November 19, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-120 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ बीसवाँ अध्याय दूतों का धर्म एवं अधर्म की मृत्यु का समाचार दैत्यराज सिन्धु को देना, सिन्धु द्वारा शोक प्रकट करना, सखियों द्वारा समाचार मिलने पर सिन्धुपत्नी दुर्गा का राजसभा में उपस्थित हो पुत्रों के लिये विलाप करना, सखियों द्वारा उसे आश्वस्त करना, क्रुद्ध दैत्यराज सिन्धु का चतुरंगिणी सेना लेकर युद्ध के लिये प्रस्थान, उसी समय पिता चक्रपाणि का प्रकट होकर पुत्र सिन्धु को मैत्री का उपदेश देना, किंतु सिन्धु का उसे अस्वीकृत कर देना अथः विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पितृसिन्धुसंवादं ब्रह्माजी बोले — मरने से बचे हुए कुछ वीर सैनिक; जिनके शरीर से रक्त प्रवाहित हो रहा था और जो अत्यन्त दुखित थे, दैत्यराज सिन्धु के पास आये और सभा में विराजमान सिन्धु से अत्यन्त भयभीत होते हुए इस प्रकार कहने लगे — ॥ १ ॥ वीर बोले — हे धनुर्धर ! आप इस अत्यन्त दुःख प्रदान करने वाले वचन को सुनिये। आपके दोनों पुत्रों धर्म और अधर्म ने महान् युद्ध करके देवसेना को मार-मारकर यमलोक में पहुँचा दिया। तदनन्तर देवसेना में से कोई महान् वीर युद्ध करने आया, जिसके छह मुख थे ॥ २-३ ॥ उसे भी भीषण युद्ध में आपके पुत्रों द्वारा जमीन पर पटक दिया गया, किंतु उसने उठकर उन दोनों वीरों की शिखा के बालों को पकड़ लिया और बहुत बार घुमाते हुए जमीन पर गिरा दिया, जिस कारण उनकी देह सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों उत्तम स्वर्गलोक को ‘चले गये ॥ ४-५ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार उनकी बात सुनकर दैत्यश्रेष्ठ वह सिन्धु शोकसागर में निमग्न हो गया और उसी प्रकार भूमि पर गिर पड़ा, जैसे कि वज्र के प्रहार से पर्वत गिर पड़ता है। उसी समय बन्धु-बान्धवों तथा मित्रों ने दौड़ते हुए उसे शीघ्र ही बलपूर्वक उठा लिया, मुहूर्तभर के अनन्तर उसकी चेतना लौट आयी, तब वह बहुत दुखित होता हुआ शोक करने लगा ॥ ६-७ ॥ सिन्धु बोला — जिन्होंने पूर्वकाल में युद्ध में इन्द्र आदि लोकपालों को भी जीत लिया था, उन महाबली धर्म और अधर्म नामक दोनों वीरों को छः मुखवाले कार्तिकेय ने कैसे मार दिया ? ॥ ८ ॥ मुझे मृत्युलोक में छोड़कर मेरे वे दोनों पुत्र स्वर्गलोक क्यों चले गये ? वे दोनों वीर देवसेना को मार डालने वाले तथा यमराज का भी अन्त करने वाले थे ॥ ९ ॥ [हे पुत्रो !] ‘यदि मैं शत्रु के सिर को काटकर यहाँ नहीं लाऊँगा तो मैं आपको अपना मुख नहीं दिखलाऊँगा’ — ऐसा तुमने युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय मुझसे कहा था, क्या तुमने उस वचन को सत्य कर दिया है ॥ १० ॥ तदनन्तर अत्यन्त दुःख के कारण रोती हुई सखियों ने अन्तः पुर में स्थित धर्म और अधर्म की माता दुर्गा से सब समाचार विस्तार से बतलाया ॥ ११ ॥ सखियों ने कहा — हे सुन्दर भौंहोंवाली ! धर्म और अधर्म नामक पुत्रों के मारे जाने से आपके स्वामी दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त रुदन कर रहे हैं। यह सुनकर शय्या पर स्थित वह दुर्गा उसी प्रकार भूमि पर गिर पड़ी, जैसे कि अत्यन्त कोमल और अरुणवर्ण के पल्लवयुक्त केले के वृक्ष आँधी के द्वारा गिरा दिये जाते हैं ॥ १२ ॥ सखियों के अमांगलिक वचनों से उसका हृदय इस प्रकार विद्ध हो गया, मानो बाणों से बिंध गया हो। उसके केश तथा आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये । उस समय वह भी बहुत रोने लगी ॥ १३ ॥ उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे, जिसके कारण बिल्वफल के सदृश शोभास्पद उसका वक्षःस्थल अनावृत-सा हो गया था । आँसुओं के गिरने से उसके कपोल श्यामल वर्ण के प्रतीत हो रहे थे। शोकरूपी अग्नि से उसकी प्रभा मलिन-सी हो गयी थी ॥ १४ ॥ वह अपने दोनों हाथों से मुख पर प्रहार कर रही थी, उसके दाँतों से निकलने वाले रक्त से भूमि सिक्त हो गयी थी, वह अपने शरीर की भी सुध-बुध भूल गयी, वह अत्यन्त व्याकुल हो गयी और लज्जा का भी उसे भान नहीं रहा। वह उसी प्रकार गिरते-पड़ते राजसभा के प्रांगण में पहुँची, जैसे कि कोई हठ करता हुआ बालक गिरता-पड़ता है । उसको देखकर उसके दुःख से विवश हुए वे सभी सभा में बैठे हुए पुरुष भी रोने लगे। अपने नेत्रों से आँसू बहाती हुई वह राजपत्नी दुर्गा उन सभासदों से कहने लगी ॥ १५–१६१/२ ॥ रानी बोली — सभी वीरों के उपस्थित रहने पर भी मेरे उन दोनों सुकुमार पुत्रों को बिना मुझसे पूछे ही क्यों युद्धभूमि में प्रेषित कर दिया गया ? यदि मैं आशीर्वाद देकर उन्हें भेजती तो निश्चित ही उनकी मृत्यु नहीं होती ॥ १७-१८ ॥ मेरे वचनों को विधाता भी मिथ्या करना नहीं चाहते। जिन मेरे पुत्रों के द्वारा देवगणों को भी जीत लिया गया था, फिर वे कैसे मृत्यु को प्राप्त हुए ? ॥ १९ ॥ मैं उन दोनों को अब कब देखूँगी, जिन्होंने कि अपनी सुन्दरता से कामदेव को भी जीत लिया था और जो बुद्धि के समुद्र थे, वे दोनों मुझे छोड़कर क्यों चले गये ? उन दोनों की शोकाग्नि में दग्ध होकर आज ही मैं मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँगी। इस प्रकार से कहकर वह दैत्यपत्नी दुर्गा अपने हृदय को बार-बार पीटती हुई भूमि पर गिर पड़ी ॥ २०-२१ ॥ तदनन्तर सखियों तथा नगरनिवासी जनों ने उसे शीघ्र ही समझाया और कहा — हे माता! शोक करने से कोई भी जो मृत्यु को प्राप्त हो गया हो, लौटकर वापस नहीं आता है ॥ २२ ॥ मृत्युलोके चिरं स्थाता नेक्षितो न श्रुतोऽपि च । विहाय हनुमन्तं च कृपं शारद्वतं बलिम् ॥ २३ ॥ व्यासं परशुरामं च बिभीषणमथापि च । द्रौणिं नान्यश्चिरं स्थायी न भूतो न भविष्यति ॥ २४ ॥ ब्रह्मादीनां भवेन् मृत्युः का तत्र गणनात्मनः । रोदनं तेन कर्तव्यं न स्यान् मृत्युः कदाऽस्य चेत् ॥ २५ ॥ क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च । न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत् ॥ २६ ॥ यथा काष्ठं काष्ठगतं पुरेणैव वियुज्यते । तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेवशः ॥ २७ ॥ नानापक्षिगणा रात्रावेकवृक्षागता यथा । प्रातर्दशदिशो यान्ति तत्र किं परिवेदनम् ॥ २८ ॥ इस मृत्युलोक में चिरकाल तक जीवित रहने वाला न कोई देखा गया है और न ऐसे किसी व्यक्ति के विषय में सुना ही गया है। हनुमान्, शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य, बलि, व्यास, परशुराम, विभीषण तथा द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा — इन सात चिरजीवियों को छोड़कर चिरकाल- तक जीवित रहने वाला न कोई हुआ है और न कोई आगे होगा ही ॥ २३-२४ ॥ जब ब्रह्मा आदि देवताओं की भी मृत्यु होती है, तो फिर हम लोगों की क्या गणना ! रुदन तो उसी को करना चाहिये, जो यह समझे कि मेरी मृत्यु नहीं होगी ॥ २५ ॥ यह निश्चित है कि ऋण का बन्धन छूट जाने पर स्त्री, पुत्र, पशु भी इस संसार में स्थिर नहीं रहते, अतः शोक करना व्यर्थ है । जिस प्रकार जलप्रवाह में बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं, तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्ध के कारण ] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणी के साथ ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है । जिस प्रकार बहुत-से पक्षीगण रात्रि में एक वृक्ष का आश्रय लेते हैं और प्रातःकाल दसों दिशाओं में उड़ जाते हैं, उसी प्रकार संसार में जीवों का संयोग और वियोग होता रहता है, इसमें दुःख एवं विलाप करने की क्या आवश्यकता? ॥ २६–२८ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से दुर्गा को [सखियों तथा नागरिकों ने] समझाया, इसके अनन्तर [सभासद् ] जनों से समन्वित वह सिन्धु बलपूर्वक शोक को रोककर अपने आसन में बैठ गया ॥ २९ ॥ उन्होंने विचार किया कि यदि हम रोते रहेंगे तो शत्रुजन हमारा उपहास करेंगे। उस दुर्गा को सहारा देकर लोग बलपूर्वक अन्त: पुर में ले गये ॥ ३० ॥ शोक से अत्यन्त व्याकुल वह दुर्गा दीर्घ निःश्वास लेती हुई पलंग पर गिर पड़ी। दैत्यराज सिन्धु ने अत्यन्त क्रुद्ध होते हुए शस्त्रों के समूहों को धारण किया ॥ ३१ ॥ अपने दोनों पुत्रों के वध का बदला लेने के लिये वह अश्व पर आरूढ़ होकर युद्ध करने चल पड़ा। उसके प्रस्थान करते ही उसकी रणोन्मत्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी निकल पड़ी। सबसे आगे पैदल सैनिक उछलते- उछलते हुए जा रहे थे। वे सभी नानावर्ण के तथा समान स्वरूप वाले थे, उन्होंने अपने हाथों में विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को धारण किया हुआ था ॥ ३२-३३ ॥ पैदल सेना के पीछे हाथियों के झुण्ड चल रहे थे, वे गैरिक आदि अनेक धातुओं से चित्रित किये गये थे, घण्टा तथा आभूषणों से सुसज्जित थे। उनके गण्डस्थल से मदरूपी जल की धारा प्रवाहित हो रही थी और वे चिंघाड़ रहे थे। वे हाथी अपनी चीत्कार से शत्रुसेना को भयभीत कर रहे थे और अत्यन्त भयंकर ध्वनि कर रहे थे। हाथियों की सेना के अनन्तर घुड़सवारों सहित घोड़े चल रहे थे। जो युद्ध में वायु के समान वेगवाले थे ॥ ३४-३५ ॥ उन घोड़ों के खुरों के आघात से भूतल पर से अग्नि की चिनगारियाँ निकलकर गिर रही थीं । उन घोड़ों के ऊपर हाथों में ढाल, भाले तथा खड्ग लिये हुए अश्वारोही सैनिक सुशोभित हो रहे थे। वे सैनिक शरीर में चन्दन तथा अगरु का अनुलेप किये हुए थे । विविध प्रकार की मालाओं से विभूषित थे। सभी ने शरीर की रक्षा करने वाले कवच को धारण कर रखा था और मस्तक पर मुकुट धारण करने से वे बहुत सुशोभित हो रहे थे ॥ ३६-३७ ॥ वे मानो आकाश को निगलते हुए और दसों दिशाओं को निनादित करते हुए चल रहे थे। उस अश्वसेना के पीछे रथ चल रहे थे, जिन पर महान् वीर योद्धा बैठे हुए थे ॥ ३८ ॥ वे रथ नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे और उनमें धनुष एवं तरकस रखे हुए थे। उस सेना के मध्य में दैत्यराज सिन्धु सुशोभित हो रहा था, जो विशाल मुकुट तथा कुण्डलों को धारण किये हुए था ॥ ३९ ॥ वह अपने हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र तथा धनुष को लिये हुए था और कन्धे में धारण किये तरकस से सुशोभित हो रहा था। वह युद्धोचित उत्तम कंकणों की शोभा से समन्वित तथा करधनी और बाजूबन्द से शोभायमान था ॥ ४० ॥ क्रुद्ध होने से उसके नेत्र ऐसे लाल-लाल हो रहे थे मानो वह तीनों लोकों को खा जाना चाहता हो । उस समय सभी प्रकार के वाद्यों के बजते हुए और बन्दीजनों द्वारा स्तुतिगान होते हुए जब राजा सिन्धु बड़े वेग से चल रहा था, तभी एक दूत वहाँ आकर दैत्यराज से बोला — हे दैत्यराज! हे सुव्रत! आपके पिता आ रहे हैं, आप उनकी प्रतीक्षा करें ॥ ४१-४२ ॥ जब सिन्धु ने पीछे मुड़कर देखा तो उसने अपने पिता को समीप में आया देखा। वे अश्व पर आरूढ़ थे । सिन्धु अपने पिता को प्रणाम किया और पिता ने भी उसे आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ४३ ॥ तदनन्तर [वात्सल्यवश] सेना के मध्य में पुत्र को सुरक्षित करके उसके पिता ने उसे इस लोक तथा परलोक में सुख प्राप्त करने के लिये उपदेश प्रदान किया ॥ ४४ ॥ चक्रपाणि बोले — हे पुत्र ! तुम अभिमान के वशीभूत हो बर्ताव कर रहे हो, ऐश्वर्य के मद में उन्मत्त होकर तुम भला-बुरा कुछ भी जान नहीं पा रहे हो। जो अपने कल्याण की कामना रखता हो, उसे अपने कार्य की सिद्धि के लिये वृद्धजनों से पूछना चाहिये। जो भविष्य में अपने कल्याण की कामना रखता हो, उसे चाहिये कि वह वर्तमान में अशुभ कर्म न करे। थोड़े से भी अशुभ कर्म के द्वारा महान् पुण्य विनष्ट हो जाता है ॥ ४५-४६ ॥ हे पुत्र ! जिस प्रकार अग्नि की एक चिनगारीमात्र सब कुछ जला डालती है, उसी प्रकार थोड़ा-सा भी दोष सम्पूर्ण संचित पुण्य को विनष्ट कर डालता है । हे पुत्र! देवताओं को बन्दी बनाये रखने में तुम्हारा कहीं भी कोई भी लाभ दिखायी नहीं देता है ॥ ४७ ॥ वही पुत्र सत्पुत्र कहलाता है, जो सदा ही माता- पिता की आज्ञा का पालन करता है, उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने पर पुण्य विनष्ट हो जाता है और हे पुत्र ! वह अनेकों नरकों को प्रदान करने वाले पापसमूहों तथा मोह के पाश में ग्रस्त हो जाता है। अतः हे पुत्र ! तुम मेरा यह कल्याणकारी वचन सुनो — तुम शीघ्र ही देवताओं को मुक्त कर दो ॥ ४८-४९ ॥ देवताओं के बन्धनमुक्त हो जाने पर वह मयूरेश तुम्हारा मित्र हो जायगा, वह सम्पूर्ण मनोरथों पूर्ण को करने वाला है। इस पृथ्वी पर द्वेष रखते हुए कोई भी किसी प्रकार सुख नहीं प्राप्त कर सकता । द्वेष रखने के कारण ही देवताओं के द्वारा हिरण्याक्ष आदि असुरों का विनाश हुआ ॥ ५०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — पिता के इस प्रकार के वचनों को सुनकर पुत्र सिन्धु अत्यधिक कुपित हो उठा और वह अपने पिता को धिक्कारते हुए उनसे कहने लगा — मुझे अभी तक यह भ्रम बना हुआ था कि मेरे पिता आप बहुत चतुर हैं, किंतु इस समय आपका वह सब चातुर्य भलीभाँति प्रकट हो गया है ॥ ५१-५२ ॥ हे तात! आप मूर्खो की भाँति बोल रहे हैं, अब आप अपना मुख काला करके यहाँ से चले जायँ। हे पिता! जिसने मेरी परार्ध संख्या वाली सेना को मार डाला है, उसके साथ अब मैं कैसे अपयश प्रदान करने वाली सन्धि कर सकता हूँ? हाथ में कुश एवं अक्षमाला को धारण करना क्षत्रियधर्म में शोभित नहीं होता ॥ ५३-५४ ॥ इसी कारण राजा को चाहिये कि वह शत्रुओं के साथ दया का बर्ताव न करे। नीति में बताया गया है कि युद्ध-स्थल में शत्रु के प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार ही करना चाहिये ॥ ५५ ॥ ऐसा कहने के अनन्तर दैत्यराज सिन्धु ने पिता को प्रणाम किया और उन्हें बलपूर्वक वापस लौटाकर वह युद्ध की अभिलाषा से युद्ध के लिये निकल पड़ा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘पिता के साथ सिन्धुदैत्य के संवाद का वर्णन’ नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२० ॥ Content is available only for registered users. 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