December 3, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-148 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मों के भेद तथा गणेशगीता की महिमा अथः अष्टचत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः । गणेशगीता – त्रिविधवस्तुनिरूपणन्नामैकादशोऽध्यायः श्रीगणेशजी बोले — हे राजन् ! कायिक, वाचिक और मानसिक — इन तीन भेदों से तप भी तीन प्रकार का है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु- पण्डित-ब्राह्मण एवं देवता का पूजन करना तथा नित्य स्वधर्म का पालन करना – यह कायिक तप है ॥ १-२ ॥ जो मर्मस्पर्शी न हों, ऐसे प्रिय वचन बोलना, उद्वेगरहित, हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद- शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है ॥ ३ ॥ अन्तःकरण में प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना – यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ निष्काम भाव और श्रद्धा से जो तप किया जाता है, वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार – पूजा के निमित्त तथा दम्भसहित जो तप किया जाता है, वह राजसी तप है। राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरता को देने वाला है। जिसमें दूसरे को तथा अपने को पीड़ा हो, वह तामस तप कहा गया है ॥ ५-६ ॥ विधियुक्त, उत्तम देश-काल में सत्पात्र को श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया है। उपकार या फल की कामना से मनुष्य जो दान करते हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्ति के कारण दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है ॥ ७-८ ॥ जो देश-कालरहित, अपात्र में अवज्ञापूर्वक दिया जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तमोगुणी दान कहा गया है। हे राजन् ! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकार का है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकार के हैं, वह मैं प्रसंग से कहता हूँ ॥ ९-१० ॥ जो अनेक प्रकार के प्राणियों में एक मुझको ही देखता है तथा नाशवान् भूतों में मुझ नित्य को जानता है, हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है। जो उन अनेक भूतों से मुझे पृथक् स्वरूपवाला और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञान का नाम राजस है ॥ ११-१२ ॥ असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयों में लगना – इस ज्ञान का हेतुरहित, असत्य तथा देह और मन के सुख के लिये नाम तामस है। हे राजन् ! सत्, रज, तम – इन भेदों से कर्म भी तीन प्रकार का है, जिसे मैं बताता हूँ; सुनो, कामना, द्वेष और दम्भ से रहित जो नित्य कर्म है और फल की इच्छा से रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है ॥ १३-१४ ॥ जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फल की इच्छा से किया गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्ति के बाहर तथा अर्थ का क्षय करने वाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है ॥ १५-१६ ॥ इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकार के कर्ता होते हैं, जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन् ! धैर्य और उत्साहयुक्त, सिद्धि-असिद्धि में समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकार से रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है ॥ १७-१८ ॥ और जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसा में प्रवृत्ति फल की इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है। प्रमाद और अज्ञानयुक्त, दूसरों का नाश करने वाला, दुष्ट, आलसी और जो कुतर्क करने वाला है, वह तामसी कर्ता कहा जाता है। हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन प्रकार के हैं, वह तुम क्रम से सुनो, इनके भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ ॥ १९-२१ ॥ जो पहले तो विष के समान प्रतीत हो, किंतु दुःख का अन्त करने वाला हो और परमार्थोन्मुख बुद्धि से जिसकी कामना की जाती हो, जो अन्त में अमृत के समान हो तथा जो अपनी बुद्धि को आनन्द देने वाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। विषयों का जो सुख प्रथम तो अमृत के समान विदित हो और अन्त में विष के समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं ॥ २२-२३ ॥ जो तन्द्रा तथा प्रमाद से उत्पन्न हुआ हो, आलस्य से भरा हुआ हो तथा अपने में सदा मोह उत्पन्न करता हो, उसका नाम तामसी सुख है । ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो इन तीनों गुणों से मुक्त हो ॥ २४-२५ ॥ हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत् — इस भेद से तीन प्रकार का है और हे राजन् ! इस त्रिलोकी में सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – ये स्वभाव से ही भिन्न कर्म करने वाले हैं, इनके कर्म संक्षेप से मैं तुमसे कहता हूँ ॥ २६-२७ ॥ बाह्य और अन्तः इन्द्रियों को वश में करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकार के तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय- व्यतिरेक)-से आत्मा का ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और स्मृतियों का ज्ञान होना तथा उनके अर्थों का अनुष्ठान करना – ये ब्राह्मण के कर्म हैं ॥ २८-२९ ॥ दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्ध से पलायन न करना, शरणागत की रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता, मन की उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन ( तथा राज्यपालन)-के पाँच कर्मों में अधिकार- ये क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म हैं । अनेक प्रकार की वस्तुओं का क्रय- विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायों की रक्षा करना – ये तीन प्रकार के वैश्य के कर्म कहे गये हैं। हे राजन्! दान, ब्राह्मणों की सेवा तथा सदा शिवजी की उपासना – यह शूद्रों का कर्म कहा गया है ॥ ३०–३३ ॥ हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपा से निश्चल परम स्थान को प्राप्त करते हैं ॥ ३४ ॥ प्रिय राजन् ! इस प्रकार तुम्हारे स्नेह से मैंने अंग- उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योग का वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है ॥ ३५ ॥ हे राजन्! मेरे द्वारा कहे गये इस योग को धारण करो और किसी से इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे तो परम उत्तम सिद्धि को प्राप्त करोगे ॥ ३६ ॥ व्यासजी बोले — इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजी के वचन सुनकर राजा वरेण्य ने उनके वचन अनुसार आचरण किया। राज्य और कुटुम्ब को त्यागकर वेग से वे वन को चले गये और उपदेश किये गये योग में स्थित होकर मुक्त हो गये ॥ ३७-३८ ॥ इस महागुप्त योग का जो कोई श्रद्धा से श्रवण करता है, वह भी मुक्ति को प्राप्त हो जाता है; क्योंकि वह भी योगी के समान ही होता है । जो बुद्धिमान् इस योग के तात्पर्य को भलीभाँति अधिगत करके दूसरों को सुनाता है, वह भी योगी के समान मुक्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ जो इस गीता का भलीप्रकार अभ्यास कर तथा गुरुमुख से इसका अर्थ जानकर गणेशजी की पूजाकर प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालों में पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाता है और उसके दर्शन से भी मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन (प्रचुर धनव्यय से साध्य शास्त्रीय अनुष्ठान), न सांगोपांग वेदों के उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणों के श्रवण, न भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रों से भी ऐसे ब्रह्म की प्राप्ति होती है, जैसे इस गीता से मनुष्यों को प्राप्त होती है ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन चारों महापाप करने वालों का साथ करने वाले और स्त्री हिंसा, गोवध आदि करने वाले पापी भी इस गीता को पढ़ने से पापमुक्त हो जाते हैं। जो नियम से इसे नित्य पढ़ता है, वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप हो जाता है और जो चतुर्थी के दिन इसे भक्ति से पढ़ता है, वह भी मुक्त हो जाता है ॥ ४५–४७ ॥ उन-उन पुण्यक्षेत्रों में जाकर स्नान करके गणेशजी का पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीता का पाठ करने वाला ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष में चतुर्थी के दिन भक्तिपूर्वक वाहन और आयुधसहित श्रीगणेश की मृत्तिका की चतुर्भुज मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात बार इस गणेशगीता का पाठ करता है, उस पर सन्तुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं ॥ ४९–५१ ॥ विद्यार्थी को विद्या, सुखार्थी को सुख, कामार्थी को नानाविध कामों की प्राप्ति होती है और अन्त में वे मुक्ति को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मैंने आपको समस्त [गीतोपदेश ] बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं ? ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘त्रिविध वस्तुविवेकनिरूपण’ नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४८ ॥ Content is available only for registered users. 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