November 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-131 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ इकतीसवाँ अध्याय भगवान् शंकर की आज्ञा से नन्दी का शिशु गजानन को वरेण्यपत्नी के पास ले जाना अथः एकत्रिशत्तरशततमोऽध्यायः गन्धर्वपराजय ब्रह्माजी बोले — तदुपरान्त भगवान् शिव विचार करने लगे कि इस बालक को किस प्रकार वहाँ ले जाया जाय ? उन (-के मनोभाव ) – को जानकर नन्दी ने शिवजी से कहा — हे स्वामी! आपके अनुग्रह से मैं समुद्रों को अवश्य ही सुखा सकता हूँ तथा पर्वतों को भी चूर्ण कर सकता हूँ। इसलिये आपके मन में जो कर्तव्य विद्यमान है, उसको सम्पन्न करने के लिये मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले — नन्दी के कथन से सन्तुष्ट हुए भगवान् शंकर उनसे कहने लगे ॥ २१/२ ॥ शिवजी बोले — हे नन्दिकेश्वर ! मेरे मनोभाव को प्रकाशित करते हुए तुमने उत्तमोत्तम बात कही हैं । सैकड़ों बार मैंने तुम्हारे सामर्थ्य का परिचय पाया है। अब इस समय जो कर्तव्य उपस्थित हुआ है, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम उसको पूर्ण करो ॥ ३-४ ॥ महानगरी माहिष्मती में वरेण्य नाम से विख्यात महाबली नरेश हैं, जो विविध धर्मों (जातिधर्म – कुलधर्मादि) – के अनुष्ठान में निरत रहते हैं। उनकी महाभागा धर्मपत्नी का नाम पुष्पिका है। उसने अभी-अभी प्रसव किया और [प्रसवश्रम के कारण] वह सोयी हुई है। [रानी को सोयी जानकर] किसी राक्षसी ने उसके पास से शिशु का अपहरण कर लिया है, इसलिये जबतक कि वह कल्याणी सोयी है, उसी बीच में इस बालक को तुम रानी के समीप शीघ्र ही पहुँचा दो ॥ ५–७ ॥ ब्रह्माजी बोले — भगवान् शंकर के द्वारा दी गयी इस आज्ञा को सुनकर नन्दी ने तत्काल पार्वतीपुत्र को उठाया और त्वरापूर्वक आकाशमार्ग से जाकर उस बालक को शीघ्र ही रानी के समीप पहुँचा दिया। रानी सो रही थी, इसलिये इस घटना को वह जान न सकी। तदुपरान्त वे नन्दिकेश तत्काल ही [आकाश में] उड़े और महेश्वर के समीप जा पहुँचे तथा मार्ग में जो कुछ उन्होंने किया था, वह सब वृत्तान्त बताने लगे ॥ ८- ९१/२ ॥ [ नन्दिकेश्वर बोले — ] हे देव ! हे विभो ! [जब मैं जा रहा था कि] सहसा आकाश में भयंकर रूप वाली एक राक्षसी मुझे रोककर खड़ी हो गयी। वह बालक के मांस का भक्षण कर रही थी। तब मैंने आपके अनुग्रह से उस राक्षसी को अपनी पूँछ में लपेट लिया और [चारों ओर] उसे घुमाकर एक विशाल पर्वत शिखर पर फेंक दिया । हे प्रभो! आपके नाम का उच्चारण करके [जब मैंने उसे क्रोधपूर्वक फेंका तो] उसके सैकड़ों खण्ड हो गये ॥ १०–१२ ॥ इसके पश्चात् मैंने दुरात्मा गन्धर्वों का विशाल समूह देखा, तो सोचने लगा कि किस प्रकार इनसे युद्ध किया जाय और शिशु (गौरीपुत्र) – को बचाया जाय । हे शंकर! तब इस प्रकार चिन्ताकुल होकर मैंने मन-ही-मन आपका स्मरण किया। तदुपरान्त अपनी पूँछ, सींग, क्रोधपूरित निःश्वास, लातों के प्रहार और हुंकारों से उन सभी अतिबलिष्ठ गन्धर्वों को मैंने भगा दिया ॥ १३-१४१/२ ॥ उस समय उनमें से कुछ तो मर गये, कुछ भाग गये और कुछ सिर फूट जाने तथा पैर टूट जाने के कारण भूमि पर गिर पड़े और उनके सैकड़ों खण्ड हो गये । तत्पश्चात् [मेरे ऊपर आकाश से] पुष्पों की वर्षा हुई । हे देव! इसके बाद आपके द्वारा आदिष्ट कर्तव्य को पूर्ण करके मैं [यहाँ] चला आया ॥ १५-१६ ॥ हे देव! आपकी इच्छा के विषय को अर्थात् आप जिसे चाहते हैं, उसे समस्त त्रिलोकी में ऐसा कौन है, जो मार सके। इसलिये आपके नाम का ही आश्रय लेकर बालक के साथ होने पर भी मैंने विजय प्राप्त की ॥ १७ ॥ तब हर्ष से भरे भगवान् शंकर ने नन्दिकेश्वर का आलिंगन किया और प्रसन्न मन से कहने लगे — नन्दिकेश्वर ! मैंने तुम्हारा दृढ़ पौरुष जान लिया है। इस त्रैलोक्य में तुम्हारी बराबरी करने वाला कोई भी नहीं है ॥ १८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इसके उपरान्त (शिवजी से मिल लेने के पश्चात्) वे नन्दी विश्वनाथ शिवजी को प्रणाम करके पार्वतीजी के समीप गये और हाथ जोड़कर उन्हें प्रणामकर मधुर वाणी में कहने लगे — हे मातः ! शिवजी की आज्ञा से मैं बालक को माहिष्मतीपुरी ले गया और वरेण्यपत्नी पुष्पिका के समीप में रख आया हूँ; क्योंकि उस (बालरूप गणेश)-ने उस पुष्पिका को पूर्व में वर प्रदान किया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा और ब्रह्मतत्त्व का प्रतिपादन करूँगा ॥ १९–२११/२ ॥ तब उन नन्दीश्वर के वचनों को सुनकर सब कुछ जानने वाली पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं। वे शिशु (-रूप (गणपति) – के अन्तहीन पराक्रम को जानती थीं, [अतः गणपतिदेव के प्रति] परम भक्तिभाव से युक्त हो पार्वतीजी नन्दीश्वर से कहने लगीं — ‘हे पुत्र ! मैं तुम्हारे पुरुषार्थ को जानती हूँ ॥ २२-२३ ॥ तुमने भयंकर घोष करने वाली अत्यन्त भीषण राक्षसी का संहार किया है, दुरात्मा गन्धर्वों को नष्ट किया तथा शिशु की रक्षा की । [ इसके अतिरिक्त ] बिना उस प्रसूता को ज्ञात हुए, उसके बालक को वहाँ पहुँचा भी दिया है — ये सब महान् कृत्य थे, जो तुमने सम्पन्न किये हैं।’ इस प्रकार से [प्रीतिपूर्वक ] नन्दीश्वर से कहकर पार्वतीजी ने उनको विदा किया और विश्राम करने लगीं ॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘गन्धर्वपराजयवर्णन’ नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३१ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe