श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-122
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ बाईसवाँ अध्याय
गौतम आदि महर्षियों तथा भगवान् शिव द्वारा मयूरेश की महिमा एवं पराक्रम का वर्णन, षडानन आदि का देवर्षि नारद के साथ संवाद, देव मयूरेश का दैत्य सिन्धु से युद्ध के लिये सन्नद्ध होना, किंतु नन्दी, भृंगी आदि का उन्हें रोककर स्वयं युद्ध के लिये प्रस्थान करना, वीरभद्र तथा भूतराज का भी साथ में जाना, दैत्य सिन्धु के साथ उनका युद्ध और दैत्यसेना का पराजित होना
अथः द्वाविंशोत्तरशततमोऽध्यायः
श्रीगणेशसेनाविजयवर्णनं

ब्रह्माजी बोले —जब देव मयूरेश सिंहासन पर बैठे हुए थे और चारों ओर से अपने गणों से घिरे हुए थे, उस समय गौतम आदि महर्षियों ने वहाँ आकर उन गुणेश्वर की महिमा का गान किया ॥ १ ॥

ऋषिगण बोले — जिस दैत्यराज सिन्धु ने देवराज इन्द्र पर विजय प्राप्त की तथा नागों सहित पाताल में स्थित शेषनाग को जीत लिया, फिर उसके समक्ष अन्य किसी और की क्या गणना! ऐसे सिन्धुदैत्य को भी आपने जीत लिया । हे सुरेश्वर ! आपने उस दुष्ट सिन्धु दैत्य से बहुतों की रक्षा की है, यदि आप ऐसा नहीं करते, तो गणों का तथा अन्य सभी लोगों का जीवन कैसे बच पाता ! ॥ २-३ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से जब ऋषिगण उन गुणेश्वर की कीर्ति का गान कर रहे थे कि उसी समय देवी गिरिजा वहाँ आयीं और अपने पुत्र गुणेश का आलिंगन करके उनसे बोलीं — युद्ध की लालसा रखने वाले तुम अत्यन्त थक गये हो ॥ ४ ॥

उसी समय शीघ्र ही भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने उन मयूरेश का आलिंगनकर उनसे कहा — जो कार्य देवराज इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी असाध्य था, वह कार्य आपने करके दिखाया है। आप साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत् के गुरु हैं, सब कुछ जानने वाले हैं और पृथ्वी के भार को हलका करने में सदा निरत रहते हैं, आपकी महिमा को, आपके यथार्थ स्वरूप को ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते हैं और न गौतम आदि मुनि ही भलीभाँति जानते हैं तो उसे जानने की सामर्थ्य हममें कैसे हो सकती है ? ॥ ५–७ ॥

ब्रह्माजी बोले — जब देवेश्वर भगवान् शिव इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी माता पार्वती से कहने लगे — हे माता ! आप मेरी बात सुनें ॥ ८ ॥ हे शिवे! इस स्थान पर रहते हुए बहुत दिन व्यतीत हो गये हैं, हे अनघे! वह अत्यन्त दुष्ट दैत्यराज सिन्धु कब मुक्ति को प्राप्त करेगा ? जिस दैत्य सिन्धु ने इन्द्र आदि देवताओं को भी जीत लिया है, उसका विनाश कैसे होगा ? हे सुव्रते ! मयूरेश का विवाह कब होगा ? ॥ ९-१० ॥ हमें आप आज्ञा दीजिये, हम लोग जायँगे, पुनः शीघ्र ही लौट भी आयेंगे। दैत्यराज सिन्धु के बन्धन से वे देवता कब मुक्त होंगे ? हे माता ! उस दैत्य सिन्धु का वध तो मुझे असाध्य ही प्रतीत होता है ॥ ११-१२ ॥

ब्रह्माजी बोले — देवर्षि नारदजी की बातों को सुनकर वे गण और षडानन आदि वीर उन सुरेश्वर देव मयूरेश्वर को उद्बुद्ध करने के प्रयोजन से देवदर्शन नारदजी से कहने लगे — हे मुने! हे अनघ ! हे नारद! आश्चर्य है कि आप सर्वज्ञ हैं, तथापि इस प्रकार की बातें कर रहे हैं। ये प्रभु मयूरेश तो इसी कार्य की सिद्धि के लिये अपने निज धाम से इस पृथ्वी पर आये हुए हैं ॥ १३-१४ ॥ ये मयूरेश सम्पूर्ण कामनाओं से परिपूर्ण हैं, सम्पूर्ण पदार्थों को प्रदान करने वाले हैं। ये गुणातीत हैं, गुणों के ईश हैं और सत्त्व-रज तथा तम — इन तीनों गुणों में क्षोभ उत्पन्न करने वाले हैं, इनके यथार्थ स्वरूप का निरूपण करने में ब्रह्मा आदि देव भी सर्वथा असमर्थ हैं, ये पृथ्वी के भार का हरण करने के इच्छुक हैं, इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी अवध्य महाबलशाली असुरों का वध करने में निरत हैं, ये अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के नायक हैं, सम्पूर्ण जगत् के आत्मस्वरूप हैं और सभी लोकों की उत्पत्ति करने वाले, पालन करने वाले और फिर संहार करने वाले भी ये ही हैं, क्या आप इन मयूरेश के स्वरूप को तथा इनके बल-पराक्रम को नहीं जानते ? ॥ १५–१७१/२

ब्रह्माजी बोले — षडानन आदि की इस प्रकार की वाणी सुनकर देवर्षि नारदजी पुनः कहने लगे — जब मैं उस दैत्य सिन्धु को मरा हुआ देखूँगा और मुक्ति को प्राप्त हुआ देखूँगा, तभी मैं सभी वचनों को सत्य मानूँगा, अन्यथा कभी नहीं ॥ १८-१९ ॥

नारदजी के इस प्रकार के वचन को सुनकर मयूरेश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। वे क्रोध से उद्दीप्त हो उठे और तीनों लोकों को निनादित करते हुए गरजे ॥ २० ॥ उस समय वे तीनों लोकों को जलाते हुए-से और इस पृथिवी को चूर-चूर करते हुए-से मेघ के समान गम्भीर वाणी में उन मुनि नारदजी से बोले ॥ २१ ॥

मयूरेश बोले — हे मुनीश्वर नारदजी! आप ब्रह्माजी के पुत्र होने के कारण और सर्वज्ञ होने के कारण माननीय हैं, अतः मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी मर्यादा का पालन करें ॥ २२ ॥ मैं आपकी कृपा से क्षणभर में ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा यमराज को भी निगल जाऊँगा। भूलोक को उलट डालूँगा और सभी सागरों को सोख डालूँगा। हे मुने! मैं अपनी नि:श्वासवायु से मेरु को हिला डालूँगा। हे नारदजी! हे सर्वत्रगामी! आप मेरी इस सत्य प्रतिज्ञा का इस समय श्रवण करें। मैं उस दैत्य सिन्धु को मार डालूँगा, इसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ २३–२४१/२

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर वे विनायक मयूरेश मयूर पर आरूढ़ होकर युद्ध के लिये चल पड़े। उसी समय नन्दी तथा भृंगी – दोनों ने उन विनायक से कहा — हम दोनों युद्ध करेंगे, आप हमारे रणकौशल को देखें ॥ २५-२६ ॥

ऐसा कह करके वे दोनों वायु के समान वेग से गण्डकीपुरी की ओर चल पड़े। उन दोनों के जाने का समाचार सुनकर वीरभद्र तथा भूतराज भी युद्ध के लिये निकल पड़े। उस समय धरती काँपने लगी और शेषनाग व्याकुल हो उठे । तदनन्तर कार्तिकेय आदि चारों ने उस दैत्य सिन्धु का वह दुर्ग देखा, जो देवराज इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी दुर्गम था ॥ २७-२८ ॥ उस दुर्ग के भीतर एक पलंग पर सुखपूर्वक बैठे हुए दैत्यराज सिन्धु को उसके गुप्तचरों ने बताया कि हे महान् असुर ! पर्वत के समान विशाल आकृति वाले चार वीर दसों दिशाओं को गुंजायमान करते हुए आपकी नगरी में चले आये हैं, फिर आप निश्चिन्त क्यों बैठे हुए हैं ? इस प्रकार के वचनों को सुनकर दैत्यराज सिन्धु क्षणभर में ही चिन्तासागर में निमग्न हो गया ॥ २९-३० ॥

सिन्धुपत्नी दुर्गा भी चिन्ता से व्याकुल हो उठी । दैत्य सिन्धु के समान ही उसका मुख भी काला पड़ गया। दोनों का मुख नीचे को झुक गया और वे उसी क्षण महान् दुःख को प्राप्त हो गये ॥ ३१ ॥

दुर्गा कहने लगी — हे महाराज! मैंने आपसे जो कुछ कहा था, उसे आपने नहीं किया, उसीका यह सब फल है, अब इस समय चिन्ता करने से क्या लाभ? ॥ ३२ ॥

दुर्गा इस प्रकार बोल ही रही थी कि वे चारों श्रेष्ठ वीर – नन्दी, भृंगी, वीरभद्र और भूतराज राजा के सभामण्डप में प्रविष्ट हो गये । वह सभामण्डप अनेक प्रकार के आश्चर्यों से समन्वित था, विविध प्रकार के रत्नों तथा स्वर्ण से उसका निर्माण हुआ था तथा वह अनेक शिखरों वाला था । क्रुद्ध होकर एकाएक भृंगी उछलकर उस सभामण्डप के बीच में खड़े हो गये, उन महाबली भृंगी ने बलपूर्वक तत्काल उस मण्डप को तोड़ डाला। उस मण्डप के टुकड़े-टुकड़े वहाँ आँगन में चारों ओर बिखर गये ॥ ३३–३५ ॥ तदनन्तर वे तीनों वीर—नन्दी, वीरभद्र और भूतराज भी उस भृंगी के पास चले गये । युद्ध के लिये आविष्ट उन सभी के मुख लालवर्ण के हो गये थे और वे सेनासहित उस सिन्धु को निगल जाने की इच्छा रखने वाले थे ॥ ३६ ॥ उन वीरों का वैसा पराक्रमपूर्ण कर्म देख करके दैत्यराज सिन्धु की सेना सामने आ गयी। वह सेना खड्ग, ढाल, धनुष-बाण, भाला तथा मुद्गर धारण की हुई थी। ‘मारो, इन चारों महान् वेगशाली वीरश्रेष्ठों को मार डालो, ऐसा कहकर दैत्य सिन्धु के सैनिक उन चारों को मारने के लिये आये ॥ ३७-३८ ॥

दैत्यराज सिन्धु के असंख्य सैनिक बड़े ही उत्साह से उन चारों वीरभद्रादि के साथ युद्ध करने लगे। ‘मैं तुम्हें मारता हूँ, तुम मुझे मारो’ – इस प्रकार कहते हुए [वीरों का] वहाँ महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ ३९ ॥ तदनन्तर दैत्यसेना का उन चारों के साथ भीषण संग्राम होने लगा। उठने वाली धूलि के कारण वहाँ अन्धकार छा गया था, उस अन्धका में वे योद्धागण शस्त्रों के चमचमाते प्रकाश में युद्ध कर रहे थे ॥ ४० ॥ उस युद्ध में नन्दी आदि चारों वीरों ने सैकड़ों करोड़ दैत्यों को मार डाला। उन्होंने अपने ओज से असंख्य महावीर दैत्यों का पाँव पकड़कर उन्हें भूमि पर पटक दिया। फिर उन दैत्यों को बार-बार घुमाकर आकाश में फेंक दिया। वहाँ से जमीन पर गिरकर उनके सौ-सौ टुकड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥ उस युद्धभूमि में बाणों से, विविध अस्त्रों से, शस्त्रों से, पाँव के प्रहार से और हाथ की चोट से दैत्यों की उस सम्पूर्ण सेना का उन्होंने विनाश कर दिया ॥ ४३ ॥

तदनन्तर वीरभद्र आदि वे चारों वीर वेगपूर्वक दैत्यराज सिन्धु के भवन में जाकर पलंग पर बैठे हुए उस सिन्धु दैत्य के बाल पकड़कर उसे विजय के स्मारक स्तम्भ के रूप में रणक्षेत्र में ले आये ॥ ४४ ॥ तदनन्तर दैत्यराज सिन्धु ने अपने महान् अस्त्रों के द्वारा उन नन्दी आदि के साथ युद्ध किया । दैत्यराज सिन्धु ने सर्पास्त्र को छोड़ा। उन सर्पों ने तीनों योद्धाओं को लपेट लिया, तब भृंगी ने उसी समय एकाएक गरुड़ास्त्र का संधान किया। तदनन्तर दैत्य सिन्धु ने आग्नेयास्त्र चलाया, यह देखकर भृंगी ने पर्जन्यास्त्र को छोड़ा ॥ ४५-४६ ॥ तब सिन्धुदैत्य ने वायव्यास्त्र का प्रयोग किया तो भृंगी ने पर्वतास्त्र से उसका निवारण किया । तदनन्तर नन्दी आदि वे चारों वीर उसके साथ बड़े ही मान-सम्मान के साथ क्रमशः मल्लयुद्ध करने लगे । नन्दी ने दैत्य सिन्धु के मस्तक पर स्थित मुकुट को गिरा दिया, भृंगी ने अत्यन्त रुष्ट होते हुए उस दैत्य की पीठ पर प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥ वीरभद्र ने उस दैत्य के देखते-देखते उसकी भार्या के बाल पकड़ लिये और भूतराज ने वैरभाव का स्मरण करके उस सिन्धुदैत्य को लातों से मारा। दैत्य सिन्धु की पत्नी दुर्गा ने अपने नेत्र बन्द कर लिये, वह उस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त अपने पति को वैसी स्थिति में देख न सकी। वह अपने पति के कर्मों की निन्दा करती हुई अपने भवन के लिये पलायित हो गयी ॥ ४९-५० ॥

दैत्य सिन्धु भी अत्यन्त आवेश में आ गया। उसने वीरभद्र का पाँव पकड़ लिया । नन्दी को मुष्टिका के प्रहार से मारा और भृंगी की चोटी पकड़कर जमीन पर गिरा दिया। भूतराज मूर्च्छित हो गये। तब दैत्यराज सिन्धु पुनः मुकुट धारणकर और गले में मोतियों की माला पहनकर एक उत्तम घोड़े पर सवार हुआ और शेष बचे हुए सैनिकों को बुलाकर उनसे बोला — ‘ आज मैं उस मयूरेश को मार डालूँगा’, ऐसा कहकर वह पुनः युद्ध के लिये चल पड़ा ॥ ५१-५३ ॥

दैत्य सिन्धु ने दिशाओं तथा विदिशाओं को गुंजायमान करते हुए गर्जना की। उस समय तक नन्दी आदि चारों वीर गणनायक मयूरेश के पास जा चुके थे, उन्होंने बताया कि दैत्यसेना के सभी वीरों को उन्होंने नष्ट कर डाला है। हे गणेश्वर! उस सिन्धु दैत्य को भी हम रणभूमि में ले आये हैं। वह थोड़ी-सी सेना के साथ है। आप उसे इस भवसागर से मुक्त कर दें । हे विघ्नराज ! आपकी आज्ञा नहीं थी, नहीं तो हम ही उसे मार डालते ॥ ५४–५६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सिन्धु की सेना के संहार का वर्णन’ नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.