श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-134
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय
पराशराश्रम में मूषक का प्रबल उपद्रव और गजानन का उसे दमित कर अपना वाहन बनाना
अथः चतुस्त्रिंशाधिकशततमोऽध्यायः
मूषकवाहनरूपधारणं

ब्रह्माजी बोले —  वह बालक अपनी लीलाओं के द्वारा माता-पिता को आनन्दित करता हुआ [महर्षि पराशर के आश्रम में] दिन- अनुदिन वैसे ही बढ़ने लगा, जैसे [शुक्लपक्ष में] चन्द्रमा बढ़ता है ॥ १ ॥

व्यासजी ने कहा — हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! आप गुणेश के द्वापरयुगीन चरित्रों का वर्णन कीजिये, उनके पूर्वकालिक चरित्रों को सुनकर मैं तृप्त नहीं हो सका हूँ । हे चतुरानन! इन [गौरीनन्दन] – का ‘गजानन’ यह नाम कैसे हुआ और वाहन मूषक क्यों बना – यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ २-३ ॥

ब्रह्माजी बोले —  इस विषय में एक पुरातन इतिहास [विद्वज्जन] बतलाते हैं, जिसमें भृगुवंशी कवि अर्थात् महर्षि शुक्र के साथ प्रह्लाद का संवाद हुआ था ॥ ४ ॥ प्राचीन काल में प्रह्लादजी ने इसी प्रकार महामुनि शुक्र से पूछा था, तब उन्हें भगवान् कवि (शुक्राचार्य) -ने जो बतलाया था, उसे इस समय [मुझसे] श्रवण करो ॥ ५ ॥

शुक्राचार्य ने कहा —  हे प्रह्लाद ! जिस कारण से मूषक इन गजानन का वाहन बना, उसे मैं तुम्हें बता रहा हूँ, उस [वृत्तान्त]- |- का तुम श्रवण करो, [ क्योंकि ] वह सुननेमात्र से समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाला है ॥ ६ ॥ प्राचीन काल की बात है, इन्द्र की सभा में क्रौंच नामक श्रेष्ठ गन्धर्व ने शीघ्रतावश वामदेवमुनि को चरणों के अग्रभाग से ठोकर मार दी, इससे [कुपित हुए] मुनि ने उसे शाप दे दिया कि हे गन्धर्व! तू मूषक बन जायगा ॥ ७१/२

क्रौंच ने मुनि से शापमुक्ति के लिये आदरपूर्वक प्रार्थना की, तो वे उससे बोले कि तुम मृत्युलोक में [जाकर ] सभी के लिये अत्यन्त दुर्धर्ष मूषक बनोगे तथा तुमको नियन्त्रित करके भगवान् गुणेश्वर अपना वाहन बना लेंगे। वे विश्वस्रष्टा गुणेश ही तुम्हारे प्रति सदय होकर मोक्ष प्रदान करेंगे। तब वह गन्धर्व मूषकके-से रूपवाला हो गया और [स्वर्ग से च्युत होकर ] महर्षि पराशर के आश्रम परिसर में आ गिरा ॥ ८-१० ॥

वह पर्वतशिखर के सदृश विशाल तथा भयानक आकृति वाला और महान् पराक्रम से सम्पन्न था। उसके रोम, नख तथा दाढ़ें- ये सभी अतीव दीर्घाकार थे और वह प्रबल गर्जना कर रहा था ॥ ११ ॥ उसने पराशरजी के आश्रम में घनघोर उपद्रव प्रारम्भ कर दिया। वहाँ जो अनाज रखा था, उसने सबका भक्षण कर डाला और मिट्टी के बरतनों को तोड़-फोड़ दिया । [आश्रम में रखी हुई] पुस्तकें, कपड़े, उत्तम वल्कल तथा और भी जो कुछ सामग्री थी, उस मूषक ने सबका भक्षण कर लिया ॥ १२-१३ ॥ उसने अपनी पूँछ के आघात से वृक्षों को भूतल से उखाड़ फेंका और अपनी ‘चूँ-चूँ’ इस ध्वनि से पूरे संसार को प्रतिध्वनित कर दिया ॥ १४ ॥

उस मूषक के वैसे कार्यकलापों को जानकर मुनीश्वर पराशरजी चिन्तित हो गये और सोचने लगे कि दुरात्मा [जनों ] -के उपद्रवों से युक्त स्थान तो निस्सन्देह त्याग देने योग्य ही होता है ॥ १५ ॥ इस समय कहाँ जाया जाय, किस स्थान पर रहने से सुख होगा और [ यदि यहीं रहकर ] प्राणोत्सर्ग करूँ तो [ वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि ] शास्त्र-चिन्तकों ने प्राण-त्यागको महान् अपराध बतलाया है। इस सुखद आश्रम में न जाने किस कर्मविपाकवश दुःख प्राप्त हो रहा है ? इस समय मैं किसका स्मरण करूँ और कौन इस दुःख से हमें छुड़ायेगा? इस आश्रम में ऐसा कौन है, जो इसका नाश कर सकेगा, इसका वध कर पाने में कौन समर्थ हो सकेगा? आज मैं किसकी शरण में जाऊँ और कौन हमें बचायेगा? ॥ १६–१८ ॥

ब्रह्माजी बोले —  अपने [ धर्मतः ] पिता पराशरजी की ऐसी बातें सुनकर अनन्तपराक्रमी बालक गजानन ने मधुर वाणी में कहा कि महान् प्रभावसम्पन्न तथा दुष्टों का संहार करने वाले मेरे होते हुए आप तनिक भी चिन्तित न होइये । मैं जब आपका पुत्र बना हूँ तो जो कुछ भी आपको प्रिय होगा, वह अवश्य ही सम्पन्न करूँगा ॥ १९-२० ॥ हे मुने! मेरे गर्जन से यह पृथिवी फटने लगती है और मेरे चरणों के आघात से पर्वत चूर-चूर हो जाते हैं। ‘हे तात! मेरा कौतुक देखिये, अभी मैं इस मूषक को अपना वाहन बनाता हूँ।’ ॥ २११/२

ऐसा कहकर शिशु गजानन ने करोड़ों सूर्यों के सदृश प्रकाशमान अपना पाश फेंका ॥ २१-२२ ॥ वह पाश [नीले] आकाश में जाकर वैसे ही शोभित हो रहा था, जैसे बादलों के बीच में बिजली शोभायमान होती है। तब देवताओं ने भय के कारण उसी क्षण अपने-अपने निवासस्थान त्याग दिये अर्थात् भागने लगे ॥ २३ ॥ वह [मूर्तिमान्] पाश मुख से मानो अग्नि का वमन करता हुआ और दसों दिशाओं में भ्रमण करता हुआ पाताल [-तक पहुँच गया और वहाँ]-से मूषक का कंठ बाँधकर उसे बाहर ले आया । मूषक पाश की शक्ति से व्यथित होकर गम्भीररूप से मूर्च्छित हो गया और [कुछ काल के उपरान्त चैतन्य लाभ करके] अतिशय क्रुद्ध हो गया । मूषक का [कंठ बँध जाने के कारण] श्वास अवरुद्ध हो रहा था, इससे वह शोक से व्याकुल हो उठा ॥ २४-२५ ॥

वह [मन-ही-मन] कहने लगा कि [ मैं तो स्वयं सबका अन्त करने में समर्थ हूँ, तब मुझ] काल का मरण क्या सम्भव है, [अतः प्रतीत होता है कि यह ] प्रारब्ध की ही रचना है। जो कुछ होना होता है, वह होकर रहता है, पुरुषार्थ तो निरर्थक ही है ॥ २६ ॥ जिसने केवल अपनी दाढ़ों के अग्रभाग से बहुत सारे पर्वतों को विदीर्ण कर दिया था, वह मैं कभी देवताओं, असुरों, राक्षसों अथवा मनुष्यों को [अपने समक्ष] गिनता ही नहीं था । ऐसे पराक्रम वाले मुझको कौन पाश के द्वारा आक्रान्त कर मरणोन्मुख कर रहा है ! ॥ २७१/२

ब्रह्माजी बोले —  वह मूषक जब इस प्रकार बोल रहा था, तभी गजानन ने संकल्पबल से पाश को खींचा तो जैसे गारुड़ी विद्या को जानने वाला सर्प को तत्काल खींच लेता है, वैसे ही मूषक के सहित वह पाश खिंचा चला आया ॥ २८-२९ ॥ पाशबद्ध कंठ वाला वह मूषक गजानन को देखते ही तत्काल उनके वास्तविक स्वरूप को जान गया और उन अनामय, विभु गजाननदेव को नमस्कार करके परम भक्ति-भाव से चिदानन्दघन प्रभु का स्तवन करने लगा ॥ ३०१/२

मूषक बोला — [हे देव !] आप ही समस्त विश्व के स्वामी, निर्माता, पालक एवं संहारक हैं। आप गुणत्रय से परे होकर भी गुणत्रय को [सृष्टि आदि प्रयोजनों से ] अंगीकार करते हैं। आप माया से अतीत हो करके भी माया के प्रवर्तक एवं मायावियों को भी मोहग्रस्त करने वाले हैं। मुनिजनों के हृदयकमल में अधिष्ठित होने वाले आपको ब्रह्मा आदि भी नहीं जान पाते। आप ही कारण, करण (साधन), कर्ता तथा कारणों के भी कारण हैं ॥ ३१–३३ ॥ हे विभो! मेरा परम सौभाग्य है कि जो श्रुतियों के द्वारा भी अगोचर हैं, उन [आप]-को मैंने आज अपनी आँखों से देखा है, अतएव मेरा जन्म लेना तो सार्थक हो गया। मेरे माता-पिता, नेत्रयुगल, विद्या, तपस्या, व्रत और जप – ये सभी धन्य [ और सफल] हो गये ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले —  मूषक के ऐसे स्तुति वाक्य सुनकर गजानन प्रसन्न हो गये और उसका अपने प्रति अविचल भक्तिभाव जानकर वे विभु मूषक से कहने लगे —  ॥ ३५ ॥

हे निष्पाप मूषक! देवताओं और ब्राह्मणों से द्रोह करने वाले तुम्हारे ही पुरुषार्थ के कारण मैं निर्गुण होकर भी दुष्टों का नाश तथा सत्पुरुषों की रक्षा करने के लिये सगुण बन गया हूँ। तुमने जो मेरी शरण ग्रहण कर ली. है, इसलिये मैंने तुम्हें अभय दे दिया, अब तुमको जिस वर की आकांक्षा हो, उसे माँग लो ॥ ३६-३७ ॥

मूषक बोला — हे गजानन ! मुझे आपसे कोई वर नहीं चाहिये, यदि आप चाहें तो मुझसे वांछित वर माँग लीजिये ॥ ३७१/२

ब्रह्माजी बोले — उस घमण्डी चूहे के ऐसा कहने पर गजानन उससे बोले कि [हे मूषक !] यदि तुम सच में वर देने की बात कह रहे हो, तो मेरे वाहन बन जाओ। जब मूषक ने कहा कि ‘ऐसा ही हो’, तो पिंगलनेत्र गजानन तत्काल उसे आक्रान्त करके उस मूषक पर आरूढ़ हो गये ॥ ३८-३९ ॥ जब गजानन उसे अपने भार से चूर-चूर करने लगे तो वह [अत्यन्त पीड़ित हो गया और ] उन देवदेव से बोला कि प्रभो ! मैं तो आपका वाहन हूँ, अतः [मुझ पर कृपा करके आप] अल्प भार वाले हो जाइये ॥ ४० ॥

उसके याचनापूर्ण वचनों के कारण विभु गजानन अल्प भार वाले हो गये। इस महान् आश्चर्य को देखकर महर्षि पराशर ने [ गजानन को] प्रणाम करके कहा —  मैंने तीनों लोकों में कहीं भी [ किसी] बालक में [ऐसा ] पौरुष नहीं देखा, [जैसा कि तुमने प्रकट किया है ।] जिसके घोष से पर्वत विदीर्ण हो गये और लोकपाल [तक] अपने-अपने स्थानों से पतित हो गये, उस मूषक को तुमने बलपूर्वक क्षणमात्र में अपना वाहन बना लिया ॥ ४१-४२१/२

इसी बीच में बालक की ममतामयी माता अर्थात् मुनिपत्नी वहाँ पर आयीं और उन शिशुरूप गजानन को प्रीतिपूर्वक गोद में लेकर झरते हुए दूध वाले स्तनों से दुग्धपान कराने लगीं। माता ने शिशु से कहा कि मैं तुम्हारा न तो वास्तविक स्वरूप जानती हूँ और न तुम्हारे पराक्रम का ही मुझे ज्ञान है। हम लोगों के जन्म- जन्मान्तर के पुण्यों के कारण ही तुम हमारे घर आये हो । इसके उपरान्त वे गजानन मूषक को बाँधकर साधारण बालक की भाँति क्रीडा करने लगे । [ब्रह्माजी ने व्यासजी से कहा कि ब्रह्मन्!] इस प्रकार से मैंने गणपति के मूषकवाहन होने की कथा आपको सुनायी ॥ ४३–४५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘क्रौंचाक्रमण’ नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३४ ॥

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