November 13, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-109 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ नौवाँ अध्याय देवर्षि नारद से शिव-पार्वती का मयूरेश के विवाह के लिये कन्या के अन्वेषण के लिये कहना, देवर्षि नारद द्वारा सिद्धि एवं बुद्धि नामक कन्याओं को मयूरेश के योग्य बताना, शिव-पार्वती तथा ससैन्य मयूरेश का गण्डकी नगर की ओर प्रस्थान, मार्ग में हेम नामक दैत्य का ससैन्य आगमन, मयूरेश की कृपा से मुनिबालकों द्वारा अभिमन्त्रित कुशों से असुर-सेना का वध अथः नवाधिकशततमोऽध्यायः राक्षसवध ब्रह्माजी बोले — एक बार की बात है, भगवान् महेश्वर सुखपूर्वक आसन पर बैठे हुए थे, उस समय माता पार्वती उनसे बोलीं — हे महादेव ! मयूरेश की अवस्था पन्द्रह वर्ष पार कर चुकी है, अतः अब आप उसके विवाह के विषय में विचार कीजिये ॥ ११/२ ॥ ये मयूरेश कामदेव से भी अतुलनीय स्वरूप वाले हैं और इनके सभी अंग अत्यन्त सुन्दर हैं, अतः आप इनके लिये किसी सुन्दर शील-स्वभाव से सम्पन्न, सुन्दर मुखमण्डलवाली, नवयौवन-सम्पन्न, मृग के समान नेत्रों वाली, हंस के समान चाल वाली, कोयल के समान मधुर बोलने वाली, सुन्दर नासिका वाली तथा क्षीण कटिवाली सुन्दर वधू का अन्वेषण कीजिये ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले — पार्वती के इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे ‘बहुत अच्छी बात है-बहुत अच्छी बात है’ – ऐसा कहने लगे। वे अपने मन में इस प्रकार की सुन्दर कन्या के विषय में सोचने लगे, किंतु उनको ऐसी कन्या कहीं नहीं दिखायी दी। अतः वे भगवान् शिव अत्यन्त चिन्तित हो उठे, तभी देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। उन्हें आसन पर बिठाकर और उनकी पूजा करके देव शिव उनसे बोले ॥ ४-५ ॥ शम्भु बोले — हे मुने! आपके आगमन से बड़े ही आनन्द की प्राप्ति हुई है। हे देवर्षे! आप बहुत दिनों के पश्चात् आये हैं, अतः एक दिन आप यहाँ ठहरनेकी कृपा करें। हे अनघ! हे विप्र ! आप चूँकि तीनों लोकों में भ्रमण करते रहते हैं, अतः अति सुन्दर शरीर वाले मेरे पुत्र मयूरेश के लिये किसी वधू की खोज करें ॥ ६-७ ॥ ब्रह्माजी बोले — उसी प्रकार माता पार्वती ने भी उनसे कहा — आप शीघ्र ही वधू के विषय में विचार कीजिये ॥ ७१/२ ॥ नारद बोले — हे स्वामिन्! मैं अपने कर्म के प्रति- फलस्वरूप अर्थात् दक्षशाप के कारण कहीं भी एक स्थान पर दो मुहूर्त से अधिक समय तक नहीं ठहर सकता हूँ। हे शिव! आपका यह कार्य सम्पन्न करने के लिये ही ब्रह्माजी द्वारा प्रेषित होने पर मैं यहाँ आया हूँ ॥ ८१/२ ॥ आपके पुत्र के प्रभाव, लावण्य एवं अवस्था को जानकर विधाता ब्रह्माजी ने सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओं को उन्हें प्रदान करने की अभिलाषा की है। उन दोनों कन्याओं के रूप-सौन्दर्य के सामने अनसूया तथा इन्द्रपत्नी शची भी लज्जित हो उठती हैं । उन दोनों को देखकर सूर्यपत्नी संज्ञा ने लज्जावश बडवा (घोड़ी) – का रूप धारण कर लिया और वन में गौतमपत्नी अहल्या शिलारूप हो गयी थी। हे हर ! भगवान् विष्णु के मन को मोहित करने वाली जालन्धर की पत्नी वृन्दा भी जिन दोनों को देखकर लज्जा से तुलसीवृक्ष हो गयी थी । हे पार्वती! [ऐसी उन कन्याओं के लिये ] इन (मयूरेश ) – के अतिरिक्त दूसरे वरों की बात ब्रह्माजी के हृदय में उस समय नहीं आ सकी ॥ ९-१२ ॥ हे देवि! इन दोनों (सिद्धि-बुद्धि एवं मयूरेश) – के समान सौन्दर्य एवं शौर्य अन्य किसी स्त्री-पुरुष में नहीं है। उन दोनों सिद्धि एवं बुद्धि का संयोग होने पर आपके पुत्र उसी प्रकार अत्यन्त शोभा को प्राप्त होंगे, जैसे कि रत्न एवं कांचन का संयोग होता है और जैसे मोती तथा मूँगे का संयोग अत्यन्त शोभासम्पन्न होता है ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — देवर्षि नारदजी के इस प्रकार कहने पर वे भगवान् शिव एवं पार्वती अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १४ ॥ शिव बोले — हे मुने! आपने हमारी मनोभिलाषा को पूर्ण करने वाले शुभ और उचित वचन कहे हैं ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इसके अनन्तर भगवान् शिव भी तत्क्षण ही वृषभ पर आरूढ़ हुए और उन्होंने अर्धांग में पार्वती को बैठा लिया, तदनन्तर उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा गौतम आदि मुनियों को बुलाया और फिर वे सबके साथ बड़े हर्षित होते हुए निकल पड़े ॥ १५-१६ ॥ देव मयूरेश अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर आगे-आगे चलने लगे। देवर्षि नारद अपनी तपस्या के प्रभाव से अन्तरिक्ष में होते हुए गये। सात करोड़ गण, जो नाना प्रकार के आयुधों को धारण किये हुए थे, वे क्रीड़ा करते हुए तथा हर्षित होने से दसों दिशाओं को गुंजायमान करते हुए चल रहे थे ॥ १७-१८ ॥ उस समय सभी प्रकार के वाद्य बज रहे थे। उन सबके चलने से उठने वाली धूलि से सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया था। [ उस विवाह यात्रा में] अट्ठासी हजार मुनिगण भी हर्षपूर्वक साथ में गये। जब वे सब गण्डकी नगर को जा रहे थे, तो उन्होंने मार्ग में सात करोड़ गणों से समन्वित राक्षसों के सैन्यदल को देखा ॥ १९-२० ॥ उन राक्षसों के मुख इतने विशाल थे कि वे आकाश को छू रहे थे। वे सभी सर्वदा काल को भी तिरस्कृत कर देने वाले थे। जब उन निशाचरों ने मयूरेश की सेना के भयंकर शब्द को सुना तो वे सो करके उठे हुए निशाचर युद्ध करने की इच्छा से सन्नद्ध होकर निकल पड़े ॥ २११/२ ॥ राक्षस बोले — तुम लोग किसके सैनिक हो, कहाँ जा रहे हो, तुम लोगों का कहाँ से आगमन हुआ है ? बिना अपने स्वामी की आज्ञा के हम तुम लोगों को नगर में नहीं जाने देंगे ॥ २२१/२ ॥ मयूरेश बोले — हम लोग स्वतन्त्र हैं, पराधीन नहीं हैं, दैत्यों तथा राक्षसों का विनाश करने वाले और सज्जनों की रक्षा एवं पालन करने वाले हैं। अतः हम लोगों को मार्ग दे दो, नहीं तो तुम लोगों का नाश हो जायगा ॥ २३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — उसी समय हेम नामक वह असुर वहाँ उपस्थित हुआ, जिसको पूर्व में मयूरेश ने नाक-कान आदि काटकर विकृत बना दिया था। वह असुर मयूरेश से बोला — पहले तुमने मुझे अकेला पाकर [विकृत करके] वापस भेज दिया था, किंतु अब इस समय राक्षसों के साथ मिलकर मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा । ॥ २४–२५ ॥ फिर वह हेम नामक असुर राक्षसों से बोला — इस मयूरेश ने बलपूर्वक अनेक दैत्यों का वध किया है, इसने मेरे अंगों को काटकर मुझे भी विकृत शरीर वाला बना दिया है। अतः इसे शीघ्र मार डालो ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी बोले — उसका वैसा वचन सुनकर मयूरेश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और वे मुनिबालकों से कहने लगे — मेरी कृपा के बल से तुम लोग इन असुरों से युद्ध करो ॥ २७ ॥ तब कुशों को हाथ में उठाकर वे मुनिबालक बड़े ही हर्ष से युद्ध करने के लिये उद्यत हो गये। पीछे से देव मयूरेश ने उनसे कहा — हे बालको! इन राक्षसों का कुशों के द्वारा वध कर डालो ॥ २८ ॥ मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित किये गये उन कुशों ने बहुत से दैत्यों के मस्तकों को काट डाला। मयूरेश्वर की कृपा से उन राक्षसों के शस्त्र कुण्ठित हो गये ॥ २९ ॥ मस्तक कटने पर भी जो राक्षस पुनः उत्पन्न हो जाते थे, उन राक्षसों को वे मुनिपुत्र कुशों से पुनः मार डालते थे। तब बाहु, जाँघ तथा घुटनों से रहित हुए वे राक्षस खण्ड-खण्ड हो करके गिरने लगे ॥ ३० ॥ यह देखकर वे राक्षस अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे और यह कहने लगे कि क्या घास के तिनकों से भी कोई मर सकता है ? इस प्रकार उस समय उन बालकों ने सभी राक्षसों को मार डाला और मयूरेश ! [ आपकी जय हो], मयूरेश! [आपकी जय हो] – ऐसा कहते हुए वे गर्जना करने लगे। असुरों पर विजय पाकर वे मयूरेश के पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने मयूरेश को प्रणाम किया और उनसे कहने लगे — ॥ ३११/२ ॥ बालक बोले — हे गुणेश्वर ! आपकी आज्ञा प्राप्तकर आपकी कृपा से हमने सभी राक्षसों को मार डाला है, अब आप हमें अन्य आज्ञा दें, हम उस कार्य को पूर्ण करेंगे। उस समय जो मुनि वहाँ आये थे, वे सब यह देखकर परम आश्चर्यचकित हो गये कि कुशसमूहों के द्वारा इन बालकों ने सभी राक्षसों को मार डाला है। माता पार्वती ने वृषभ से उतरकर उन मयूरेश का आलिंगन किया ॥ ३२–३४ ॥ भगवान् शिव भी कहने लगे — हे देव मयूरेश ! आज मैंने आपका पराक्रम देख लिया है। पहले तुमने इन दैत्यों को अपने शस्त्रों से मारा था । पुनः इन बालकों ने उन्हें कुशों से मार डाला ॥ ३५ ॥ हे पार्वतीपुत्र मयूरेश! आपका प्रभाव ब्रह्मा आदि देवताओं के लिये भी अगम्य है, मैं भी यह ठीक से नहीं जानता कि आप आगे क्या-क्या करनेवाले हैं ? ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सीमावर्ती चौकियों में नियुक्त राक्षसों के वध का वर्णन’ नामक एक सौ नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०९ ॥ Content is available only for registered users. 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