November 22, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-125 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय कारागार से मुक्त हुए देवताओं का मयूरेश की महिमा का गान करना, चक्रपाणि द्वारा मयूरेश की प्रथम पूजा करने से इन्द्र का रुष्ट होना, महान् ध्वनि के साथ मयूरेश का प्रकट होना और पुनः पंचदेवों के रूप में अवतरित होना, ब्रह्माजी द्वारा सिद्धि-बुद्धि नामक कन्याओं का मयूरेश के साथ विवाह करना अथः पञ्चविंशोत्तरशततमोऽध्यायः श्रीगणेशविवाहवर्णनं ब्रह्माजी बोले — अपने नगर में सबसे आगे पहुँचकर चक्रपाणि ने अत्यन्त मूल्यवान् चादरों तथा वस्त्रों के द्वारा और पताकाओं, ध्वजों एवं चामरों के द्वारा अपनी राजसभा को सुसज्जित करवाया। उस सभा में भूमि में स्थित स्तम्भों में नाना प्रकार के रत्नों की आभा प्रकाशमान हो रही थी, जिसमें गये मनुष्यों के प्रतिविम्ब अनन्त प्रकार के दिखायी दे रहे थे ॥ १-२ ॥ देवेश्वर मयूरेश ने विविध प्रकार के ध्वजों से सुशोभित उस गण्डकीपुरी को देखा। उस पुरी के ऊँचे-ऊँचे भवनों के शिखरों पर चढ़ी हुई स्त्रियाँ उन मयूरेश को देख रही थीं ॥ ३ ॥ बन्धन में डाले गये वे देवता चक्रपाणि द्वारा मुक्त होने पर मयूरेश के समक्ष आये। उनमें विष्णु, इन्द्र, अग्नि, कुबेर, मरुद्गण, सूर्य तथा इन्द्राणी आदि सभी थे। वे विविध वाद्यों की ध्वनि करते हुए शीघ्र ही वहाँ आये । वे सभी देवता अपने-अपने वाहनों से उतरे और उन सभी ने मयूरेश्वर को प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥ देवताओं ने तथा पुरवासियों ने बड़े ही आदर के साथ मयूरेश का आलिंगन किया। मयूरेश का दर्शनकर भगवान् विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। विष्णु आदि सभी देवताओं ने दैत्यराज सिन्धु का वध कर दिये जाने के कारण मयूरेश की अत्यन्त प्रशंसा की ॥ ६१/२ ॥ देवता बोले — जिसने स्वर्ग आदि सभी लोकों को भी भयभीत कर अपने अधीन बना डाला था, ऐसे दैत्य सिन्धु का क्षणभर में आपने वध कर डाला और शीघ्र ही देवताओं को अपना-अपना पद प्रदान कर दिया, ऐसा दूसरा कोई देवता न देखा गया है और न कभी सुना ही गया है ॥ ७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — वहाँ जो-जो भी वैष्णव, शैव, शाक्त तथा सूर्योपासक सौर थे, उन्होंने मयूरेश का अपने- अपने इष्टदेव के रूप में अर्थात् विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्य के रूप में दर्शनकर अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उनका पूजन किया। मयूरेश की जय हो, यह ध्वनि सुनकर सभी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ ॥ ८-९ ॥ उस समय बालकों, युवावस्था को प्राप्त मुग्धा युवतियों, प्रौढा स्त्रियों, वृद्धजनों तथा युवावस्था वाले पुरुषों ने देव मयूरेश का मानसिक पूजन किया ॥ १० ॥ हे मुनि व्यासजी ! चक्रपाणि के भवन में पहुँचकर देवेश्वर मयूरेश वहाँ मध्य में स्थित एक शुभ सिंहासन पर आसीन हो गये और उनके चारों ओर देवता, मुनि और सात करोड़ की संख्या वाले सभी गण स्थित हो गये । तदनन्तर वन्दीजनों ने स्तुतिगान किया और वैसे ही सफलमनोरथ देवताओं तथा राजाओं ने भी स्तवन किया ॥ ११-१२ ॥ उस समय अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे । नारद आदि ऋषिगण गान करने लगे । तदनन्तर राजा चक्रपाणि ने विधि-विधान के साथ सबका पूजन किया और पूजन के अनन्तर वे सभा के मध्य में स्थित होकर कहने लगे — आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरे कर्म सफल हो गये, जो कि इन्द्र आदि लोकपाल मेरी सभा में उपस्थित हुए हैं। अपने सौ जन्मों के अर्जित पुण्यफलों के द्वारा आज मुझे मयूरेश के दर्शन का सौभाग्य . प्राप्त हुआ है ॥ १३-१४१/२॥ ब्रह्माजी बोले — मयूरेश की सबसे पहले हुई पूजा को देखकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे, वे जगदीश्वर की माया से मोहित होकर एकाएक बोल उठे ॥ १५१/२ ॥ इन्द्र बोले — हे चक्रपाणि ! जगत् का निर्माण करने वाले चतुर्मुख ब्रह्मा तथा लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के यहाँ उपस्थित होने पर भी तुम बड़े मूर्ख ही हो, जो कि तुमने एक बालक का सर्वप्रथम पूजन किया है। हम सभी को अपमानित करके मोहवश तुमने एक बालक का पूजन किया है ॥ १६-१७ ॥ तुमने सभी लोकों की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा, संहार करने वाले भगवान् शिव, सृष्टि-पालन तथा अन्त करने वाली तीनों लोकों की माता जगदम्बा तथा तीनों लोकों के स्वामी एवं वैदिक कर्मों का प्रवर्तन करने वाले भगवान् सूर्य को छोड़कर एक बालक का पूजन किया है, यह तुमने ठीक नहीं किया ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले — देवराज इन्द्र के इस प्रकार कहने पर राजा चक्रपाणि बोले — इस बालक में रुद्र, सूर्य, कुबेर, इन्द्र, मरुद्गण तथा अग्नि आदि देवों से अधिक पराक्रम देखा गया है, जो कि इन्होंने दैत्यराज सिन्धु का वध कर दिया और इन गुणेश्वर मयूरेश ने ही दैत्य सिन्धु के कारागार से सभी देवताओं को मुक्त कराया है ॥ २०-२१ ॥ पृथ्वी के भार का हरण करने के लिये ये भगवान् शिव के घर में अवतीर्ण हुए हैं। ये परमात्मा हैं, अनन्त शक्तियों से सम्पन्न हैं और अनेकों दैत्यों का वध करने वाले हैं ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले — राजा चक्रपाणि जब इस प्रकार से बोल रहे थे कि उसी समय देवों को एक महान् ध्वनि सुनायी पड़ी। उस ध्वनि से ब्रह्माण्ड में विस्फोट होने की आशंका से कुछ देवता मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ २३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। उस समय कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था । करोड़ों सूर्यों के प्रकाश से सहसा जगत् आच्छादित हो गया ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन देवताओं ने वहाँ पर एक अत्यन्त सुन्दर देव को देखा। वह नाना प्रकार के अलंकारों को धारण किये हुए था, उसकी दस भुजाएँ थीं और उसका मुख हाथी के समान था ॥ २५ ॥ इस प्रकार के स्वरूप को देखकर वे सभी देवता उस समय आश्चर्यचकित हो उठे। उसी क्षण उन्होंने पुनः उस देव को पाँचस्वरूपधारी ईश्वर के रूप में देखा ॥ २६ ॥ वह मध्य में पद्मासन में स्थित वक्रतुण्ड के रूप में, आग्नेयकोण में शिवरूप में, नैर्ऋत्यकोण में सूर्यरूप में, वायव्यकोण में पार्वती के रूप में और ईशानकोण में विष्णुरूप में दिखायी पड़ा। यह देखकर वे सभी देवता अत्यन्त भ्रम में पड़ गये। तभी उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी, जो उन सभी के भ्रम का निवारण करने वाली थी ॥ २७-२८ ॥ उस आकाशवाणी ने कहा — ये देव सभी लोगों के लिये आराधनीय हैं। एक होने पर भी ये पाँच रूपों में प्रकट हुए हैं। ये देव आदि और अन्त से रहित हैं। सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त रहने वाले हैं और ये गजानन नाम वाले हैं ॥ २९ ॥ ये देव देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, नागों तथा राक्षसों के द्वारा सदैव ही पूजनीय हैं और सभी विघ्नों का विनाश करने वाले हैं। इनका पूजन हो जाने से पंचदेवों – गणेश, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्य का पूजन हो जाता है। इन देव के विषय में कोई शंका नहीं करनी चाहिये, ऐसा करने पर वह नरक प्राप्ति का कारण बनेगी ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार की आकाशवाणी को सुनने के अनन्तर इन्द्र आदि उन प्रधान देवताओं ने सूँड़ से सुशोभित उन मयूरेश को आद्य ओंकार के रूप में देखा ॥ ३२ ॥ तदनन्तर ज्ञान प्राप्त हुए उन देवताओं ने अपने भ्रम तथा अभिमान का परित्यागकर ‘जय’ शब्द के द्वारा उन सर्वान्तर्यामी प्रभु का पूजन किया ॥ ३३ ॥ देवताओं के द्वारा मयूरेश का पूजन कर लेने के अनन्तर दैत्य सिन्धु के पिता चक्रपाणि ने बड़ी ही प्रसन्नता के साथ उन गुणेश्वर मयूरेश का पूजन किया। उन्होंने पंचामृत तथा शुद्धजल से उन मयूरेश को स्नान कराकर दिव्य वस्त्रों तथा आभूषणों से उन्हें अलंकृत किया। तदनन्तर पुष्प, धूप, दीप, विविध नैवेद्य निवेदित किये। इसके पश्चात् फल, ताम्बूल तथा अनेक प्रकार की दक्षिणाएँ उन्हें समर्पित कीं और फिर नीराजन करने के अनन्तर मन्त्रपुष्पांजलि और प्रणाम निवेदित करके उनका स्तवन किया। इसी प्रकार से राजा चक्रपाणि ने बड़ी ही भक्ति – श्रद्धा के साथ सभी देवताओं की भी पूजा की ॥ ३४–३६ ॥ इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ चक्रपाणि ने उन देवताओं से कहा — आज मैं आप लोगों का पूजन करने से धन्य हो गया हूँ, क्योंकि इस प्रकार से सभी देवताओं का एक स्थान पर उपस्थित होना कहीं भी नहीं देखा गया है। तदनन्तर वहाँ पर विद्यमान अत्यन्त प्रसन्न हुए देवर्षि नारदजी ने चतुर्मुख ब्रह्माजी से कहा — ॥ ३७१/२ ॥ हे कमलयोनि ब्रह्माजी ! आपकी आज्ञा से सिद्धि तथा बुद्धि के विवाह के सम्बन्ध में भगवान् शिव तथा देवी पार्वती को सभी बातें बताकर यह मैंने पहले ही निश्चय कर लिया था कि सभी प्रकार के शुभ लक्षणों से सम्पन्न इन दोनों कन्याओं को आप मयूरेश को ही प्रदान करेंगे ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर आसक्तिवश वे सभी देवता देव ब्रह्माजी से आदरपूर्वक यह माँग करने लगे कि ‘ये कन्याएँ मुझे प्रदान कीजिये ।’ तब ब्रह्माजी ने उन दोनों — सिद्धि एवं बुद्धि के हाथों में माला देकर इस प्रकार कहा — ॥ ४०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे देवियो ! यहाँ उपस्थित तैंतीस करोड़ देवताओं में से कोई एक, जो तुम्हारे हृदय को भाता हो, उसके गले में माला पहनाकर तुम दोनों मेरे समक्ष ही उसका वरण करो। तब सिद्धि-बुद्धि ने सभी देवताओं को छोड़कर मयूरेश के गले में माला पहना दी और वे दोनों बड़ी प्रसन्न हो गयीं। यह देखकर सभी देवता खिन्न मनवाले हो गये और वे दीर्घ श्वास छोड़ने लगे । घुटनों तक लम्बी उन मालाओं से मयूरेश की बड़ी शोभा हुई। तदनन्तर ब्रह्माजी ने यथोचित विधि-विधान के अनुसार उन दोनों सिद्धि-बुद्धि का विवाह मयूरेश के साथ कर दिया ॥ ४१–४४ ॥ तदुपरान्त उस सभा के मध्य में स्थित होकर ब्रह्माजी बोले — मेरे हृदय में जो था, उसे मैंने आज प्राप्त कर लिया है । ऐसा कहकर यथोचित रीति से ब्रह्माजी ने उन दोनों कन्याओं को देवेश्वर मयूरेश को सौंप दिया ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी ने यह भी कहा कि आज तक मैंने इन दोनों कन्याओं का बड़े ही यत्नपूर्वक पालन-पोषण किया है, इस समय अब मैं इन दोनों को तुम्हें समर्पित कर रहा हूँ, तुम बड़े ही यत्न से इनकी रक्षा करना ॥ ४६ ॥ इसके पश्चात् इन्द्र आदि देवताओं ने मयूरेश से निवेदन करते हुए कहा — हे देवेश ! आपकी कृपा से हम सभी देवता दैत्य सिन्धु के कारागार से मुक्त हुए हैं। आपकी ही कृपा से उस दैत्यराज सिन्धु ने मोक्ष भी प्राप्त किया है, इस समय अब हम गौतम आदि मुनियों के साथ अपने-अपने स्थान को जायँगे। आप हमें जाने की अनुमति प्रदान करें ॥ ४७-४८ ॥ ब्रह्माजी बोले — तब देव मयूरेश ने जाने की इच्छा रखने वाले उन देवों तथा मुनियों को प्रसन्नतापूर्वक जाने की आज्ञा प्रदान की। इसके पश्चात् शिव के समीप में स्थित माता पार्वती ने अपनी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दोनों पुत्रवधुओं को तथा मयूरेश को बड़े ही आदर के साथ अपनी गोद में बैठाकर बड़े ही हर्ष का अनुभव किया । उन्होंने [ब्राह्मणों को] वस्त्र तथा आभूषण आदि अनेक दानों को प्रदान किया ॥ ४९-५० ॥ जो मनुष्य भगवान् गणेश के द्वारा प्राप्त की गयी सिन्धुदैत्य पर विजय तथा भगवान् गणेश के शुभ-विवाह के इस आख्यान का श्रवण करता है, वह व्यक्ति अपने सभी अभीष्ट मनोरथों को प्राप्त कर लेता है ॥ ५१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘मयूरेश के विवाह का वर्णन’ नामक एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२५ ॥ Content is available only for registered users. 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