श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-133
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय
राजा वरेण्य के द्वारा गजमुखाकृति शिशु का भयभीत होकर वन में परित्याग और पराशरमुनि के द्वारा शिशु गजानन का पालन
अथः त्रयस्त्रिंशोत्तरशततमोऽध्यायः
पराशरदर्शनं

व्यासजी बोले —  हे विधे ! राजा वरेण्य के भवन में [उनकी भार्या] पुष्पिका के समीप [ नन्दी के द्वारा ] पहुँचाये गये उन बालरूप गणपति ने कौन-सी लीला की, इसे मुझको सविस्तार बतलाइये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले —  हे वत्स ! तुमने उचित प्रश्न किया है, जो हृदय को आनन्दित करने वाला है। मैं वह समस्त पापनाशक वृत्तान्त विहित रीति से तुम्हें बतलाऊँगा ॥ २ ॥ उस रात्रि के अर्थात् प्रसव की रात्रि बीतने के उपरान्त रानी पुष्पिका ने पुत्र को देखा। वह अलंकारों से समन्वित, चार भुजाओं से युक्त तथा हाथी के जैसे मुखवाला था । उसका वर्ण अरुण था। कस्तूरी तिलक और मोतियों की मालाओं से वह शोभायमान था । उसने उत्तम अंगराग और पीताम्बर धारण किया था। नानाविध आभूषणों से युक्त वह बालक तेजोमय शरीरवाला था ॥ ३–४१/२

वह पुष्पिका उस समय वैसे रूपवाले बालक को देखकर विस्मित तथा दुखी हो गयी और उसे भय लगने लगा। तब शोकाकुल वह रानी हाथों से वक्षःस्थल पर आघात करती हुई बाहर की ओर भाग चली। रानी के क्रन्दन को सुनकर दासियाँ वहाँ आयीं और उन्होंने भी उस अद्भुत आकार-प्रकार वाले बालक को देखा ॥ ५–७ ॥ इस वृत्तान्त का पता लगने पर राजा वरेण्य भी अपने गणों (मन्त्री, पुरोहित आदि ) – के साथ प्रसूतिकागृह में आ पहुँचे। जब उन राजा आदि ने वैसे अद्भुत बालक को देखा तो वे भी भय के कारण विचलित हो गये। वहाँ कुछ लोग अधीर होकर भाग खड़े हुए और कुछ मूर्च्छित हो गये तथा कुछ लोग राजा से कहने लगे कि इस प्रकार का बालक तो आज तक न जनमा है, न आगे ही जन्म लेगा । मनुष्यों के बीच में न कभी कोई ऐसा बालक कहीं पर देखा अथवा सुना ही गया है। इसे आपको अपने घर में नहीं रखना चाहिये, यह तो वंश का नाश ही कर देगा ॥ ८-१० ॥

सभी लोगों की ऐसी बातें सुनकर वे नरेश भयाकुल हो उठे और उन्होंने दूतों (सेवकों) से कहा कि ‘इस बालक को घने जंगल में ले जाकर छोड़ दो ‘ ॥ ११ ॥ तब वे सेवक बालक को लेकर ऐसे घने जंगल के बीच में जा पहुँचे, जहाँ वायु का भी प्रवेश नहीं था । वहाँ उन्हें एक सरोवर दिखायी पड़ा, जिसके तट पर सेवकों ने बालक को फेंक दिया और उसे पत्तों के द्वारा ढँककर तत्काल राजा वरेण्य के पास लौट आये ॥ १२-१३ ॥

वहाँ सभा के मध्य में स्थित राजा को देखकर उन सेवकों ने प्रणाम किया, तदुपरान्त राजा से कहने लगे कि हे राजेन्द्र! हम लोग आपके आदेशानुसार सिंह- व्याघ्रादि से भरे हुए वन में उस बालक को छोड़कर लौट आये हैं। अबतक तो सम्भवतः वन्य पशुओं ने उसका भक्षण भी कर लिया होगा ॥ १४१/२

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी !] जबतक उस बालक का भक्षण करने के लिये शृगाल [आदि वन्य जीव] आते, तबतक उसे करुणानिधि महर्षि पराशर ने देख लिया। चार भुजाओं से युक्त, हाथीके-से मुखवाले, दिव्य वस्त्रों से विभूषित, नानाविध आभूषणों से समन्वित, चिन्तामणि से अलंकृत, सर्प से आवेष्टित उत्तम नाभिदेश वाले अर्थात् सर्प की करधनी धारण किये हुए तथा करोड़ों सूर्यों के सदृश देहकान्ति वाले उस शिशु को देखकर वे मोहित हो गये। वे मुनिवर समस्त ज्ञान-विज्ञान के आश्रय थे, तथापि उस बालक की माया के कारण वे चिन्तित हो उठे और सोचने लगे कि ‘क्या यह विघ्न मेरे विनाश के लिये इन्द्र ने स्वार्थवश निर्मित किया है; क्योंकि उन्हें मेरी तपस्या का विनाश ही अभीष्ट है। सर्वदा पाप से डरने वाले मैंने तो अल्पमात्र भी दुष्कृत्य नहीं किया । हे चन्द्रचूड! हे दीनरक्षक ! इस महान् भय से मेरी रक्षा कीजिये ‘ ॥ १५–१९१/२

मुनि को इस प्रकार शोकाकुल देखकर भगवान् गजानन को बड़ी दया आयी और उन्होंने उनके मोहजाल को नष्ट कर दिया, तब वे मुनिवर भक्तों के रक्षणार्थ इस प्रकार का वेष बनाकर अपने समक्ष विद्यमान साक्षात् परब्रह्म परमात्मा उन गजानन को देख सके ॥ २०-२११/२

पराशरजी बोले —  आज मेरा जन्म लेना सार्थक हो गया, मेरे माता-पिता तथा मेरी महान् तपश्चर्या भी धन्य हो गयी। आज मैंने आवागमन के चक्र से अपने को मुक्त कर लिया तथा अभीष्ट फल पा लिया । न जाने किस भाग्यहीन ने इन बालरूप गजानन को वन के मध्य में लाकर छोड़ दिया ॥ २२-२३ ॥

ब्रह्माजी बोले —  ऐसा कहकर वे मुनि उस बालक को अपने आश्रम में ले गये । वहाँपर वात्सल्यमयी मुनिपत्नी ने वैसे (विलक्षण रूपवाले) बालक को देखा और यह जानकर कि इसे मेरे पतिदेव लेकर आये हैं, वह स्नेहशीला [स्त्री] प्रसन्नता से भर गयी ॥ २४१/२

तदुपरान्त उसने बालक को हृदयसे लगा लिया और प्राणेश्वर पतिदेव से कहने लगी — हे स्वामिन्! सुदीर्घकाल से की जाने वाली आपकी उत्कट तपश्चर्या आज सफल हो गयी। जिसके स्वरूप को ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मीपति विष्णु तथा मुनिजन भी जान नहीं सके, उन (गजाननदेव)-का आज हम लोग प्रत्यक्ष अवलोकन कर रहे हैं । हे स्वामिन्! जो प्रभु समस्त जगत्प्रपंच के स्रष्टा, रक्षक तथा संहारक हैं तथा नानाविध अवतार ग्रहण करने वाले हैं, जो भूभार का हरण करने के लिये अवतीर्ण हुए हैं, जिनका साक्षात्कार कर पाने में इन्द्रियों के सहित मन भी कभी समर्थ नहीं होता, वे विश्वभर्ता प्रभु आज बिना प्रयत्न के अनायास ही दृष्टिगोचर हुए हैं, यह हम लोगों का महान् सौभाग्य है ॥ २५-२८१/२

ब्रह्माजी बोले —  बालक का स्पर्श होते ही [नारी- सुलभ स्नेह के कारण] मुनिपत्नी के स्तन पुष्ट तथा दुग्धयुक्त हो गये। बालक जब स्तनपान करने लगा तो इससे मुनिपत्नी आनन्दविभोर हो उठीं ॥ २९१/२

तदुपरान्त जब उन राजा वरेण्य को यह सूचना मिली कि दिव्य दृष्टिसम्पन्न महर्षि पराशर के द्वारा बालक का पालन-पोषण किया जा रहा है, तो वे अतिशय हर्षित हो गये और उन्होंने खूब बाजे बजवाये तथा प्रत्येक घर में शर्करा (मिठाई) बँटवायी । राजा ने ब्राह्मणों तथा बन्धु- बान्धवों को [ इस अवसर पर] सुवर्ण, रत्नराशि तथा वस्त्रादि के द्वारा सन्तुष्ट किया ॥ ३०-३२ ॥ [उन बाल गजानन के आ जाने से] गायें कामधेनु के सदृश [प्रचुर दुग्ध देने वाली ] हो गयीं, सूखी बावड़ियाँ जलपूर्ण हो गयीं और उन पराशरमुनि के आश्रम के सूखे वृक्ष भी फलों से लद गये। जो मनुष्य इस [गजाननलीलारूप वृत्तान्त ] – का श्रवण करेगा, वह पुत्र तथा धन-वैभव से सम्पन्न हो जायगा ॥ ३३-३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘पराशरदर्शन’ नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३३ ॥

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