November 15, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-113 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ तेरहवाँ अध्याय युद्ध के लिये दैत्यराज सिन्धु की चतुरंगिणी सेना का प्रस्थान, मयूरेश की सेना और दैत्यसेना का भीषण संग्राम, सिन्धुसेना के दो अमात्य वीर – मैत्र और कौस्तुभ का वीरभद्र एवं कार्तिकेय से युद्ध तथा दोनों अमात्य वीरों के वध का वर्णन अथः त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः मित्रकौस्तुभवध ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी!] सबसे आगे पैदल सैनिक चल रहे थे, वे धरती को कम्पित करते हुए जा ही रहे थे। उनके मुख बड़े ही भयंकर थे। वे सभी बड़े पराक्रमी थे और उनके मस्तक सिन्दूर के समान अरुण वर्ण के थे। कुछ सैनिक कवच बाँधे हुए थे, उनके केश खुले हुए थे। वे अत्यन्त भीषण लग रहे थे । किन्हीं-किन्हीं वीरों ने अपनी कमर बाँध रखी थी, और कुछ वीरों ने चन्दन का अनुलेपन किया हुआ था ॥ १-२ ॥ वे विविध प्रकार के शस्त्रों को धारण किये हुए और अनेक प्रकार की युद्धकला में पारंगत थे । उन पैदल सैनिकों के आगे [सिन्दूरादि से अनुलिप्त ] मतवाले हाथी चल रहे थे, जो ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो नाना प्रकार की धातुओं से चित्रित किये गये पर्वत हों ॥ ३ ॥ अनेक प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित थे, वे हाथी अपने उनके लम्बे-लम्बे दाँत सुशोभित हो रहे थे, वे घण्टानाद के द्वारा सभी जनों को तत्काल ही बधिर बना दे रहे थे। वे अपनी सूँड़ के प्रहार से पर्वतों तथा वृक्षों को चूर-चूर बनाते हुए चल रहे थे । उन हाथियों के मस्तक अनेक प्रकार की पताकाओं तथा चित्र-विचित्र ध्वजों से सुशोभित हो रहे थे ॥ ४-५ ॥ उन हाथियों के पीछे घोड़े चल रहे थे, जो अपने | खुरों के आघात से पृथिवी को चूर्ण-चूर्ण कर दे रहे थे । वे अपने हिनहिनाने के नाद से आकाश तथा दसों दिशाओं को निनादित कर दे रहे थे ॥ ६ ॥ वे घोड़े स्वर्ण, अनेक प्रकार के रत्नों तथा मोतियों की मालाओं से सुशोभित थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो वे आकाश में विचरण कर रहे हों। उन अश्वों के ऊपर महान् वीर योद्धा विराजमान थे, जो कवच धारण करने से सुशोभित हो रहे थे, उन्होंने विविध प्रकार के शस्त्र धारण कर रखे थे और वे महायोद्धा शत्रुसेना का मर्दन करने वाले थे ॥ ७१/२ ॥ घुड़सवार सेना के पीछे रथारोही वीर सैनिक चल रहे थे, जो अपने शस्त्रों तथा अस्त्रों के द्वारा शत्रुओं का विनाश कर देने वाले थे । वे रथारोही वीर युद्ध में युद्ध के मार्ग का समुचित ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ सारथियों से समन्वित थे और मोतियों तथा मणियों की एवं सुगन्धित पुष्पों वाली मालाओं को धारण किये हुए थे ॥ ८-९ ॥ उनके कन्धों पर धनुष लटक रहा था। वे तूणीर भी धारण किये हुए थे। उनके हाथों में खड्ग तथा भाले थे, वे उस महायुद्ध में अपने शस्त्रों से निकलने वाली आभा के द्वारा लोगों के नेत्रों को आच्छादित कर दे रहे थे ॥ १० ॥ जो कि सूर्य के तेज से मिलकर दोगुनी अधिक देदीप्यमान हो रही थी। उस समय तूर्यघोष हो रहा था और बन्दीजन दैत्यपति सिन्धु का स्तवन करते हुए कह रहे थे कि हे सिन्धु ! आपके अतिरिक्त तीनों लोकों में कोई दूसरा बलिष्ठ वीर नहीं है। आपकी सम्पत्ति से धनद कुबेर की भी सम्पत्ति समता नहीं कर सकती ॥ ११–१२ ॥ इस प्रकार से वह सेना दसों दिशाओं को अपनी गूँज से निनादित करती हुई आ रही थी। तब भूतराज तथा पुष्पदन्त ने उस आती हुई सेना को देखा तो भयभीत होकर भाग पड़े और मयूरेश के पास आये ॥ १३१/२ ॥ वे दोनों बोले — आपकी आज्ञा से हमने आगे जाकर सिन्धुदैत्य के नगर के द्वार पर बनी चौकी में स्थित सेना का संहार कर डाला और उस दैत्य सिन्धु के गण्डकी नामक नगर को भी बहुत प्रकार से दग्ध कर दिया। तब हम दोनों के पराक्रम को सुनकर वह दैत्यराज सिन्धु स्वयं चला आया है। उसके साथ में नाना प्रकार के अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित चतुरंगिणी सेना है । हे महाबल ! उसे देखकर हम दोनों भयभीत होकर आपके पास चले आये हैं ॥ १४–१६ ॥ ब्रह्माजी बोले — वे दोनों अर्थात् भूतराज तथा पुष्पदन्त — इस प्रकार कह ही रहे थे कि पूर्व दिशा में सिन्धुदैत्य की समुद्र के समान [अपरिमित ] सेना आती हुई दिखायी दी, जिसका पार पाना शस्त्र धारण करने वाले योद्धाओं के लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ १७ ॥ तदनन्तर संक्षेप में उस दैत्य सिन्धुराज के वृत्तान्त को जानकर हर्षित हुए मयूरेश नीले कण्ठवाले अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर आगे बढ़े ॥ १८ ॥ उन्होंने अपने चारों हाथों में चार आयुधों को धारण कर रखा था। अपने हाथों में धनुष, बाण तथा तलवार लिये हुए करोड़ों गण युद्ध के लिये सुसज्जित होकर वृषभ पर विराजमान नीलकण्ठ भगवान् शिव को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। मुनीश्वरों ने मयूरेश की स्तुति की और आशीर्वचन प्रदान किये ॥ १९-२० ॥ उस समय सिन्धुदैत्य की सेना तथा मयूरेश की सेना — दोनों सेनाओं के वाद्यों की ध्वनि से महान् कोलाहल होने लगा। वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरे की उस सैन्यसम्पदा को देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो रही थीं ॥ २१ ॥ वे मयूरेश दैत्य सिन्धु की असंख्य सेना को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो गये। नन्दीश्वर ने पूर्व में जो उन्हें बतलाया था, वह सब उन्होंने आज प्रत्यक्ष देख लिया । तदनन्तर नन्दीश्वर मयूरेश को प्रणाम करके बार-बार गर्जना करते हुए युद्ध करने के लिये आकाशमार्ग से चल पड़े और दैत्यसेना में आकर उन्होंने अनेक दैत्यवीरों के मस्तकों को काट डाला ॥ २२-२३ ॥ उन्होंने अपने सींगों के महान् आघात से दैत्यराज सिन्धु के अश्व पर दृढ़ प्रहार किया और बिना क्षत-विक्षत हुए शीघ्र ही उड़ करके मयूरेश के पास चले आये ॥ २४ ॥ उस समय सभी गण अत्यन्त आश्चर्य करने लगे और ‘साधु-साधु’ – इस प्रकार कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे । तदनन्तर नन्दीश्वर ने अपने सींगों के प्रहार से दैत्य सिन्धुराज के छत्र को गिरा डाला ॥ २५ ॥ घोड़े के तथा छत्र के गिर जाने पर वह दैत्यराज सिन्धु दूसरे घोड़े पर सवार हो गया और उसने एक अत्यन्त मूल्यवान् दूसरा छत्र धारण कर लिया । नन्दीश्वर के पराक्रम को देखकर सिन्धुदैत्य को अत्यन्त आश्चर्य हुआ । उसने अपने महान् वीरों पर क्रोध करते हुए कहा — तुम लोगों का बल-पराक्रम कहाँ चला गया है ? ॥ २६-२७ ॥ सिन्धुराज के इस प्रकार के वचन सुनकर उस दैत्य के कौस्तुभ तथा मैत्र नाम वाले दो अमात्य, जो शत्रु की सेना को मार गिराने वाले थे, वे दैत्य सिन्धु को प्रणाम करके बोले — हे नाथ ! हे सिन्धु ! आप चिन्ता न करें, हम दोनों शत्रुओं का विनाश कर डालेंगे, अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम किसी प्रकार भी अपना मुख नहीं दिखलायेंगे। ऐसा कह करके वे दोनों चतुरंगिणी सेना को साथ लेकर चल पड़े। ब्रह्माण्ड का विदीर्ण कर डालने में तत्पर पैदल सैनिकों के समूह भी उनके साथ में निकले ॥ २८-३० ॥ वे रणोन्मत्त सैनिक पृथ्वी को उलट डालने की इच्छा रखते थे। कौस्तुभ तथा मैत्र नामक दोनों अमात्य मयूरेश के पास उन्हें गिरा डालने की इच्छा से गये ॥ ३१ ॥ जबतक वे दोनों अमात्य अपने बाणों की वर्षा से मयूरेश को आच्छादित कर उनके पास पहुँचते, उससे पहले ही वीरभद्र तथा कार्तिकेय उनसे युद्ध करने वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों असंख्य सेना के साथ थे और दसों दिशाओं को अपनी गर्जना से निनादित कर रहे थे। वे दोनों महाबली वीर वीरभद्र और कार्तिकेय क्रुद्ध होकर [ अनेक प्रकार के प्रहारों से ] दैत्य सिन्धु की सेना पर आघात करने लगे ॥ ३२-३३ ॥ कौस्तुभ तथा मैत्र का भी उन दोनों के साथ युद्ध हुआ। दोनों पक्षों के वीर परस्पर प्रहार कर रहे थे और ‘सहो’ ‘मारो’ इस प्रकार से आपस में कह रहे थे ॥ ३४ ॥ कौस्तुभ तथा मैत्र ने अनेकों अस्त्रों तथा शस्त्रों से उन दोनों वीरभद्र और कार्तिकेय के साथ युद्ध किया । बाणसमूहों से, भिन्दिपालों से, परिघों से तथा मुसलों से दोनों पक्षों के वीर एक-दूसरे का वध करने की इच्छा से युद्ध कर रहे थे। जब सभी शस्त्र टूट गये और बाण भी समाप्त हो गये तो दोनों सेनाओं के वीर आपस में मल्लयुद्ध करने लगे और एक-दूसरे को मार डालने तक युद्ध करते रहे। कुछ वीर प्राणों से रहित होने पर भूमि पर गिर पड़े और अपने मुख से बहुत-सा रक्त प्रवाहित करने लगे ॥ ३५-३७ ॥ कुछ वीर पैर से दूसरे पक्ष के वीर के पैर में चोट पहुँचा रहे थे, तो दूसरे वीर कन्धे से कन्धे पर वार कर रहे थे। कुछ पीठ के बल पीठ पर चोट पहुँचा रहे थे, तो कुछ वीर हाथ से हाथ में मार रहे थे। कुछ सैनिक अपने मस्तक से दूसरे पक्ष के सैनिक के मस्तक पर आघात कर रहे थे तो कुछ कुहनी के द्वारा कुहनी पर प्रहार कर रहे थे। कुछ वीर गिर गये थे, कुछ दूसरे के द्वारा गिराये जा रहे थे, कुछ मृत हो गये थे, कुछ अंग-भंग हो गये थे तो कुछ वीर चूर-चूर हो गये थे ॥ ३८-३९ ॥ किसी के कण्ठ कट गये थे, किसी की भुजाएँ अलग हो गयी थीं और कुछ जंघा, ऊरु तथा बाहुओं से रहित हो गये थे। इस प्रकार से मयूरेश की सेना के विनष्ट हो जाने पर दैत्यराज सिन्धु की सेना विजयी हो गयी ॥ ४० ॥ तब जय-जयकार के शब्दों से स्तुति किये जाते हुए और बन्दीजनों द्वारा वाद्यों की ध्वनि सुनाये जाते हुए मित्र [मैत्र] तथा कौस्तुभ नामक वे दोनों अमात्य दैत्येश्वर सिन्धु के पास आये ॥ ४१ ॥ इधर वीरभद्र तथा कार्तिकेय भी मयूरेश के पास चले आये। तदनन्तर सूर्य के अस्त हो जाने पर युद्ध-विराम हो गया ॥ ४२ ॥ · दूसरे दिन दानवों ने देवताओं की सेना के साथ पुनः युद्ध किया । सिन्धुराज के वीर दैत्यों ने अपने बाणों की वर्षा से भागती हुई उस देवसेना पर प्रहार किया ॥ ४३ ॥ तब वीरभद्र तथा कार्तिकेय पुनः युद्ध के आवेश में आ गये और गर्जना करते हुए [उस] गर्जना के द्वारा दसों दिशाओं तथा आकाश को निनादित करने लगे । यमराज के समान वे उस शत्रुसेना को मार रहे थे और सेना को दग्ध कर रहे थे। उस समय महान् भयंकर अन्धकार के छा जाने पर कहीं भी कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ ४४-४५ ॥ फलतः दोनों पक्षों के वे महाबलवान् वीर अपने पक्ष के तथा शत्रुसेना के वीरों को भी मार डाल रहे थे। तदनन्तर दैत्य सिन्धु की सेना के छिन्न-भिन्न हो जाने पर वीरभद्र तथा कार्तिकेय ने विजयघोष किया ॥ ४६ ॥ तब दैत्य सिन्धुराज के वे दोनों अमात्य मैत्र और कौस्तुभ मरने का निश्चय करके युद्ध करने के लिये पुनः आ पहुँचे और उन्होंने अपने- अपने घोड़ों को शत्रुसेना के मध्य जाने के लिये प्रेरित किया ॥ ४७ ॥ वे दोनों बाणों की वर्षा करते हुए और तलवार के वार से वीरों को मारते हुए आगे बढ़ रहे थे। तदुपरान्त जब कार्तिकेय और वीरभद्र ने शत्रुवीरों का वैसा पराक्रम देखा, तो बहुत जोरों से उनपर मुष्टि-प्रहार करके शीघ्रतापूर्वक अपनी सेना में आ गये। उस प्रहार के कारण मैत्र अपने मुख से बहुत-सा रक्त बहाता हुआ भूमि पर गिर पड़ा ॥ ४८-४९ ॥ मैत्र की वह स्थिति देखकर कौस्तुभ युद्ध करने के लिये आगे आया और क्रोधित होकर उसने अपनी तलवार के वार से कार्तिकेय पर प्रहार किया ॥ ५० ॥ उस प्रहार से कार्तिकेय मूर्च्छित हो गये, तब वीरभद्र ने कौस्तुभ के साथ युद्ध किया। कौस्तुभ ने अत्यन्त रोष में भरकर अनेक बाणों से वीरभद्र पर आघात किया ॥ ५१ ॥ तब वीरभद्र ने भी अपनी मुष्टिका के प्रहार से उसे भूमि पर गिरा दिया। उस कौस्तुभ के मर जाने पर महाबली वीरभद्र अत्यन्त आनन्दित हो उठे ॥ ५२ ॥ इस प्रकार मैत्र तथा कौस्तुभ —दोनों अमात्य वीरों के मारे जाने पर दैत्यों की वह सेना पलायन कर गयी। शस्त्राघात से आहत एवं बहुत-सारा रक्त वमन करने वाले असुर सैनिक नित्य ही मैत्र तथा कौस्तुभ की विजय की अभिलाषा रखने वाले, देवताओं के शत्रु दैत्यराज सिन्धु के पास उस सम्पूर्ण समाचार को बताने के लिये गये और उन सैनिकों ने शस्त्रों की आघातजनित पीड़ा से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण अस्पष्ट वाणी में वह सारा वृत्तान्त उसे बतलाया ॥ ५३-५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘मैत्र एवं कौस्तुभ के वध का वर्णन’ नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११३ ॥ Content is available only for registered users. 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