September 18, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-011 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ग्यारहवाँ अध्याय महर्षि कश्यपजी द्वारा इन्द्र को बालक गणेश के अद्भुत कर्मों को बताना, इन्द्र की आज्ञा से वायु तथा अग्नि द्वारा बालक गणेश की परीक्षा, गणेश का विराट् रूप धारणकर इन्द्र को दिखाना, इन्द्र का भयभीत होकर उनकी स्तुति करना, इन्द्रकृत स्तुति का माहात्म्य अथः एकादशोऽध्यायः बालचरिते कश्यपजी बोले —- मेरे घर में यह कोई परम पुरुष ही अवतीर्ण हुआ है, जो अनिर्वचनीय गुणों वाला है । यह सत्त्वादि तीनों गुणों से समन्वित होते हुए भी उन तीनों गुणों से रहित है, गुणातीत है ॥ १ ॥ जो इसका विरोध करेगा, वह अपने स्थान से च्युत हो जायगा। हे देवेन्द्र! मेरे द्वारा बताये गये इसके अद्भुत कर्मों के विषय में आप सुनें । भयंकर विरजा नामक राक्षसी इसे मारने के लिये आयी थी, किंतु इस बालक ने उसे मार डाला, वह दो योजन दूर जाकर गिरी ॥ २-३ ॥ उद्धत तथा धुन्धु (धुन्धुर) नामक अत्यन्त मदान्ध दो दैत्य थे। वे तोते का रूप धारणकर इसे मारने के लिये आये। इसने उनके पंख पकड़कर शिला पर पटक डाला, जिससे निष्प्राण होकर वे भूमि पर गिर पड़े, उन भयंकर दैत्यों को सबने अपने सामने देखा था। उसी प्रकार एकबार चित्र नामक गन्धर्व [शापवश] मगरमच्छ का रूप धारणकर जल में स्थित था। वह इस बालक के स्पर्शमात्र करने से दिव्य शरीर को प्राप्त हो गया ॥ ४-६ ॥ हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक दैत्यों के सत्त्व की शुद्धि के लिये इसने स्वयं पंचदेवों की मूर्तियों का अपहरण करके स्वयं को ही पंचदेवों के रूप में प्रकट किया ॥ ७ ॥ आप सभी लोगों के देखते-देखते इसने विघात आदि पाँच राक्षसों को मार डाला । महर्षि कश्यपजी के इस प्रकार के वचन सुनकर बल नामक राक्षस तथा वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र बोले — ॥ ८ ॥ इन्द्र बोले — जब तक मैं इसके गुणों के वैशिष्ट्य को नहीं देख लेता, तबतक यह मेरे लिये कैसे मान्य हो सकता है?॥ ८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर देवराज इन्द्र ने वायुदेवता को आज्ञा दी कि इस बालक को उड़ाकर आकाश में ले चलो ॥ ९ ॥ इन्द्र की आज्ञा प्राप्त करते ही वायुदेव प्रलयकाल में प्रवाहित होने वाली आँधी के समान वेग से प्रवहमान हो गये, वे सभी लोकों को आन्दोलित करने लगे, पृथ्वी को धारण करने वाले पर्वतों को जोर से घुमाने लगे, कहीं असमय में ही प्रलय तो नहीं शुरू हो गया, इस प्रकार से विचार करते हुए अत्यन्त भयभीत ऋषिगण काँप उठे ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर वायुदेवता उस बटुक गणेश को उड़ा ले जाने के लिये बड़े वेग से उसके पास पहुँचे, परंतु न तो उस बालक का आसन हिला और न एक रोम ही हिल सका। वायुदेव जब अपने प्रयत्न में विफल हो गये, तब इन्द्र ने अग्नि से कहा — तुम शीघ्र ही इस बटुक को जला. डालो, आज तुम्हें अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करना होगा ॥ १२-१३ ॥ इन्द्र की आज्ञा को शिरोधार्य करके वे अग्निदेव प्रलयकालीन अग्नि के समान देदीप्यमान होकर तीनों लोकों को जलाते हुए-से उस बालक के पास पहुँचे ॥ १४ ॥ सभी वृक्षों को जला डालते हुए, सभी समुद्रों को सुखाते हुए और सभी लोगों को जलाते हुए उन अग्नि को देखकर महर्षि कश्यपजी के पुत्र बालक गणेश ने अग्नि को तत्काल वैसे ही निगल लिया, जैसे कोई रोगी औषधि की गोली को निगल जाता है ॥ १५१/२ ॥ अग्नि को इस प्रकार से निगल लिये जाने पर वे इन्द्र क्रोध से लाल आँखोंवाले हो गये और वे हजार आँखों वाले इन्द्र अपनी सब कुछ देख सकने वाली सभी आँखों से लोगों को देखने लगे ॥ १६१/२ ॥ उसी समय इन्द्र ने देखा कि वह बालक गणेश हजार से भी अधिक आँखों वाला हो गया है। उसके असंख्य सिर और असंख्य मुकुट हैं, उसके कानों की संख्या अनन्त है, वह अनन्त हाथ, पैरों वाला है, अन्तहीन उत्कृष्ट पराक्रम से सम्पन्न है, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि — ये उसके तीन नेत्र हैं, उसने अपने शिरोमण्डल से आकाश तथा पृथ्वी को व्याप्त कर रखा है, सात पाताल ही उसके चरण हैं, सातों लोक उसके एक मस्तक समान हैं, असंख्यों सूर्यों के समान उसकी आभा है, असंख्य इन्द्र उसकी सेवा कर रहे हैं, वह असंख्य विष्णु, ब्रह्मा, शिव आदि से समन्वित है, उसके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्माण्ड स्थित हैं, जिस प्रकार गूलर के वृक्ष में जड़ से लेकर सिरे तक गूलर के फल-ही-फल लगे रहते हैं अथवा जैसे गूलर के फल में असंख्य मात्रा में मच्छर भिनभिनाते रहते हैं, वैसे ही उसके एक-एक रोमकूप में असंख्य ब्रह्माण्ड स्थित थे ॥ १७-२११/२ ॥ भ्रान्त होकर उन अनेक ब्रह्माण्डों में से एक ब्रह्माण्ड के भीतर इन्द्र प्रविष्ट हो गये तो वहाँ उन्होंने चराचर जगत् सहित तीनों लोकों को देखा। जैसे वन में उगने वाले केले कोश के प्रत्येक पत्र में फल लगे रहते हैं, वैसे ही शचीपति इन्द्र ने वहाँ एक ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत असंख्य जगत् देखे ॥ २२-२३१/२ ॥ भ्रान्तचित्त होकर वे उसी के अन्दर चक्कर काटने लगे, लेकिन उन्हें वहाँ से बाहर निकलने का कोई मार्ग दिखायी नहीं दिया, तब विफल मनोरथवाले इन्द्र ने भगवान् गणपति को सिर झुकाकर प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने देवदेवेश्वर गजानन की प्रार्थना की ॥ २४-२५ ॥ ॥ शक्र उवाच ॥ भूभारहरणार्थं यो जातः कश्यपनन्दनः । अचिन्त्यो महिमा यस्य किमु वर्ण्यो भवेन्मम ॥ २६ ॥ निर्गमं देहि देवेश कुक्षेरत्यन्तविस्तरात् । अदृष्टपाराद् वर्षाणि द्वादश भ्रमता मया ॥ २७ ॥ तव कुक्षौ मयाऽदर्शि भुवनानि चतुर्दश । स्थाने स्थाने विभक्तानि प्रतिरोमाञ्चमेकराट् ॥ २८ ॥ समष्टिव्यष्टिरूपाणि महाविस्तारवन्ति च । दृष्टानि तव रूपाणि सुसौम्यानीतराणि च ॥ २९ ॥ अद्भुतान्यप्यसङ्ख्यानि वक्त्राणि नयनानि च । दृष्ट्वा दुर्दर्शरूपाणि जगत्क्षोभकराणि ते ॥ ३० ॥ दैत्यदानवपूर्णानि सुरमानववन्ति च । यक्षरक्षः पिशाचादिचतुराकरवन्ति च ॥ ३१ ॥ विकरालमहोरूपमुपसंहर विश्वकृत् । गतो मोहं स्मृतिर्लब्धा प्रसादान्निखिलेश्वर ॥ ३२ ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या वाचा त्वां शरणं गतः । प्राकृतं दर्शय विभो रूपं ते भक्तवत्सल ॥ ३३ ॥ इन्द्र बोले — जो महर्षि कश्यप के पुत्ररूप में पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये अवतरित हुए हैं और जिनकी महिमा का आकलन ही नहीं हो सकता, फिर मेरे द्वारा उनकी महिमा का कैसे वर्णन किया जा सकता है ? ॥ २६ ॥ हे देवेश्वर! आप अत्यन्त विस्तारवाली कुक्षि से मुझे बाहर निकलने का मार्ग प्रदान कीजिये । यहाँ घूमते हुए मुझे बारह वर्ष व्यतीत गये हैं, किंतु मैं इससे पार पाने का मार्ग नहीं देख पा रहा हूँ ॥ २७ ॥ हे एकराट् गणेशजी ! मैंने आपके उदरदेश में प्रत्येक रोम में व्याप्त ब्रह्माण्डों में से पृथक्-पृथक् विभक्त एक- एक ब्रह्माण्ड में चौदह भुवनों को प्रतिष्ठित देखा है ॥ २८ ॥ मैंने अत्यन्त विस्तार वाले आपके समष्टि-स्वरूपों एवं व्यष्टि-स्वरूपों के साथ ही आपके सौम्य तथा भयंकर स्वरूपों का दर्शन किया है ॥ २९ ॥ मैंने आपके असंख्य एवं अद्भुत मुखों तथा नयनों का दर्शन किया है और जगत् को क्षुब्ध कर डालने वाले आपके दुर्दर्श रूपों को भी देखा है ॥ ३० ॥ दैत्यों, दानवों, देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों तथा अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज — इस प्रकार के चतुर्विध जीवों से परिपूर्ण आपके विराट् स्वरूपों का मैंने दर्शन किया है ॥ ३१ ॥ हे जगत्स्रष्टा! आप अपने इस विकराल महान् रूप को छिपा लें। हे निखिलेश्वर ! मैं तो मोह में पड़ा था, किंतु आपके कृपाप्रसाद से [मेरा अज्ञान दूर हो गया है तथा] मेरी स्मृति जाग्रत् हो गयी है ॥ ३२ ॥ हे विभो ! मैं शरीर, मन तथा वाणी से आपकी शरणमें आया हूँ। हे भक्तवत्सल! आप अपना सौम्य स्वरूप दिखलाइये ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी बोले — इन्द्र इस प्रकार प्रार्थना कर ही रहे थे कि उन्होंने स्वयं को सभा के मध्य में विद्यमान तथा उन गणेशजी को ब्रह्मचारी के रूप में स्थित देखा ॥ ३४ ॥ अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाले होकर तथा लज्जा एवं हर्ष से समन्वित इन्द्र ने सभी लोगों के देखते हुए उन गणेशजी को दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ देवराज इन्द्र सभी देवताओं के सुनते हुए लीला के लिये मनुष्यरूप धारण करने वाले और महर्षि कश्यप के घर में उत्पन्न उन ब्रह्मचारी गणेश की स्तुति करने लगे ॥ ३६ ॥ ॥ शक्र उवाच ॥ जाने न त्वाऽनन्तशक्ति परेशं विश्वात्मानं विश्वबीजं गुणेशम् । विश्वाभासं विश्ववन्द्यं त्रिसत्यं त्रेधाभूतं जन्मरक्षार्तिहेतुम् ॥ ३७ ॥ एकं नित्यं सच्चिदानन्दनरूपं सर्वाध्यक्षं कारणातीतमीशम् । चेष्टाहेतुं स्थावरे जङ्गमे च वाञ्छापूरं सर्वगं त्वाऽभिवन्दे ॥ ३८ ॥ सर्वेशानं सर्वविद्यानिधानं सर्वात्मानं सर्वबोधावभासम् । सर्वातीतं वाङमनोगोचरं त्वां सर्वावासं सर्वविज्ञानमीडे ॥ ३९ ॥ इन्द्र बोले — आप अनन्त शक्ति से सम्पन्न हैं, परमेश्वर हैं, विश्वात्मा हैं, विश्व के कारणरूप हैं, गुणों के स्वामी हैं, विश्व को प्रकाशित करने वाले हैं, समस्त जगत् के लिये वन्दनीय हैं, भूत-भविष्य तथा वर्तमान – तीनों कालों में विद्यमान रहने वाले हैं; ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के रूप में त्रिधा विभक्त हैं और सृष्टि, पालन तथा प्रलय करनेवाले हैं, मैं आपको नहीं जानता ॥ ३७ ॥ आप अद्वितीय, शाश्वत, सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वाध्यक्ष, कारणातीत, ईश्वर, चराचर जीवों के प्रयत्न के कारणभूत, कामनाओं को परिपूर्ण करने वाले तथा सर्वत्र व्याप्त रहने वाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ ३८ ॥ आप सभी के स्वामी हैं, सभी प्रकार की विद्याओं के निधान हैं, सबके आत्मरूप हैं, सबको ज्ञान प्रदान करने वाले हैं, सबसे परे हैं, मन-वाणी से न जानने योग्य हैं, सभी के अधिष्ठान तथा सब कुछ जानने वाले हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ३९ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्तुति करके, प्रणाम करके और उनकी पूजा करने के अनन्तर इन्द्र ने उन्हें अपना अंकुश, कल्पवृक्ष तथा दो सेविकाएँ प्रदान कीं और उनका ‘विनायक’ यह सुन्दर नाम रखा। यह नाम स्मरण करने से सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला है। उस समय जय-जयकार के घोषों, नमस्कार की ध्वनियों तथा अनेक प्रकार के वाद्यों के निनादों और गन्धर्वों के गीतों की ध्वनियों तथा अप्सराओं के नृत्यों की झंकारों से एवं पुष्पों की वर्षा से समस्त आकाशमण्डल तथा भूमितल परिव्याप्त हो गया ॥ ४०–४२ ॥ विपरीत दिशा में बहनेवाली नदियाँ पूर्व दिशा की ओर बहने वाली हो गयीं; और अत्यन्त मंगलकारिणी हो गयीं; दिशाएँ निर्मल हो उठीं; वायु अत्यन्त सुखप्रद होकर प्रवाहित होने लगी । अग्नियाँ सभी स्थानों में शान्त स्वरूपवाली होकर दाहिनी ओर अभिमुख ज्वालाओं वाली हो गयीं। तदनन्तर एकराट् विनायक ने प्रसन्न होकर इन्द्र को अभयदान दिया और कहा — ॥ ४३-४४ ॥ हे इन्द्र ! तुम्हें युद्ध-स्थल में कहीं भी कोई भय नहीं होगा। तुम श्रद्धाभक्ति से सम्पन्न होकर तीनों कालों में इस स्तोत्र का पाठ करो। अन्य भी जो कोई मनुष्य भक्तिपूर्वक इन तीनों श्लोकों का पाठ करेगा, वह अपनी सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर लेगा तथा सर्वत्र विजयी होगा ॥ ४५-४६ ॥ तदनन्तर इन्द्र ने यह कल्याणकारी वर प्राप्त कर उन बालक गणेश को प्रणाम किया, इसके पश्चात् अन्य सभी जन उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानों को चले गये ॥ ४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘बालचरित’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe