों) – का पालन किया ॥ ६३-६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘बालचरित में अश्वासुर  के वध का वर्णन’ नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९९ ॥

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