November 24, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-130 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ तीसवाँ अध्याय पार्वतीजी के गर्भ से गजानन का आविर्भाव तथा उनके विलक्षण स्वरूप को देखकर विस्मित पार्वती को शिवजी के द्वारा प्रबोधित किया जाना अथः त्रिंशाधिकशततमोऽध्यायः गजाननाविर्भाव ब्रह्माजी बोले — तदुपरान्त नौवाँ मास पूर्ण होते ही पार्वतीजी ने एक बालक का प्रसव किया। उस शिशु के सुन्दर नेत्र कमल की शोभा को जीतने वाले थे और उसका मुख चन्द्रमा के सदृश आह्लादक था ॥ १ ॥ [जन्म के समय ही उस बालक ने] मुकुट तथा केयूर धारण कर रखा था, उसकी देहकान्ति करोड़ों सूर्यों के सदृश थी, प्रवाल (मूँगा या किसलय)-के सदृश [अरुण] शोभामय उसके अधर थे। बालक के चार भुजाएँ शोभित थीं, जिनमें उसने परशु, कमल, माला और मोदक धारण कर रखा था। वह [कण्ठ में] मोतियों का हार और [हाथों में] सुन्दर कंकण धारण करके शोभा पा रहा था। उसके कमलकी-सी कान्ति वाले चरणतल ध्वज, अंकुश, कमल आदि चिह्नों से युक्त थे। उस सुन्दर शिशु के सुन्दर गुल्फ-युगल (दोनों टखने) किंकिणीजाल से सुशोभित थे । वह अत्यन्त सौन्दर्यसम्पन्न था। बालक का चन्द्रमा से युक्त ललाट कोटि-कोटि चन्द्रमण्डलोंकी-सी शोभा वाला और अग्नि के सदृश तेजोदीप्त था। शिशु के ऐसे [विस्मयावह] स्वरूप को देखकर [सहसा] पार्वतीजी काँपने लगीं [किन्तु अगले ही क्षण अपने पुत्र के रूप में देवाधिदेव विनायक को आया देख] आनन्दमग्न हो गयीं ॥ २-५ ॥ [वात्सल्य और विस्मय – दोनों ही भावों से समन्वित पार्वतीजी कहने लगीं — अरे ! ] नेत्रों को ढँक लेने वाला यह कैसा महातेज उदित हुआ है ? हे देव ! [ मुझ पर ] कृपा करो और बताओ कि तुम कौन हो ? [हे प्रभो ! मैं चाहती हूँ कि तुम शिशुरूप होकर मेरे] चित्त को आनन्दित करो। ऐसा कहकर पूर्वकाल के वचनों का स्मरण करती हुई पार्वतीजी ने उनको प्रणाम किया। तब वे तेजोमूर्ति गणपति कहने लगे कि हे मातः ! उद्विग्न मत होइये। मैं अनेकानेक ब्रह्माण्डों की रचना करने वाला गुणेश हूँ। मेरे असंख्य अवतार हुए हैं, जिन्हें देवगण भी नहीं जानते ॥ ६–८ ॥ हे शिव को आनन्दित करने वाली ! मैं ही [ ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक] तीन रूपों को धारणकर इस विश्वप्रपंच का सृजन, पालन तथा संहार करता हूँ ॥ ९ ॥ मैं ही पूर्वकाल में त्रेतायुग में तुम्हारे भवन में लीलावश अवतीर्ण होकर सिन्धु नामक असुर का संहार और नानाविध चरित्र किये थे। उस समय मेरा नाम मयूरेश था, वर्ण श्वेत था और मैंने छः भुजाएँ धारण की हुई थीं। उसी काल में मैंने तुम्हें वचन दिया था कि द्वापरयुग में मैं पुनः तुम्हारी सन्तान बनकर सेवा करूँगा। हे पवित्र मुसकान वाली देवि ! उस समस्त वृत्तान्त का स्मरण करो कि [कैसे उस समय] ब्राह्मण के रूप में आकर मैंने सिन्दूरासुर से तुमको छुड़ाया था ॥ १०–१२ ॥ हे पार्वती ! तब भी मैंने यह बात कही थी कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा। वह जो मेरा वचन था, उसे मैंने सत्य कर दिया है। हे मातः ! मैं अब महाबली सिन्दूरासुर का संहार करके भूमिभार का हरण करूँगा तथा आपकी सेवा करूँगा । [ और इसके बाद] – भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला मैं ‘गजानन’ इस नाम से विख्यात होऊँगा ॥ १३–१४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले – [ गजानन की] इन बातों को सुनकर देवी गौरी को समस्त प्राचीन वृत्तान्त का स्मरण हो आया और वे उन देवेश, विश्वेश, विघ्नविनाशक भगवान् गजानन की स्तुति करने लगीं ॥ १५१/२ ॥ गौरीजी ने कहा — जो चिदानन्दघन, निर्विकल्प ब्रह्मस्वरूप हैं, जो निराकार होने पर भी गुणों के भेद से [ब्रह्मादि रूपों में] साकार हो जाते हैं। जो अणु से भी अणुतर अर्थात् अतिसूक्ष्म तथा स्थूल से भी अधिक स्थूल एवं व्यापक हैं, उन भक्तवत्सल को नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ जो अव्यक्त होकर भी [ स्वेच्छावश] रजोगुण, तमोगुण तथा सत्त्वगुण का आश्रय लेकर [नाना नाम-रूपों में] प्रकट होते हैं। जो माया के अधिपतियों की भी माया के नियामक हैं, समस्त मायाओं को जानने वाले एवं प्रभाव सम्पन्न हैं। जो चारों वेदों से अज्ञेय हैं तथा जिन्हें मन भी समझ नहीं सकता, ऐसे आप नित्य, सर्वाधार, परात्पर सर्वान्तर्यामी को नमस्कार है ॥ १८-१९ ॥ हे विभो ! यह मेरा परम सौभाग्य है कि वे [साक्षात् परब्रह्मस्वरूप] आप मेरे पुत्र बनकर अवतीर्ण हुए हैं । हे विभो ! मैं तो आपके [आगमन की] प्रतीक्षा ही कर रही थी। आपने आकर प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अब कभी आपसे मेरा वियोग न हो सके, वैसा [ अनुग्रह ] कीजिये ॥ २०१/२ ॥ जब पार्वतीजी ऐसा कह ही रही थीं, तभी गणपतिदेव ने दूसरा रूप धारण कर लिया ॥ २१ ॥ उस समय शुण्डादण्ड से युक्त अर्थात् हाथी सदृश आकृतिवाले, चतुर्भुज, चन्द्रमा से युक्त शिरोदेश वाले, नाना भूषणों से विभूषित, चिन्तामणि नामक दिव्य मणि से शोभायमान हृदय वाले, दिव्याम्बरविभूषित, दिव्य गन्ध से अनुलिप्त देह वाले वे सिद्धि तथा बुद्धि के सहित प्रकट होकर भोले-भाले बालक की भाँति रुदन करने लगे ॥ २२–२३ ॥ जब तन्वंगी सुकुमार और दुबले पतले अंगों वाली स्त्री।पार्वतीजी ने उनके इस रूपको देखा तो वे अत्यन्त शोकाकुल हो गयीं । [ वे विलाप करने लगीं कि] किसने मेरी निधि अर्थात् सर्वस्वरूप पुत्र का हरण कर लिया है। सूँड़ से युक्त बालक तो तीनों लोकों में कहीं भी नहीं देखा गया है। जब ब्रह्मा आदि [देवगण] तथा [दूसरे भी] लोग इस प्रकार के शिशु को देखेंगे तो उपहास करेंगे ॥ २४१/२ ॥ ऐसे भाँति-भाँति के शोकपूर्ण विलाप को सुनकर भगवान् शंकर अपने गणों के साथ भवन में आ पहुँचे और उस शिशु को गोद में लेकर पार्वती से कहने लगे — हे प्रिये ! मेरी बात सुनो। शुण्डादण्ड से विभूषित [यह बालक ] आदि, मध्य तथा अन्त से रहित साक्षात् गणपतिदेव ही हैं, जिनके स्वरूप का निरूपण करने में चारों वेद, शास्त्र तथा विशिष्ट मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं । हे प्रिये ! नानाविध कृत्यों वाले विश्वप्रपंच में इन्होंने ही देवताओं को नियुक्त किया है ॥ २५-२७ ॥ ये सबके अन्तर्यामी, अनेकानेक ब्रह्माण्डों के आविष्कर्ता [गणपतिदेव] हैं, इनके चारों युगों में पृथक्-पृथक् चार स्वरूप हैं। सत्ययुग में इनकी दश भुजाएँ थीं और ये ‘विनायक’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए । त्रेतायुग में इनका वर्ण शुक्ल था, भुजाएँ छः थीं और मयूरराट् अर्थात् मयूरेश नाम हुआ ॥ २८-२९ ॥ हे प्रिये ! जिन्होंने अपने (हमारे) भवन में [पूर्वकाल में] अवतीर्ण होकर सिन्धु दैत्य का संहार करके [विश्वका] रक्षणकार्य सम्पन्न किया था, वे ही [गणपतिदेव] आज पुनः अरुण वर्ण तथा चार भुजाओं से शोभित होकर हम लोगों के भवन में अवतीर्ण हुए हैं और [कालान्तर में] मूषकारूढ़ होकर सिन्दूर दैत्य का वध करेंगे तथा पृथ्वी के भार का हरण करेंगे ॥ ३०-३१ ॥ इस समय ये देवेश ‘गजानन’ इस नाम से त्रैलोक्य में विख्यात होंगे। हे देवि! ये ही कलियुग में सुन्दर नेत्रों तथा चार भुजाओं से समन्वित हो ‘धूम्रकेतु’ इस सुन्दर नाम से भूतल पर प्रसिद्ध होंगे ॥ ३२१/२ ॥ भगवान् शंकर के वचनों को सुनकर वे बालरूप गणपति स्पष्ट रूप से कहने लगे ॥ ३३ ॥ बालरूप गणपति बोले — हे शिव! आपने मेरे स्वरूप को भलीभाँति जाना है, आप यथार्थ ही कह रहे हैं। मैं आपकी सेवा करने के लिये और देवताओं तथा सभी राजाओं को मारने वाले सिन्दूरासुर का वध करने के लिये आपके घर में अवतीर्ण हुआ हूँ। हे शंकर! ब्राह्मणों को उत्पीडित करने वाले त्रिलोकविजयी उस असुर का संहार करके मैं विश्व को आह्लादित करूँगा ॥ ३४–३५१/२ ॥ भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला मैं [सिन्दूरासुर के कारण अवरुद्ध हुए] वैदिक यज्ञ-यागादि सत्कर्मों का [पुनः] प्रवर्तन करूँगा और वरेण्य [नामक राजा] -को [मनोवांछित] वर तथा आत्मविज्ञान भी प्रदान करूँगा । वह वरेण्य मेरा भक्त है और [सर्वदा] मेरा ही ध्यान करता रहता है । वह देवता, ब्राह्मण, अतिथि आदि का पूजन करने वाला, पंच महायज्ञों के अनुष्ठान में निरत, सत्यभाषी, पवित्र, सदाचारी तथा पुराणों के श्रवण में तन्मय रहता है ॥ ३६-३८ ॥ उसकी भार्या का नाम पुष्पिका है, जो धर्मपरायण, पतिव्रता, पति के वचनों का अनुसरण करने वाली और प्राणों के समान पति से प्रीति रखने वाली है ॥ ३९ ॥ उन दोनों ने बारह वर्षों तक दारुण तपस्या की थी, तब मैंने उनको वरदान दिया था कि अवश्य ही मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतीर्ण होऊँगा ॥ ४० ॥ उस पुष्पिका ने आज ही प्रसव किया है और उसके शिशु का राक्षस (राक्षसी) ने अपहरण कर लिया है। [अब वह पुत्रवियोग के कारण] प्राण त्याग देगी, इसलिये मुझको वहाँ ले चलो। भगवान् शिव ने जब बालगणपति की ऐसी बात सुनी तो हर्षित हो उठे और उन्होंने भक्तिभाव से नानाविध वाङ्मयपुष्पों अर्थात् स्तोत्रों के द्वारा उन बालगणेश का पूजन किया ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘गजानन के आविर्भाव का वर्णन’ नामक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३० ॥ Content is available only for registered users. 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