श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-135
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय
गजानन के वाहन मूषक के पूर्वजन्म का वर्णन
अथः पञ्चत्रिंशोत्तरशततमोऽध्यायः
क्रौञ्चशापवर्णनं

व्यासजी ने कहा —  हे पद्मज ! उस मूषक ने पूर्व में ऐसा क्या पाप और पुण्य किया था, जिसके कारण उसे मूषकयोनि तथा गजाननदेव के वाहकत्व की प्राप्ति हुई ? हे ब्रह्मन् ! मेरे इस कौतूहल का आप समग्रतः समाधान कर सकते हैं, अतः यह बात विस्तार से बतलाइये कि वह पूर्वजन्म में कौन था?॥ १-२ ॥

ब्रह्माजी बोले —  हे वत्स ! तुमने उचित प्रश्न किया है। यह तो मेरे मन को भी प्रिय जान पड़ता है । इस प्रसंग में वह समस्त वृत्तान्त मैं तुम्हें बता रहा हूँ, उसे एकाग्र चित्त से सुनो ॥ ३ ॥ सुमेरुपर्वत के शिखर पर महर्षि सौभरि का विशाल तथा रमणीक आश्रम था। वह वृक्षों से परिपूर्ण और नाना प्रकार के पक्षियों से भरा था। उसमें अनेक बावड़ियाँ और सरोवर थे तथा बहुत-से मुनिजन वहाँ रहा करते थे ॥ ४ ॥ वहाँ महर्षि सौभरि के दर्शनार्थ दिनानुदिन वसिष्ठ आदि मुनिजन एवं इन्द्रप्रभृति देवगण आया करते थे । महर्षि सौभरि परमात्मा के अनुचिन्तन में निरत और विपुल तप के कारण बढ़े हुए तेज से सूर्य तथा अग्नि से अधिक तेजस्वी जान पड़ते थे। उनकी प्रसिद्धि समस्त लोकों में व्याप्त थी ॥ ५-६ ॥

उनकी धर्मपत्नी मनोमयी नाम से विख्यात एवं परम सौभाग्यशालिनी थी। पतिव्रताओं के मध्य विशेष रूप से चर्चित उस मुनिपत्नी पर महर्षि की विशेष प्रीति थी । उसकी सुन्दरता ने रति के समग्र रूप लावण्य को जीत लिया था और शची आदि सभी देवियाँ तो उसकी सुन्दरता के अंशमात्र की भी बराबरी करने में असमर्थ थीं ॥ ७-८ ॥

किसी समय की बात है, महर्षि सौभरि ने यज्ञशाला में सावधान मन से प्रात:कालीन होमकृत्य सम्पन्न किया और समिधा लाने के लिये वन चले गये। उस समय सदाचारिणी मनोमयी घर में ही थी और घर के कार्यों को सम्पन्न करने में लगी थी ॥ ९१/२

उसी समय वहाँ क्रौंच नामक दुष्ट गन्धर्व आ पहुँचा। नानाविध शालाओं (यज्ञशाला, पाठशाला, पाकशाला आदि) – से युक्त तथा सघन और शीतल छायावाले उस उत्तम आश्रम को देखकर उसकी सारी थकावट दूर हो गयी ॥ १०-११ ॥

[वह कहने लगा कि] जिसका ऐसा सुषमासम्पन्न आश्रम है, वह प्रभावशाली व्यक्ति तो सर्वथा धन्य ही है, उसका जप-तप भी धन्य है । क्षणभर में सुखी कर देने वाले इस आश्रम में तो चिरकाल पर्यन्त रहने से मोक्ष भी मिल सकता है — ऐसा कहता हुआ वह गन्धर्व मुनि के भवन में प्रविष्ट हुआ ॥ १२१/२

वहाँ उसने मनोमयी के चन्द्रसदृश मनोहर मुख का अवलोकन किया, जिसके दर्शनमात्र से भगवान् शिव भी मोहाकुल हो जायँ; ऐसी [परम सुन्दरी] मनोमयी की उस पर दृष्टि पड़ते ही वह कामाग्नि से सन्तप्त हो उठा और आसक्तिवश उसने मनोमयी का एकाएक हाथ पकड़ लिया ॥ १३–१४१/२

गन्धर्व के हाथ पकड़ते ही [सतीत्वनाश के भय से पतिव्रता] मनोमयी काँपने लगी और मूर्च्छित-सी हो गयी। उसका कंठ सूख गया, कान्ति मलिन हो गयी, शरीर स्वेदपूरित हो उठा और आँखों से अश्रुवर्षा होने लगी। पति के स्मरण में तत्पर [महासती] मनोमयी ने [तपोनाश के भय से] उसको शाप नहीं दिया ॥ १५-१६ ॥ उसे अतीव उद्वेग हुआ। वह किंकर्तव्यविमूढ हो सोचने लगी कि मैं इस समय किसकी शरण में जाऊँ, कौन मुझे इस दुष्ट से छुड़ायेगा ? मैंने अपनी स्मृति में इस जन्म में तो कुछ भी अपकर्म नहीं किया है, इसलिये लगता है कि किसी अन्य जन्म के पाप के कारण आज यह सुखध्वंसक दुःख उपस्थित हुआ है ॥ १७-१८ ॥

उस गन्धर्व की दूषित भावना को जानकर वह उसको समझाते हुए कहने लगी कि हे सुव्रत ! मैं तुम्हारी पुत्री के समान हूँ और तुम मेरे पिता के सदृश हो। तुम तो ज्ञानी हो, अतः पाप में मन को मत लगाओ; क्योंकि पापियों को करोड़ों वर्षों तक नरक में रहना पड़ता है ॥ १९-२० ॥ हे महाभाग ! इसलिये पुत्रीतुल्य मुझ दीन नारी को छोड़ दीजिये, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मैं निश्चय ही प्राणों का त्याग कर दूँगी । तब आपको स्त्रीवधजनित महापाप का भागी बनना पड़ेगा। मेरे महाभाग पतिदेव इस समय वन से लौटने ही वाले हैं, उनकी कोपाग्नि तुमको क्षणभर में भस्म कर देगी ॥ २१-२२१/२

[ यद्यपि ] उनकी आज्ञा के बिना मैं कोई साधारण- से- साधारण कार्य भी नहीं करती, तथापि [ यदि तुम नहीं मानोगे तो ] मैं तुमको और ब्रह्मा की सम्पूर्ण सृष्टि को भी भस्म कर डालूंगी ॥ २३१/२

जब वह इस प्रकार कह रही थी, तभी वहाँ महर्षि सौभरि आ पहुँचे ॥ २४ ॥ उस समय मध्याह्नकालीन सूर्य के सदृश तेजोदीप्त महर्षि को वहाँ घर के आँगन में उपस्थित देखकर उनके तेज से अभिभूत हुए गन्धर्व ने मुनिपत्नी का हाथ छोड़ दिया। वह नीचे की ओर देखने लगा और काँप उठा। उसकी कान्ति मलिन हो गयी और वह भयभीत हो गया । महर्षि सौभरि एकाएक प्रलयाग्नि के समान क्रोध से जल उठे और उसकी भर्त्सना करने लगे। तदुपरान्त उन्होंने गन्धर्व को बड़ा ही कष्टप्रद शाप दे दिया ॥ २५-२६१/२

मुनि ने कहा —  अरे मूढ़ ! छिपकर तूने मेरी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार किया है, इसलिये तू सर्वदा छिपकर विचरण करने वाला मूषक हो जायगा और भूतल को खोदकर चोर की भाँति अपना पेट भरेगा ॥ २७-२८ ॥

क्रौंच बोला — हे मुने! मैंने जान-बूझकर आपकी पत्नी मनोमयी से दुर्व्यवहार नहीं किया। इसे सुन्दर रूपवाली देखकर संयोगवश मेरी आसक्ति हो गयी । जिस समय आपने मुझे देखा, उस समय तक मैंने केवल इसका हाथ ही पकड़ा था और आपके तेज से भयभीत होकर मैंने [उसी क्षण] इस निष्पाप महिला को छोड़ भी दिया था । हे कृपानिधे! हे शरणागतवत्सल ! इसलिये आप मेरा अपराध क्षमा भी कर सकते हैं। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे अनुगृहीत कीजिये, मुझ पर कृपा कीजिये। मैंने तीनों लोकों में पतिव्रतोचित गुणों में इसकी समानता करने वाली स्त्री नहीं देखी ॥ २९-३२ ॥

मुनि ने कहा — अरे दुष्ट ! सुमेरुपर्वत भले ही सागर में तैरने लगे, सूर्य पश्चिम से उदय होने लगे और अग्नि भले ही शीतल प्रतीत होने लगे, किन्तु मेरी वाणी व्यर्थ नहीं हो सकती। इसपर भी मैं जो कह रहा हूँ, उसे अब आदरपूर्वक सुनो। जब द्वापरयुग में [गणपति-] देव पराशरमुनि के भवन में प्रकट होंगे और ‘गजानन’ इस नाम से विख्यात होंगे, तब तुम उनके वाहन बनोगे तथा ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा आदरसहित तुम्हारा सम्मान किया जायगा । भगवान् गजानन के द्वारा पकड़ लिये जाने पर शीघ्र ही तुम स्वर्गलोक को [पुन: ] प्राप्त कर लोगे ॥ ३३-३५१/२

ब्रह्माजी बोले —  इस प्रकार की उनकी बातें सुनकर वह गन्धर्व [गणपति का वाहन बनने के कारण ] सुख तथा [मूषकयोनि में जाने के कारण] दुःख का अनुभव करता हुआ विशाल मूषक बनकर भूतलपर गिर पड़ा ॥ ३६१/२

महर्षि सौभरि के आशीर्वाद के प्रभाव से अपार बल- विक्रम वाला और विशाल पर्वत के सदृश वह मूषक द्वापरयुग के प्रारम्भ होने पर पराशरजी के आश्रम में अवस्थित भगवान् गजानन के समीप जा पहुँचा और वहाँ वह महाबली मूषक गजाननदेव का वाहन बन गया। हे अनघ ! जिस प्रकार मूषक गजानन का वाहन बना, वह सब वृत्तान्त तुम्हारे पूछने पर मैंने बतला दिया है ॥ ३७–३९ ॥

मुनि ने कहा — हे ब्रह्मन् ! हे विभो ! उन भगवान् गणेश ने सिन्दूर दैत्य का वध किस प्रकार किया था ? हे चतुरानन ! उसे मुझको विस्तार से बतलाइये। आपकी बातें सुनकर मुझको उसी प्रकार तृप्ति नहीं हो रही है, जैसे अमृत का पान करते रहने पर भी तृप्ति नहीं होती । हे देवेश! आप सब कुछ जानने वाले हैं, और मैं भक्तिभाव से श्रवण कर रहा हूँ, इसलिये आप मुझे [ यह रहस्य ] बतलाइये ॥ ४०-४१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘क्रौञ्चशापवर्णन’ नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३५ ॥

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