श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-107
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ सातवाँ अध्याय
मयूरेश्वर के चौदहवें वर्ष में मुनियों के कहने पर पार्वती का इन्द्रयाग करना, मयूरेश्वर का कल तथा विंकल नामक दैत्यों का वध और फिर इन्द्रयाग को विध्वंस करना, रुष्ट होकर इन्द्र का मयूरेशपुरवासियों तथा मयूरेशपुरी को संतप्त करना, मयूरेश्वर का सबकी रक्षा करना एवं इन्द्र का मयूरेश की शरण ग्रहण करना
अथः सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
इन्द्रमखभङ्ग

ब्रह्माजी बोले — मयूरेश्वर के चौदहवें वर्ष की बात है, एक दिन गौतम आदि महर्षिगण माता पार्वती के घर में अनेक गणों से समन्वित शिव के पास आये । तब माता पार्वती ने उन महर्षियों को प्रणामकर अपने समक्ष अनेक आसनों पर विराजमान उनका विधिपूर्वक पूजन किया और उनको अपने मन की बात बताते हुए कहा ॥ १-२ ॥

गिरिजा बोलीं — अनेक विघ्नों के भय से हमने अत्यन्त श्रेष्ठ त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्र में रहना छोड़ दिया था, किंतु यहाँ भी मेरे इस बालक पर बहुत से विघ्न हो रहे हैं। आप लोग यह बताने की कृपा करें कि किस कर्म को करने से विघ्न उत्पन्न नहीं होंगे अथवा रहने के लिये कोई उत्तम स्थान बतायें, जहाँ कि विघ्न बाधित न कर सकें ॥ ३१/२

मुनियों ने कहा — हे देवि ! इन्द्रयाग करने पर वह सभी विघ्नों का हरण कर देगा ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी बोले — तब पार्वती ने शीघ्र ही एक अत्यन्त विस्तृत यज्ञमण्डप बनवाया और इन्द्र को प्रसन्न करने वाली यज्ञ-सामग्रियों को एकत्र करवाया ॥ ५ ॥ भगवान् शम्भु से अनुमति लेकर उन पार्वती ने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर महर्षियों के द्वारा विधि-विधानपूर्वक इन्द्रयाग करवाया। उन महर्षियों ने देवराज इन्द्र का ध्यानकर उनका आवाहन किया । तदनन्तर उन्होंने देवी पार्वती की आज्ञा से साङ्ग सपरिवार इन्द्र का तथा उनके गणों का भी पूजन किया ॥ ६-७ ॥ उन श्रेष्ठ ऋषियों ने मन्त्रोच्चारणपूर्वक यज्ञकुण्ड में अग्नि की स्थापना की और मन्त्रजप की संख्या के दशांश संख्या में पायस तथा तिलों की आहुतियों से हवन किया ॥ ८ ॥ वे ऋषिगण मन्त्र के जप में प्रारम्भ में प्रणव (ॐ) जोड़कर और अन्त में ‘नमः’ जोड़कर मन्त्र जप करते थे, तथा हवन के समय उन मन्त्रों के अन्त में ‘स्वाहा’ जोड़कर हवन करते थे। वे द्विज चारों वेदों में पठित शान्तिमन्त्रों का भी पाठ कर रहे थे ॥ ९ ॥

इसी समय जब बालक मयूरेश बालकों के साथ क्रीडा करके यज्ञस्थल के समीप पहुँचे ही थे कि कल और विंकल नामक दो दैत्य भैंसे का रूप धारणकर उन मयूरेश के समक्ष आ पहुँचे। वे दोनों भयंकर शब्द करने वाले, बहुत बड़ी-बड़ी सींगों वाले और तीनों लोकों को भय पहुँचाने वाले थे ॥ १०–११ ॥ वे दोनों महिषरूपी दैत्य अपने उठे हुए बालों के द्वारा मेघों को छिन्न-भिन्न कर रहे थे और अपनी पूँछ के द्वारा पर्वतों को भी विदीर्ण कर दे रहे थे। अपनी नाक में वायु को रोककर और फिर उसे छोड़ने से वे वृक्षों को भी चूर-चूर कर दे रहे थे ॥ १२ ॥ वे दोनों दैत्य पार्वती के पुत्र मयूरेश को मारने की इच्छा से शीघ्र ही उनके पास जा पहुँचे। वहाँ वे दोनों आपस में ही मतवाले महान् हाथियों के समान युद्ध करने लगे। उन दोनों महिषरूपधारी दैत्यों की गर्जना से आकाश उसी प्रकार गूँज उठा, जैसे कि मेघों के गर्जन से गर्जित होता है। वे दोनों रक्त से लथपथ होकर क्रमश: कभी विजय प्राप्त कर रहे थे और कभी पराजित हो जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥

उनसे भयभीत हुए वे मुनियों के बालक उसी प्रकार भाग पड़े, जैसे कि भेड़िये के भय से भागते हैं । तदनन्तर गिरिजापुत्र देव मयूरेश ने दूर से ही उन महान् दैत्यों को देखा। वे यह सोचने लगे कि इन दो महान् दुष्टों को किस उपाय से मारा जाय, तभी उन्होंने उन बालकों के देखते- ही-देखते महिषरूपी उन दोनों महान् बलशाली दैत्यों की पूँछ पकड़ ली और बार-बार उन्हें घुमाते हुए आकाश में फेंक दिया। एक मुहूर्त के बाद वे वृक्षों को विदीर्ण करते हुए पृथिवी पर गिर पड़े ॥ १५-१७ ॥ गिरने से हुए उनके शरीर के सैकड़ों टुकड़ों को भेड़िया आदि जानवरों ने खा डाला । तदनन्तर वे मुनिबालक मयूरेश के समीप गये और श्रद्धाभक्ति से उनकी स्तुति करने लगे — ॥ १८ ॥

बालक बोले — जिनके तत्त्व-रहस्य को ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण भी नहीं जानते हैं, उन आप सर्वान्तर्यामी को हम बालक कैसे जान सकते हैं ? ॥ १९ ॥ आपने बचपन से ही इन करोड़ों दैत्यों का विनाश कर डाला है, आज ये दोनों दैत्य महिष का रूप धारणकर आपको मारने के लिये आये हुए थे ॥ २० ॥ जिन असुरों के श्वास छोड़ने मात्र से पर्वत, वृक्ष तथा पृथ्वी कम्पित हो उठती थी, ऐसे उन महिषों को खेल- खेल में ही पूँछ पकड़कर आपने उन्हें चूहे की भाँति फेंक दिया था ॥ २१ ॥

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर वे मयूरेश खेलते- खेलते यज्ञस्थल में पहुँच गये। वहाँ हो रहे इन्द्रयज्ञ को देखकर वे अत्यन्त रुष्ट हो गये और उन्होंने तत्क्षण ही यज्ञ का विध्वंस कर डाला। सभी मुनिबालकों से घिरे हुए उन मयूरेश ने इन्द्र की मूर्ति दूर फेंककर उन सभी मुनीश्वरों से कहा — हे पवित्रहृदय मुनियो ! आप लोगों द्वारा यह कौन-सा कार्य किया जा रहा है ? ॥ २२-२३ ॥ [स्वयं ही] सम्पूर्ण पदार्थों की अभिलाषा रखने वाले इन्द्र के सन्तुष्ट हो जाने पर [ उनके द्वारा] कौन-सी वस्तु दी जा सकती है ? क्या बकरी की प्रार्थना करने से कामधेनु से प्राप्त होने वाला फल मिल सकता है ? ॥ २४ ॥

तदनन्तर उन मयूरेश ने यज्ञाग्नि को शान्त करके यज्ञ की शेष सामग्री का स्वयं भक्षण कर लिया। उनके इस प्रकार के चांचल्य को देखकर मुनियों के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ। उन मुनिगणों के हृदय में देवी पार्वती के प्रति विशेष भक्ति थी, इसलिये वे उन गुणेश्वर को कुछ भी उलाहना देने अथवा समझाने या क्रोध करके कुछ भी कहने में समर्थ नहीं हो सके ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर वे देवी पार्वती को सारा वृत्तान्त निवेदित कर अपने-अपने आश्रमों को चले गये। वे बोले — इन्द्र को यदि यह समाचार विदित होगा, तो उन क्षुब्ध मनवाले के द्वारा जो होने वाला होगा, वह होता रहे, उससे हमें क्या प्रयोजन! [इधर] अपने अपमान की बात जानकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। क्रोध से रक्त नेत्रोंवाले वे तीनों लोकों को दग्ध करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया और उनसे यह श्रेष्ठ वचन कहा — ॥ २७–२८१/२

इन्द्र बोले — मुनिगणों ने बड़े ही श्रद्धाभाव से मुझे उद्देश्य करके यज्ञ प्रारम्भ किया था, किंतु गुणेश ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया है। अब मैं आज उस गुणेश के पराक्रम को देखूँगा। मेरे क्रुद्ध हो जाने पर चराचरसहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य नष्ट हो जायगा ॥ २९-३० ॥

देवता बोले — [हे देव !] यदि आपकी आज्ञा हो तो हम लोग उस मयूरेश को बाँधकर क्षणभर में यहाँ ले आते हैं ॥ ३०१/२

इन्द्र बोले — हे अग्निदेव ! मयूरेशपुर में तुम्हारा निवास अब कभी न हो। तुम मेरी आज्ञा से मयूरेशपुर में निवास करने वाले लोगों के उदर में से भी निकलकर छिप जाओ। अर्थात् उदर में जो जठराग्निरूप से तुम रहते हो, वहाँ से भी अन्तर्धान हो जाओ ॥ ३११/२

ब्रह्मा बोले — इस प्रकार से क्रोधाविष्ट मन वाले देवराज इन्द्र के वचन सुनकर अग्नि उस मयूरेशपुर से तथा वहाँ के निवासियों के उदर से भी अन्तर्धान हो गये। जब मुनियों ने वहाँ कहीं भी अग्नि नहीं देखी तो उन्होंने हवन हेतु अग्नि प्राप्त करने के लिये अरणि-मन्थन किया ॥ ३२-३३ ॥ अग्नि को प्रकट होता न देखकर उन्होंने बिना अग्नि में पकाये गये अन्न का आदरपूर्वक भक्षण किया, किंतु पेट में अग्नि (जठराग्नि) न होने के कारण वह अन्न पच नहीं पाया, फलस्वरूप उन्हें असह्य पीड़ा हुई ॥ ३४ ॥ तब वे मुनिगण कृपालु मयूरेश के पास गये और उन्हें प्रणाम करके कहने लगे — [ हे देव !] आपके द्वारा इन्द्रयाग के विध्वंस किये जाने पर इन्द्र के द्वारा बुलाये गये अग्निदेव [इस नगर से] कहीं अन्यत्र चले गये हैं और पेट में रहने वाली अग्नि (जठराग्नि) भी यहाँ के पुरवासियों के उदर से निकलकर अन्तर्धान हो गयी है ॥ ३५१/२

उनके इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे मयूरेश प्रत्येक नगरवासी के उदर में अग्नि बनकर स्थित हो गये, फलस्वरूप वे सभी नागरिक भूख से व्याकुल हो गये, इसी प्रकार से रसोईघरों तथा अग्निकुण्डों में भी अग्नि पहले के समान जलने लगी ॥ ३६-३७ ॥ तदनन्तर महाबली इन्द्र ने क्रुद्ध होकर उस नगर की वायु का हरण कर लिया। प्राण, अपान आदि पाँचों प्राण – वायुओं के शरीर से निकल जाने पर सम्पूर्ण मयूरेशनगरी प्रेतमय हो गयी। तब देव मयूरेश ने पंचप्राणमय होकर उन सभी नगरनिवासियों को जीवित कर डाला। पुनः इन्द्र ने सूर्य से  कहा — आप इस मयूरेशपुरी को अपने ताप से अत्यन्त संतप्त कर दें ॥ ३८-३९ ॥

तब सूर्य बारह आदित्यों का स्वरूप धारण कर सब कुछ जलाने लगे। उन्होंने वापी, कूप, तड़ाग तथा नदियों के जल को सुखा डाला। नगर, ग्राम, वन तथा खानों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी जल उठी। यह देखकर मयूरेश शीघ्र ही मेघ बनकर बरसने लगे ॥ ४०-४१ ॥ उन्होंने उस ताप को शान्त कर दिया और मरे हुए सभी जीवों को जीवित कर दिया । तदनन्तर हर्ष में भरे हुए सभी लोगों ने ‘बहुत अच्छा-बहुत अच्छा’ – ऐसा कहकर उन मयूरेश का पूजन किया ॥ ४२ ॥

ब्रह्माजी बोले — इन्द्र ने जो-जो प्रतिकूल कर्म किये थे, वे सब मयूरेश ने दूर कर दिये। जब इन्द्र को यह सब मालूम हुआ तो वे मयूरेश के पास गये और उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर इन्द्र ने दोनों हाथ जोड़कर उन प्रभु सर्वेश्वर मयूरेश्वर की स्तुति की ॥ ४३१/२

इन्द्र बोले — हे विभो ! आपके यथार्थ स्वरूप को न वेद जानते हैं, न ऋषिगण जानते हैं और न ब्रह्मा आदि देवता ही जानते हैं। आप सर्वान्तर्यामी हैं, सर्वस्वरूप हैं और साक्षात् ब्रह्म हैं। आप विश्व की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा आदि प्रजापतियों के तथा सभी कारणों के भी परम कारण हैं। आप हमारे अपराधों को क्षमा करने की कृपा करें, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ४४-४५१/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्तुति करके देवराज इन्द्र ने अपने मस्तक को उनके चरणों में रखकर सादर उनकी प्रार्थना की ॥ ४६ ॥

ब्रह्माजी बोले — उनके मन को अन्य किसी संकल्प से रहित जानकर गुणेश्वर उनसे बोले — हे भद्र ! ‘उठिये, उठिये’ आप अपने पद पर सुखपूर्वक विराजमान होइये। तदनन्तर वे शचीपति इन्द्र उन देव गुणेश मयूरेश्वर की पूजा करके और उन्हें प्रणाम करके फिर उनकी प्रदक्षिणा करके प्रसन्नमन होकर अपनी नगरी अमरावती को गये ॥ ४७-४८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘बालचरित के अन्तर्गत इन्द्रयज्ञ के ध्वंस का वर्णन’ नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०७ ॥

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