November 11, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-105 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ पाँचवाँ अध्याय मयूरेश की बारहवीं जन्मतिथि के महोत्सव में विष्णुभक्त ब्राह्मण विश्वदेव का वहाँ आना, पार्वती द्वारा उनका आतिथ्य, किंतु विश्वदेव द्वारा यह कहकर उनका आतिथ्य स्वीकार नहीं करना कि वे केवल विष्णु को ही भगवान् मानते हैं अन्य को नहीं, तब मयूरेश का अपनी माया द्वारा उनकी भेदबुद्धि को दूर करना, इस प्रसंग में गणेशभक्त पराशर की कथा अथः पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः विश्वदेवभेदबुद्धिनिरास ब्रह्माजी बोले — भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि की बात है, वे सभी मुनिबालक गणेशजी की मूर्ति बनाने के लिये मिट्टी लाने हेतु गये और वहाँ से स्वयं मिट्टी ले आये। उन मुनिबालकों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार नाना प्रकार की गणेश मूर्तियों का निर्माण किया । किसी ने सिंह पर आरूढ़ मूर्ति बनायी, किसी ने मयूर पर स्थित मूर्ति बनायी और किसी ने मूषक पर विराजमान गणेशजी की मूर्ति बनायी ॥ १-२ ॥ गणेशजी की वे मूर्तियाँ विविध प्रकार के आयुधों को धारण किये हुए थीं, नाना प्रकार के दिव्य अलंकारों से समन्वित थीं, वे चार भुजाओं वाली थीं और दिव्य गन्ध तथा दिव्य वस्त्रों से सुशोभित थीं, देखने में वे अति सुन्दर थीं। उन बालकों ने पुष्पों [से शोभित] तथा दर्पणों की आभा से सम्पन्न मण्डप में उन मूर्तियों को स्थापित करके पृथक्-पृथक् उपचारों के द्वारा अत्यन्त श्रद्धा-भक्ति के साथ उनका पूजन किया ॥ ३-४ ॥ उन्होंने कमल के पुष्पों से निर्मित अत्यन्त मनोहर मालाएँ उन्हें पहनायीं। उस समय बजती हुई तुरही की ध्वनि से वह मयूरेश की नगरी अत्यन्त हर्षित हो उठी थी । उस जन्मतिथि को जब बालक मयूरेश बारह वर्ष के हुए, माता गौरी ने उन्हें विधिवत् स्नान कराया और नानाविध अलंकारों तथा अन्य प्रसाधन- द्रव्यों के द्वारा उन्हें मण्डित किया, तदुपरान्त हरिद्रा, कुमकुम आदि के द्वारा भक्तिपूर्वक उपहार प्रदान किये ॥ ५-६१/२ ॥ सौभाग्यवती स्त्रियों का पूजन करके उनको अनेक प्रकार के उसी समय विश्वदेव नाम से प्रसिद्ध एक [ब्राह्मण-] देवता वहाँ उपस्थित हुए, वे भगवान् विष्णुका-सा रूप धारण किये हुए थे। उनका शरीर श्रीमुद्रा से सुशोभित था और शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से अलंकृत था । वे कण्ठ में अत्यन्त मनोहर तुलसीमाला धारण किये हुए थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे, दिव्य अनुलेप लगाया हुआ था । उन्होंने अपने हाथों में जलपूर्ण कमण्डलु तथा वेणुदण्ड धारण किया हुआ था ॥ ७–९ ॥ घर के द्वार पर स्थित उन अतिथि से देवी गौरी ने बड़ी ही श्रद्धा-भक्ति के साथ कहा — हे ब्रह्मन् ! आपका आगमन कहाँ से हुआ है, मैं आपके तेज को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ १० ॥ इस प्रकार से कहे गये वे विप्र उन गौरी से बोले — पहले मैंने तुम्हारे विषय में जो सुन रखा था, उस सबको आज अपनी आँखों से देखकर मेरा मन बहुत सन्तुष्ट हो गया है। तीर्थों में भ्रमण करता हुआ मैं मानसिक श्रान्ति का अनुभव कर रहा हूँ और भूख से पीड़ित हूँ, इसीलिये आपके घर आया हूँ ॥ १११/२ ॥ पार्वती बोलीं — आप आसन पर विराजमान हों और प्रसन्नमन होकर भोजन करें। तब वे विप्र वहाँ आसन पर बैठ गये ॥ १२ ॥ आसन पर बैठे हुए उन ब्राह्मणदेव के चरणों का मयूरेश ने प्रक्षालन किया और उस निर्मल तीर्थतुल्य जल को सर्वत्र छिड़ककर [अपने भवन आदि को] पवित्र किया। उनका पूजन करके उन्हें पायस तथा पक्वान्नों को समर्पित किया। वे द्विज आचमन करने के अनन्तर मौन तथा चिन्ता में मग्न हो गये ॥ १३-१४ ॥ यह देखकर पार्वती बोलीं — आप भोजन करें, भोजन करें। यदि यह अन्न आपके मनोनुकूल नहीं है, तो जो आपको सबसे अधिक प्रिय हो, उसे प्रदान करूँगी। अतः आप शीघ्र बतायें, भगवान् शंकर के प्रभाव से मैं वह अन्न शीघ्र ही प्रस्तुत करूँगी ॥ १५१/२ ॥ द्विज बोले — मैं क्षीरसागर में निवास करने वाले शेषशायी भगवान् विष्णु का दर्शन करके ही भोजन करता हूँ और तभी पानी भी पीता हूँ, यह मेरा नित्य का नियम है, किंतु आज मोहवश वह नियम मैं भूल गया हूँ ॥ १६१/२ ॥ उमा बोलीं — हे द्विजश्रेष्ठ ! आपने अपने नियम के विषय में पहले क्यों नहीं बतलाया ? हे सत्यनिष्ठा को झुठलाने वाले विप्र! भोजनपात्र को छोड़कर आप क्यों जाते हैं, इससे भगवान् शंकर क्षुब्ध होकर न जाने क्या कर बैठेंगे ॥ १७-१८ ॥ उसी समय मयूरेश बोल पड़े — यदि आपके हृदय में दृढ़ भावना है, तो यहीँ पर आपको शीघ्र ही उन पद्मनाभ विष्णु का दर्शन हो जायगा ॥ १९ ॥ यह आपका महान् अभाग्य ही दिख रहा है कि जो आप पक्वान्न तथा पायस का परित्यागकर जा रहे हैं अथवा हे द्विज! मोहवश आप कहाँ जा रहे हैं ? ॥ २० ॥ हे सुव्रत ! अनेक जन्मों की तपस्या के परिणामस्वरूप जिन भगवती का कृपाकटाक्ष लोक में लोगों को प्राप्त होता है, उन्हीं के द्वारा परोसे गये अन्न का आप क्यों परित्याग कर रहे हैं ? जो भगवती जगदम्बा ब्रह्मा आदि देवताओं के लिये भी सुलभ नहीं हैं, उन्हीं शिवा का आपको साक्षात् दर्शन हुआ है, वे समस्त लोकों की जननी और सभी स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ २१-२२ ॥ वे परम अद्भुत हैं और सभी देवताओं की शक्ति हैं। उनके दर्शन से ही भगवान् विष्णु के दर्शन हो पाते हैं। अग्नि का भोजन करने वाले पक्षी चकोर को जैसे मिष्टान्न अच्छा नहीं लगता है, वैसे ही अमृतोपम देवान्न भी क्या आपको अच्छा नहीं लग रहा है ? अथवा विश्वस्वरूप मेरे दर्शन से भी आपको श्रीविष्णु के दर्शन हो सकते हैं ॥ २३-२४ ॥ द्विज बोले — मैं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु का दास हूँ, उनके अतिरिक्त और किसी का मैं वन्दन नहीं करता, यदि आप सर्वस्वरूप हैं और यदि आपमें सामर्थ्य है तो मुझे उन अविकारी विश्वेश्वर नारायण का दर्शन कराइये ॥ २५१/२ ॥ वे मयूरेश्वर उन विप्र का उस प्रकार का दृढ़ निश्चय जानकर अन्तर्धान हो गये और फिर दूसरे ही क्षण नारायण विष्णु के रूप में प्रकट हो गये। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था, उन सर्वसामर्थ्यसम्पन्न विभु ने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे ॥ २६-२७ ॥ विविध प्रकार के अलंकारों से वे मनोरम लग रहे थे। सभी अलंकारों के धारण करने से वे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत हो रहे थे। उनका वक्ष:स्थल कौस्तुभमणि तथा वनमाला से अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २८ ॥ वे शेषनाग की शय्या पर शयन कर रहे थे और देवी महालक्ष्मी उनके चरणकमलों का संवाहन कर रही थीं। उन (विष्णुरूप मयूरेश) -का दर्शन करके द्विज विश्वदेव ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी पूजा की ॥ २९ ॥ वे अपने शरीर का भान भूलकर अनन्य भक्तिभाव के कारण उनमें तन्मय हो गये । चिदानन्द से परिपूर्ण होकर वे द्विजश्रेष्ठ कहने लगे — ॥ ३० ॥ आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया। आज मेरा जीवन जीना सफल हो गया, आज यह नगरी धन्य हो गयी, आज मेरे माता तथा पिता — दोनों धन्य हो गये ॥ ३१ ॥ मयूरेश्वर के उपदेश से तथा भवानी पार्वती के दर्शन से आप चराचरस्वरूप, परात्पर, सर्वान्तर्यामी एवं प्रभु विष्णु के साक्षात् दर्शन मुझे यहीं प्राप्त हुए हैं ॥ ३२१/२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णु ने भी अपने उस भक्त का बाहुओं में भरकर आलिंगन किया और प्रसन्न मनवाले वे आँसुओं से गद्गद वाणी में कहने लगे — [हे द्विज ! ] आपने मेरे लिये भोग का परित्याग कर दिया, मैं आपके निश्चय तथा दृढ़ एवं अविचल भक्ति को देखकर क्षीरसागर से यहाँ आया हूँ ॥ ३३-३४१/२ ॥ मैं अपने भक्त के मार्ग के काँटोंको हवा के द्वारा उड़ाकर उस मार्ग को जल से सिंचित कर देता हूँ । भक्त की प्यास को शान्त करने के लिये मैं जल का रूप धारण कर लेता हूँ। भक्तों के कष्टों का निवारण करने वाला मैं अनेक रूपों को धारण कर लेता हूँ । भक्त मुझे जिस प्रकार से प्रिय होते हैं, वह मैं आपको बतलाता हूँ ॥ ३५-३६१/२ ॥ एक बार की बात है, भाद्रपदमास की चतुर्थी तिथि को मयूरेश-महोत्सव हो रहा था। भगवान् मयूरेश की मिट्टी की अनेकों मूर्तियाँ बनायी गयी थीं, कोई मूर्ति मयूर पर विराजमान थी, कोई मूषक पर, तो कोई सिंह पर आसीन थी। विविध प्रकार के अलंकारों से वे शोभा पा रही थीं, उन्हें नाना रंगों से सुशोभित किया गया था ॥ ३७-३८ ॥ अनेक मुनियों तथा मुनिबालकों के द्वारा उन मूर्तियों का भलीभाँति पूजन किया गया। कोई उन मूर्तियों के सामने गीत गा रहे थे तो कोई भक्तिभाव से नृत्य कर रहे थे, कोई पुराणों का पाठ कर रहे थे, तो कोई मयूरेश की प्रदक्षिणा करने में निरत थे ॥ ३९१/२ ॥ उसी समय की बात है, महात्मा वसिष्ठजी के पौत्र [और शक्ति के पुत्र], जो पराशर के नाम से विख्यात थे, वे मुनि स्वेच्छा से भ्रमण करते हुए वहाँ आये। जब वे चार वर्ष की अवस्था के थे, तब उन्होंने भक्तिपरायण होकर मयूरेश की एक मूर्ति बनायी ॥ ४०-४१ ॥ सूखे पत्तों से माला बनायी और वह माला उन्हें पहनायी, कीचड़ में गन्ध का भाव रखकर उससे उस मूर्ति का आदरपूर्वक विलेपन किया। उन्होंने अनेक प्रकार के पत्तों तथा गीली मिट्टी से मिष्टान्न तथा लड्डू बनाकर उन्हें भोग लगाया और उन्हीं (पत्रादि ) – से दक्षिणा तथा फल भी समर्पित किये ॥ ४२-४३ ॥ खेल-खेल में ही पूजा का संकल्प लिया और अपनी जंघा को वाद्य के रूप में धीरे-धीरे बजाया । फिर वे मुहूर्तभर मूर्ति के सम्मुख नृत्य करने के अनन्तर ‘मेरे द्वारा निवेदित इस नैवेद्य का भक्षण करो’ इस प्रकार से उस मूर्ति से बार-बार प्रार्थना करते हुए रोने लगे। तब वह मिट्टी की मयूरेश की प्रतिमा सजीव हो उठी ॥ ४४१/२ ॥ उन बालक पराशर ने जिस-जिस प्रयोजन से जो-जो भी वस्तुएँ उनके समक्ष रखी थीं, वे सब वैसी ही हो उठीं अर्थात् मिट्टी के बनाये गये पदार्थ चन्दन, नैवेद्य आदि यथार्थरूप में हो गये । तदनन्तर उस सजीव प्रतिमा ने उन लड्डुओं, मोदकों और पायस से समन्वित विविध पक्वान्नों का भोग लगाया ॥ ४५-४६ ॥ पराशर ने उन सब मिथ्या के पदार्थों – मिट्टी, अन्न, पुष्प, फल आदि सबको सत्यरूप में तथा उस मिट्टी की मूर्ति को सजीव-साकार रूप में छः भुजा धारण किये हुए देखा, फिर दूसरे ही क्षण उसे चार भुजाओं से सुशोभित भगवान् विष्णु के रूप में देखा । तब (पराशर की इस कथा को सुनकर) वे (विश्वदेव) उन देवेश्वर (नारायण) – से बोले – मिट्टी का भोग लगाने का रहस्य क्या है? ॥ ४७–४८१/२ ॥ विष्णुस्वरूप गुणेश बोले — मुझे श्रद्धाभक्ति से जो कुछ भी समर्पित किया जाता है, वह अमृतरस के समान हो जाता है और श्रद्धाभक्ति से रहित अभक्त के द्वारा अर्पित किया गया अमृत भी मेरे लिये विष के समान हो जाता है ॥ ४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — उनका इस प्रकार का वचन सुनकर विश्वदेव पुनः बोले —॥ ५० ॥ हे सुरेश्वर ! आपका भक्त कौन है, उसका मुझे दर्शन कराइये । तदनन्तर उन विश्वदेव का हाथ पकड़कर [विष्णुरूप] मयूरेश्वर बाहर आये ॥ ५१ ॥ उन्होंने घर-घर में पूजित हो रहे उन देव मयूरेश्वर का उन्हें दर्शन कराया, जो मयूर पर विराजमान थे । वहाँ भी उन विश्वदेव ने अपने सहित उन मयूरेश्वर को देखा । ये मेरे स्वामी नहीं हो सकते, ऐसा निश्चय करके वे जब उस मूर्ति को छोड़कर अन्यत्र गये तो विश्वदेव ने घर-घर में नारायण विष्णु को देखा । फिर उन्होंने [विष्णु के स्थान पर] सर्वत्र गुणेश्वर को ही पूजित होते हुए देखा ॥ ५२–५४ ॥ कहीं-कहीं उन्होंने विष्णु का स्वरूप धारण किये हुए मयूरेश का दर्शन किया। पुनः देखने पर वह मूर्ति मयूरेश की दिखलायी पड़ी ॥ ५५ ॥ तदनन्तर वे मयूरेश अपनी लीला दिखाते हुए विश्वदेव का हाथ पकड़कर बाहर ले आये, किंतु वे विश्वदेव हाथ छुड़ाकर ‘मेरे स्वामी ये नहीं हैं’ — ऐसा कहते हुए वहाँ से चले गये ॥ ५६ ॥ फिर प्रत्येक घर में भ्रमण करते हुए उन्होंने विविध वाद्यों की ध्वनि तथा नृत्य एवं गीतों के गायन के साथ मयूरेश को पूजित होते हुए देखा ॥ ५७ ॥ कहीं उन्होंने विष्णुरूप में उस मूर्ति को देखा तो जब वे उसे प्रणाम करने गये तो वह मूर्ति उन्हें मयूरेश की दिखलायी दी, जो मयूर पर आरूढ़ थी ॥ ५८ ॥ कहीं पर वह मूर्ति गरुड़ पर आसीन दिखायी दी, तो कहीं पर शेषशय्या पर विराजमान दिखायी दी। जब वे विश्वदेव अत्यन्त प्रसन्न होकर उस मूर्ति को प्रणाम करने गये तो उसी क्षण वह मूर्ति उन्हें बार-बार मयूर पर आरूढ़ दिखायी देने लगी। वे मयूरेश उन विश्वदेव को कहीं भोजन करते हुए, कहीं आनन्द – विहार करते हुए तो कहीं सोते हुए दिखायी दिये ॥ ५९-६० ॥ तदनन्तर खिन्नमन होकर विश्वदेव महर्षि वसिष्ठ के आश्रम पर गये। उस समय उन मयूरेश ने उनसे कहा — मेरे श्रेष्ठ भक्त का दर्शन करो ॥ ६१ ॥ यह कहकर उन्होंने अपने समक्ष स्थित पराशर का दर्शन कराया। जो मिट्टी से बने हुए उपचारों के द्वारा उन गुणेश्वर की पूजा कर रहे थे और उनके अभीष्ट देव उनके द्वारा नैवेद्य के रूप में निवेदित किये गये मिट्टी के लड्डुओं का भोग लगा रहे थे। तदनन्तर विश्वदेव ने एक ही समय में आकाश में, जल में तथा भूमि में स्थित उन्हीं मयूरेश्वर को देखा ॥ ६२-६३ ॥ वे उस मूर्ति को एक क्षण में नारायण के रूप में देखते तो दूसरे ही क्षण वह मूर्ति मयूरेश की दिखलायी पड़ती। तब उन विश्वदेव ने नारायण और मयूरेश में स्थित हुई अपनी भेदबुद्धि को त्याग दिया और अपने भ्रम का भी निवारण कर लिया ॥ ६४ ॥ फिर उन्होंने नारायण तथा मयूरेश – दोनों में एक बुद्धि करते हुए उन मयूरेश्वर को अत्यन्त भक्तिभाव के साथ प्रणाम किया, उनकी स्तुति की और फिर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे विश्वदेव अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने आश्रम को चले गये ॥ ६५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘विश्वदेव की भेदबुद्धि के निरसन का वर्णन’ नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०५ ॥ Content is available only for registered users. 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