November 20, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-121 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय राक्षसराज सिन्धु की सेना के साथ कार्तिकेय, वीरभद्र आदि देववीरों की सेनाओं का भयंकर संग्राम, सिन्धुसेना की पराजय, दैत्यराज सिन्धु का स्वयं युद्ध के लिये प्रस्थान, मयूरेश के परशु से उत्पन्न कालपुरुष द्वारा दैत्य सैनिकों का भक्षण किया जाना, चिन्तित होकर दैत्य सिन्धु का घर में आकर छिपकर रहना अथः एकविंशोत्तरशततमोऽध्यायः युध्दवर्णनं ब्रह्माजी बोले — जब वीरभद्र आदि वीरों के साथ गणेश्वर सुखपूर्वक आसन पर बैठे हुए थे, उसी समय भयभीत देवता हाँफते हुए बड़े वेगपूर्वक वहाँ आये ॥ १ ॥ उन्होंने गुणेश्वर को समाचार दिया कि युद्ध करने के लिये वह दैत्यराज सिन्धु अब स्वयं ही आ गया है। सिन्धु (सागर)- के समान अपार सैन्य होने के कारण उस दैत्य का ‘सिन्धु’ यह नाम [वास्तविक अर्थों में] प्रसिद्ध हुआ है। तब (यह समाचार पाकर) वे सभी वीर उठे और [युद्ध हेतु] तैयार होकर उन्होंने उस सेना को देखा। तब उन्होंने उस सिन्धु को अपने को मारने के लिये आया हुआ साक्षात् काल ही समझा ॥ २-३ ॥ तदनन्तर मयूरेश ने अपने चारों हाथों में चार आयुधों को धारण किया और वे बड़े ही आनन्दित होते हुए अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ हुए, उस समय उन्होंने भीषण गर्जना की ॥ ४ ॥ वे मयूरेश भगवान् शिव को प्रणाम करके दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए बड़े ही वेगपूर्वक निकल पड़े। उन्हें भगवान् शिव का आशीर्वादरूपी कवच प्राप्त था। वे वीरों को साथ लेकर सेनासहित चल रहे थे ॥ ५ ॥ जब वे दैत्यराज सिन्धु को मारने के लिये आगे जाने लगे तो उसी समय षडानन कार्तिकेय ने उपस्थित होकर उनसे कहा — हे विघ्नराज ! उस सिन्धु से युद्ध करने के लिये मैं जाता हूँ। बहुत से वीरों के रहते हुए आप क्यों युद्ध के लिये जाते हैं? पहले हम सभी का बल-पराक्रम देख लीजिये, फिर यदि हमारा पौरुष नष्ट हो जाय, तब आप युद्ध करें ॥ ६-७ ॥ ऐसा कहकर और उन मयूरेश को प्रणाम करके कार्तिकेय चतुरंगिणी सेना साथ लेकर युद्ध के लिये निकल पड़े। फिर उन्होंने राक्षसराज सिन्धु की सेना का वध आरम्भ किया ॥ ८ ॥ उस सिन्धु ने भी नाना प्रकार के शस्त्रों तथा बाणों के जाल से उस देवसेना पर प्रहार किया। ‘अरे ! आज सहन करो, मुझपर प्रहार करो, मैं तुम्हें मारता हूँ, आओ मेरे सम्मुख आओ’ इस प्रकार से उस युद्ध में युद्ध करने वाले वीरों का कोलाहल हो रहा था। कई वीर शस्त्रों के द्वारा आहत हो गये थे, तो कई वीर बाणों के समूहों के प्रहार से प्राणशून्य हो गये थे ॥ ९-१० ॥ तलवारों, भिन्दिपालों, भालों तथा मुद्गरों के प्रहार से कुछ वीरों के अंग कट गये थे, कई के पैर कट गये थे, और किसी-किसी के बाहु, जाँघें और मस्तक कट चुके थे। शत्रुपक्ष के युद्धोन्मत्त सैनिकों को मारते हुए वे वीर उन्हीं सैनिकों के समूह में मिल जा रहे थे। उस समय वीरों की सिंहगर्जना, घोड़ों की हिनहिनाहट की ध्वनि, हाथियों के चिंघाड़ तथा रथों के पहियों की धुरियों और वाद्यों की ध्वनि-प्रतिध्वनियों से महान् कोलाहल हो रहा था। दोनों सेनाओं के बीच अनियन्त्रित युद्ध होने लगा ॥ ११-१३ ॥ वे वीर सैनिक अपनी-अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दूसरे पक्ष के वीरों के मस्तक, मुख, नेत्रों, बाहुओं, उदर, नाभि, दोनों पैरों, दोनों गुल्फों तथा जानुओं पर आघात करने लगे। कोई वीर अपने हाथ, कोई पैर से और कोई दूसरे को तलवार से मार रहे थे। घनघोर अन्धकार छा जाने पर भी कोई-कोई वीर अपने शत्रुओं को तलवार के प्रहार से मार रहे थे ॥ १४-१५ ॥ सूर्य के अस्त हो जाने पर वे वीर सैनिक एक- दूसरे को देखकर उससे भलीभाँति पूछकर, यदि वह शत्रुपक्ष का होता तो उसे मार डाल रहे थे । असुर लोग जब यह जान ले रहे थे कि ये देवपक्ष के हैं, तो उन्हें मार रहे थे और जब देवता लोग पहचान ले रहे थे कि ये असुरपक्षके हैं, तो उन्हें मार डाल रहे थे ॥ १६ ॥ उस भयंकर संग्राम में रक्त की नदियाँ प्रवाहित होने लगीं, उनमें मृत सैनिक बह रहे थे। जिनमें कुछ प्राण शेष था, उनको दूसरे वीरों ने हुंकार करते हुए बलपूर्वक उस नदी से बाहर निकाला और उनके शरीरों में लगे हुए बाणों को निकाला। युद्धसन्नद्ध उन दोनों पक्षों की सेना के सैनिकों ने पाँच दिन तक युद्ध करते हुए चिर विश्राम नहीं लिया ॥ १७-१८ ॥ इस प्रकार के उस युद्ध में देवताओं ने दैत्यराज सिन्धु के करोड़ों पैदल सैनिकों को मार डाला। इसके बाद उस दैत्य सिन्धु की असंख्य मात्रा में शस्त्रों से सुसज्जित गजारोही सेना आयी । उन हाथियों के ऊपर नाना प्रकार के युद्ध की कलाओं में कुशल गजारोही वीर बैठे हुए थे। तब वीरभद्र आदि देवों ने कठिनाई से जीती जा सकने वाली दैत्य सिन्धु की उस गजसेना का संहार किया ॥ १९-२० ॥ उन वीरों में से किसी के मस्तक फट गये थे, तो किसी के हाथ और दाँत टूट गये थे। अग्निसम्बन्धी शस्त्रों को धारण किये हुए कुछ देवों ने हाथियों पर सवार वीरों को गिरा डाला था ॥ २१ ॥ वीरभद्र ने अत्यन्त बलपूर्वक एक हाथी को दूसरे हाथी से टकरा डाला, उस आघात के कारण वे दोनों हाथी आठ टुकड़ों में होकर गिर पड़े ॥ २२ ॥ षडानन कार्तिकेय हाथियों की उस सेना को मारते हुए अत्यन्त शोभा पा रहे थे । उन्होंने अपने छह धनुषों से छोड़े गये अनेकों बाणों के द्वारा शक्तिपूर्वक दैत्य सिन्धु के वीर सैनिकों सहित असंख्य मदोन्मत्त हाथियों के समूहों को मार गिराया। हिरण्यगर्भ ने भी अनेक वीरों से समन्वित उन हाथियों को मार गिराया ॥ २३-२४ ॥ भूतराज ने नाराच की मार से जीवित बचे हुए विविध प्रकार के उन हाथियों को, जिनमें वीर दैत्य सैनिक बैठे हुए थे, अपने शस्त्रों से युद्ध में मार डाला ॥ २५ ॥ पुष्पदन्त ने सिंह का रूप धारण करके उन हाथियों को विदीर्ण कर डाला । नन्दी ने तो स्वयं हाथी का रूप धारण करके उन बहुत से हाथियों को भग्न कर डाला ॥ २६ ॥ दूसरे देवगणों ने अपने बाणसमूहों से उन सभी हाथियों को गिरा दिया। किसी ने एक हाथी की पूँछ पकड़कर घुमाने के अनन्तर दूसरे हाथी के ऊपर उसे फेंक दिया तो अत्यन्त सुदृढ़ आघात के कारण दोनों हाथी टकराकर चूर-चूर हो गये ॥ २७१/२ ॥ इस प्रकार हाथियों की सेना के समाप्त हो जाने परवे दैत्य वीर अश्वों पर आरूढ़ होकर युद्ध करने लगे । उन्होंने उस युद्ध में उन असंख्य देवताओं को अपने आयुधों के द्वारा मार गिराया, किंतु मूर्च्छित हुए वे देवता फिर सचेत हो गये ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर उन देवताओं ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर घोड़ों पर आरूढ़ दैत्यवीरों तथा घोड़ों को बाणों से विद्ध कर दिया। उधर घोड़ों पर आरूढ़ उन महान् असुरों ने क्रोध करते हुए देवताओं पर प्रहार किया ॥ ३० ॥ उन्होंने अपने शस्त्रों, अस्त्रों तथा बाणों की वर्षा से उन देवताओं का अन्त कर डाला । तदनन्तर युद्ध में देवताओं के मारे जाने का समाचार सुनकर मयूरेश की सेना के छः वीर युद्ध के लिये पुनः आये ॥ ३१ ॥ तब उन वीरों ने अश्वों पर सवार उन दैत्यों पर पुनः प्रहार किया। उनमें से चार वीर चारों दिशाओं में बड़ा भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥ शेष बचे दो वीर देवगणों से समन्वित अपनी देवसेना की रक्षा करने लगे। देवसेना के उन चारों वीरों ने अश्वों तथा अश्वों पर सवार दैत्य वीरों को मार गिराया ॥ ३३ ॥ उन्होंने पैदल चलकर ही शत्रुपक्ष के बहुत से वीरों को मार डाला। बाणों की मार से घायल करोड़ों करोड़ की संख्या में उस युद्धस्थल में दैत्य सैनिक गिर पड़े ॥ ३४ ॥ नन्दी और भृंगी के द्वारा अश्वों को मरा हुआ तथा घुड़सवार सैनिकों को गिरा हुआ देखकर पुनः नन्दिकेश्वर ने अपने पैरों के आघात से उनपर प्रहार किया ॥ ३५ ॥ वीरभद्र ने भी असंख्य संख्या वाले उन अश्वारोही योद्धाओं को गिरा डाला। कार्तिकेय आदि चार वीरों के द्वारा दैत्य सेना के प्रधान – प्रधान योद्धाओं के मार दिये जाने पर अवशिष्ट असुरगण सभी दिशाओं-विदिशाओं में भाग चले। तब वे कार्तिकेयादि चारों वीर असुरों का पीछा करते हुए उनका संहार करने लगे। उस रणस्थल में युद्धनिरत दैत्यों की कल्पान्त-कालीन प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। तदनन्तर कुछ दैत्य देवगणों की शरण में चले गये ॥ ३६-३७ ॥ दैत्यसेना के घुड़सवार सैनिकों का वहाँ महान् कोलाहल होने लगा। इस प्रकार से सम्पूर्ण दैत्यसेना का वध करके कार्तिकेय आदि वे छः वीर अत्यन्त प्रसन्नता को प्राप्त हुए। उस समय सभी प्रकार के वाद्य बजने लगे। सभी वीर विजय-गर्जना करते हुए उन प्रभु मयूरेश की स्तुति करने लगे। वे कहने लगे — मयूरेश के प्रभाव से, उनका स्मरण करने से तथा उनको प्रणाम करने से हमें विजय प्राप्त हुई है ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर दैत्यराज सिन्धु ने अपनी शरण में आये हुए सैनिकों के मुख से अपनी सेना के वध का वृत्तान्त जानकर गजारोही, अश्वारोही तथा रथारोही वीरों, अमात्यों और अन्य सभी वीरों से अपनी युद्ध की लालसा को प्रकट करते हुए कहा ॥ ४०१/२ ॥ सिन्धु बोला — जो-जो भी योद्धा युद्ध के लिये जाते हैं, उन्हें शत्रुपक्ष के द्वारा मारे जाने का ही समाचार मैं अभीतक सुनता आया हूँ, अब इस समय मैं स्वयं ही बलपूर्वक उस गुणेश को मारने के लिये जाता हूँ ॥ ४११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर उसने अपनी गर्जना से आकाश, दसों दिशाओं और तीनों लोकों को इस प्रकार निनादित कर डाला, जैसे कि वह पृथ्वी तथा स्वर्ग- मण्डल को ग्रसने के लिये जा रहा हो । तदनन्तर उसने धनुष में बाण का संधान करके और कान तक उस धनुष की प्रत्यंचा खींचकर बड़े ही वेग से उस बाण को महान् बलशाली वीरभद्र आदि देवों द्वारा संरक्षित देवसेना में फेंका ॥ ४२-४३१/२ ॥ उस दैत्यराज सिन्धु ने अस्त्रमन्त्र का सौ बार जप करके समस्त वीरों का निरीक्षणकर बाण का एकाएक धनुष पर सन्धान किया । उस अस्त्र से सहसा उत्पन्न अग्नि देवसेना को और साथ-ही-साथ वनों एवं पर्वतोंसहित समग्र पृथिवी को दग्ध करने लगी ॥ ४४-४५१/२ ॥ उस अग्नि के द्वारा जलाये जाते हुए उन देवसैनिकों ने उस अग्नि से उत्पन्न एक पुरुष को देखा, जो जटाएँ धारण किये हुए था, उसका तेज प्रदीप्त हो रहा था, उसकी जिह्वा विद्युत् के समान थी, उसका मुख बड़ा ही भयंकर था और वह देवसैनिकों को निगलता जा रहा था। उसे देखकर कार्तिकेय आदि भयभीत हो गये और दसों दिशाओं में भाग गये। युद्ध में वह जिस-जिसका भक्षण कर लेता था, वह-वह मयूरेश का स्मरण करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक उन मयूरेश के निज धाम को प्राप्त कर लेता था। इस प्रकार से उस पुरुष ने सम्पूर्ण देवसेना का भक्षण कर लिया ॥ ४६–४८१/२ ॥ वह देवसेना जिधर – जिधर जाती थी, वहाँ-वहाँ उस पुरुष के मुख से उत्पन्न अग्नि प्रलयाग्नि के समान जलते हुए उस सेना को दग्ध कर देती थी, इस प्रकार मयूरेश की वह सेना अग्नि के द्वारा दग्ध हो गयी ॥ ४९-५० ॥ उस समय धुएँ का महान् अन्धकार छा गया था, उस अन्धकार में कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था । तदनन्तर सभी देववीर मयूरेश के पीछे छिप गये ॥ ५१ ॥ उस अग्नि से जलाये जाते हुए वे देवगण त्राहि-त्राहि इस प्रकार से करुण पुकार करने लगे। उस निवारित किये न जा सकने वाले महान् अस्त्र को देखकर देव मयूरेश तेजहीन-से हो गये और लोक में अपमानित होने के भय से वे विचार करने लगे कि यदि इस समय भगवान् शिव कृपा करें, तभी यहाँ हमारी विजय हो सकती है ॥ ५२-५३ ॥ ऐसा कहने के अनन्तर मयूरेश ने हाथ में परशु धारण किया और उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर बलपूर्वक शत्रुसेना पर फेंका, अपने तेज से सूर्य के तेज को भी जीत लेने वाला वह अभिमन्त्रित परशु आकाश तथा दिशाओं को निनादित करते हुए तथा शत्रुसेना को दग्ध करते हुए ऐसे जा रहा था, मानो कल्पान्त के समय की प्रलयाग्नि जा रही हो ॥ ५४१/२ ॥ उस प्रज्वलित अग्निसदृश परशु से भी एक महान् पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुख में आकाशसहित सम्पूर्ण भूमण्डल भी प्रवेश करते हुए आकार में छोटा पड़ जाय । तदनन्तर उस उत्पन्न पुरुष का सिन्धुदैत्य के पुरुष योद्धा के साथ और उस अस्त्र परशु का [सिन्धु के द्वारा प्रयुक्त ] अस्त्र के साथ युद्ध होने लगा । तब उस युद्ध को देखने के लिये देवर्षिगण वहाँ उपस्थित हो गये । मयूरेश के उस यमराजतुल्य अस्त्र परशु ने शीघ्र ही दैत्य सिन्धु के अस्त्र का भक्षण कर डाला ॥ ५५-५७ ॥ तदनन्तर ज्वालाओं की माला से युक्त अग्निदेव के सदृश वह आग्नेयास्त्र दैत्य की सेना को जलाने के लिये चल पड़ा। दैत्यराज सिन्धु ने भी उस अस्त्र को आता हुआ देखकर बाणों की वृष्टि करनी शुरू कर दी ॥ ५८ ॥ उस सिन्धु के अभिमन्त्रित एक बाण से अनन्त संख्या में बाण प्रकट होने लगे। देवसेना के अत्यन्त तीव्र गति वाले योद्धा उस दैत्य की बाणवृष्टि से आच्छादित हो गये। तब क्रुद्ध होकर मयूरेश ने उस समय नाना प्रकार के अस्त्रों की सृष्टि की। उन अस्त्रों ने दैत्यराज सिन्धु के सभी अस्त्रों को निरस्त कर डाला ॥ ५९-६० ॥ तदनन्तर अस्त्र (परशु)-से उत्पन्न उस कालपुरुष ने दैत्यसेना का पुनः भक्षण कर डाला। वे दैत्य सैनिक भाग-भागकर जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ वह कालपुरुष पहुँच जाता था ॥ ६१ ॥ तब चिन्ताग्रस्त हुआ वह दैत्य सिन्धु उस समय अब क्या करना चाहिये, यह निश्चित नहीं कर सका। क्या करणीय है, कहाँ जाना चाहिये और कहाँ ठहरना चाहिये – इस प्रकार से वह चिन्ता करने लगा ॥ ६२ ॥ सूर्य के अस्त हो जाने पर वह अपने घर की ओर लौट चला। उसके कुण्डल तथा अन्य आभूषण नष्ट हो चुके थे। वह भूमि पर गिरते-पड़ते हुए जा रहा था ॥ ६३ ॥ उसने अपने नगर में प्रवेश किया, उस समय वह औघड़ शिव के समान अस्त-व्यस्त प्रतीत हो रहा था । वह वहाँ किसी गुप्त स्थान में स्त्रियों तथा अनुचरों की दृष्टि से ओझल होकर रहने लगा ॥ ६४ ॥ उस दैत्यराज सिन्धु के इस प्रकार के सम्पूर्ण वृत्तान्त को शीघ्र ही जानकर देव मयूरेश ने अपने गणोंसहित उच्च स्वर से गर्जना की। उस नाद ने सहसा तीनों लोकों को निनादित कर डाला ॥ ६५ ॥ तदनन्तर मयूरेश ने अपने द्वारा प्रकट किये गये कृतान्तास्त्र को उसी प्रकार समेट लिया, जैसे कि मन्त्र को जानने वाला सर्प को वापस अपने पास बुला लेता है । इसके पश्चात् वे मयूरेश अपने गणों को साथ लेकर शीघ्र ही अपने भवन को चले गये ॥ ६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सिन्धुदैत्य का अपमान’ नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२१ ॥ Content is available only for registered users. 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